हिंदी

पटना पुस्तक मेला 2000: किताबों के साथ कार्टून और संस्कृति का रंग

पटना पुस्तक मेला 2000 (8-19 दिसम्बर)
वृहस्पतिवार 14
दिसम्बर 2000

पटना पुस्तक मेला में एक कार्टूनिस्ट और एक लेखक का कमाल रंग लाता है। वरिष्ठ आलोचक और प्रगतिशील लेखक महासंघ की अध्यक्ष मण्डली के सदस्य और आलोचक डा० खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि “कार्टूनिस्ट हमारे जीवन और समाज की विसंगतियों को उजागर करते हैं।” वह पटना पुस्तक मेला 2000 के मेला परिसर में उदीयमान युवा कार्टूनिस्ट श्री राजीव मोहन को कार्टून प्रदर्शनी का उद्घाटन कर रहे थे। इस प्रदर्शनी का आयोजन सांस्कृतिक संस्था ‘सृजन’ ने किया था।‌ डा० खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि “श्री राजीव मोहन एक सफल कार्टूनिस्ट के रूप में हमारे सामने आए हैं। उन्होंने अपने व्यंग्य चित्रों के माध्यम से हमारे राजनीतिक और सामाजिक जीवन की विसंगतियों को उजागर किया है। उन्होंने अपनी टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं के माध्यम से जो जादू बिखेरा है वह प्रशंसनीय है। इस युवा चित्रकार के कार्टूनों से काफी प्रभावित हैं। ये कार्टून देखने वालों की चेतना को प्रबुद्ध करते हैं।” कवि श्री धर्मेन्द्र सुशांत ने कहा कि राजनीतिक समझ से युक्त कार्टूनिस्ट में असीम सम्भावनाएं हैं। वरिष्ठ कवि श्री मदन कश्यप ने कहा कि श्री राजीव मोहन के कार्टून उनकी प्रतिभा को दिखाते हैं।

उन्होंने युवा कार्टूनिस्ट को सलाह दी कि वे अपनी रेखाओं को और बारीक बनाएं। युवा लेखक और पत्रकार रत्नेश्वर ने कहा कि प्रदर्शनी में शामिल सभी कार्टून लोगों पर व्यापक प्रभाव छोड़ने में सफल हैं। ये नुकीले व्यंग्य चित्र हैं जो हमें हंसाते हैं तो हमें दर्द भी देते हैं। एक अन्य युवा कार्टूनिस्ट विकास कुमार व युवा लेखक रत्नेश्वर दोनों ने मिलकर एक किताब निकाली है- हंसते मुहावरे। वैसे पुस्तक मेला के लिए रत्नेश्वर का नाम जाना-पहचाना है। 1990 में उनकी पहली पुस्तक ‘दिशा’ (कहानी संग्रह) आई थी। 1991 में उनका कहानी संग्रह ‘मेरा भारत महान’, 1996 में ‘सफल हिन्दी निबन्ध’ एवं 1998 में उनका कहानी संग्रह ‘सिम्मड़ सफेद’ जो काफी चर्चित हुआ था। पत्रकारिता पर उनकी अनेक पुस्तकों ने भी पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफलता पायी। उन्हें पत्रकारिता पर बेहतर पुस्तकें लिखने के लिए ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’ पुरस्कार मिला। इस पुस्तक में कार्टून बनाने वाले कुमार विकास का नाम भी जाना-पहचाना है। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं में अपने कार्टून बनाए हैं। उनकी अनेक कार्टून प्रदर्शनियां चर्चित हो चुकी है।

वैसे, पटना पुस्तक मेला 2000 में 14 दिसम्बर का दिन वस्तुत: एक दूसरे कार्टूनिस्ट श्री राजीव मोहन का ही रहा। लोगों की भीड़ जुटाने में उन्होंने बाजी मार ली। लोगों की भीड़ को देखकर किसी को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह श्री राजीव मोहन की पहली कार्टून प्रदर्शनी है।‌ भीड़ का आलम यह था कि पटना पुस्तक मेला के आयोजकों को उद्घाटन तुरत कराने पर विवश होना पड़ा। आयोजक उद्घाटन समारोह में आमंत्रित कुछ अतिथियों का इंतजार कर रहे थे। वैसे उद्घाटन के लिए डा० खगेन्द्र ठाकुर आ चुके थे। लेकिन प्रतीक्षा कुछ अन्य अतिथियों का हो रहा था।‌ लेकिन प्रदर्शनी देखने के लिए बेताब लोगों के आग्रह पर प्रदर्शनी का उद्घाटन तुरत कराना पड़ा। देर से आने वाले आमंत्रित अतिथि यह जानकर चकित रह गए कि प्रदर्शनी का उद्घाटन हो चुका। मात्र यही नहीं प्रदर्शनी के बारे में अपनी प्रतिक्रिया लिखने के लिए भी लोग व्याकुल थे। लोग कतार लगाकर खड़े थे ताकि प्रदर्शनी के विषय में अपनी प्रतिक्रिया लिख सकें। इसमें युवकों के अलावा वृद्ध लोग भी शामिल थे। इस प्रदर्शनी में श्री राजीव मोहन के लगभग 50 कार्टून शामिल थे। इसमें अधिकतर कार्टून बिहार पर बनाए गए थे। खासकर झारखण्ड राज्य के निर्माण पर बना उनका कार्टून लोगों को काफी खींच रहा था। इसमें राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद को झारखण्ड नामक एक दीवार को बनाते हुए दिखाया गया था। इस कार्टून में एक आम आदमी/नागरिक सार्वजनिक आधार पर पूछ रहा था- “किसकी लाश पर बना रहे हो।” इसी तरह पटना में हुए विमान दुर्घटना पर राजीव मोहन ने कई लाजवाब कार्टून बनाए थे। एक अन्य कार्टून अपराधमापी यन्त्र में राजनीति के अपराधीकरण पर उनका व्यंग्य भी कमाल का था।‌

