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पटना पुस्तक मेला : एक विहंगावलोकन

किताबों की अहमियत को कौन चुनौती दे सकता है भला? इंसान के अंदर छाये अज्ञान के अंधेरे को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं किताबें। सचमुच, किताबें एक मार्गदर्शक की तरह अनजान चीजों और अपरिचित क्षेत्रों से आपका परिचय कराती हैं, आपमें सोचने-समझने की क्षमता जागृत करती हैं तथा इंसानियत का पाठ पढ़ाकर आपको एक अच्छा मनुष्य बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं।
वैसे तो सारे देश में शिक्षा के स्तर में गिरावट आती है मगर बिहार में शैक्षणिक स्तर में हो रही निरन्तर गिरावट अखबारों की सुर्खियाँ बनती जा रही हैं। राज्य के कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों की गिरती साख और बौद्धिक गतिविधियों की कमी पर अनेक प्रश्न-चिह्न खड़े कर दिये गये।

लिहाजा 1998 में पटना में प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े चन्द उत्साही युवा व्यक्तियों ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया और बिहार में पठन-पाठन के कार्य को सुचारू रूप से चलाने तथा लोगों में पुस्तकों के अध्ययन के प्रति अभिरुचि एवं उत्साह जगाने हेतु पुस्तक मेला आयोजित करने की एक महत्त्वाकांक्षी योजना तैयार की। वैसे भी, पटना में लंबे अर्से से रह रहे लोग भी बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहे थे कि पटना में नई शैक्षिक गतिविधियाँ शुरू हों ताकि आम लोगों को रोजमर्रे की जिंदगी से, थोड़े समय के लिए ही सही, निजात मिले।
पटना में पुस्तक मेला आयोजित करने की परिकल्पना 1985 में ही बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ के तत्वाधान में पटना में हुए अधिवेशन में श्री एच.एल. गुलाटी ने की थी। उनकी इस कल्पना को श्री नरेन्द्र कुमार झा तथा पुस्तक-व्यवसाय से जुड़े कुछ अन्य महानुभावों ने साकार कर दिया।

उल्लेखनीय है कि गैर-बिहारी होने के बावजूद पटना के बाशिंदा श्री एच.एल. गुलाटी ने पटना में पुस्तक मेला आयोजित करने में भरपूर दिलचस्पी ली। श्री गुलाटी को देश में इसी तरह के मेले आयोजित करने का काफी पूर्व अनुभव भी था और बिहार पुस्तक व्यवसायी संघ के उत्साही महासचिव श्री नरेन्द्र कुमार झा ने न सिर्फ उन्हें सक्रिय सहयोग दिया बल्कि प्रसन्नता से विभिन्न दायित्वों का वहन भी किया।
इस बीच श्री नरेन्द्र कुमार झा ने दिल्ली में बिहार के एक प्रमुख सांसद श्री डी०पी० यादव एवं भारतीय बाल शिक्षा परिषद् तथा भारतीय शैक्षिक प्रकाशक महासंघ के उच्चाधिकारियों से भी मुलाकात की। उन्हें यह सुझाव दिया गया कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्म शती (14 नवम्बर 1988) के अवसर पर वे बाल पुस्तक मेले का आयोजन करें तो इसके लिए उन्हें कुछ आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाएगी।
पटना लौटकर श्री झा ने श्री गुलाटी से मुलाकात की और तब दिल्ली में हुई वार्ता के आलोक में पटना पुस्तक मेला आयोजित करने का निर्णय ले लिया गया। इसके पश्चात पुनः दिल्ली में संसद भवन में पूर्व उपराष्ट्रपति डॉ० बी.डी. जत्ती की अध्यक्षता में एक बैठक हुई जिसमें उनसे पटना पुस्तक मेले का मुख्य संरक्षक बनने का अनुरोध किया गया।

