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झारखण्ड की राजधानी राँची में सम्पन्न प्रथम राँची पुस्तक मेला 1997 : एक ज्ञातव्य विवरण

अवधि: शुक्रवार 28 नवम्बर से 7 दिसम्बर रविवार 7 दिसम्बर)

बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ केन्द्रीय समिति की झारखण्ड की राजधानी राँची शाखा (अपर बाजार में अवस्थित) ‘राँची पुस्तक व्यवसायी संघ’ के सहयोग से हमने पटना पुस्तक मेला (बिहार) की तरह ही राँची पुस्तक मेला (झारखण्ड) की शुरुआत की। हमारे विचार से यदि झारखण्ड राज्य के अधिकतम पुस्तक व्यवसायियों को अपने व्यवसाय में सामूहिक रूप से सुधार की आवश्यकता व रुचि हो तो अब ‘राँची पुस्तक व्यवसायी संघ’ का परिवर्तित नाम ‘झारखण्ड राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ’ होना चाहिए जो इस नए राज्य का केन्द्रीय समिति माना जाएगा। यह भी जान लें चूंकि उस समय झारखण्ड बिहार का ही एक हिस्सा था अतः ‘पटना’ में पटना पुस्तक मेला के समापन समारोह के अन्तराल वर्ष (Every Gap Year) में इस शैक्षणिक महोत्सव को राजधानी ‘राँची’ में परिवर्तित नाम ‘राँची पुस्तक मेला’ के माध्यम से प्रारम्भ किया। क्या राँची पुस्तक व्यवसायी संघ के सदस्य अथवा दर्शक हमारे द्वारा आयोजित राँची पुस्तक मेला के सहयोगी बनने के बाद भी इसके बारे में एक ऐतिहासिक लेखनी कर सकते हैं ? यदि हाँ, तो अवश्य लिखें। वैसे हम आम दर्शक के समक्ष वर्ष 1997 व 1999 में आयोजित राँची पुस्तक मेला से सम्बद्ध स्वलिखित आलेख एक हद तक पेश कर रहे हैं जो उनकी रूचि के अनुसार उनकी लेखनी का मददगार बन सकती है।

राँची पुस्तक मेला 1997 शुक्रवार 28 नवम्बर से रविवार 7 दिसम्बर तक आयोजित किया गया था जिसका थीम ‘इतिहास का नवनिर्माण’ (History in the Making) था। 1997 के दस्तावेज (आलेख) में राँची पुस्तक मेला के आयोजन, महत्त्व एवं इसमें शामिल होनेवाले भागीदार का भी पूर्ण विवरण है।‌ इस दस्तावेज में दिसम्बर 1997 में झारखण्ड की राजधानी में आयोजित ‘राँची पुस्तक मेला’ की अवधि में सम्पन्न हुए विभिन्न कार्यक्रमों व साहित्यिक गतिविधियों का भी उल्लेख है। इसमें निम्नलिखित मुख्य बिन्दुओं का दृष्टिकोण है:

01. यह दस्तावेज राँची पुस्तक मेला 1997 के आयोजन व उसके विवरण को समर्पित है। इसमें पुस्तक मेला की आयोजन तिथि: 28 नवम्बर से 7 दिसम्बर 1997: दर्शनार्थ परिसर: जिला स्कूल मैदान, राँची। दस्तावेज में विभिन्न गतिविधियों का उल्लेख है।

02. राँची पुस्तक मेला 1997 हेतु आम जनता का प्रवेश (नामकरण) ‘बिरसा मुंडा प्रवेश द्वार, मेला परिसर मुख्य प्रवेश ‘अलबर्ट एक्का द्वार’, मेला परिसर मुख्य कार्यालय ‘डॉ कामिल बुल्के प्रशासनिक भवन’ सहित उद्घाटन-समापन व विभिन्न कार्यक्रमों के लिए मूल प्लेटफार्म का नाम ‘जयपाल सिंह मुक्ताकाश मंच’।

03. शुक्रवार, 28 नवम्बर 1997 को उद्घाटन समारोह में ‘मुख्य अतिथि’ राँची विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ चितरंजन लाहा, ‘विशिष्ट अतिथि ‘ शिक्षाविद् श्री एच चतुर्वेदी, ‘सम्मानीय अतिथि ‘ सत्य भारती के निदेशक फादर प्रताप टोप्पो, विशेष आमंत्रित अतिथि डीएवी जवाहर विद्या मन्दिर श्यामली के प्राचार्य श्री राम इकबाल सिंह दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार श्री चन्द्रभूषण के साथ अखिल भारतीय शैक्षिक प्रकाशक संघ दिल्ली के तत्कालीन महासचिव श्री ओपी शास्त्री उपस्थित रहे। राँची पुस्तक मेला कार्यकारिणी समिति व दर्शकों (आम नागरिक) को जयपाल सिंह मुक्ताकाश मंच से उद्घाटन समारोह के ‘मुख्य वक्ता’ के रूप में योगदा सत्संग‌ के स्वामी श्रद्धानंद जी का आशीर्वचन भी प्राप्त हुआ।