चुनावों पर राजीव मोहन के कार्टून लोगों को सोचने के लिए विवश कर रहे थे।‌ महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षकों की हड़ताल, बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था और लुंज-पुंज पुलिस पर उनकी कार्टून देखकर लोग हंस भी रहे थे और सोचने के लिए विवश भी हो रहे थे।‌ इन कार्टूनों को देखने से साफ पता चलता था कि इन्हें बनानेवाला कार्टूनिस्ट आम जनता के कितना करीब है। जनता के दुःख और दर्द राजनीतिज्ञों के लिए किस तरह वोट को तिजारत का साधन बन जाते हैं यह उनके नरसंहार पर बने कार्टूनों से जाहिर होता था। हाल-फिलहाल की घटित घटनाओं के बारे में कार्टूनिस्ट काफी गहराई से सोचता है। मैच फिक्सिंग पर उनका कार्टून सभ्य लोगों के खेल क्रिकेट के अन्दर की गन्दगी को बाहर ला रहा था। इसके अलावा बिहार में हुई राजनीतिक घटनाओं पर कार्टूनिस्ट की कूची ने अपनी अद्भुत समझ का परिचय दिया था। इस कार्टून प्रदर्शनी ने जहाँ एक तरफ राजनीतिज्ञों की कम हो रही विश्वसनीयता पर लोगो को अपने रोज-रोज की तकलीफों पर भी सोचने के लिए विवश किया। इस समारोह का संचालन कमलेश ने और स्वागत स्वयं कार्टूनिस्ट श्री राजीव मोहन ने किया। इन सबसे हटकर ‘हिन्दुस्तान’ के मंडप पर ‘कैप्शन प्रतियोगिता’ (HT Caption Contest Topic ‘The Crorepati Mania’) के लिए काफी भीड़ दिखी। लोग पंक्तियों में आकर वहाँ रखे बॉक्स में उपयुक्त कैप्शन डाल रहे थे। इसके अलावा इसी मंडप पर ‘पुनश्च’ द्वारा बच्चे ने स्वतंत्र होकर चित्रकला का प्रदर्शन भी किया।‌

वृहस्पतिवार 14 दिसम्बर 2000 को बच्चों का मुख्य आकर्षण कथा-कहानी-नाटक था। इसके तहत श्री प्रेम कुमार मणि, डा० शैलेश्वर सती प्रसाद, श्री राकेश प्रवीर तथा श्री अविनाश ने अबतक भागीदारी की। आज श्री शिवदयाल ने अपनी कहानी का पाठ किया। बाद में श्री आशीष कुमार मिश्रा ने बच्चों के बीच अपना लघु नाटक ‘एक सबैया सावा’ की कलात्मक प्रस्तुति कर उनका दिल जीता।‌ इस नाटक के कुछ अंक पर बच्चों ने खूब तालियां बजायीं। मम्मी कहती है: बच्चों के माँ-बाप को समझना होगा कि पेट काटकर दुःख तकलीफ उठाकर भी अपने बच्चों को पढ़ाइए-लिखाइए। दूसरी ओर मम्मी कहती है: चुप हो जाओ। मास्टरजी का मार तो परसाद के समान है। तभी पापा कहते हैं: पर ये बताओ तुम दोनों की पिटाई क्यों पड़ी ? मम्मी कहती हैं: पूजा वर्ग में बदमाशी किया था। राँची से आए कथाकार श्री दिलीप तेरे ने भी आज खास तौर से इस कार्यक्रम में भागीदारी निभाई। पैवेलियन का एक और आकर्षण ‘सैडो ग्राफी’ था जिसे राधा कुमुद शर्मा ने बच्चों को दिखाया। मोबाइल थियेटर के बच्चों ने बालश्रम उन्मूलन पर गीत प्रस्तुत किया। विकलांग बच्चों की समस्या पर ‘मंजिल दूर नहीं’ फिल्म का प्रदर्शन किया गया। पटना पुस्तक मेला में इन दिनों प्रसिद्ध जादूगर गोगिया सरकार के स्टाल पर भारी भीड़ उमड़ी।‌ पेंसिल काटने एवं जोड़ने का जादू जैसे कारनामों से लोग ज्यादा आकर्षित हुए। जादू सिखा रहे श्री अजीत कुमार ने बताया कि जादू एक प्रकार का विज्ञान का खेल है, हाथ की सफाई नहीं। हाथ की सफाई पाकेटमारी को कहते हैं।

