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किताबों का मेला और बिहार के सवाल

चकरी चल रही है, झूला झूला जा रहा है, पिपहियाँ बज रही हैं, कहीं चिल्ल-कही पें, कहीं बांसुरी लेने की हांक, कहीं गुड़ वाली जलेबी की सुगंध, कहीं भखरा सिंदूर-चोटी-नथनी ढील की कंघी पर लुझी महिलाएँ तो कहीं, गाय-बकरी देखते पुरुष। यह हमारे गाँव के मेले का दृश्य है—हमारे भारत की सांस्कृतिक चेतना का महोत्सव। जहाँ नट-नटिन घोड़ा और मोर के कठ-रूप में नृत्य कर रहे हैं। सब थिरक रहे हैं। सारा गाँव-सारा जवार थिरक रहा है। शाम होते ही थियेटर के पास भीड़ उमड़ पड़ी है—रामलीला जो है। रामलीला ही तो भारत लीला है, गाँव-लीला है; हम सबकी लीला है। उसी ने तो हमें जीवन जीने का यह भारतीय तरीका सिखाया। उसी रामायण और लीला का मिला-जुला वह मेला—आज का पुस्तक मेला बन गया है। शहरी संस्कृति और ग्रामीण संस्कृति का मिला जुला मेला।

आखिर यह संस्कृति क्या है? मार्डन कहते हैं—चित्तवृत्ति की गंभीरता, मन का संतुलन संस्कृति के अंतिम पाठों में से एक है और यह समस्त विश्व को वश में करनेवाली शक्ति में पूर्ण विश्वास से उत्पन्न होती है। फिर रामायण क्या है? एक पुस्तक! फिर पुस्तक क्या है? आगस्टाइन कहते हैं : संसार एक महान पुस्तक है जिसमें वे लोग जो कभी घर से बाहर नहीं निकलते केवल एक पृष्ठ ही पढ़ पाते हैं। लोकमान्य तिलक कहते हैं : मैं नरक में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूँगा, क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि जहाँ ये होंगी वहाँ आप ही स्वर्ग बन जाएगा। महात्मा गाँधी कहते हैं : अच्छी पुस्तकों के पास होने से हमें अपने भले मित्रों के साथ न रहने की कमी नहीं खटकती।

अब हम चलें उस स्वर्ग की ओर जहाँ पुस्तकें-पुस्तकें-और सिर्फ पुस्तकें हैं। वर्ष 1990, गाँधी मैदान में लगा, पटना पुस्तक मेला। मैं अपनी किताब लिए घुस गया उस मेले में। स्वर्ग के मेले में। उस दिन रेकार्ड-तोड़ भीड़। संभले नहीं संभल रही थी। आयोजकों से। पचास-साठ हजार से कम लोग न होंगे। ऐसा लग रहा था मानो दिनकर के साथ शहर-गाँव का एक बड़ा समूह स्वर्ग लूटने आ गया है। पर पूरे वातावरण में एक सांस्कृतिक मदमस्ती।

मेरी अपनी किताब। खूब हांक लगायी और उसकी साढ़े सात सौ प्रतियाँ बिक गयीं। 1996 में मुझे पटना पुस्तक मेला का प्रवक्ता बना दिया गया। तब से मेरा प्रयास उसे और बेहतर करने और उसे पूरा कर पूरा सांस्कृतिक केन्द्र बना देने की शुरू हुई। तीन लाख से भी अधिक लोगों ने शिरकत की। 2000 तक आते-आते वह इक्कीसवीं सदी का मेला पूरा का पूरा सांस्कृतिक केन्द्र बन गया। नुक्कड़ नाटक, सांस्कृतिक आयोजन साहित्यिक बाल प्रतियोगिताएँ, साहित्यिक पुरस्कार, कवि सम्मेलन एवं विविध विषयों पर सेमिनार आयोजित हुए।

उधर भारतीय स्तर पर कलकत्ता का पुस्तक मेला और दिल्ली वर्ल्ड बुक फेयर अपने परवान पर था। पटना ने भी इनके बाद अपनी जगह बना ली। लोग किताबें खरीदने के लिए महीनों पहले से ही बजट बनाने लगे। कलकत्ता में पुस्तक मेले के दौरान कपड़े और अन्य वस्तुओं की बिक्री कम हो गयी। इन तीन मेलों ने पूरे भारतवर्ष के शैक्षिक-गण को जगाया। गौहाटी, जयपुर, भोपाल, जबलपुर, राँची, नागपुर, टाटानगर, मुंबई, बंगलोर, इंदौर, बोकारो, देवघर, हजारीबाग सहित देश के छोटे-छोटे जिलों और कस्बों में भी पुस्तक मेला का सफल आयोजन हुआ और इसकी धूम मच गयी।

