पटना कॉलेज आज भी बिहार में उच्च शिक्षा का सबसे पुराना अध्ययन केन्द्र है। इस कालेज की स्थापना अंग्रेज और भारतीयों के सहयोग से हुई। जुलाई 1835 में पटना हाई स्कूल की स्थापना हुई। 1839 में गवर्नर जनरल लार्ड आकलैंड के आदेश से पटना में एक केन्द्रीय कालेज को स्थापित करने की योजना बनी और 1841-42 में पटना हाई स्कूल में कुछ बदलाव करके इस योजना को साकार रूप प्रदान किया गया। 26 सितम्बर 1844 को इस स्कूल को कालेज का दर्जा प्राप्त हो गया। किन्तु ढाई वर्ष पश्चात ही यह कालेज बंद हो गया क्योंकि इस कालेज को चलाने में पटनावासियों ने विशेष रुचि नहीं ली। 1856-57 में पुनः कालेज खोलने की योजना बनाई गई किन्तु यह योजना असफल रही। योजना बनाने वालों के बीच आपसी मतभेद रहा। फलस्वरूप अप्रैल 1858 में पटना हाई स्कूल भी बंद हो गया।
बिहार में आधुनिक शिक्षा की स्थापना दिवस के अवसर पर अर्थात 28 अप्रैल 1858 को पटना हाई स्कूल के बदले पटना में एक जिला स्कूल खोलने की योजना बनी और पटना हाई स्कूल का नाम ही पटना जिला स्कूल पड़ा। इस तरह एक लम्बा सफर तय करने के पश्चात पटना जिला स्कूल को पटना कालेज के रूप में स्थापित करने का सरकारी आदेश 15 नवम्बर 1861 को पास हुआ। इसी आदेश के अनुसार पटना जिला स्कूल ने अगस्त 1862 में पटना कालेजियट स्कूल का रूप ले लिया। इसी पटना कालेजियट स्कूल को 9 जनवरी 1863 शुक्रवार के दिन कालेज का दर्जा प्राप्त हो गया।
प्रारम्भ में यह कालेज एक उच्च भवन में जो 17वीं शताब्दी में निर्मित हुआ था, चलाया जाने लगा। 1862 में शिक्षा निदेशक के आदेश से प्राचार्यों और शैक्षणिक सेवा करने वालों को अधिक वेतनमान निर्धारित किये गये। 1863 से कालेज के हेडमास्टर को प्रोफेसर इंचार्ज कहा जाने लगा। 19 फरवरी 1867 से यहाँ केवल कालेज स्तर की पढ़ाई होने लगी और पटना कालेज के प्रथम प्राचार्य जे. डब्ल्यू मॅक्ग्रिण्डल बने। मॅक्ग्रिण्डल 1880 तक प्राचार्य के पद पर कार्यरत रहे।
1865 के बाद पटना कालेज ने सैकड़ो विद्वान, प्रशासक, देशभक्त, अधिकारी, वकील, जज, पत्रकार और लेखक पैदा किया। देखते-देखते स्थिति ऐसी हो गयी कि बिहार का लगभग प्रत्येक बड़ा आदमी पटना कालेज का छात्र रहा। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद, बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण, महान कवि दिनकर, अनुग्रह नारायण सिन्हा, डा. सच्चिदानन्द सिन्हा, सर सुल्तान अहमद, प्रसिद्ध इतिहासकार के.के.दत्त, रामशरण शर्मा, सैयद हसन अस्करी, योगेन्द्र मिश्र, जगदीश चन्द्र झा, विष्णु अनुग्रह नारायण, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गोरखनाथ सिंह और केदारनाथ प्रसाद आदि पटना कालेज के छात्र रहे।
पटना कालेज में पंडित राम अवतार शर्मा (संस्कृत), डा. अजीमुद्दीन अहमद (अरबी और फारसी), यदुनाथ सरकार (इतिहास), डा. सुविमल चन्द्र सरकार (इतिहास), जे.एन. सरकार (इतिहास), डा. डी.एम. दत्त (दर्शनशास्त्र), डा. ज्ञानचन्द (अर्थशास्त्र), यमुना प्रसाद (मनोविज्ञान), एस.सी. चटर्जी (भूगोल), परमेश्वर दयाल (भूगोल), विश्वनाथ प्रसाद (हिन्दी), नलिन विलोचन शर्मा (हिन्दी), जैसे राष्ट्र प्रसिद्ध शिक्षक थे।