पटना पुस्तक मेला मूलतः प्रकाशक, पाठक और देश के सभी राज्यों की आम जनता के बीच सम्बन्ध जोड़ता है। सामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों में आयी गिरावट और शैक्षणिक अराजकता के माहौल में ऐतिहासिक पटना पुस्तक मेला ने वैचारिक क्रान्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए शैक्षिक आन्दोलन के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है। यह मेला पुस्तकों की अनोखी बहुरंगी दुनियाँ है।‌ हर पुस्तक मेला का अपना औचित्य होता है, क्योंकि हर पुस्तक एक मशाल होती है। पटना पुस्तक मेला का अपना एक विशेष महत्त्व भी है। इसके आयोजन के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प है। यह कहानी यूं शुरू होती है- राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत ने 1985 में 11वां राष्ट्रीय पुस्तक मेला पटना में आयोजित करने की घोषणा की थी, परन्तु जिस दिन यह मेला लगनेवाला था उसी दिन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने इस मेला को स्थगित करने की घोषणा कर दी। इस मामले को ‘बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ’ ने काफी गम्भीरता से लिया और इसका परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने नयी तिथि निर्धारित की, जिसके तहत् 1985 (2 अक्तूबर) में ही ‘पटना पुस्तक मेला’ लगाया गया।

इसके पश्चात् सन् 1988 में पटना पुस्तक मेला लगा और उसी गौरवमयी परम्परा में पटना पुस्तक मेला के इतिहास में आयोजन का अध्याय जुड़ता रहा और हर मेले में पाठक, प्रकाशक वितरक, रचनाकार और आम नागरिक एक दूसरे से रू-ब-रू होने लगे। इतना ही नहीं, प्रति वर्ष मेला में पाठकों की भीड़ और पुस्तकों की बिक्री बढ़ती गई। चाहे1990, 1988, 1990 का पटना पुस्तक मेला हो या फिर वर्ष 1991व 1992 का मेला। 1994 में पटना पुस्तक मेला ने पिछले सभी मेलों को पीछे छोड़ दिया था और इस मेला में करीब डेढ़ करोड़ रुपए से ऊपर की पुस्तकें भी बिकी। वैसे जब से पटना पुस्तक मेला प्रारम्भ हुआ तब से इस मेले का अध्याय एक उद्देश्य आयोजकों की ओर से पाठकों और प्रकाशकों को एक-दूसरे से रू-ब-रू कराना। जब पाठक और प्रकाशक एक दूसरे के करीब होते हैं तब प्रकाशकों को पता चलता है कि उनकी किस पुस्तक की माँग है और किन पुस्तकों में कमियां व्याप्त है।

हालांकि इस मेला आयोजन के पीछे एक दूसरा उद्देश्य उन पुस्तकों को पाठकों के बीच उपलब्ध कराना है जो आम तौर पर बाजार में नहीं मिलते हैं। इस बात को भी नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता है कि इस मेला में व्यवसाय एक महत्त्वपूर्ण पहलू भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि पटना पुस्तक मेला केवल राष्ट्रीय नहीं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है और यह निरन्तर सफलता की पायदान चढ़ रहा है। इस बार पुस्तक प्रेमियों और प्रकाशकों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर आयोजकों ने व्यवस्था पर खास ध्यान दिया है, क्योंकि मेला का स्थान परिवर्तन से आमलोगों, पाठकों और प्रकाशकों में कुछ भ्रान्तियां फैल गई थी, लेकिन अब मेला में पाठकों की भीड़ और पुस्तकों की बिक्री ने इस भ्रम को दूर कर दिया है। प्रकाशकों ने भी स्वीकार किया है कि गांधी मैदान के पहले पाटलिपुत्रा मैदान में इस बार मेला का आयोजन होने से व्यवसाय में कोई विशेष अन्तर नहीं दिख रहा है। मेला में हिस्सा लेने आए प्रकाशकों और उनके प्रतिनिधियों के हौसले बुलन्द हैं। प्रकाशकों और उनके प्रतिनिधियों के बुलन्द हौसले इजहार करती है मेले के अन्दर पुस्तक प्रेमियों को आकर्षित कर रही किताबों की अनोखी दुनियाँ। शायद ही कोई ऐसा विषय होगा, जिस पर आधारित पुस्तकें मेला में नहीं होगी। एक एक विषय पर अनगिनत किताबों की भरमार है ‘बुक स्टौलों’ पर।

