Bihar Reading Culture

बिहार में पाठकीयता का ग्राफ सबसे ऊपर

मैं एक लम्बे अरसे से पटना पुस्तक मेले में आता रहा हूँ। नेशनल बुक ट्रस्ट ने जब पहली बार यहां पुस्तक मेले का आयोजन किया था उस समय से यहां आने का जो मेरा सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक बना है। इस बार के मेले की साज-सज्जा पिछले तमाम मेलों से अलग और बेहतर…


मैं एक लम्बे अरसे से पटना पुस्तक मेले में आता रहा हूँ। नेशनल बुक ट्रस्ट ने जब पहली बार यहां पुस्तक मेले का आयोजन किया था उस समय से यहां आने का जो मेरा सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक बना है। इस बार के मेले की साज-सज्जा पिछले तमाम मेलों से अलग और बेहतर है। हर बार मेले में प्रकाशकों की यह शिकायत आम रहती थी कि उन्हें सही जगह स्टॉल आवंटित नहीं किया गया, इस बार मेला आयोजन समिति ने उनकी इस शिकायत को सिरे से गायब कर दिया है। आप गेट पर पहुँचकर वहीं से पूरे मेले का एक लुक ले सकते हैं।

पटना पुस्तक मेले की सफलता का श्रेय मैं यहां की जनता और उनके पाठकों को देता हूँ। उन्हीं का श्रेय आयोजक भी पाते हैं। मैं देश भर में आयोजित होने वाले तकरीबन सभी मेलों में जाता रहा हूँ। उन तमाम यात्राओं से प्राप्त अनुभवों के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि पूरे भारत के हिन्दी भाषी इलाके में पुस्तकें खरीदने की जो क्षमता बिहार के लोगों में है, वह कहीं नहीं। इस बार के मेले में प्रकाशकों की भागीदारी बढ़ी है।

जो प्रकाशक दिल्ली छोड़कर कहीं नहीं जाते थे, वे भी इस बार के मेले में यहां दिखायी पड़ रहे हैं। प्रभात प्रकाशन उन्हीं प्रकाशकों में है, जो यहां आया है, हालांकि इस प्रकाशन की किताबों का सरोकार जनता से कम है। पटना पुस्तक मेले को बेहतर बनाने के लिए यहां के लोगों को समन्वित प्रयास करना चाहिए। मैं इस बार पटना आया तो मुझे लगा यहां के लोगों ने एक नयी हवा में सांस ली है। होटल में, सड़कों पर हर कहीं लोगों में एक अपूर्व संतुष्टि का भाव नजर आया। यह भाव यहां की जनता में उस समय भी आया था जब 89 में सत्ता में बदलाव हुआ। मैं चाहूँगा कि इस बार बिहार में वास्तविक बदलाव आये। यहां विकल्प की गुंजाइश है।

वर्तमान सरकार साहित्य संस्कृति और पुस्तकों में रुचि दिखाए तो यह अच्छी बात होगी। बिहार सरकार को छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश सरकार से इस संदर्भ में सीख लेनी चाहिए। छत्तीसगढ़ सरकार ने पंचायत स्तर पर 10,000 पुस्तकालय खोले। सरकार ने हरेक पंचायत को यह अधिकार दिया कि वे अपनी पसंद की किताबें खरीदें। इसे ‘राजीव गांधी पुस्तकालय योजना’ का नाम दिया गया। यह सारी योजना अजीत जोगी सरकार के समय बनी थी। उनके बाद की सरकार ने भी इस योजना को जारी रखा और जब यह मूर्त हुई तो इसका बड़ा सकारात्मक प्रभाव वहां देखने में आया।

छत्तीसगढ़ से एक वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार ने 45 हजार पुस्तकालय स्थापित किए। ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के नाम से चल रहा यह अभियान वहां प्राथमिक विद्यालयों तक समृद्ध पुस्तकालय स्थापित करना था इसके लिए सरकार द्वारा लेखकों, प्रकाशकों और विशेषज्ञों की एक टीम भी बनायी गई थी जिन्हें यह दायित्व सौंपा गया था कि वे इस बात का पता लगाए कि वास्तव में ये पुस्तकालय चल रहे हैं या नहीं।

पुस्तकालय को समृद्ध करने का यह मध्य प्रदेश सरकार का अभिनव कदम था। इसके लिए प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय को 5 हजार रुपये (जो कि 6-7 करोड़ बनते हैं) पुस्तकालय के लिए तथा प्रति अध्यापक को 500 या एक हजार रुपया आवंटित किए गए (यह राशि भी लगभग 7 करोड़ रुपये की है)।

अब मध्य प्रदेश की स्थिति यह है कि वहां सरकार जिला स्तर पर पुस्तक मेले आयोजित करवा रही है, जहां सभी प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक समूह में आकर इस काम को साकार कर रहे हैं। इसे मध्य प्रदेश राज्य शिक्षा संस्थान संचालित करवा रही है और इस योजना का नाम दिया गया है-पुस्तकें आपके द्वारा। यह बहुत ही दूरदर्शी योजना है। मैं चाहूंगा कि बिहार सरकार भी बिहार शिक्षा परियोजना सरीखी संस्थाओं को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ भेजकर इस पुस्तकालय आंदोलन की सफलता के बारे में पता करे ताकि पुस्तकें स्थानीय स्तर तक पहुँच सके।

हरीशचन्द्र शर्मा, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली

(पटना पुस्तक मेला 2005 स्मारिका से लिया गया लेख)


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