हमने अपने लेखों-वक्तव्यों से और देश के तमाम बड़े महान विद्वानों के लेखों-वक्तव्यों से इस किताबों की दुनिया का जमकर प्रचार किया। लेखकों-सांस्कृतिकर्मियों-शिक्षकों और पत्रकारों ने मिलकर पूरे देश में अपना एक अलग मंच तैयार किया। ऐसे में यूनिसेफ और वर्ल्ड हेल्थ ऑरगेनाइजेशन भला कहाँ चूकते। इन संस्थाओं से सड़कीय और गरीब बच्चों-महिलाओं के लिए भी वहाँ अनेक आयोजन किये। इस तरह यह शहरी-ग्रामीण, गरीब-अमीर सबका सांस्कृतिक केन्द्र बन गया। वरिष्ठ पत्रकार सुधीश पचौड़ी ने अपने हिन्दुस्तान में छपे एक लेख में पटना पुस्तक मेला को हिन्दी क्षेत्र का सबसे सफल पुस्तक मेला बताया और इसके सांस्कृतिक महत्त्व की भी चर्चा की।

30 जनवरी 2002, हिन्दुस्तान के अपने एक स्तंभ लेख में प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने ‘एक छोटी-सी यात्रा के तीन सांस्कृतिक पड़ाव’ लिखा। “दरअसल पुस्तक खतरे में है—यह एक ‘अपडर’ है, जिसे इलेक्ट्रानिक मीडिया के उदय के बाद जोर-शोर से प्रचारित किया गया है। पुस्तक-लोप की इस बहुप्रचारित आशंका के विरुद्ध बहुत से तर्क दिये जा सकते हैं। पर पटना पुस्तक मेले के लिये उमड़ती हुई भीड़ इसके विरुद्ध सबसे बड़ा तर्क है। पर इस तर्क की एक धार ऐसी भी थी जो बिहार के पिछड़ेपन की अवधारणा पर भी चोट करती थी। पर सस्ते मनोरंजन की बढ़ती हुई लोकप्रियता के इस युग में बिहार के पाठक-समुदाय के अदम्य पुस्तक-राग का यह इजहार मेरे और मेरे जैसे असंख्य पुस्तक-प्रेमियों के लिये एक गहरा आश्वासन है।” प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी ने एक सेमिनार में भाषण के दौरान पटना पुस्तक मेला को देश के सबसे सफल पुस्तक मेलों में से एक कहा और यह उदाहरण बिहार की जागरूकता और इसके पुस्तक प्रेम के संदर्भ में था।

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन से किसी ने पूछा; भारत के उत्थान के लिए एक पंक्ति में आप क्या कहेंगे? उन्होंने कहा—सम्पूर्ण भारतीय को शिक्षित करना ही उसके उत्थान का रास्ता है। शिक्षा का मतलब विश्वविद्यालयीय डिग्रियों से नहीं है। प्लेटो कहते हैं : शरीर और आत्मा में अधिक-से-अधिक जितने सौंदर्य और जितनी सम्पूर्णता का विकास हो सकता है उसे सम्पन्न करना ही शिक्षा का उद्देश्य है। हबर्ट स्पेन कहते हैं : शिक्षा का ध्येय चरित्र-निर्माण है। डॉ. जान.जी. हिबन कहते हैं, “शिक्षा जीवन की परिस्थितियों का सामना करने की योग्यता का नाम है।”

अक्षर ब्रह्म है। और वह मुझे विविध स्रोतों से हमारे जीवन-लक्ष्य की ओर ले जाता है। लेकिन ज्ञान का सबसे बड़ा माध्यम किताबें ठहर जाती हैं। सिर्फ किताबी ज्ञान से सब कुछ संभव नहीं। व्यवहार आवश्यक है। पुस्तकों का मेला इसी किताबी ज्ञान और व्यवहार का मिलन स्थल है। ऐसा सांस्कृतिक आयोजन हमें शिक्षित होने में हमारी मदद करता है। किताबें जहाँ अपनी बात कहकर रुक जाती हैं, पुस्तक मेला विविध कार्यक्रमों-आयोजनों के माध्यम से उसे हमारे जीवन के यापन में घोल देता है। एक तरफ पुस्तक मेला हमें अद्भुत पुस्तक-मित्र के बीच खड़ा कर देता है। वहीं दूसरी तरफ जीवन के वर्तमान सच को सहर्ष जीने के लिए नुक्कड़ नाटक, बाल प्रतियोगिताएँ, युवा प्रतियोगिताएँ, गरीब बच्चों के लिए अलग से (गीत-संगीत-कहानी) शास्त्रीय संगीत, कविता-कहानी पाठ, चित्र-कला प्रदर्शनी, सांस्कृतिक पुरस्कार, सांस्कृतिक आयोजन, विचार गोष्ठियाँ हमारा सम्पूर्ण सांस्कृतिक विकास कराता है।

