Bihar Unique Villages

बिहार के अनोखे गांव: अपराध, अजीब परंपराएं और अनसुनी सामाजिक कहानियां

बिहार के ‘हाजरा गांव’ में लोगों की शादी तभी होती है, जब वे कोई अपराध करते हैं। इसी प्रदेश के मिसरा मठिया गांव के अधिकतर निवासी कुंवारे ही रह जाते हैं, क्योंकि उस गांव के लोगों पर आरोप है कि वे चोरियां करते हैं और डकैतियां डालते हैं। हाजरा गांव, जमुई जिले में और मिसरा…


बिहार के ‘हाजरा गांव’ में लोगों की शादी तभी होती है, जब वे कोई अपराध करते हैं। इसी प्रदेश के मिसरा मठिया गांव के अधिकतर निवासी कुंवारे ही रह जाते हैं, क्योंकि उस गांव के लोगों पर आरोप है कि वे चोरियां करते हैं और डकैतियां डालते हैं। हाजरा गांव, जमुई जिले में और मिसरा मठिया गांव सिवान जिले में हैं। इस प्रदेश में अजीबो-गरीब ‘विशेषताओं’ वाले ऐसे और भी कई गांव हैं। कहीं पूरा-का-पूरा गांव भीख मांगता है, तो कहीं पूरा गांव वेश्यावृत्ति में लगा है। किसी गांव के करीब सारे लोग लंगड़े हैं तो किसी गांव में अब भी बाल-विवाह की परंपरा कायम है। हाजरा के छह सौ परिवार सदियों से अपराधों में लगे हैं। इन हरिजन परिवारों के सदस्यों की शादी तभी हो पाती है, जब वे अपराध करना शुरू करते हैं, क्योंकि रोटी कमाने के लिए उनका यही परंपरागत पेशा है। जो चोरी नहीं करता, उसकी शादी नहीं होती। रोजगार के किसी ठोस अवसर के अभाव में हाजरा परिवार अपने पुश्तैनी ‘धंधे’ को ‘आधुनिक’ बना रहे हैं। पहले वे लाठी, भाला, तीर-धनुष के साथ अपराध करते थे। अब वे पिस्तौल चला रहे हैं। वे अपने जिले में अपराध नहीं करते। इन्होंने बगल के जिलों को आपस में बांट लिया है। कोई निर्धारित भूभाग के बाहर अपराध नहीं करता। अगर करे तो उसे सजा मिलती है।

उधर बिहार के एक गांव की आबादी घटती जा रही है। सवर्णों के उस गांव में आजादी के समय करीब दो सौ मर्द थे। उनकी संख्या घटकर अब नब्बे रह गई है। यह गांव सिवान जिले में है। वहां के लोगों पर चोरी और डकैती के आरोप हैं। इस गांव को ‘चोखा गांव’ भी कहा जाता है। इसीलिए इस गांव में कोई अपनी बिटिया व्याहना नहीं चाहता। नतीजा यह है कि इस छोटे से गांव में अभी चालीस अविवाहित हैं। इन अविवाहितों की उम्र तीस से 70 साल तक है। इस गांव के कुछ लोगों ने बंगाल से लड़की लाकर व्याह रचना शुरू किया है। किन्तु उनकी संख्या कम है। इस गांव के एक छोटे भाई ने बंगाल से लड़की-लाई तो गांव वालों की पंचायत बैठी। पंचों ने फैसला किया कि लड़की बड़े भाई को व्याह दी जाए ताकि छोटे का भी उस पर ‘हक’ बना रहे। इस तरह दो आदमी का ‘परिवार’ बस जाएगा। इसी तरह से उस गांव में काम चलाया जा रहा है।

मुजफ्फरपुर जिले के औराई प्रखंड में हरिजनों का एक गांव है – बड़ा खुर्द। दस साल की उम्र आते-आते इस गांव के अधिकतर लोग लंगड़े हो जाते हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि जो लड़कियां दूसरे गांवों से इस गांव में व्याह कर लाई जाती हैं, वे भी थोड़े दिनों में लंगड़ी हो जाती हैं। पुरुष तो दूसरे प्रदेशों के बड़े शहरों में जाकर भीख मांगकर अपना गुजारा कर लेते हैं, किन्तु महिलाओं को अधिक कष्ट होता है। मध्य बिहार के जहानाबाद जिले के निरसरपुर गांव में अधिकतर लोग ‘घर जमाई’ हैं। निरसरपुर गांव, अरवल से करीब दस किलोमीटर दक्षिण स्थित है। हालांकि उस गांव के लोग यह बात किसी को बताना नहीं चाहते। पटना के एक निवासी की उस गांव में ससुराल है। उसने यहां बताया कि उसे भी इस गांव में बस जाने का ‘आफर’ मिला था। किन्तु वे वहां नहीं गए।

