पटना विश्वविद्यालय देश का सातवाँ सर्वाधिक प्राचीन विश्वविद्यालय रहा है। इसकी स्थापना 1917 में हुई। पटना विश्वविद्यालय के इतिहास को विद्वानों ने आधुनिक बिहार का इतिहास बताया है। बी.एन.कॉलेज इस विश्वविद्यालय के अन्तर्गत एक प्रसिद्ध महाविद्यालय रहा है। टेकारी राज की जमीन पर इसका निर्माण हुआ।
गाँधी मैदान के पूरब और अशोक राज पथ के उत्तर में स्थित बिहार नेशनल कॉलेज से ही बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद ने बी.ए. पास किया था। यह कॉलेज पहले एक हाई इंगलिश स्कूल था। 1889 में इसे दूसरे दर्जे के कालेज का स्थान प्राप्त हुआ और बी.ए. पास कोर्स तथा कला के अलावा आई.एस.सी. में रसायन एवं भौतिक की पढ़ाई होने लगी। इस कालेज को स्थापित करने में कुल्हड़िया जमींदार परिवार के दो भाइयों श्री विन्देश्वर सिंह और शालिग्राम सिंह की भूमिका अति महत्वपूर्ण रही।
इस जमींदार के परिवार के लोग आज भी बी.एन. के सटे पूरब में स्थित इमारत में रहते हैं। इन्हीं दोनों भाइयों के प्यार एवं देखरेख में बी.एन. कालेज का अस्तित्व परिपक्व होने लगा। जिस समय भारत में राष्ट्रवादी भावनाओं का ढंग से विकास भी नहीं हो पाया था उस समय अर्थात् 1889 में इन दोनों राष्ट्र प्रेमी भाइयों ने साहसपूर्वक इस कालेज का नामकरण बिहार नेशनल कालेज दिया। 1892 में इस कालेज को प्रथम स्तर का दर्जा प्राप्त हुआ।
इसी वर्ष यह कालेज कलकत्ता विश्वविद्यालय के अधीन कर दिया गया। यहाँ अब बी.ए. में प्रतिष्ठा स्तर की और वकालत की पढ़ाई होने लगी। 1892 से 1908 के बीच धीरे-धीरे कई विषयों में यहाँ एम.ए. की पढ़ाई होने लगी और इस तरह स्नातकोत्तर विभाग खुले। यह कालेज सुव्यवस्थित ढंग से विकसित करे- इससे पूर्व ही इस पर संकट के बादल मंडराने लगे। हुआ यह कि कलकत्ता विश्वविद्यालय ने एक नियम पास किया जिसके अनुसार उसी कालेज को इस विश्वविद्यालय के अधीन रखा जायेगा जहाँ ट्यूटोरियल क्लास, पुस्तकालय और विज्ञान में प्रयोगशाला के लिए अलग-अलग स्वतंत्र भवन हों। इस नियम को 1908 में बी.एन. कालेज पर लागू कर दिया गया, फलतः यहाँ बी.ए. प्रतिष्ठा में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या तेज रफ्तार से घटती गई और कालेज बंद होने के कगार पर पहुँच गया।
1908 में ही कुल्हड़िया जमींदार परिवार के दोनों महान भाइयों की मृत्यु हो गयी। उनके उत्तराधिकारियों ने इस कालेज को कलकत्ता विश्वविद्यालय के अधीन लाने में विशेष ध्यान दिया। इस कालेज को पटना के कुछ महत्वपूर्ण एवं उत्साही नागरिकों जैसे प्रसिद्ध दोनों इमाम भाई एवं मिस्टर आर्केडेल अर्ले जैसे कुछ सरकारी उच्चाधिकारियों ने बर्बाद होने से बचाने का अंतिम प्रयास किया।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के नियमानुसार ट्यूटोरियल क्लास, पुस्तकालय और विज्ञान में प्रयोग के लिए नवीन एवं स्वतंत्र भवनों को बनाने के लिए उनलोगों ने धन इकट्ठा करना शुरू किया और इस तरह 1914 में यह कालेज सरकार द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त करने वाला एक संस्थान बन गया। बी.एन.कालेज समिति और सरकार के बीच 1923 में एक समझौता हुआ जिसके अनुसार कालेज समिति ने अपनी सम्पूर्ण चल-अचल सम्पत्ति सरकार को सौंप दी और सरकार इसके बदले में कालेज को सभी प्रकार की आर्थिक सहायता और कालेज को चलाने में सहायता करने लगी। इस तरह सरकारी सहयोग से 1928 में विशाल आर्ट्स ब्लाक और तीन तरफ वाला विशाल मेंस होस्टल निर्मित हुआ।
1952 में यह कालेज पटना विश्वविद्यालय का अंगीभूत इकाई हो गया और यहाँ के शिक्षक स्नातकोत्तर स्तर में अध्यापन करने लगे। 1964 से संस्कृत, उर्दू और बंगला में तथा 1966 से फारसी में स्नातक स्तर की पढ़ाई होने लगी। एक स्वतंत्र विषय के रूप में समाजशास्त्र की पढ़ाई 1964 से की जाने लगी। इसी समय से भौतिक शास्त्र की पढ़ाई होने लगी। 1970 में एक सुन्दर इमारत का निर्माण हुआ जिसके भूमि तल्ले पर न्यू कामन रूम और प्रथम तल्ले पर पुस्तकालय का निर्माण हुआ। इसके लिए डेढ़ लाख की अनुदान राशि सरकार से मिली। पुस्तकालय में 1970 में कुल पुस्तकों की संख्या करीब 2500 थी। 1970 के आसपास से कालेज की अंग्रेजी और हिन्दी में पत्रिकाएं छपने लगीं।
अंग्रेजी के प्रोफेसर श्री अक्षय कुमार मजुमदार 1889 से 1891, अंग्रेजी के प्रोफेसर श्री हरिदास मैत्रा 1892 से 1893, गणित के प्रोफेसर श्री भगवती चरण दास 1894 से 1900, दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर डा. देवेन्द्र नाथ सेन 1901 से 1935, गणित के प्रोफेसर श्री ललित कुमार घोष 1935 के नवम्बर माह, अंग्रेजी के प्रोफेसर श्री शंभुनाथ राय 1953 से 1955, अंग्रेजी के प्रोफेसर श्री एस.एन. मोइनुल हक 1935 से 1953, दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर श्री शंभू नाथ राय 1953 से 1955 और अंग्रेजी के प्रोफेसर डा. दिवाकर प्रसाद विद्यार्थी 1955 से 1962 तक इस कालेज के प्राचार्य रहे।
प्राचार्य डी.एन.सेन को पटना विश्वविद्यालय की रजत जयन्ती के अवसर पर पी.एच.डी. की उपाधि प्रदान की गई थी। इस कालेज की मान-प्रतिष्ठा बढ़ाने में डा. सेन की भूमिका अति प्रशंसनीय रही। श्री मोइनुल हक अपने जमाने के एक प्रतिष्ठित और विद्वान व्यक्ति थे। इस तरह बी. एन. कालेज ने सैकड़ों साहित्यकारों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं राजनेताओं को पैदा किया।




Leave a Reply