पटना कालेज में बी.ए. की पढ़ाई 1865 से होने लगी। 1864-65 में प्रोफेसर जे.के. रोजर्स और चार शिक्षक थे। प्रोफेसर ए.ओ. वैक रसायनशास्त्र, भौतिकी और गणित पढ़ाते थे। पटना कालेज में इस तरह वकालत, विज्ञान, इंजीनियरिंग और कला की पढ़ाई होती थी। कैलाशचन्द्र बंदोपाध्याय प्रथम छात्र थे जिन्होंने 1869 में एम.ए. पास किया।
1905 से पटना कालेज का महत्व बढ़ने लगा। कलकत्ता विश्वविद्यालय से इसे काफी अनुदान मिलने लगा। इस कालेज के प्रोफेसर डी.एन. मल्लिक भौतिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश भेजे गये। शिक्षकों की संख्या बढ़ने लगी। उच्च शिक्षा में बिहारी छात्रों की संख्या बढ़ने लगी। 1907 में पटना कालेज में करीब 120 छात्र थे जिनमें से 90 बिहारी थे।
1862-63 में यहां एक पुस्तकालय की स्थापना हुई। 1866 में पटना कालेज के पुस्तकालय में करीब चार हजार पुस्तकें थीं। 1899 में पटना कालेज पुस्तकालय में पुस्तकाध्यक्ष की नियुक्ति की गई। मई 1864 से पटना कालेज में वकालत की पढ़ाई होने लगी। मई 1864 में नवीन चन्द्र डे वकालत पढ़ाने के लिए प्राध्यापक नियुक्त किये गये। 1868 में वकालत पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 57 थी। 1881 में छात्रों की कुल संख्या 162 और मार्च 1900 में 205 हो गई। 1909 आते-आते पटना कालेज का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व हो चुका था। इस वर्ष से छात्रों की संख्या इतनी बढ़ी की बहुतों का यहां नामांकन नहीं हो पाया था। 1919 से भारतीय प्रशासनिक सेवा में भारतीय छात्र भी सम्मिलित होने लगे। 1921 में नीलमाणि सेनापति और राशिदुज जमन तथा 1922 में अभयपद मुखर्जी आई.सी.एस. पास किये। ये लोग पटना कालेज के ही छात्र थे।
1912 में बंगाल से हटकर बिहार और उड़ीसा अलग प्रांत बना दिये गये। 1917 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से अलग पटना विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 1913 में पटना कालेज के ऊपर वाले विशाल कमरे में बिहार और उड़ीसा विधान परिषद् की प्रथम बैठक आयोजित की गई। 1913 में ही प्रथम बार पटना कालेज के उत्तर में स्थित गंगा घाट पर वायसराय लार्ड हार्डिंग आये और इस अवसर पर एक ऐतिहासिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। गांधीजी के नेतृत्व में प्रारम्भिक स्वतंत्रता संघर्ष में इस कालेज के छात्रों की भूमिका अति सराहनीय रही। गांधीजी के कहने पर कालेज के कुछ छात्रों ने 1920 के आंदोलन में भाग लिया और जयप्रकाश नारायण उन्हीं छात्रों में से एक थे।