मेले के प्रति स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का रुख भी बड़ा उत्साहवर्द्धक रहा। उन्होंने अपने रंगीन चित्र पर एक नारा लिख “हर पुस्तक एक मशाल है” और उसे देशभर में वितरित किया गया। यह वाक्य पुस्तकों के प्रति उनके रुझान का प्रतीक था।
बहरहाल, पटना पुस्तक मेला बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ के झंडे तले भारतीय बाल शिक्षा परिषद् तथा भारतीय शैक्षिक प्रकाशक महासंघ के सहयोग से आयोजित किया गया। इस मेले में देशभर से करीब 100 प्रकाशकों ने भाग लिया। मेले के लिए रैक़ों की व्यवस्था नेशनल बुक ट्रस्ट ने की। हालांकि स्टाल धारकों को थोड़ी असुविधाओं का सामना करना पड़ा, मगर कुल मिलाकर मेला स्थल पर लोगों की भीड़ जमा हुई और भारी संख्या में पाठकों ने पुस्तकें खरीदीं। स्टालों के निर्माण तथा साज-सज्जा का काम एक स्थानीय डेकोरेटर ने किया था।

इस मेले की सफलता का श्रेय काफी हद तक बुद्धिजीवी वर्ग तथा संचार माध्यमों को जाता है। इनमें हिन्दुस्तान टाइम्स के तत्कालीन सम्पादक श्री एस सेन, टाइम्स ऑफ इंडिया के तत्कालीन संपादक श्री पी. सेन एवं श्री संजय दत्ता, हिन्दुस्तान टाइम्स की श्रीमती श्रुति शुक्ला और डॉ. श्रीवास्तव, टाइम्स ऑफ इंडिया के श्री उज्जवल सिंह, आज के श्री सुधांशु शेखर, हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञापन प्रबंधक श्री ए.एस. रघुनाथ, गृहसचिव श्री जियालाल आर्य, विज्ञापन एजेन्सी से जुड़े श्री खुर्शीद अहमद (जिनकी अपनी एजेन्सी ‘एडवांटेज मीडिया कंसलटेंस’ है), मेले के आधिकारिक फोटोग्राफर श्री नौशाद रिजवी तथा महिमा के श्री अरूण गुप्त खास तौर पर उल्लेखनीय रहे।
वैसे तो यह पुस्तक मेला शानदार ढंग से सफल रहा और पाठकों ने भारी संख्या में पुस्तकें खरीदीं फिर भी आयोजकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। मेले में भाग लेने वाले प्रकाशकों ने भी सुविधाओं की कमी की ओर आयोजकों का ध्यान आकृष्ट किया। ऐसी आम राय बनी कि इस मेले का हर वर्ष आयोजन करना संभव नहीं होगा, लिहाजा जनता द्वारा नियमित रूप से हर वर्ष मेले का आयोजन करने की मांग को नजरअंदाज करते हुए हर दूसरे वर्ष पुस्तक मेला आयोजित करने का निर्णय लिया गया।

द्वितीय पटना पुस्तक मेला का उद्घाटन करने की पूर्व स्वीकृति हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने दी दी थी, मगर देश में राजनीतिक उथल-पुथल होने की वजह से वे निर्धारित तारीख को पटना नहीं आ सके।
मेले को सफल बनाने के लिए त्रुटिविहीन योजना तैयार की गई थी। पेशेवर सजावटकर्त्ता कर्मी वृंद को कलकत्ता से बुलाया गया था। पटना में संभवतः पहली बार गाँधी मैदान में प्रशासनिक ब्लाक का एक ऐसा विशाल ढाँचा तैयार किया गया था, जो मेला परिसर को एक मुकम्मल का रूप प्रदान कर रहा था। राजस्थान की कलाकृतियों और बिजली के लट्टुओं से अपनी बेहतरीन सजावट की गई थी। शाम में यह नजारा देखते समय ऐसा लगता था मानों आप पेरिस में अपनी शाम गुजार रहे हों।

