4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

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पाठकीयता की संस्कृति का संबल : पुस्तक मेला

भारत एक बदलाव के काल से गुजर रहा है और इस बदलाव की रफ्तार बहुत तेज है। बहरहाल, साक्षरता के बगैर कोई बदलाव संभव नहीं है, क्योंकि देखा गया है कि विभिन्न स्तरों पर इच्छित सामाजिक बदलाव भिन्न त्वरा के साथ प्राप्त करने के लिए साक्षरता एक महत्वपूर्ण औजार है।

पटना की तरह पुस्तक मेलों के आयोजन का प्रमुख उद्देश्य पुस्तक पढ़ने की मानसिकता पैदा करना, पुस्तकालयों, प्रकाशकों, लेखकों और पुस्तक विक्रेताओं के बीच एकरूपता स्थापित करना है, इसके साथ ही यह साक्षरता को भी विकसित करता है और राष्ट्रीय एकता में योगदान देता है और सार्वजनिक ज्ञान को विकसित भी करता है।
ऐसे समय में जबकि सभी क्षेत्रों में एक उभार है, पुस्तक मेलों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। खासतौर से तब जबकि सभी सरकारें साक्षरता को प्रोत्साहित कर रही हैं।

साक्षरता का केवल यह तात्पर्य नहीं है कि कोई पढ़ने और लिखने की क्षमता प्राप्त करे, बल्कि साक्षरता एक सामाजिक तौर पर निर्मित परिघटना है, जहाँ कि हम सामाजिक रूप से मान्य कार्यों को करते हैं, एक-दूसरे के तर्कों को समझते हैं और सभी लोगों के साथ एक समानता का व्यवहार करते हैं, जो मानव के इतिहास में अप्रत्याशित है। साक्षरता वह सजगता पैदा करता है जो राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के लिए आवश्यक है, जबकि लोग अक्सरहां इससे हट कर साम्प्रदायिक और क्षेत्रीयता की भाषा में बात करते हैं। भारत के लिए एक जैसा धर्म सम्भव नहीं है। लेकिन देशभक्ति और राष्ट्रीयता की भावना देश की एकता की बुनियाद बन सकती है। पुस्तकें आश्चर्यजनक रूप से समता कारक होती हैं—सभी समय के लिए महान समताकारक।

पुस्तक मेला राष्ट्रीय एकता और विश्वजनीन बोध का एक मंच है, जहाँ एक समान भाषा बोली जाती है और यह भाषा ज्ञान और बोध की भाषा है और ये दोनों मिलकर राष्ट्रीय चरित्र का गठन करते हैं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, खासतौर से बिहार के लिए, जहाँ इतनी आस्थाएँ, भाषाएँ और संस्कृतियाँ हैं, इसलिए साक्षरता को विकसित करने और विभिन्न आस्थाओं और संस्कृतियों के लोगों को एक साथ लाने तथा उनमें एकरूपता की भावना पैदा करने में पुस्तक मेला एक अति महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कर सकता है।

भारत में एक समान भाषाएं या समान लिपि नहीं है, लेकिन पुस्तक मेलों में इस बात की बगैर चिन्ता करते हुए कि वे देश के हिस्से या दुनिया के किस हिस्से के हैं, लोग एक-दूसरे से एक ही भाषा में संवाद करते हैं और वह समझदारी की भाषा है। लोग पुस्तकों की एक ऐसी विस्मयकारी दुनिया में पहुँचते हैं, जहाँ लोग अपने विभेद, पृष्ठभूमि, संस्कृति, भाषा, वर्ग, जाति, घृणा और भावनाओं को भूल जाते हैं। वे एक-दूसरे के कंधे को सहलाते हुए चलते हैं, इस बात की चिन्ता किए बगैर कि उनके आगे कौन खड़ा है, समान पुस्तक के लिए एक ही रूप से पहुंचते हैं, एक ही प्रतिज्ञाओं के साथ, जिसका उल्लेख पुस्तक में होता है, एक ही आनन्द और एक ही संतोष के साथ। इसके अलावा कुछ पुस्तक मेलों में कुछ मजाक की भी स्थिति होती है। लड़के पुस्तकों की सूची/ कैटलागों के रूप में अपने द्वारा किए गए संग्रह का मूल्यांकन भी करते हैं, लड़कियाँ अपनी आँखों में सितारे सजा कर आती हैं, अपने सपनों के घरों के लिए डिजाइन तलाशती रहती हैं।

कुछ सजाई गयी पुस्तकों के सुन्दर चित्रों की एक झलक के लिए आते हैं, कुछ यहां अपने बचाए पैसों को खर्च करने के निर्णय के साथ आते हैं। ये सभी एक-दूसरे तरह से हास्य और रोमांचकारी हैं और जो ज्ञान के लिए बाधक है। कोई भी व्यक्ति पहली बार में कोई पुस्तक कोष होने पर या अभिरुचि के अभाव में नहीं खरीद लेता है, लेकिन आप निश्चित रूप से विभिन्न विषयों पर पुस्तकों के आकर्षण से आकर्षित होते हैं और यह आकर्षण पुनः आपको मेले में आने के लिए तथा पुस्तकें खरीदने के लिए बाध्य करता है। यह अनुभव कितना आनन्ददायक है कि परिवार के सभी सदस्य अपनी पसन्द की पुस्तकें खरीदते हैं।

बच्चे जब पुस्तकों की आश्चर्यजनक दुनिया को देखते हैं तो उनका उत्साह कुछ देखने और विश्वास करने का होता है। यह जरूरी नहीं है कि पुस्तक मेले में आने वाले सभी लोग पुस्तक की दुकानों में जाते हैं। आप आगंतुकों से यह सवाल पूछेंगे तो 100 में से 80 आगंतुकों का जवाब होगा कि वे देखने आये हैं। मैं पाठ्य पुस्तकों की बात नहीं करता हूं। वस्तुतः मैं पुस्तक मेलों में आम पाठ्य पुस्तकों को सजाने का विरोधी हूँ, यदि वे नये प्रकाशन नहीं है और यदि उन्हें बढ़ाने की जरूरत नहीं है। पुस्तक मेलों को गैर पाठ्य पुस्तकों के लिए होना चाहिए, जो कि अतिरिक्त ज्ञान पैदा करे और साथ-साथ पढ़ने की आदत भी पैदा करे और इसके अलावा अन्य उद्देश्यों को भी पूरा करे।

पुस्तक मेला लोगों को जागरूकता बढ़ाने और ज्ञान की तलाश के लिए होना चाहिए। ज्ञान मनुष्य को विकसित करता है। यह सोचने को प्रेरित करता है। यह समाज में प्रसिद्धि, आनन्द और स्तर प्रदान करता है। यह लोगों को शिक्षित करता है, और देश या विश्व को एक सूत्र में बुनता है। आप किसी भी भाषा में पुस्तकों को सजावें। सभी का समान रूप से आदर किया जायेगा।

लेख़क- राकेश प्रियदर्शी

(पटना पुस्तक मेला 2005 स्मारिका से लिया गया लेख)