बी.एन. कालेज के नाम से चर्चित-प्रशंसित बिहार नेशनल कॉलेज की भूमिका बिहार के शिक्षा जगत में श्लाघ्य एवं रेखांकित रही है। स्वतंत्रता से पूर्व यह बिहार में ऐसा महाविद्यालय था, जहां राष्ट्रीयता की भावना समर्पण भाव से पल्लवित-पुष्पित होती थी। परिणामतः यह ब्रिटिश शासन का कोपभाजन बना रहा। आजादी के आन्दोलन में इसने स्वातन्त्र्यवीर सपूतों को पराधीनता से मुक्ति हेतु उत्प्रेरित किया। स्वतंत्रता-संग्राम में योगदान इसका नाम स्वतः सिद्ध प्रमाण है। उस स्वर्णिम अतीत का यह आज भी उद्घोष कर रहा है। बिहार के प्राचीन महाविद्यालयों में सिर्फ इसी का नाम राष्ट्रीय भावना से सम्बद्ध है।
इसका जन्म क्रांति की कोख से हुआ है। यद्यपि 1857 ई. के ‘सिपाही-विद्रोह’ को अंग्रेजों ने कुचल दिया, किन्तु उसकी चिनगारी बुझी नहीं थी। वैसे ही समय में राजनीतिक उद्देश्यों को लेकर राष्ट्रीय सम्मेलन अर्थात इंडियन नेशनल कांग्रेस का जन्म (28 फरवरी, 1885 को) हुआ, जो शुरू में सरकार से मिलकर अपनी मांग मनवाने वाली संस्था बनी, परन्तु भारतीय राजनीतिक चेतना-संपन्न लोग समझ चुके थे कि उसी आड़ में भारतीय राजनीति प्रज्ज्वलित होगी, अतः जो कांग्रेस प्रारम्भ में सरकार की कृपा दृष्टि पर चली, कालांतर में उसने जैसे ही तेवर बदले, उस पर सरकार की वक्र दृष्टि पड़ने लगी, लेकिन जनता जनार्दन में उसकी लोकप्रियता उत्तरोत्तर बढ़ती गई। फलतः जिस कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन (बम्बई, 1885) में सिर्फ 71 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए, उसी के पांचवे अधिवेशन (बम्बई, 1889) में 1,889 सदस्य सहभागी हुए। उसी पृष्ठभूमि में और उसी वर्ष अर्थात 1889 में राष्ट्रीय शिक्षा के प्रचार-प्रसारार्थ इस कालेज की स्थापना हुई।
पटना सचिवालय पर 9 अगस्त को तिरंगा फहराने के क्रम में अंग्रेजों की गोली के शिकार हुए उन सात छात्रों में चौथे-शहीद जगपति कुमार इस कॉलेज के द्वितीय वर्ष के तथा गया जिले के खराठी ग्रामवासी सुखराज बहादुर के वीर सपूत थे। इस कालेज को द्वितीय वर्ष के ही एक अन्य शहीद छात्र महेश्वर प्रसाद सिंह पर भी गर्व है, जिन्होंने 15 अगस्त, 1942 को सोनपुर स्टेशन पर अंग्रेजों की गोली से वीरगति पायी।
स्वाधीनता के बाद बिहार का पहला छात्र आन्दोलन 12 अगस्त, 1955 को यहीं से आरम्भ हुआ। बस भाड़े में अत्यधिक वृद्धि एवं बिहार परिवहन निगम के कर्मचारियों द्वारा छात्रों के साथ किये गये दुर्व्यवहारों को इसके विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर विरोध किया। परिणामतः तत्कालीन पुलिस पदाधिकारी पी.के.जैन के आदेश से चली गोलियों से इसके पश्चिमी दरवाजे पर भोजपुर जिलांतर्गत बलुआ ग्राम निवासी एवं साइंस कॉलेज के तृतीय वर्ष के छात्र दीनानाथ पाण्डेय सहित आठ ने अपने प्राणों की आहुति दी। उसकी शुरुआत पटना के अविस्मरणीय बलिदान दिवस 11 अगस्त को ही हुई जब छात्र शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित कर लौटे, तो उन्हें पता चला कि बस भाड़े की वृद्धि का विरोध करने वालों को गांधी मैदान बस डिपो में बेरहमी से पीटा तथा लूटपाट का आरोप लगाकर बंद कर दिया गया है।
