Bihar College of Engineering Patna

बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पटना का इतिहास | स्थापना, विकास और प्रमुख पूर्व छात्र

बिहार में विज्ञान एवं तकनीक के आधुनिक विकास में पटना विश्वविद्यालय का बिहार कालेज आफ इंजीनियरिंग ने एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम किया। वर्तमान साइंस कालेज के दक्षिण-पूर्व और गंगा के दक्षिणी किनारे पर स्थित इस कालेज की गेरुए-लाल रंग की अंग्रेजीनुमा विशाल कलात्मक इमारत का दर्शन मुख्य मार्ग से ही किया जा सकता है।…


बिहार में विज्ञान एवं तकनीक के आधुनिक विकास में पटना विश्वविद्यालय का बिहार कालेज आफ इंजीनियरिंग ने एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम किया। वर्तमान साइंस कालेज के दक्षिण-पूर्व और गंगा के दक्षिणी किनारे पर स्थित इस कालेज की गेरुए-लाल रंग की अंग्रेजीनुमा विशाल कलात्मक इमारत का दर्शन मुख्य मार्ग से ही किया जा सकता है।

इस कालेज के भूतपूर्व प्राध्यापक डा. आर. के. महतो से जानकारी मिली कि पटना हाईकोर्ट के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री सरवर अली के आदरणीय दादा नवाब लुफ्त अली खां द्वारा दान दी गई भूमि पर यह कालेज स्थित है। नवाब लुफ्त अली खां ने एक लाख रुपये का अनुदान दिया और इसी रकम से इस कालेज की ऐतिहासिक इमारत 1890 में बनकर तैयार हुई।

इस कालेज का परिसर इतना विशाल है कि यहां के अधिकांश शिक्षक इसी में रहते हैं। परिसर के दक्षिण और पूर्वी भाग में कई छात्रावास हैं जिनमें पहले इस कालेज के छात्र रहते थे किन्तु आज अव्यवस्था का माहौल है। यह इलाका पहले लाल बाग के नाम से जाना जाता था। इसके पास स्थित मस्जिद में मुगल बादशाह औरंगजेब का पोता अजीम-उशान का राज्याभिषेक हुआ था। पटना का पुराना नाम अजीमाबाद का नामकरण इसी के नाम पर हुआ था।

1874 के आसपास से ‘सर्वेक्लास’ के नाम से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पटना कालेज में होने लगी। इसकी पढ़ाई उर्दू में होती थी। जनवरी 1874 में नोट्स आन इंजीनियरिंग नामक पुस्तक का उर्दू में अनुवाद पटना कालेज के एक सर्वे शिक्षक द्वारा किया गया। नोट्स आन इंजीनियरिंग नामक दूसरी और स्काट द्वारा लिखित तीसरी पुस्तक नोट्स आन सर्वे का भी उर्दू में अनुवाद किया ताकि छात्र सर्वे की पढ़ाई समझ सकें। घुड़सवारी का प्रमाण पत्र प्राप्त किये बिना सर्वे की पढ़ाई पूरी नहीं हो पाती। इसी समय घुड़सवारी के दौरान एक छात्र की मृत्यु हो गई। सर्वेक्लास में छात्र प्रायः अनुपस्थित रहते थे। गणित उन्हें ठीक से समझ में नहीं आती थी और परीक्षा में अधिकांश छात्र फेल होते थे।

1892 में सर्वे स्कूल के साथ बिहार इंडस्ट्रियल स्कूल और बाद में चलकर दो और इंजीनियरिंग स्कूल संलग्न हो गये। 1896 में इसका नाम अब स्कूल आफ इंजीनियरिंग हो गया। पटना कालेज से हटकर यह संस्था 1896 से वर्तमान भवन में आ गयी।
1912 में बिहार एक स्वतंत्र प्रांत बना। इस प्रांत के विकास की बातें सोची जाने लगीं। स्कूल स्तर से ऊपर उठाकर इसे बिहार कालेज आफ इंजीनियरिंग करने की आवश्यकता महसूस की गई। 1923-24 ई. में सरकार ने सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री कोर्स अर्थात स्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए स्वीकृति प्रदान कर दी। इस तरह जुलाई, 1924 में यह कालेज पूर्ण रूप से स्थापित हो गया। नौ से बढ़कर इसमें कुल छात्रों की संख्या 1924 में तीस हो गई। क्लास के लिए नवीन कमरों की संख्या बढ़ी। छात्रावास बने।