द्वितीय पटना पुस्तक मेला के उद्घाटन के दूसरे दिन मेला-स्थल पर ‘हंगामा’ हो गया। दरअसल, आयोजकों की बगैर पूर्व जानकारी के तत्कालीन रेल मंत्री श्री जार्ज फर्णांडीस मेला परिसर में नजर आये। आयोजक अपने बीच एक केन्द्रीय मंत्री को देखकर बड़े हर्षित हुए और उन्होंने उनका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया। ध्वनि विस्तारक यंत्र पर भी उनके आगमन की घोषणा की गई। पर, इस घोषणा के तुरंत बाद कुछ युवकों ने मंत्रीजी का घेराव कर दिया और मंडल आंदोलन के पक्ष और विपक्ष में नारे लगाने शुरू कर दिए। स्मरणीय है कि मंडल विवाद ने उस वक्त देश में उग्र रूप धारण कर रखा था। गाँधी मैदान थाने के प्रभारी श्री हसनैन की चुस्त व कारगर पहल पर पुलिस और समारोह स्थल पर तैनात सुरक्षा गार्डों की मदद से माननीय मंत्रीजी का बचाव किया जा सका। इस घटना के बावजूद आयोजकों ने सूझबूझ के साथ मेले का कार्यक्रम चलाया। बिहार की प्रतिष्ठा का सवाल जो था। फिर भी एहतियात के तौर पर उन्होंने गृह आयुक्त श्री जियालाल आर्य से पर्याप्त सुरक्षा-व्यवस्था प्रदान करने का अनुरोध किया ताकि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो। गृह आयुक्त के निर्देश पर तुरंत सी० आर० पी० एफ० के जवानों समेत अतिरिक्त पुलिस बल मेला-स्थल पर तैनात कर दिए गए। सुरक्षा व्यवस्था के संयोजन में श्री अशोक चौधरी, श्री जे० तिवारी का योगदान भी बहुत सराहनीय रहा।

पटना पुस्तक मेला की सफलता के ढेरों कारण गिनाए जा सकते हैं। वैसे तो साक्षरता-दर के आधार पर बिहार को शैक्षणिक रूप से पिछड़े का दर्जा दिया जाता है, मगर हकीकत यह है कि बिहार में न तो पुस्तक-प्रेमियों की कमी है और न ही किताबों की मांग की। सही अर्थों में तो मांग और पुस्तक की उपलब्धि के बीच एक बड़ी खाई है—और यह पुस्तक मेला उस खाई को पाटने का कार्य करता है। बिहार पुस्तक खपाने का एक बेहतरीन बाजार है क्योंकि यहाँ ग्यारह विश्वविद्यालय, दो कृषि विश्वविद्यालय, नौ मेडिकल कॉलेज, सत्ताइस पोलिटेकनिक व इंजीनियरिंग कॉलेज, सैकड़ों डिग्री कॉलेज तथा तकरीबन पैंसठ हजार स्कूल हैं। इस पुस्तक मेले में देश के विभिन्न भागों से जो प्रकाशक भाग लेते हैं उन्हें अपनी पुस्तकों को खपाने के लिए नए बाजारों का आकलन करने का अवसर मिलता है। सच तो यह है कि पुस्तक मेले में अप्रत्याशित कारोबार से प्रभावित होकर अनेक प्रकाशकों ने पटना में अपनी शाखाएँ खोलनी शुरू कर दी। यह पाठकों तक पुस्तकें पहुँचाने की दिशा में एक अच्छी शुरूआत कही जा सकती है।

1990 के पटना पुस्तक मेले में केवल भारत के प्रमुख प्रकाशन संस्थानों ने की नहीं वरन् अनेक विदेशी संस्थाओं समसलन बुल्गेरिया के दूतावास, सिंगापुर की मैक्सवेल-मैकमिलन कम्पनी आदि ने भी भाग लेकर मेले की सफलता में चार चाँद लगा दिए। पटना के लोगों का मेले के प्रति जो रुझान और उत्साह जबरदस्त ढंग से देखने को मिला, उसकी आयोजकों ने कल्पना भी नहीं की थी। और ऐसा होता भी क्यों नहीं, आखिर बिहार एक युग में विश्व की शिक्षा का केन्द्र स्थल रहा था और प्राचीनकाल में दूर-दूर से शिक्षा हासिल करने के उद्देश्य से लोग यहाँ आया करते थे।

