हैदराबाद, मेदक, मदांशव पेठ, बीदर कमलपुर, गुलबर्गा, चिंचोली, बीजापुर आदि में चंद नेताओं की भुनभुनाहटों को छोड़ दें तो चारों ओर मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन की जय-जयकार है। चुनाव खर्च की बाबत चुनाव आयोग के कड़े निर्देशों का नतीजा यह हुआ है कि पैसे और ताम-झाम से बनने वाली चुनाव की मामा नदारद है। 800 किमी से ज्यादा की यात्रा में ‘कट आउट’ ‘बैनर’ तो कहीं देखने को ही नहीं मिले।
शहरों और कस्बों में दर्जन-दो दर्जन की सीमा में ही पोस्टर भी लगे हैं। दीवारों पर भी इक्का-दुक्का जगहों पर ही पार्टी प्रचार के नारे लिखे गए हैं। पार्टियों के मुख्य चुनाव दफ्तरों में भी कोई ताम-झाम नहीं है। उम्मीदवारों की चुनाव प्रचार की लाउडस्पीकर लगी गाड़ियां भी हर क्षेत्र में एक-दो की संख्या तक ही सीमित हैं। पार्टियों की आम सभाओं में भी इस बार लोगों को ढोने के लिए गाड़ियां नहीं लगतीं। चिल्ल-पों, शोर-शराबा सब कुछ नदारद है।
ज्यादा उम्मीदवार सुबह से दोपहर तक चुनाव क्षेत्रों में घर-घर जाकर वोट के लिए हाथ जोड़ रहे हैं और दोपहर बाद इलाके-इलाके में कार्यकर्ताओं की समूह बैठकें कर रहे हैं। भाषणों में निकलने वाले जहरीले गुबार भी इस बार संयमित हैं। गुलबर्गा के मेयर प्रेम नाथ कृपा कहते हैं: ‘चुनाव की चुप्पी का यह आलम है कि गांवों में औरतें अचरज से पूछती हैं कि चुनाव हो रहे हैं?’ वे चूड़ियां, बिंदी, टिकुली, बैज बांटने वाली गाड़ियां, उनके दहाड़ते लाउडस्पीकर, झंडाबरदारों और आचार्य धर्मेंद्र के कैसेट, सिनेमा दिखाने वाले प्रोजेक्टर, जीप-ट्रैक्टर इस बार सब गायब हैं।
पार्टी दफ्तरों में कार्यकर्ताओं को मिलता खाना और शराब भी इस बार सामने नहीं है। कार्यकर्ताओं में जो कुछ लेन-देन हो रहा है वह पर्दे के पीछे ही है। शेषन का नाम शहर-कस्बे से लेकर गांवों तक अचरज और प्रशंसा से छाया है। हुमनाबाद की प्रौढ़ा घरेलू महिला गुलनाज अचरज से कहती हैं- ‘करिश्मा हुआ है।’ लोगों में छाई शेषन की इस छवि का थुलथुल, मोटापे, गदराए और गली-गली पैदल घूमते पसीने से तर नेताओं पर भी यह असर हुआ है कि अपनी ओर से ही बात चलाकर वे शेषन की तारीफ करने लगते हैं। यह तारीफ मंत्री धर्म सिंह के मुंह से भी निकल रही है, वीरेंद्र पाटिल के सुकुमार बेटे कैलाशनाथ पाटिल के मुंह से भी और हेलीकाप्टर घुमाकर दौड़ रहे बंगरप्पा की पार्टी के महासचिव मल्लिकार्जुन गुतेदार के मुंह से भी।
जनता दल के पूर्व मंत्री एस. के. कांत तो शेषन की जयकार में झड़ी ही लगा देते हैं- ‘शेषन ने चुनाव का माहौल ही बदल दिया है। गरीब उम्मीदवार भी अब चुनाव लड़ने की हालत में आ गए हैं। अब शोर, तमाशा, धन के प्रदर्शन के बदले उम्मीदवार के अपने किए काम पर चर्चा होगी। उसी से फैसला होगा।’ कांत यह कहने से नहीं मुकरते कि चुनाव खर्च सीमित करने के फैसले का सबसे बड़ा लाभ जनता दल को हो रहा है और सबसे ज्यादा सासत कांग्रेस उम्मीदवारों को हो रही है।
चुनाव आयोग ने कर्नाटक में चुनाव खर्च की सीमा 1,35,000 रुपए तय की है। नए नियमों के मुताबिक मित्रों और शुभचिंतकों, पार्टी की ओर से किया जाने वाला खर्च भी इसी में शामिल होगा। नियमों के मुताबिक चुनाव प्रचार का रोज-रोज का खर्च हिसाब बनाकर हर रोज चुनाव अधिकारी को भेज दिया जाना है। चुनाव प्रचार में चलने वाले साइकिल समेत हर वाहन के लिए पुलिस से पहले पास लेना है। पेट्रोल-डीजल गाड़ियों का खर्च उनको लगने वाले पेट्रोल के खर्च से नापा जा रहा है। प्रति गाड़ी मीटर रीडिंग समेत लगने वाले पेट्रोल का खर्च रोज चुनाव अधिकारी को भेजा जाना है। चुनाव प्रचार में निकलने वाली हर साइकिल पर रोज 10 रुपए खर्च माना जा रहा है।