1926 में हाइड्रोलिक एवं मैटेरियल टेस्टिंग के लिए प्रयोगशाला निर्मित हुए। प्रयोगशालाओं के अतिरिक्त भार सहन के लिए 1926 में रस्टन आयल इंजिन्स नामक कम्पनी से दूसरा इलेक्ट्रिकल जेनरेटिंग सेट खरीदा गया। 1928 में हाइड्रोलिक प्रयोगशाला के लिए पम्प से पानी निकालने के लिए कम्प्रेस्ड स्टील टैंक के साथ एक विंडमिल निर्मित किया गया जिसे आज भी देखा जा सकता है। बेहतरीन ढंग से पुस्तकालय व्यवस्थित किये गये। नेपाल, नाइजीरिया, कश्मीर, आसाम आदि के छात्र यहां नामांकित किये जाने लगे। भवन-निर्माण की वैज्ञानिक विधि की पढ़ाई में छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए बिल्डर्स क्लास की व्यवस्था हुई।

1928 में इस कालेज में विकास कार्यों के लिए एक उप समिति संगठित हुई जिसने छात्रों एवं शिक्षकों के लिए छात्रावास एवं भवन बनाने का निर्णय पास किया। इलेक्ट्रिकल एवं मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक स्तर की पढ़ाई की योजना पास हुई। किन्तु 1929 से 1939 के बीच गहरी आर्थिक मंदी रही और इससे पूरा विश्व प्रभावित रहा। फलतः 1928 की योजनाएं सफल नहीं हो सकी।

1929 में वकील एवं मुंसिफ के लिए शार्ट सर्वे कोर्स की पढ़ाई शुरू हुई जिसमें हाल के वर्षों तक उड़ीसा से भी वकील प्रशिक्षण प्राप्त करने आते थे। इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए 1937 में विशेषज्ञों की एक समिति बनी जिसमें 1938 में रिपोर्ट के प्रथम भाग के अनुसार इलेक्ट्रिकल एवं मैकेनिकल डिग्री पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए 3,77,000 रुपये की राशि की आवश्यकता बताई गई। रिपोर्ट के दूसरे भाग में कुछ अवधि तक इन दोनों विषयों की पढ़ाई के लिए 1,56,000 रुपये का खर्च बताया गया। 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण सारी योजना रुक गई। 1943-44 में दो तल्ले का एक कार्यशाला भवन निर्मित हुआ।

इसमें युद्ध तकनीशियनों को प्रशिक्षित किया जाता था। 2 जनवरी 1952 से यह कालेज पटना विश्वविद्यालय के अधीन हो गया। इसमें युद्ध तकनीशियनों को प्रशिक्षित किया जाता था। जुलाई 1952 से मैकेनिकल इंजीनियरिंग डिग्री कोर्स में नामांकन शुरू हुआ। स्टीम टरबाइन, कम्पाउण्ड स्टीम इंजिन, डीजल इंजिन एवं अन्य उपकरण खरीदे गये जिसमें 1,70,000 रुपये खर्च हुए। 35,000 रुपये में एक वायरलर खरीदा गया। 1954-55 से स्वायल मैकेनिक्स लैबोरेटरी में कार्य किया जाने लगा।

इस कालेज ने कुशल इंजीनियरों को पैदा किया। बिहार में 1960 तक अधिकांश चीफ इंजीनियर इसी कालेज के छात्र रहे हैं। आई. टी. आई. खड़गपुर के निदेशक ब्रिगेडियर एस. के. बोस 1965-70 में यहां के छात्र थे। रामजी प्रसाद वर्मा 1932-33 बैच के थे और बिहार के प्रथम डी.एस.सी. तथा इस कालेज के प्राचार्य थे। भूतपूर्व चीफ इंजीनियर प्रधान ज्वाला प्रसाद, कैनाडा के प्रसिद्ध इंजीनियर जीतेन्द्र खन्ना, दिनेश चन्द्र झा, आई.ए.एस., जयप्रकाश विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति डा. एस.एन.सिन्हा, मगध विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति डा. आर. के. महतो और एस.सी.ई.आर.टी. के निदेशक डा. योगेन्द्र प्रसाद इसी कालेज के छात्र शिक्षक रहे हैं। 1994 में यहाँ कुछ विषयों में स्वतंत्र स्नातकोत्तर विभाग खुले हैं।


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