आज लगातार भारतीय लोकतंत्र की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। अब लोकतंत्र को भेड़तंत्र भी कहा जाने लगा है। आखिर इसका क्या तात्पर्य है? भेड़ तंत्र का अर्थ निरक्षरों का तंत्र। भारत में पैंतालीस प्रतिशत लोग निरक्षर हैं। जिस देश की आधी आबादी अक्षर-अज्ञान हो वहाँ लोकतंत्र की मजबूती की कल्पना हम कैसे कर सकते हैं? इसके मूल में स्पष्ट संकेत है—शिक्षा का प्रचार प्रसार। कौन करेगा? हमें ही करना होगा। अपने शैक्षिक कार्यक्रमों से, विद्यालयों से, पुस्तकालयों से और पुस्तक मेला जैसे सांस्कृतिक केन्द्र के माध्यम से। जहाँ से हम सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलन का शंखनाद कर चुके हैं।

आज दुनिया में वही लोग आर्थिक दृष्टि से आगे हैं जिनके पास विविध ज्ञान है। वैज्ञानिक दृष्टि से जो पूरे जीवन को और जीवन के कर्म-धर्म को देखते हैं। यहाँ एक बार यह फिर कहना चाहूँगा कि ज्ञान का मतलब डिग्री अर्जित करने से नहीं है। आज बिल गेट्स से लेकर दुनिया के तमाम अमीर लोग शिक्षा को आधार बनाकर ही आगे बढ़े हैं। भाषा-सम्मोहन से लेकर अपने विषय के अथाह ज्ञान के बिला पर ही हम दुनिया में अलग पहचान बना सकते हैं। आज अखबार, टी.वी., कम्प्यूटर और किताबें हमारे जीवन से अलग कर दी जाएं तो कुछ नहीं बचेगा। बिजली गुल हो जाएगी! पुस्तक मेला पर अब तक प्रायोजकों का ध्यान नहीं गया है। इसे खतरनाक प्रायोजकों से बचाये रखने की भी जरूरत है। पुस्तक मेला कोई व्यावसायिक उद्देश्य वाला कार्य नहीं है। यह समाज को चेतनशील और सांस्कृतिक चेतना से ओत-प्रोत कराना चाहता है।

लेखक के बारे में

आदि संस्कृति और विज्ञान पर केन्द्रित अमेजन बेस्टसेलर एवं साहित्य आजतक बेस्टसेलर उपन्यास ‘32000 साल पहले’, ‘हिमयुग में प्रेम’, ‘पहला सनातन हिन्दू’ और ग्लोबल वार्मिंग पर केन्द्रित बेस्टसेलर उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ के लेखक रत्नेश्वर महज पाँचवीं कक्षा से ही अपने स्कूल सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र, पटना में स्टोरी मास्टर के नाम से पुकारे जाने लगे थे. 20 अक्टूबर 1966 ई. को जन्मे रत्नेश्वर ने बचपन से ही संघर्षपूर्ण जीवन जिया. अपने पैत्रिक गाँव बड़हिया से एक किसान के रूप में इन्होंने अपने करियर की शुरुआत की.

रत्नेश्वर दुनिया के सबसे महंगे ग्रन्थ ‘मैं’ के रचनाकार हैं. भारतीय मुद्रा में ‘मैं’ ग्रंथ का मूल्य पंद्रह करोड़ रुपये है.   आज रत्नेश्वर कुमार सिंह भारत के सर्वाधिक रॉयल्टी पाने वाले और बेस्ट सेलिंग लेखक हैं. पत्रकारिता साहित्य के लिए इन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार’ प्रदान किया गया. इन्होंने 1988 ई. में ‘नवभारत’ नागपुर से पत्रकारिता की शुरुआत की. ‘स्टार वन’ पर ‘मानो या ना मानो’ का स्क्रिप्ट-लेखन किया, साथ ही मशहूर फिल्म निर्देशक प्रकाश झा के नेतृत्त्व में ‘मौर्य टी.वी.’ के डिप्टी एडिटर भी रहे. इन्होंने अब तक 8 से भी अधिक बेस्ट सेलिंग पुस्तकों के अलावा कुल 23 पुस्तकें लिखी हैं. इस समय रत्नेश्वर सिंह भारत के लोकप्रिय मोटिवेशनल स्पीकर हैं. रत्नेश्वर बिहार का लोकप्रिय सांस्कृतिक उत्सव ‘सीआरडी पटना पुस्तक मेला’ के अध्यक्ष भी हैं.

E-mail ratneshwar1967@yahoo.co.in

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