चाहे वह विषय अध्यात्म हो, धर्म,गणित हो या विज्ञान, योगासन हो या स्वास्थ्य, कम्प्यूटर हो या बाल साहित्य, इतिहास हो या भूगोल, साहित्य हो या दर्शन। इस मेला में भौतिकी विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, भाषा विज्ञान तथा काव्य शास्त्र सरीखे पुस्तकें काफी संख्या में उपलब्ध। पटना पुस्तक मेला परिसर में लेखक बैठिए में विचार- गोष्ठी/संगोष्ठी (SEMINAR), दक्ष (QUIZ), नई पुस्तकों का विमोचन/लोकार्पण/वाद-विवाद संवाद सहित सांस्कृतिक समारोह किए गए। यह मेला पुस्तक प्रेमियों के लिए एक महोत्सव का रूप ले लिया है। पुस्तकों का प्रकाशन और उसे सर्व सुलभ बनाने के लिए नेक कार्य में लगे कतिपय व्यवसायियों के व्यापक सहयोग से आधारित पटना पुस्तक मेला पाठकों और जन साधारण के लिए एक आकर्षण का केन्द्र बन चुका है। लखोटिया कम्प्यूटर सेंटर का स्टौल (स्टौल संख्या: 11) छात्रों के लिए आदर्श कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र है। आज लखोटिया कम्प्यूटर सेंटर का 750 से भी अधिक प्रशिक्षण केन्द्र इंडोनेशिया, सिंगापुर, स्वीडेन, बांग्लादेश, नेपाल सहित भारत में खुल चुके हैं।‌ इसकी अपने प्रशिक्षण पद्धति के कारण शुरू से ही अपनी एक अलग पहचान है और लखोटिया कम्प्यूटर केन्द्र हमेशा से मध्यवर्गीय छात्र-छात्राओं के लिए एक आदर्श कम्प्यूटर प्रशिक्षण केन्द्र रहा है। पटना पुस्तक मेला 2000 में इसके क्षेत्रीय प्रबन्धक श्री नीरज कुमार पोद्दार ने बताया कि इस मेले में उन्होंने छात्र-छात्राओं की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा ताकि प्रत्येक वर्ग के युवा पीढ़ी कम्प्यूटर जगत की इस दौड़ में अपनी भी पहचान बना सकें। पटना पुस्तक मेला 2000 के अवसर पर सभी विषयों की प्रशिक्षण शुल्क काफी कम रखी गई ताकि सभी इससे लाभान्वित हो सकें।

पटना पुस्तक मेला 2000 चरम पर, मेला में पूर्ण रूपेण जान आ गई। लेखकों के लिए बनाए बैठकों के अलावा मेला का मजा लेने आए लोग भी इसपर बैठ जाते हैं। मेले में प्रसिद्ध कवि, लेखकों को लगातार देखा जाता है। डा० खगेन्द्र ठाकुर, श्री मदन कश्यप, श्री प्रेम कुमार मणि, श्री विरेन्द्र झा, श्रीमती उषा किरण खान, श्री कुमार नयन, श्री विद्यानंद सहाय, श्री किशन कालजयी, श्री कुमार मुकुल आदि प्रायः हर रोज आते हैं। मेले में कई राजनीतिक चेहरे भी दिखे। इन्हें पुस्तकों से कुछ लेना-देना नहीं था। ये सिर्फ भाषणबाजी कर रहे थे। एक व्यक्ति ने कहा भी ‘क्या मेला में आज राजनीतिक दल के नेताओं का कार्यक्रम है’! मेले में बिहार के मुखिया श्री लालू प्रसाद यादव के साले विधायक श्री अनिरूद्ध प्रसाद उर्फ साधु यादव ‘पर्यावरण एवं जनसंख्या नियंत्रण समिति’ सारी व्यवस्था समिति के मुख्य संरक्षक के स्टौल पर नेत्रहीनों के लिए ब्रेल लिपि में महाभारत रामायण से लेकर IA तथा MA तक की किताबें ब्रेल लिपि में है। यहाँ ब्रेल लिपि में पढ़ना और लिखना सिखाने के लिए अलग से ⛺ शिविर लगाया गया जिसमें ऊर्जा राज्यमंत्री श्री श्याम रजक प्रमुख हैं।

PATNA BOOK 📚 FAIR IS THE PLACE TO BE IN ! If you think Book fairs are for those queer group of people, the bookworms as they are called, with those high-powered thick eye glasses, you really need to change your opinion. In Patna, nothing happens the way it is meant to be. Be it a Trade fair or a Book fair, the crowd will be the same. “We, Patnaites, are a very curious group of people. Anything that generates our curiosity and premises to be different will find us running to it and we are not to be blamed for that. Patna hardly offers any place for outing where we can go for a change or just to freak out, so we are constantly on the look out for an opportunity to have fun and it doesn’t matter even if it is of this kind. At least, there are food stalls and also plenty of space to just loiter around with friends”, said a young visitor at the fair. So you see. Book fair is not only about books, it is more about the enjoyment related with “fairs” and none of us is unaware of the importance of fairs or more appropriately ‘melas’, in the lives of Indians. At one point of time such ‘melas’ were looked up to with a lot of excitement. Though a short term recreation spot, people are satisfied that they have some place to visit even though for a temporary period. The organising committee knows that people would not come only for books, so they have prepared a tentative schedule and programmes are being held every day. We can find various kinds of groups hanging out here: families, school children, college students and also the “exclusive” group of book lovers. “It becomes very difficult for us to search for the books of our choice because of the big number of people inside the stalls. Many would not even buy any books but would simply turn the pages and look around creating a lot of inconvenience,” said a book lover. And the place would be your destination point if you want to check out the latest fashion scenario in the capital. From mini skirts to capri pants, the girls have it all. Perhaps, Book fairs have another major utility about which we are still unaware.