खबर गांधी मैदान के समीपस्थ बी.एन. कॉलेज में बिजली की भांति फैली और उत्तेजित छात्र जुलूस की शक्ल में साथियों को छुड़ाने पहुंच गये। उस दिन तो किसी प्रकार मुठभेड़ टल गयी, किन्तु छात्रों ने आन्दोलन तेज करने का निर्णय लिया, जिसका परिणाम आठ लोगों का बलिवेदी पर चढ़ना हुआ। वही आन्दोलन 1967, 1974-77 आदि के छात्र आन्दोलनों की प्रेरणा बना।
इसने अनेक प्रतिभापुत्रों को समुचित विकास का अवसर दिया, जिन्होंने विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्रों में बिहार को गौरवान्वित किया है- चाहे वह क्षेत्र खेलकूद, साहित्य, राजनीति, भौतिक, गणित, अभियंत्रण, प्रशासन, अर्थशास्त्र, चिकित्सा, न्यायालय, समाजशास्त्र अथवा कोई अन्य ही क्यों न हो? इसे पहले उद्यान (विशेषतः गुलाब) प्रतियोगिता में बराबर प्रथम स्थान प्राप्त होता था। 1972 से 74 तक रसायनशास्त्र के पूर्व प्राध्यापक और उद्यान प्रभारी श्री योगेश चन्द्र बनर्जी ने इसे यह श्रेय दिलाया। इसके अतिरिक्त एकांकी प्रतियोगिता, खेलकूद प्रतिस्पर्द्धा, राष्ट्रीय सेवा योजना इत्यादि में भी यह प्रथम स्थान पाता रहा है।
यहां 18 वर्ष तक यशस्वी प्रधानाचार्य रहे सैयद मोइनुल हक को 1948, 1952 (हेलिंसकी ओलम्पिक) एवं 1956 ई. में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित विश्व ओलम्पिक में भारतीय टीम के शेफ द मिशन होने का गौरव प्राप्त हुआ। उन्होंने इंडियन ओलम्पिक एसोसिएशन के क्रमशः सचिव तथा अध्यक्ष के पद को भी सुशोभित किया। उन्हीं के नाम पर 1965 ई. में स्थापित स्टेडियम का नाम 1973 ई. में ‘मोइनुल हक स्टेडियम’ किया गया। उसी से प्रेरित प्रभावित होकर लखनऊ के स्टेडियम का नामकरण हाकी के सुप्रसिद्ध खिलाड़ी के.डी. सिंह ‘बाबू’ के नाम पर हुआ।
यहां एक से एक व्यक्तित्व पधारते रहे। प्रो. हलदार द्वारा संगठित रवीन्द्र सभा में अनेक महानुभावों का पदार्पण हुआ। उन्हीं की प्रेरणा से गठित हिन्दी विभाग की श्री हरिश्चन्द्र सभा में 1943 ई. में सुप्रसिद्ध साहित्यकार राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह पधारे, जिन्होंने अपनी अमर रचना “जिसकी जवानी उसका जमाना” का सर्वप्रथम यहीं वाचन किया। तत्पश्चात कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान, छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, विद्वान सांसद विष्णु कान्त शास्त्री, विद्वान वक्ता डा. नामवर सिंह, तत्कालीन रक्षामंत्री जगजीवन राम इत्यादि गणमान्य व्यक्तियों का आगमन हुआ। एक बार यहां राष्ट्रकवि दिनकर का भी काव्यपाठ हुआ था।
लेखक- डॉ० बीरेन्द्र झा



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