उस गांव में काले रंग का एक विशेष प्रकार का धान पैदा होता है। कुछ लोगों की धारणा है कि शायद उसी धान का असर है कि वहां लड़कियां ज्यादा पैदा होती हैं। उत्तर बिहार के सारण जिले में नया गांव रेलवे स्टेशन के बगल में मठ-ककड़ा नामक एक गांव है। इसमें गोसाईं ब्राह्मण रहते हैं। गांव के ज्यादातर लोग भीख मांगते हैं। अधिकतर लोग गेरुआ वस्त्र पहनते हैं और कंधे पर झोला लटका कर रोज भीख मांगने निकल जाते हैं। किन्तु उस गांव की नई पीढ़ी इस काम से धीरे-धीरे अलग होती जा रही है। रांची जिले के टाटी सिलवे थाने में सरई टोली गांव है।

महिलौंग पंचायत के इस गांव के युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति आम है। आए दिन यहां के युवा खुदकुशी की कोशिश करते हैं। कुछ बच जाते हैं, कुछ जान दे देते हैं। छोटी-छोटी बातों पर भी वे जान देने पर उतारू हो जाते हैं। आत्महत्या की कोशिश करने वाले युवक और युवतियों की औसत उम्र करीब बीस साल है। बेगूसराय जिले में मुसहरों (अनुसूचित जाति) का एक गांव है जहां की पूरी आबादी चोरी से हुई आमदनी पर निर्भर है।

इस गांव के लोग बगल के गढ़हरा यार्ड से रेलवे की संपत्ति की चोरी करते हैं। आरपीएफ, स्थानीय पुलिस और रंगदारों को इन चोरों से नियमित रूप से ‘कमीशन’ मिलता है। वे चोरी से हुई आमदनी का अधिकांश दारू पीने पर खर्च कर देते हैं। रोजगार के अभाव में वे चोरी के धंधे को जारी रखने के लिए मजबूर हैं।

धनबाद जिले के गोविंदपुर ब्लॉक के पचरुखी गांव के करीब छह सौ लोग सपेरा का काम करके अपनी जीविका चलाते हैं। पीढ़ियों से ये लोग इसी पेशे में लगे हुए हैं। इस गांव में बच्चे भी सांपों से खेलते हैं। यहां तक कि शादियों में दहेज के रूप में सांप दिए जाते हैं। कुछ साल पहले सरकार ने उन्हें खेती के लिए कुछ जमीन दी थी। किन्तु सिंचाई के अभाव और खेती की जानकारी की कमी के कारण वे खेती नहीं कर सके। सपेरे अपने सांप लेकर रोज करीब पच्चीस-तीस किलोमीटर पैदल गांव-गांव घूमते हैं तो उन्हें करीब बीस-तीस रुपए मिल पाते हैं। किन्तु वनों के निरंतर विनाश के कारण सांपों की कमी पड़ रही है। उनकी कठिनाइयां बढ़ रही हैं।

इनके घरों की महिलाएं चटाइयां बुन कर कुछ कमा लेती हैं। नवादा जिले के मुसलमान बहुल गांव रजहत के करीब-करीब सारे पुरुष होमियोपैथ डाक्टर हैं। नवादा जिला मुख्यालय से करीब दस किलोमीटर दूर बसे इस गांव के लोगों ने बेरोजगारी से लड़ने का नायाब तरीका ढूंढ लिया है। इस गांव के डा. अदीब नवादा में दवाखाना चलाते हैं। डा. अदीब के दवाखाने में रजहत के युवक डाक्टरी की शिक्षा लेते हैं। सुबह ही रजहत के डाक्टर अपने गांव से निकल जाते हैं। उनके घरों के पढ़े-लिखे बेरोजगार लड़के उनके लिए कंपाउंडर का काम करते हैं। इस गांव के डाक्टरों ने दूसरे स्थानों में अपना दवाखाना खोल रखा है। मर्दों की देखादेखी यहां की कई महिलाओं ने भी होमियोपैथी डाक्टरी सीख ली है।

भागलपुर जिले के कहलगांव के निकट के एक गांव की सारी-की-सारी स्त्री-आबादी के वेश्यावृत्ति में लगे रहने की खबर हाल के वर्षों तक यहां मिलती थी। ताजा स्थिति के बारे में कोई पक्की खबर नहीं मिल सकी। पिछली जानकारी के अनुसार ‘विशाल’ गांव की औरतें आसपास के गांवों के दबंग लोगों की रखैल रहीं। वही लोग इन औरतों का खर्च चलाते रहे।

भागलपुर जिले के धोरैया रजौन और बाराहाट प्रखंडों के कुछ गांवों में अब भी बाल-विवाह प्रचलित है। जन्मते ही बच्चों की शादी तय कर दी जाती है। यह प्रथा तिल्ली जाति में प्रचलित है। तीन प्रखंडों के करीब एक दर्जन गांवों में तिल्ली जाति की आबादी है। उनकी कुल आबादी करीब बीस हजार है। किन्तु प्रशासन इस खबर से खुद को अनजान बताता है।


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