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2000 का पुस्तक मेला: गांधी मैदान से पाटलिपुत्र मैदान तक सिमटती किताबों की दुनिया

वृहस्पतिवार 23 नवम्बर 2000

बाजार के जाल में उलझा मेला
-श्रीकांत

इस वर्ष (2000) के पुस्तक मेला के गांधी मैदान से पाटलिपुत्र मैदान पहुँचने-सिमटने की कथा है। इस कथा के मुख्य पात्र हैं- आयोजक, प्रकाशक और सरकार। इसके मूक दर्शक हैं वे लाखों लोग,जो किताब देखने, छूने और हैसियत के अनुसार खरीदने के लिए उमड़ते हैं। वे नहीं जानते कि हर साल-दो साल के अन्त में होने वाले पुस्तक मेला को इस साल ऐतिहासिक गांधी मैदान से धकिया कर पाटलिपुत्र के बेपहचाने और अनाम मैदान पहुँचाने की इस कथा के नायक-खलनायक कौन हैं ? वे मायूस हैं कि अब उनके दरवाजे तक किताबों की दुनियाँ पहुँचने का रास्ता संकीर्ण हो गया।

आयोजकों और सरकार के बीच विवाद है। सरकार ने पुस्तक मेला के आयोजन के लिए आयोजकों से गांधी मैदान में घेरे जाने वाले 50 हजार वर्गफीट भूखण्ड के लिए प्रति वर्गफीट एक रुपए की दर से 50 हजार रुपए की माँग की। आयोजक पहले मात्र 36 सौ रुपया देते थे। तर्क यह कि यह सरकार का नया रेट है। पुस्तक मेला के लिए तो सरकार इतना पैसा अवश्य लेगी क्योंकि आयोजक मेला में व्यवसाय करते हैं। कोई सांस्कृतिक आयोजन या चैरिटी शो नहीं है। और तो और, गांधी मैदान के रख-रखाव के मद्देनजर यह रेट तय किया गया है। आयोजकों का रोना यह है कि गांधी मैदान में राजनीतिक रैलियाँ होती हैं। प्रवचन होते हैं।

सब फ्री। पार्टियों, नेताओं और बाबाओं के राजनीतिक एवं धार्मिक व्यवसाय के लिए मैदान मुहैय्या करते वक्त सरकार को रेट का नियम भी याद नहीं रहता। दस दिनों के लिए मेला के रूप में किताबों की दुनियाँ बसाने की कोशिश उसे व्यवसाय नजर आने लगती है। दोनों के अपने-अपने तर्क। तर्क इतना लम्बा चला कि दोनों पक्ष पुस्तक प्रेमी जनता को भूल गए और पुस्तक मेला को पाटलिपुत्र में ठेल दिया गया। अब किताबों को देखने लोग शहर से दूर जाएंगे। राज्यपाल मेले का उद्घाटन करेंगे। मेला 8 दिसम्बर से 19 दिसम्बर 2000 तक चलेगा। इस बार के पुस्तक मेला के गांधी मैदान में लगने से पहले काफी शोर-शराबा हुआ। आयोजकों और पटना जिला प्रशासन के बीच तनातनी हुई और भारी धन की माँग के कारण आयोजकों ने पाटलिपुत्र का रुख किया। लेकिन यह सवाल टंगा रह गया कि क्या किताबों के इस मेले को पैसे से तोला जा सकता है ? एक रुपया प्रति वर्गफीट मेंटेनेंस चार्ज के साथ लाखों तक की बात हुई। और अन्त में आयोजकों को पीछे हट जाना पड़ा। लेखकों ने राज्यपाल महोदय के सामने प्रदर्शन भी कर दिया। आयोजकों का कहना है कि सरकार का नजरिया व्यावसायिक है।

उन्हें स्टाल बनवाने में काफी खर्च करना पड़ता है। ऐसे में वे क्या करें। यह भी आरोप है कि कुछ प्रकाशक मेले के चलते लखपति बन गए। सरकार या आयोजक न लाभ, न हानि के सिद्धान्त पर एक क्यों नहीं होते। पुस्तक प्रेमियों का यह सवाल अनुत्तरित रह गया। दरअसल पुस्तक मेला के दो पक्ष है- सांस्कृतिक पक्ष और व्यावसायिक पक्ष। सांस्कृतिक पक्ष को मजबूत करने, चेतना जगाने, विरासत को समझने के साथ ज्ञान देने का पक्ष है। दूसरा पक्ष धन से सम्बन्धित है। कमाने से सम्बन्धित है और मुनाफा से सम्बन्धित है। लाभ-हानि के जोड़ घटाव में किताबों की दुनियाँ से जन समुदायों को काट दिया जाए। दिल्ली नेशनल बुक ट्रस्ट आयोजन करता है पुस्तक मेले का, बिहार में आप बिहार राष्ट्रभाषा परिषद अथवा बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी के तहत पुस्तक मेले का आयोजन कर सकते थे। लेकिन, नहीं। बिहार, एक तो पिछड़ा हुआ प्रदेश माना जाता है। पिछले कई सालों से गांधी मैदान में पुस्तक मेले का आयोजन होता रहा है।

किताबें बिकती भी हैं और किताबें देखी भी जाती हैं। एक सांस्कृतिक माहौल बनता है। लेकिन दूसरा और काला पक्ष भी यह है कि पुस्तक के नाम पर व्यवसाय होता है। महंगा पुस्तक मेला है- पटना का। सस्ता किताब छापने वाले प्रकाशक का आना मुश्किल है। उन्हें ज्यादा भुगतान करना पड़ता है। वे मेले में पहुँच नहीं पाते। स्टालों का किराया अधिक होता है। ऐसे में गरीब व छोटे प्रकाशक कैसे पहुँचेंगे। बड़े प्रकाशक और प्रकाशकों की अमीर लाबी मेले पर नियंत्रण करती है, जो कुंजी, गाईड बुक छापते हैं। मेला को ऐसे प्रकाशक नियंत्रित करते हैं। पुस्तक मेले में चाट की दुकानें भी खुल जाती हैं। फोकचा भी चलता है। छमछम भी चलता है। भीड़भाड़ में मेले का सांस्कृतिक पक्ष खो सा जाता है। नव संरक्षरों के लिए सस्ती किताबें उपलब्ध नहीं होती हैं। नहीं।

हाँ, बच्चों की महंगी किताबें जरूर मिल जाती हैं। पुस्तक मेला के आयोजकों के लिए विलेन और हाल में स्थानांतरित पटना के जिलाधिकारी श्री अमित खरे का कहना है कि प्रति वर्गफीट 1 रुपया मेंटेनेंस चार्ज की माँग के साथ कोई शर्त नहीं थी। ऐसा नहीं कहा गया कि पुस्तकों की खरीद-बिक्री नहीं होगी। हम तो खुद ही चाहते हैं कि मेला में इंट्री फ्री नहीं लगे। छोटे और कमजोर प्रकाशकों को भी स्टाल का पैसा न देना पड़े। हिन्दी की किताबों का प्रचार-प्रसार हो। चाट की दुकानें और झूला न हो। पुस्तकों के साथ अन्य तरह की व्यावसायिक गतिविधियाँ न हो। प्रकाशक सरकार से छूट चाहते हैं और स्टाल लगाने वाले प्रकाशकों से पैसा भी चाहते हैं। प्रशासन और सरकार बिहार की इस विरासत को कायम रख नया माहौल बना सकती है। आम लोग तो यही चाहते हैं। लेकिन कल्याणकारी राज में सरकार किधर है ?????

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