1940 में शिक्षकों के मामले में दूसरे चरण की शुरुआत हुई। इस वर्ष तक पटना कालेज के अधिकांश शिक्षकों का कार्यकाल समाप्त हो गया। कई शिक्षकों की मृत्यु हो गई। इसी समय से विद्वानों के नये झुंड से पटना कालेज पुनः विकास की ओर बढ़ चला। इन विद्वानों में प्रमुख थे-प्रोफेसर वाई. जे. तारापोरेवाला, प्रोफेसर गोरखनाथ सिन्हा, प्रोफेसर के.के.दत्त, श्री जगदीश नारायण सरकार, डा. सुधाकर झा, प्रोफेसर एस.के.घोष, के. अहमद, एफ. रहमान, डी.एन. दत्त, के.एन. मिश्र, प्रोफेसर महेन्द्र प्रताप, डा. ज्ञानचन्द, डा. इकबाल हुसैन, प्रोफेसर विमान बिहारी मजुमदार, मोहन झा, नर्मदेश्वर प्रसाद, ए.एस. अल्तेकर, वी. पी. सिन्हा, एस.एन. घोषाल, अजिमुद्दीन अहमद, एस.आर. बोस, रमोला नन्दी, हरिमोहन झा, धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी इत्यादि। प्रथम छात्रा का नामांकन 1925 में हुआ। छात्राओं की संख्या 1932-33 में 2, 1936 में 14, 1937 में 15, 1938-39 में 32, 1939-40 में 42 और 1951-52 में 62 थी।
1948 में पटना कालेज में कुल छात्रों की संख्या 1234 थी। 1951-52 में 38 छात्राएं बी.ए. ऑनर्स का क्लास करने पटना कालेज से आती थीं। पटना कालेज शिक्षा का एक महान केन्द्र बन चुका था। 1937 में इस कालेज की लाइब्रेरी में पुस्तकों की संख्या 25000 से ज्यादा थी। छात्रों के लिए एक मैगजीन-रूम की व्यवस्था 1939 में की गई जो 10 बजे दिन से 12 बजे तक खुला रहता था। 1950 में पुस्तकालय में पुस्तकों की संख्या 37000 हो गई।
1928 से पटना कालेज के स्टाफ-क्लब में चाय मिलने लगी। 1930 से हाकी, क्रिकेट आदि खेले जाने लगे। 1949 से यहां से छात्र एन.सी.सी. का प्रशिक्षण प्राप्त करने लगे। बाहर से आने वाले छात्रों को रहने के लिए 1875 में एक छात्रावास की व्यवस्था प्रथम बार की गई जो कालेज के पास में ही स्थित था। इसके प्रथम अधीक्षक संस्कृत के प्रोफेसर छोटेराम तिवारी थे। पटना कालेज के शिक्षा-स्तर को ऊंचा उठाने में छात्रावासों की भूमिका अति प्रशंसनीय रही। मिंटो हिन्दू होस्टल का एस्से क्लब काफी प्रसिद्ध संस्था थी। सभी छात्रावासों में एक पुस्तकालय की व्यवस्था थी। छात्रावास के अंतेवासियों की सामाजिक भूमिका महत्वपूर्ण होती थी।
मिंटो मुस्लिम होस्टल में प्राचार्य जैक्सन के नाम पर एक पुस्तकालय की स्थापना 1912 में हुई। इसी पुस्तकालय के कारण 1929 में मिंटो मुस्लिम होस्टल का नाम जैक्सन होस्टल हो गया। 1944-45 में पटना कालेज के चार छात्रावासों- मिंटो, जैक्सन, इकबाल और रानीघाट में जितने कमरे थे उनमें से मात्र 30 या 35 प्रतिशत कमरों में ही छात्र रहते थे और शेष खाली पड़ा रहता था। धीरे-धीरे छात्रावासों में रहने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि होने लगी और 1949 में कालेज परिसर में ही न्यू होस्टल नामक नया छात्रावास बना।
पटना कालेज के प्राचीन गौरवमय गाथा को जितना लिखा जाय उतना कम होगा। आज के पटना कालेज में शायद ही 1940-50 का पटना कालेज दिखाई दे। 1940-50 में कहा जाता था कि पटना कालेज विद्या का पवित्र मंदिर है। इस मंदिर में आकर श्रद्धा और विनय के व्यवहार से अपने व्यक्तित्व को निखारने का सुअवसर नहीं गंवाना चाहिए।
लेखक- डा० ओमप्रकाश




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