1990 के पुस्तक मेले में देश के छोटे प्रकाशकों ने शिरकत तो की ही, कई बड़े व्यापारिक संगठनों ने भी अनेक कार्यक्रमों को प्रायोजित कर एक ओर तो आयोजकों की मदद की वहीं दूसरी ओर अपने प्रतिष्ठानों और अपने उत्पादन के प्रचार हेतु इस माध्यम का भरपूर इस्तेमाल किया। संचार माध्यमों ने भी मेले के आयोजन की महत्ता को समझते हुए अपने स्टॉल लगाये। नमिता रेस्तराँ के स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद आज भी खाने के शौकीन प्रेमी भूले नहीं हैं और इसका सारा श्रेय उसके संचालक श्री तापस मुखर्जी और श्री अशोक मुखर्जी को जाता है।

इस मेले में मनोरंजन का बेहतरीन सरंजाम था और ऐसा मंजर पटना शहर में पूर्व में देखने को नहीं मिला था। इस अवसर पर नयनाभिराम रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन मिथिला महिला महाविद्यालय, पटना की ओर से किया गया था, जिसमें युवा और उदीयमान कलाकारों को अपना जौहर दिखाने का भरपूर मौका मिला। इन कलाकारों ने श्रोता-दर्शकों का मनोरंजन किया और उसकी वाहवाही लूटी। इसके आयोजन का सम्पूर्ण श्रेय डॉ. एम.एन. झा एवं श्री ब्रह्मानन्द चौधरी को जाता है। प्रवेश टिकटों का लॉटरी ड्रॉ, बुक लवर्स ड्रॉ, वाद-विवाद प्रतियोगिता, क्विज प्रतियोगिता, विचार गोष्ठियाँ, सोविनियर पब्लिशर्स, नई दिल्ली द्वारा आयोजित पेंटिंग प्रतियोगिता आदि पुस्तक मेले के अन्य विशेष आकर्षण थे। टाइम्स ऑफ इंडिया की सुश्री अनुश्री सरकार ने भी इन कार्यक्रमों में उल्लेखनीय योगदान दिया।

1990 के पुस्तक मेले की एक और खासियत यह थी कि इसका आयोजन बिहार शैक्षिक संघ ने पहली बार बिल्कुल स्वतंत्र रूप से किया था। प्रथम पुस्तक मेले के आयोजन में अहम भूमिका अदा करनेवाले श्री वाई.पी. रानाडे और श्री ओ.पी. शास्त्री को विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित कर आयोजकों ने उनके प्रति आभार व्यक्त किया। इस मेले की एक विशेषता यह रही कि पटना पुस्तक मेला में बिहार के प्रकाशन, भारती भवन के युवा एवं उत्साही संचालक संजीव बोस का मेला-स्क्रीन पर आगमन हुआ। श्री बोस ने उसी कुशलता से आयोजन के दायित्व को निभाया जिस जिम्मेदारी से उनके चाचा श्री तड़ित कुमार बोस इस दायित्व को निभाया करते थे।
इस मेले की उपलब्धियों की जनसंचार माध्यमों ने खुलकर अपने लेखों में चर्चा की बुल्गेरिया दूतावास ने भी अपने देश की पत्रिका में पटना पुस्तक मेले का बहुत विस्तार से उल्लेख किया।

इस मेले में उभर कर सामने आने वाले अन्य प्रतिभाशाली युवा प्रकाशकों में एक है किरण प्रकाशन के श्री सत्यनारायण प्रसाद जिनकी यह दिली ख्वाहिश है कि पटना पुस्तक मेला का यह बिरवा जल्द-से-जल्द एक वट वृक्ष की शक्ल अख्तियार कर ले।
1990 के पुस्तक मेले के समापन के बाद जब हर कोई इसकी सफलता पर जश्न मनाने में लगा हुआ था, आयोजक कुछ मुतासिर से लग रहे थे। मेले के आर्थिक मामलों के प्रभारी श्री संजीव बोस ने मेला के आयोजन में हुए भारी नुकसान की चर्चा करते हुए कहा कि इस घाटे की पूर्ति आगामी पुस्तक मेले से भी कर पाना असम्भव जान पड़ता है।