शनिवार 16 दिसम्बर 2000
पटना पुस्तक मेला में महिला लेखिकाओं की पुस्तकों की धूम है। महाश्वेता देवी, तसलीमा नसरीन, तहरीमा दुरानी, अमृता प्रीतम, अलका सरावगी, सोमा भारती, माया शबनम, उषा किरण खान, रमा सिंह, मंजू शर्मा और किरण बेदी आदि की पुस्तकें पाठकों की खास पसन्द बनी हुई हैं। पटना पुस्तक मेला 2000परिसर में आज कथाकार डा० लालजी प्रसाद की कहानी संग्रह “मैं हारूंगी नहीं” का लोकार्पण हिन्दी के प्राध्यापक डा० कलानाथ मिश्र ने किया। समारोह की अध्यक्षता डा० बिमल नारायण आर्य ने की जबकि आगत अतिथियों का स्वागत श्री सुरेश तिवारी और श्री विजय कुमार आर्य ने की। इस अवसर पर डा० मिश्र ने कहा कि “साहित्य लेखन की कलम से निकलकर समाज का प्रतिबिम्ब बनता है और साहित्य में निहित भावों के अनुरूप ही रचनाकार की पहचान होती है। साहित्यकार का दायित्व समाज को राह दिखाना है। आज साहित्यकार की जिम्मेदारी काफी बढ़ गयी है। कथाकार, कवि, समालोचक सबों के लिए विचारणीय है कि किस प्रकार प्रकारान्तर से हमारी संस्कृति को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया गया और किस प्रकार की रचना से हम अपनी सांस्कृतिक मर्यादा को फिर से प्रतिष्ठित कर सकते हैं। डा० लालजी प्रसाद की ‘मैं हारूंगी नहीं’ कहानी संग्रह में कथाकार का यथार्थ बोध परिलक्षित होता है जो आज की सामाजिक संवेदनाओं को व्यक्त करता है।”

इस अवसर पर झारखण्ड के प्रसिद्ध कथाकार/कार्टूनिस्ट/रचनाकार/पत्रकार श्री दिलीप तेतरवे ने कहा कि “आज साहित्यकार का फर्ज बनता है कि रचना करने से पहले समाज को पढ़े, सुने, विचार करे, फिर रचना करे तभी उस साहित्य से समाज के लोगों का प्रेम बढ़ेगा। वस्तुत: वादों को तोड़ना ही साहित्य का काम है, पूंजीवाद-साम्यवाद के फेर में पड़ना साहित्य का काम नहीं है। साहित्यकार को एक कुशल सर्जन की भांति समाज की विकृतियों को लेखनी के माध्यम से निकालना चाहिए।” पुस्तक मेला के प्रवक्ता रत्नेश्वर ने कहा कि औरतों का मनोबल बढ़ाने के लिए श्री लालजी प्रसाद ने अपनी लेखनी का कमाल दिखाया है। प्रस्तुत कहानी संग्रह पर प्रोफेसर कन्हैया प्रसाद सिंह, श्री महावीर प्रसाद सिंह माधव, श्री अमरेंद्र कुमार झा, श्री पवन कुमार झा, प्रोफेसर सी०डी० सिंह, श्री जनार्दन मिश्र आदि ने अपने विचार व्यक्त किए।

बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी का स्टौल पटना पुस्तक मेला २००० का सबसे बड़ा स्टौल। मेला में आने वालों में श्री बी०पी० सिन्हा, श्री बहाव अशर्फी, डा० कुमार विमल जैसे पुस्तक प्रेमियों को हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, के०पी० जायसवाल शोध संस्थान, प्राकृत एवं अहिंसा शोध संस्थान पर ही विशेष देखा जाता है।‌ विदेशी पर्यटक पुस्तक प्रेमियों को के०पी० जायसवाल शोध संस्थान की पुस्तकें खरीदते देखा गया। इस संस्थान के प्रकाशन सहायक श्री विनय कुमार झा एवं श्री शुभ नारायण झा ने बताया कि ‘कम्प्रीहैन्सिव हिस्ट्री आफ बिहार’, ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस इन बिहार’, ‘बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास’, ‘, बिहार इन दी एज आफ ग्रेट मुगल’ ‘फ्राम किंगशिप टू सोशल हायरार्की द वैदिक एक्सपीरीएन्स’, ‘संत कबीर का धर्म दर्शन’, ‘हिस्ट्री आफ भोजपुर’, ‘बिहार पास्ट एंड प्रेजेंट’ जैसे पुस्तकें खासकर विदेशी पर्यटक पुस्तक प्रेमियों एवं उच्चस्तरीय पाठकों ने खरीदी हैं। प्राकृत एवं अहिंसा शोध संस्थान के प्रकाशन सहायक ने बताया कि हमें कुछ पुस्तकें विशेष आर्डर पर मंगानी पड़ी। खासकर ‘होमेज टू वैशाली’, ‘बुद्धिस्ट एण्ड जैनिज मोनार्की’, अंग्रेजी प्राकृत एवं हिन्दी में प्रकाशित कर्पूर मंजरी, रिसर्च इंस्टीट्यूट बुलेटिन तथा ‘इंडियन लाजिक’ जैसी पुस्तकें। इसके अतिरिक्त मैथिली अकादमी के स्टौल से भी मैथिली चित्रकला एवं शिल्पकला, संस्कार गीत, विद्यापति गीतावली आदि पुस्तकों की अच्छी बिक्री हुई। उच्च शिक्षा राज्यमंत्री श्री रामदास राय ने पटना पुस्तक मेला में राज्य की अकादमियों द्वारा लगाए गए स्टौलों का निरीक्षण किया। मैथिली अकादमी के स्टौल पर अकादमी के अध्यक्ष श्री गौरीकान्त चौधरी ‘कान्त’ एवं निर्देशक श्री रत्नेश्वर प्रसाद सिंह ने उनका स्वागत करते हुए उन्हें अकादमी के प्रकाशनों से अवगत कराया।