04. शनिवार, 29 नवम्बर 1997 को ‘झारखण्ड में जनजातीय दृश्य’ पर परिचर्चा की गई जिसमें राँची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ अमर कुमार सिंह, दर्शनशास्त्र सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष डॉ उमाचरण झा, राँची कॉलेज अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर डॉ आर एन गौड़, साहित्यकार दिनेश्वर प्रसाद, श्री विजय कुमार पाण्डे ‘द्रोणाचार्य’, राँची एक्सप्रेस के तत्कालीन स्थानीय सम्पादक श्री बैजनाथ मिश्र, राँची कॉलेज की प्रोफेसर डॉ ऋता शुक्ल और प्रभात खबर के संस्थापक व तत्कालीन प्रधान सम्पादक श्री हरिवंश भी इस कार्यक्रम में शामिल रहे।

05. रविवार, 30 नवम्बर 1997 को ‘चाइल्ड लाइन’ (बाल सखा) माइक्रो परिचर्चा में श्री सनत कुमार, श्री इंदुशेखर, श्री तारकेश्वर सहित भारतीय किसान संघ से श्री संजय मिश्र ने भाग लिया।

06. सोमवार, 1 दिसम्बर 1997 को मेला परिसर में कई बौद्धिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक कार्यक्रम हुए। भारतीय शैक्षिक प्रकाशक संघ दिल्ली के सौजन्य से छात्र-छात्राओं के लिए वाद-विवाद प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसका विषय था ‘आजादी के 50 वर्ष, क्या खोया-क्या पाया ? इसमें डीएवी विद्या मन्दिर श्यामली की छात्रा सुश्री वर्षाली विश्वास को उत्कृष्ट भाषण कला के लिए प्रथम, संत अलोइसिस स्कूल के छात्र श्री अमित कुमार को द्वितीय तथा सेक्रेट हर्ट स्कूल की छात्रा सुश्री डालिया को तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। विजयी प्रतियोगी को बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉ रामचंद्र पूर्वे ने पुरस्कृत किया।

07. मंगलवार, 2 दिसम्बर 1997 को छात्र-छात्राओं के लिए ‘क्विज प्रतियोगिता, बाल कहानियों का संग्रह ‘जामुन की हवेली’ लोकार्पण की अध्यक्षता प्रसिद्ध समाजसेवी व वरिष्ठ राजनीतिज्ञ श्री पीएन सिंह, ‘मुख्य अतिथि’ समाज व साहित्यसेवी श्री हनुमान प्रसाद सरावगी, ‘मुख्य वक्ता’ राँची विश्वविद्यालय हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ मंजु ज्योत्स्ना धान, ‘सम्मानीय अतिथि’ युवा रचनाकार श्री नरेश बंका आदि की उपस्थिति में बाल-साहित्य सृजन पर व्याख्यान भी आयोजित हुआ।

08. बुधवार, 3 दिसम्बर 1997 को राँची पुस्तक मेला 1997 के तहत् बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री डाक्टर रामचंद्र पूर्वे ने मेला परिसर में एक परिचर्चा विषय पर ‘मुख्य अतिथि’ के रूप में उच्च शिक्षा की चुनौतियों पर चर्चा की। इस कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रोफेसर बी० सी० मेहता भी उपस्थित रहे।

09. बृहस्पतिवार, 4 दिसम्बर 1997 को मेला परिसर के ‘जयपाल सिंह मुक्ताकाश मंच’ पर एक “काव्य-व्यंग्य संगोष्ठी” डॉ अशोक प्रियदर्शी की अध्यक्षता में हुई जिसका उद्घाटन श्री हनुमान प्रसाद सरावगी ने किया जबकि संचालन कवि-पत्रकार-साहित्यकार- रचनाकार श्री दिलीप तेतरवे ने किया। इस संगोष्ठी में मुख्य रूप से 15 कवि-कवयित्रियों- डॉ बालेन्दु शेखर तिवारी, श्री नरेश बंका, श्री सुरेश, डॉ प्रभाशंकर विद्यार्थी, श्रीमती महुआ माजी, श्रीमती सुरिन्दर कौर नीलम, डॉ रेहाना अहमद अली, सुश्री रश्मि निरूपम, श्रीमती मुक्ति शाहदेव, डॉ माया प्रसाद, डॉ मंजू ज्योत्स्ना धान ने भाग लिया। 4 दिसम्बर को ही योगदा सत्संग‌ की संयासिनी व ब्रह्मचारिणी मीराबाई, ब्रह्मचारिणी निर्मला -अर्चना-श्रीमती कुसुम गुप्ता-श्रीमती रितु बहन -श्रीमती सुदर्शन जोहरा-श्री समन पाल-स्वामी कृष्णानंद गिरि महाराज आदि ने ‘भजन-संध्या’ व ‘योग ध्यान’ विचार गोष्ठी कार्यक्रम में भागीदार बने।

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