लिहाजा 1990 के पुस्तक मेले के घाटे को पूरा करने के लिए 1991 में पुस्तक मेले के साथ-साथ एक व्यापार मेला का भी आयोजन करने का फैसला किया गया। 1991 में आयोजित पुस्तक मेला सह-व्यापार मेला अपने-आप में एक अनूठा आयोजन था, जो अप्रत्याशित ढंग से सफल रहा और लगभग 12 दिनों तक मेला स्थल राजधानी की गतिविधियों का केन्द्र बना रहा। फिर भी मेले में शामिल होनेवाले प्रकाशकों में काफी नाराजगी थी, उनका ख्याल था कि मेले के दर्शकों ने अपना अधिकांश पैसा व्यापार मेले में ही खर्च कर दिया इसीलिए पुस्तकों की बिक्री इस संयुक्त आयोजन से प्रभावित हुई। इस आरोप में काफी दम भी है लेकिन 1991 का पुस्तक-सह-व्यापार मेला मशहूर हस्तियों को जुटाने में कामयाब रहा। इन हस्तियों में ब्रिटेन के डिप्टी हाई कमिश्नर श्री इयान मैकलनी, कार्टूनिस्ट आर० के० लक्ष्मण एवं श्री दिलीप पडगाँवकर खास तौर पर उल्लेखनीय रहे।

1991 के पुस्तक मेले में एक नई बात यह देखने में आई कि इसमें बिहार शैक्षिक संघ ने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देनेवाले चार हस्तियों को अलग-अलग पुरस्कार प्रदान किया। पुस्तक मेला के समापन समारोह के मुख्य अतिथि माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री बी० सी० बसाक ने अपने हाथों से ये पुरस्कार प्रदान किए। रंगमंच के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘भिखारी ठाकुर पुरस्कार’ श्री रामेश्वर सिंह कश्यप (अब स्वर्गीय) को, साहित्य के क्षेत्र में ‘फणीश्वर नाथ रेणु पुरस्कार’ साहित्यकार श्री हिमांशु श्रीवास्तव को संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘रामचतुर मल्लिक पुरस्कार’ तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन को प्रकाशन के क्षेत्र में ‘आचार्य रामलोचन शरण पुरस्कार’ उभरते युवा प्रकाशक किरण प्रकाशन के श्री सत्यनारायण प्रसाद को, दिया गया।
1991 का पुस्तक-सह-व्यापार मेला इस कदर सफल रहा कि इंडियन एक्सप्रेस और इंडिया टुडे (पाक्षिक पत्रिका) समेत अनेक राष्ट्रीय समाचार-पत्रों ने भी मेला विषयक लेख प्रकाशित किए।
इन सबके बाद 1992 के पटना पुस्तक मेले की बारी आई है जिसका उद्घाटन 13 नवम्बर, 1992 का स्थानीय गाँधी मैदान में मुख्य न्यायाधीश श्री बी० सी० बसाक ने किया।

पटना पुस्तक मेला पुस्तक को पाठकों तक पहुँचाने का जो सराहनीय कार्य किया है, उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय वह कम ही है। पुस्तक मेला की ओर लोगों का ध्यान बरबस आकृष्ट हो गया है। जिस तरह लोग दशहरा, होली, ईद, क्रिसमस, गुरु-पर्व आदि पर्व-त्योहारों की बेकरारी के साथ प्रतीक्षा करते हैं अब उसी तरह से वे पुस्तक मेले का इंतजार करते हैं। इतना ही नहीं, पर्व-त्योहारों की तरह वे पुस्तक मेले में पुस्तकों की खरीददारी हेतु अब अपने बजट में विशेष प्रावधान भी रखने लगे हैं। यह पटना पुस्तक मेला की एक विशिष्ट उपलब्धि ही कही जाएगी। वास्तव में, मेले के दिनों में यह सम्पूर्ण राष्ट्र में या कम-से-कम बिहार में तो चर्चा का विषय बना ही रहता है। (हिन्दुस्तान, 20 नवम्बर 92 से साभार)

लेख़क – अवनीन्द्रनाथ ठाकुर

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