Vishnu Prabhakar

प्रशासन और मीडिया से हताश हैं विष्णु प्रभाकर

Vishnu Prabhakar


चर्चित और लोकप्रिय साहित्य रचने में पूरा जीवन खपा देने के बाद हिंदी के सबसे बुजुर्ग पीढ़ी के साहित्यकार विष्णु प्रभाकर अब जीवन के आखिरी वर्षों में अपने ही घर से बेदखल हैं। व्यवस्था से वे पूरी तौर पर नाउम्मीद हैं। दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने उन्हें मिलने का वक्त तक नहीं दिया। लोकप्रिय राजनेता और प्रशासक ने उनकी कभी परवाह नहीं की। और तो और हिंदी से कमाने-खाने वाले साहित्य और मीडिया के लोग भी उनके मामले में खामोश हैं, 1980 में पत्नी के निधन के बाद अकेले-से हो गए, अक्सर अस्वस्थ रहने वाले वयोवृद्ध नाटककार, उपन्यासकार, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता, ‘अर्द्धनारीश्वर’ और ‘आवारा मसीहा’ के लेखक से यह दुःख सहा नहीं जाता। पिछले दिनों कलकत्ता में विष्णु प्रभाकर को शरत साहित्य परिषद ने सम्मानित किया शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के विवादास्पद व्यक्तित्व पर शोध करके ‘आवारा मसीहा’ लिखने के लिए। परिषद ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी रचना बांग्ला में भी नहीं लिखी गई, कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में जिस बांग्ला भाषा की श्रीवृद्धि की खुद शरत बाबू ने।

अपने बेटे के साथ मध्य कलकत्ता में ‘जनसंसार’ कार्यालय में ठहरे थे विष्णु प्रभाकर। वहीं उनसे लंबी और अंतरंग बातचीत हुई। शरतचंद्र के जीवन, कृतित्व, उनके पात्रों श्रीकांत, राजलक्ष्मी, इंद्रनाथ और मोक्षदा, मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य, समकालीन साहित्य और हिंदी की स्थिति तमाम मुद्दों पर वे खुलकर बोले। कहने लगे-‘हिन्दी समाज में अपने नायक नहीं हैं। हिंदीवाले हिंदी के लिए पूरा जीवन खपा देने वालों को नहीं जानते।’ गांधीवादी जमाने में देश सेवा और साहित्य सेवा की स्मृतियां ताजा करते हुए उन्होंने खेद जताया कि मीडिया विस्फोट की इस अफरा-तफरी में हिंदी वालों को न साहित्य की परवाह है और न साहित्यकारों की। उन्होंने कहा कि स्वदेशी और सुराज का नारा लगाने वाली भाजपा की दिल्ली सरकार से उन्हें कभी कोई मदद नहीं मिली।

मदनलाल खुराना ने मिलने से मना कर दिया। कवि अटल बिहारी वाजपेयी ने मदद करने का वायदा किया, पर कुछ हो नहीं सका।’ गौरतलब है कि श्री प्रभाकर के मकान पर उनके किराएदार ने कब्जा जमा लिया है। उन्होंने कहा कि दरअसल राजनीतिक अस्थिरता के इस युग में नैतिकता और समाज के प्रति जिम्मेदारी नाम की कोई चीज नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे उदार, लोकतांत्रिक व्यक्तित्व के प्रधानमंत्री पद से पूर्व हो जाने पर उन्होंने खेद जताया तो एचडी देवगौड़ा सरकार और सामाजिक न्याय की ताकतों से देश की खुशहाली की भी वे कोई संभावना नहीं देखते। उन्होंने हवाला से लेकर यूरिया तक के तमाम घोटालों की चर्चा करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से लेकर सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े तमाम लोग कोई सुनवाई नहीं करते, वजह तो साफ है। पर इससे ज्यादा बदतर स्थिति यह है कि भ्रष्टाचार अब राष्ट्रीय चरित्र बन गया है।

दफ्तर का बाबू और पुलिस का सिपाही प्रधानमंत्री से ज्यादा ताकतवर है। ऊपर से कार्रवाई भले ही हो जाए, नीचे फाइलें इस टेबल से उस टेबल तक नहीं सरक सकती। पुलिस को अच्छी तरह मालूम है कि किस पर जुल्म ढाने पर बाल भी बांका न होगा और किससे कतई छेड़छाड़ नहीं कर सकते। जिसे भी, जहाँ भी थोड़ा बहुत अधिकार मिला है, वह सामने वालों को अपनी औकात बताने पर तुल गया है। ऐसे में अपनी निजी त्रासदियां अलग, इस देश का क्या होगा यही चिंतनीय है। विष्णु प्रभाकर समकालीन साहित्य में प्रतिबद्धहीनता, विचारहीनता, संघर्ष का अभाव, दिशा और आदर्श के भटकाव पर भी दुखी हैं।

साहित्यकारों की मीडिया की पीठ पर सवार होकर हीरो बनने की ललक उन्हें हास्यास्पद लगती है। हिंदी विभागों, प्रतिष्ठानों, अखबारों और साहित्यिक पत्रिकाओं के जरिए सिद्धांतहीन खेमेबंदी और एक-दूसरे को महान बनाने की होड़ से निष्ठा, तपस्या और सत्यनिष्ठा का गैर प्रासंगिक हो जाना उन्हें दुर्भाग्यपूर्ण लगता है। विष्णु प्रभाकर ने कहा कि हिंदी और हिंदी साहित्यकारों की बात संसद तक पहुँचाने वाला अब कोई नहीं है, सांसद शंकर दयाल सिंह की मृत्यु के बाद। फर्क भी क्या पड़ता है? ‘मेरा मामला उठा? क्या हुआ?’ उन्होंने कहा कि प्रकाशक लेखक को ठग रहा है। पर खुद लेखक भी लेखक को ठगने लगा है इन दिनों!

पत्रिकाएं और प्रकाशन चलाने वाले साहित्य के मठाधीश साथी लेखकों को फूटी कौड़ी भी मेहनताना नहीं देते! उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कहा, ‘साहित्यकार ही आज साहित्यकार का सबसे बड़ा दुश्मन है। नामवर सिंह हों या राजेंद्र यादव, सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़ाव उनकी पहली प्राथमिकता है। न साहित्य से उनका लेना-देना है न साहित्यकारों से। उन्होंने कहा कि नया लेखक तुरत फुरत इतिहास में दर्ज हो जाना चाहता है। सृजन के बजाए राजनीति के जरिए प्रतिष्ठित होने में उसे कोई ज्यादा दिक्कत नहीं होती। पाठक तो कहीं गिनती में है ही नहीं। थोक खरीददारी के कारोबार ने पुस्तकों से पाठकों को अलहदा कर दिया।

टीवी दर्शन में मस्त पाठक को लेखक अपनी ओर खींचने की कोशिश भी नहीं करता। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी के लिए त्याग करने वाले औद्योगिक घरानों की जो पीढ़ी उभर आई थी, उनके उत्तराधिकारियों की दिलचस्पी हिंदी के नकदीकरण में है। इसके लिए हिंदी की चिंदी करने में उन्हें शर्म महसूस नहीं होती। उन्होंने साहित्य और पत्रकारिता में निर्लज्जता की हद तक सीढ़ियां चढ़ने के लिए राजनीतिक दलों के पिछलगू हो जाने की आत्मघाती प्रवृत्ति से सावधान रहने की जरूरत बताई। उनके मुताबिक प्रतिबद्धता आज सीढ़ी हो गई है और विचार अवसरवादी।


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