शनिवार 16 दिसम्बर 2000
पुस्तक मेला में आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डा० जगन्नाथ मिश्र और वर्तमान प्राथमिक शिक्षा मन्त्री श्री रामचंद्र पूर्वे भी आए। मेला परिसर में बच्चों के कई सांस्कृतिक कार्यक्रम, ओपन अंताक्षरी प्रतियोगिता और श्री प्रेम कुमार मणि द्वारा लिखित उपन्यास ‘ढलान’ का लोकार्पण किया गया। राजनीतिज्ञों ने मेले में विभिन्न स्टालों को घूम-घूम कर देखा। माइक्रो सेमिनार में आज का विषय था, ‘किशोर न्याय प्रणाली’। चर्चा में बहुत बच्चों ने भाग लिया। कहानी में आज पटना दूरदर्शन के सहायक निदेशक श्री प्रमोद कुमार झा ने बच्चों को कहानी सुनाई। ‘शेर और लोमड़ी’ कहानी का शीर्षक था। सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत ‘बिहार ग्रामीण विकास परिषद्’ बेगूसराय से आए कलाकार यूनिसेफ परिकल्पित मीना मिशन के तहत मीना रथ लाए थे जो बच्चों द्वारा बनायी गयी पेंटिंग्स एवं अब तक मीना मिशन में किए गए कार्यों के फोटो से लैस थे। सांस्कृतिक कार्यक्रम में कई नाटक एवं संगीत प्रस्तुत किए गए। श्री आर०टी० राजन, श्री धर्मेन्द्र कुमार, बबली, श्री बबलू कुमार, सुश्री राजमणि कुमारी,सुश्री जयमाला एवं सुश्री सरिता नाटक-संगीत में भाग लेने वाले मुख्य कलाकार थे। ‘मीना की चिट्ठी आप के नाम’ एक पर्ची भी लोगों को वितरित की गई जिसमें भ्रूण हत्या, बाल विवाह, अशिक्षा एवं कुपोषण पर न्याय की गुहार थी।

हिन्दी में ‘कुरान’ की मांग बढ़ना एक ओर जहाँ साम्प्रदायिक सौहार्द की बुनियाद को पुख्ता करती है वहीं दूसरी ओर लोगों को एक दूसरे के धर्मों के बारे में जानने की जिज्ञासा की पुष्टि भी करती है। मेले में उर्दू किताबों के लिए दो स्टौल। कादियन, पंजाब से आए सद्र अंजुमन अहमदिया के प्रकाशन विभाग का स्टौल। स्टौल के अधिकारी श्री इम्तियाज अहमद ने बताया कि उनके स्टौल से हिन्दी में अनुदित ‘कुरान’ की सबसे अधिक प्रतियां बिकी हैं और यह मांग अब भी जारी है। ठीक बगल के स्टौल कौमी काउंसिल बरा-ए-फरोग-ए-उर्दू‌ जबान के स्टौल पर श्री खुर्रम ने भी इस बात की पुष्टि की कि “कुरान’ का हिंदी अनुवाद खरीदने के लिए पुस्तक प्रेमी उनके स्टौल पर भी चलें आते हैं जबकि यह किताब उनके प्रकाशन की नहीं है।

पुस्तक मेला का समापन समारोह 18 दिसम्बर को अपराह्न 3 बजे परिसर में होगा और 17 दिसम्बर को अपराह्न 2 बजे से एक काव्य पाठ का आयोजन किया जाएगा। इसमें प्रोफेसर डा० उषा किरण खान की मैथिली पुस्तक ‘कचहि बांस’ (कच्चा बांस) के लोकार्पण के साथ-साथ कवि कुमार मुकुल को विद्यापति पुरस्कार से सम्मानित भी किया जाएगा। यह जानकारी परिसर के दिनकर प्रशासनिक भवन में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में पटना पुस्तक मेला आयोजन समिति के वरिष्ठ सदस्य और भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी IG श्री रामचंद्र खान ने दी। श्री खान ने मीडिया को सम्बोधित करते हुए कहा “मेला अब एक संस्कृति का रूप ले चुका है। वर्तमान समय में जब हर ओर अशांति है और पढ़ने लिखने का माहौल खत्म होता जा रहा है ऐसे में पुस्तक मेला की प्रासंगिकता बढ़ गई है। जब बिहार, बंगाल और उड़ीसा सम्मिलित सूबा हुआ करता था उस समय यहाँ के शिक्षण संस्थानों की प्रतिष्ठा विदेशों में भी थी। पटना पुस्तक मेला का 1985 में शुरुआत के उपरान्त उसी प्रतिष्ठा को एक बार फिर से स्थापित करने की योजना मूलतः 1988 में बनी और पटना पुस्तक मेला का यह स्वरूप सामने है जिसका मुख्य भागीदार UNICEF है।”