पेट्रोल पंपों पर पुलिस का निर्देश है कि चुनाव प्रचार में लगी हर गाड़ी की मीटर रीडिंग और दिए गए पेट्रोल के लिए अलग से रजिस्टर बनाएं। पुलिस इन रजिस्टरों की भी जांच कर रही है। बिना पास लगाए चुनाव प्रचार में लगी गाड़ी को तुरंत जब्त कर लेने के निर्देश हैं। फूड और सिविल सप्लाईज कारपोरेशन के चेयरमैन बाबू राव चिनसूर चितापुर से कांग्रेस उम्मीदवार हैं। वे चेयरमैन की अपनी गाड़ी चुनाव प्रचार में लगाए थे। कलेक्टर ने उस गाड़ी को जब्त करके चुनाव प्रचार से जबरन हटवाया है। उम्मीदवार के साथ तीन से ज्यादा गाड़ियां चलने के नियम नहीं हैं।
गुलबर्गा के कमलपुर चुनाव क्षेत्र में डीएसपी समेत पुलिस के दो अधिकारियों की कांग्रेस प्रत्याशी रामकृष्ण के यहां दावत चल रही थी। कलेक्टर और एसपी ने रात साढ़े ग्यारह बजे छापा मारकर उन्हें वहां पकड़ा और अब चुनाव उम्मीदवार से चुनाव सांठ-गांठ के लिए उन्हें सजा देने के लिए चुनाव आयोग से सिफारिश की गई है। गुलबर्गा में 18 को प्रधानमंत्री की भी सभा थी। इस सभा के लिए भीड़ ला रही बिना पास की डेढ़ दर्जन से अधिक गाड़ियां जब्त करके वापस भेज दी गई। नियमों का नतीजा यह हुआ है कि गुलबर्गा में प्रधानमंत्री की मीटिंग में तीन हजार लोग भी नहीं आए। बीदर में लोग न होने से मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली की सभा ही न हो सकी। बंगरप्पा बीदर में लोगों के जमा न होने पर ऊपर-ऊपर ही उड़ कर चले गए। सात-आठ हजार की सभा हो जाना तो बहुत बड़ी भीड़ मानी जा रही है।
अठारह नवंबर को प्रधानमंत्री की गुलबर्गा की सभा में कांग्रेस के उम्मीदवार सादात हुसैन को मंच पर भी जगह नहीं मिली। सादात हुसैन ने अखबारों को इंटरव्यू दिया कि प्रधानमंत्री बिना बुलाए आए। उनके आने से कांग्रेस का रहा-सहा वोट भी खत्म हो गया। गुलबर्गा में आज जाफर शरीफ ने धावा किया। पर न कहीं मजमा लगा। न कहीं साथ में भीड़ चली। वे ख्वाजा बंदा नवाज की दरगाह में माथा टेक कर लौटे पर आम सभा नदारद। बीदर में पिछले दिनों अटल बिहारी वाजपेयी की सभा में आई भीड़ को इस इलाके में उपलब्धि माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री की सभा में बिना पास की भीड़ जुटाने वाली गाड़ियां आ धमकी थीं। इसके लिए चुनाव आयोग से लिखित शिकायतें की गई हैं। उम्मीदवारों, नेताओं, चुनाव अधिकारियों का सब पर मर्यादित होने का दबाव काम कर रहा है। चुनाव नियमों का ठीक से पालन कर रहे अधिकारी को लोग अपनी ओर से उपाधि दे रहे हैं। गुलबर्गा के कलेक्टर मदन गोपाल का पूरी कार्यकारी में नाम ही ‘छोटा शेषन’ पड़ गया है। चुनाव नियमों के मुताबिक किसी दीवार पर नारा लिखने के लिए घर मालिक की लिखित इजाजत जरूरी है। गुलबर्गा जनता दल के उपाध्यक्ष गुलाम रसूल कहते हैं- ‘नतीजा यह हुआ है कि वही आदमी किसी का नारा लिखवाएगा जो उस पार्टी का कट्टर समर्थक हो।
दूसरे लोग इसकी या उसकी नाराजगी से बचना चाहते हैं।’ जान लें कि गुलबर्गा जैसे शहर में इन दबावों के चलते जनता दल उम्मीदवार एस.के. कांत ने एलान कर दिया कि उनकी ओर से दीवार पर नारे लिखे ही नहीं जाएंगे। चुनाव प्रचार से लाउडस्पीकर भी सुबह छह बजे से रात 10 बजे तक ही बजते हैं। आम सभाएं भी इसी अवधि में खत्म होती हैं। चुनाव खर्च के रोज-रोज हिसाब देने का नतीजा यह हुआ है कि उम्मीदवार सारा खर्च अंत के तीन-चार दिनों के लिए ही बचा कर रख रहे हैं।
अड़ग से जनता दल उम्मीदवार और विधानसभा के उपाध्यक्ष बी.आर. पाटील कहते हैं- ‘शेषन को धन्यवाद कि अब साइकिलों और शराब का बंटना नहीं चलेगा। साड़ियां और बिंदियां नहीं बटेंगी। चुनाव लोगों की जिंदगी में कोहराम लेकर नहीं आएगा।’ बीदर नगर पालिका के अध्यक्ष भाजपा के रमेश पांडे कहते हैं- ‘चुनाव में एक मर्यादा कायम हो रही है। पैसे वाले उम्मीदवार अभी भी लेन-देन करेंगे। लेकिन लेन-देन का, पैसे का नंगा नाच अब नहीं होगा। जान लें कि शेषन का नाम हर घर न सही हर पढ़े-लिखे आदमी के दिल और दिमाग पर पहुंच गया है।’



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