कार्यक्रम के बारे में श्री खान ने जानकारी दी कि 17 दिसम्बर को दो मुख्य कार्यक्रम होंगे। इसमें 12:30 बजे दोपहर में गीत एवं नाटक प्रभाग द्वारा एक कार्यक्रम और अपराह्न 2 बजे से काव्य पाठ भी होगा। एक घंटा के काव्य पाठ में लगभग नौ कवि भाग लेंगे। इनमें आलोक धन्वा,मदन कश्यप, अनिल विभाकर, रवीन्द्र भारती, साजिना, सुरेन्द्र स्निग्ध, विद्यानंद सहाय, विश्व रंजन और कुमार मुकुल प्रमुख हैं। यह पूछने पर कि अगली बार भी पुस्तक मेला का स्थान यही (पाटलिपुत्रा कालोनी मैदान) रहेगा या गांधी मैदान के जबाव में उन्होंने कहा कि गांधी मैदान पटना पुस्तक मेला को सिर्फ दो शर्तों की वजह से उपलब्ध नहीं हो सका। प्रशासन ने पहली शर्त यह रखी थी कि गांधी मैदान में पुस्तकों की खरीद-बिक्री नहीं होगी और दूसरी शर्त यहाँ किसी प्रकार का प्रवेश-शुल्क नहीं लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि किताबों की बिना खरीद पर बिक्री के इसका क्या औचित्य रह जाएगा ? पटना पुस्तक मेला आगे भी आयोजित होता रहे यही मुख्य है।

रविवार 17 दिसम्बर 2000

“कविता की भूमिका बहुत ही नाजुक किस्म की है। आज आदमी बनाने के लिए सारी जरूरी चीजें खतरे में है। ऐसे में कविता आदमी को केवल इंसान बनाने की प्रेरणा देती रही तो यह उसका बड़ा काम होगा”! प्रसिद्ध आलोचक डॉ मैनेजर पाण्डेय ने ये बातें पटना पुस्तक मेला में रेणु मुक्ताकाश मंच पर आयोजित काव्य गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में कही। डॉ पाण्डेय ने कहा कि कविता ही मनुष्यता कायम रखती है। यह समाज और प्रकृति के राणात्मक सम्बन्ध की रक्षा करता है। कविता की यही भूमिका समाज के लिए आवश्यक है। काव्य गोष्ठी का संचालन साहित्यकार श्री खगेन्द्र ठाकुर कर रहे थे। मेले में आज माले नेता श्री दीपांकर भट्टाचार्य भी आए थे। आधुनिक हिन्दी कविता के जाने-माने एवं चर्चित कवियों ने पटना पुस्तक मेला के रेणु मुक्ताकाश मंच पर आयोजित काव्य गोष्ठी में समां बांध दिया । आधुनिक हिन्दी कविता के चर्चित कवि मदन कश्यप, आलोक धन्वा, विश्वरंजन, अनिल विभाकर, श्रीमती साजीना, श्री चंदन सिंह ने दो-दो कविताएं सुनाईं। श्रोताओं में भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के वरिष्ठ अधिकारी IG श्री रामचन्द्र खान, लेखिका श्रीमती उषा किरण खान, चर्चित रंग-दिग्दर्शक श्री संजय उपाध्याय, युवा लेखक रत्नेश्वर, प्रोफेसर श्री श्याम शर्मा, श्री कमेन्द्र शिशिर, श्री प्रेम कुमार मणि, श्री अवधेश प्रीत, श्री ऋषिकेश सुलभ सहित कई अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

सोमवार 18 दिसम्बर 2000
राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने कहा ‘जो बात हो गयी सो हो गयी, अगली बार से मेला गांधी मैदान में लगेगा। इस बार मेला वहाँ नहीं लगा इसका मुझे खेद है।’ वह पटना पुस्तक मेला 2000 के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि इस बात का कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता कि पुस्तक मेला को गांधी मैदान में नहीं लगाया जाए। गांधी मैदान एक सार्वजनिक स्थल है और यह पटना विश्वविद्यालय के नजदीक ही है इसलिए अगली बार से पुस्तक मेला गांधी मैदान में ही आयोजित होगा। वे पूरे मूड में थे। अपनी मनोरंजक भाषा और भाषण से लोगों को खूब हंसाया। उन्होंने पुस्तक मेला में अपने किसी पुराने मित्र और कवि की कविता भी सुनाई – ‘हम हई भोजपुरिया जवान, अइसन अइसन ना जानीले। हम स्नो पाउडर ना जानी, हम धूरिये लगाबे जानीले।’ दरअसल मामले की शुरुआत विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधि श्री दीक्षित ने कर दी थी। उन्होंने अपने भाषण में लालू प्रसाद यादव से कहा कि यहाँ बहुत धूल है। इसके कारण उन्हें ब्रोंकाइटिंस हो गया है।

इस पर लालू प्रसाद यादव तुरत शुरू हो गए। उन्होंने कहा- दीक्षित जी धूल से मत घबराइए।‌ ये तो यहाँ का स्नो-पाउडर है। इसके बाद उन्होंने अपने भाषण में कहा कि दीक्षित जी धूल से घबराते हैं और हमलोगों के बाप-दादा खरिहाने में दिन भर रहते थे। उन्होंने कहा कि बिहार से बाहर जाने वाले लोग जब पटना आते हैं तो वे पटना को सिंगापुर की तरह देखना चाहते हैं- लंगड़ी बिलार आ घरवे में सिकार। उन्होंने कहा कि पटना को धूल से बचाने के लिए चारों तरफ AC लगाना पड़ेगा। अब चर्चा ऐसी है कि AC से ऐसा गैस निकलता है जिससे ओजोन में छेद होता है। ओजोन परत को बचाने की जरूरत है, इसमें छेद करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने बताया कि एक समय किसी ने उनसे IT पर बोलने के लिए कहा तो उन्होंने कहा- ह्वाट आई टी। दिल्ली के मंत्री लोग कहते हैं कि लालूजी को आईटी का मतलब इनकम टैक्श बुझाता है। इससे पहले श्री रामचन्द्र खान ने जब कहा कि लालू जी जब चलते हैं तो उनके साथ पूरा सर्कस चलता है तो वहाँ के लोग खूब हंसे। हालांकि बाद में उन्होंने अपने कथन का प्रसंग भूतपूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जोड़ दिया।‌ लालू प्रसाद यादव कभी-कभी भाषण के बीच में हंसने वालों को हंसने से मना भी करते थे। इससे पूर्व पटना पुस्तक मेला के आयोजन/सलाहकार समिति के सदस्य श्री रामचन्द्र खान ने कहा कि पुस्तक मेला को गांधी मैदान में ही लगाया जाना था लेकिन यहाँ प्रशासन अंत-अंत तक इस बात पर फैसला नहीं कर सका कि पुस्तक मेला गांधी मैदान में लगेगा या नहीं।

गांधी मैदान में मेला लगाने की इजाजत मिली तो भी इस शर्त के साथ कि इसमें व्यावसायिक गतिविधियां नहीं की जाएंगी। उन्होंने कहा कि पुस्तक मेला में जब लोग किताबें खरीदने और बेचने नहीं आएंगे तो क्या यहाँ लौलीपौप खाने आएंगे। उन्होंने कहा पुस्तक व्यापार है तो ज्ञान का भण्डार भी है। समापन समारोह के प्रारम्भ में आगत अतिथियों का स्वागत पटना पुस्तक मेला के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर सच्चिदानन्द ने किया। कार्यक्रम को विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधि के अलावा डा० कुमार विमल ने भी सम्बोधित किया। इस मौके पर लालू प्रसाद यादव ने सुनीता रघुवंशम् के कैसेट ‘आरती’ का भी लोकार्पण किया। इस अवसर पर राज्य के स्वास्थ्य राज्यमंत्री श्री अखिलेश प्रसाद सिंह भी मौजूद थे। आयोजन समिति के महासचिव एनके झा ने मेला का प्रगति प्रतिवेदन रखते हुए कहा कि यदि पटना पुस्तक मेला के लिए गांधी मैदान मिल जाता है तो अगले वर्ष (2001) फिर मेला लगाया जाएगा।‌ वैसे उन्होंने अगले वर्ष राँची (झारखण्ड) में भी पुस्तक मेला लगाने की घोषणा की। कार्यक्रम का संचालन मेला के प्रवक्ता रत्नेश्वर ने की जबकि धन्यवाद ज्ञापन भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री जियालाल आर्य (संरक्षक, पटना पुस्तक मेला) ने की।

मंगलवार 11 दिसम्बर 2000
फिर मिलेंगे के वायदे के साथ पटना पुस्तक मेला सम्पन्न। पटना पुस्तक मेला परिसर में आज एक बड़े आयोजन के खत्म होने की खुमारी पसरी हुई थी। आयोजक और स्टौल के अधिकारी सुस्ताने के अन्दाज में थे। लेकिन शाम तक लोगों का आना-जाना लगा रहा और कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए। मानो ये कार्यक्रम पुस्तक प्रेमियों के चेहरे पर छाए उदास भाव को कुछ सुकून देना चाहते हों कि कभी खत्म नहीं होगी पुस्तकों की दुनियाँ। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अन्तर्गत पटना पुस्तक मेला ने अनेक प्रतियोगिताओं के विजेताओं को आज पुरस्कृत किया। इसके अलावा यूनिसेफ के मंडप में भी गीत संगीत के कार्यक्रम हुए। भीड़ का मिजाज एकदम वैसा हो गया था जिसके लिए यह भीड़ पूरे देश में जानी जाती है। तभी तो प्रसिद्ध लेखक और नाटककार असगर वजाहत ने भी इस बार मेला में कहा था कि पुस्तकों के सबसे ज्यादा पाठक और क्रेता बिहार में ही हैं।
—-

Facebook Comments Box
Leave a Comment
Show comments