4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

भारतीय साहित्य पश्चिमी तुला में नहीं तौला जा सकता

विश्वविद्यालय स्तर पर भारतीय काव्य शास्त्र के शिक्षण की सार्थकता को लेकर सभा-गोष्ठियों, पत्र-पत्रिकाओं में तरह-तरह की चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। यह कसकने-करने वाला तथ्य बार-बार प्रकाश में आया कि राजनैतिक रूप से स्वाधीन होकर हम अपने सांस्कृतिक व्यक्तित्व के प्रति निरंतर उदासीन होते गए हैं। इस उदासीनता का नतीजा हुआ कि हमारा पूरा शास्त्र चिंतन एक अजीब स्थिति के चक्कर में पड़ गया। भारत के बुद्धिजीवियों के लिए पश्चिम के सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का जो खतरा उभरा था उसे और पनपने दिया गया। पश्चिमी विचारधाराओं का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद काबिज होता गया और हमारा चिंतन इस क्षेत्र में बेदखली का शिकार हुआ। हमने तिलक-गाँधी के साथ ही दगा नहीं किया-भरत, आनंदवर्धन, कुंतक और अभिनव गुप्त के मूल्यवान चिंतन को भी मुट्ठी से फिसल जाने दिया। साहित्य और कला चिंतन के क्षेत्र की हमारी मौलिकता के बाधित होने का परिणाम हुआ— पश्चिम के अनुकरण में हमारी बढ़ती हुई लगन। इसी लगन ने शिक्षा क्षेत्र में भी पश्चिम की आक्रमणकारी शक्तियों की पकड़ को मजबूत किया।

भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम को बनाते हुए, विशेष कर हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम को बनाते हुए हमने कभी इस बात पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता महसूस नहीं की कि भारतीय काव्य शास्त्र के अध्ययन को उपयोगी कैसे बनाया जाए। काव्य लक्षण, काव्य हेतु, काव्य प्रेरणा, काव्य की आत्मा, काव्य के उपादान, काव्य रूप, शब्द शक्तियाँ आदि पाठ्यक्रम में अधूरे मन से स्थान पाते रहे। विद्यार्थी बराबर यह महसूस करते रहे कि सब से ज्यादा जड़, बोझिल, उबाऊ, रूढ़िवादी विषय यही है। जब कि ऐसा नहीं है यह विषय। भारतीय काव्यशास्त्र का पुराना नाम साहित्यालोचन, साहित्य सिद्धांत और आलोचना शास्त्र है। यह विषय भारतीय दर्शन, धर्म, व्याकरण, इतिहास, राजनीति, परंपरा-संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा है-जो निरंतर उपेक्षा का शिकार हुआ है। फिर भारतीय काव्यशास्त्र हिंदी पाठ्यपुस्तक का एक प्रश्न पत्र मात्र नहीं है- एक पूरी चिंतन परंपरा का सार सर्वस्व है, प्रवाह है, मूल्य चेतना का प्रकाश है।

यहाँ भारतीय चिंतन परंपरा से अर्थ है गुरु से शिष्य को सौंपी जाने वाली थाती या धरोहर। और यह सौंपना एक निर्जीव व्यापार नहीं है-सौंपने वाले को सौंपने की क्षमता अर्जित करनी पड़ती है और पाने वाले या ग्रहण करने वाले को उसके लिए अपने को योग्य सिद्ध करना पड़ता है। इतना ही नहीं सौंपने वाला गुरु इस भाव से सौंपता है कि पाने वाला अपनी सामर्थ्य के अनुसार इसकी वृद्धि करेगा। यही संस्कृत काव्य शास्त्र में काव्य अधिकारी, प्रमाता, सहृदय, रसज्ञ, भावक, प्रेक्षक, दर्शक, समरस, आस्वादक, भोक्ता आदि न जाने कितने नामों से अभिहित किया गया है। भारतीय काव्य शास्त्र ने रचनाकार से भी ज्यादा रचना के भोक्ता-प्रमाता को स्थान दिया। सहृदय को कई शर्तों में बांधा ताकि संस्कारवान व्यक्ति से संस्कृति का प्रवाह आगे बढ़ता रहे। शब्द के साथ अर्थ का ध्यान योग, कर्मयोग, भाव योग भी सौंपा जाता रहा। इसी बात को केंद्र में रख कर रामचंद्र शुक्ल काव्य को भाव योग कहते हैं और कवि को भाव योगी। लेकिन आज की उत्तर आधुनिकतावादी स्थितियों ने भाव योग के लिए कोई स्थान नहीं रखा है। सांस्कृतिक साम्राज्यवाद हमारे मौलिक ज्ञान प्रतीकों को निगल कर दानवी अट्टहास कर रहा है।

यह जानना बेहद जरूरी है कि भारतीय काव्यशास्त्र, व्याकरणशास्त्र, दर्शन शास्त्र, कामशास्त्र और कला शास्त्र की गोद में जन्मा है, चारों ने उसे बहुत कुछ दिया है। रस दर्शन का ही एक उदाहरण लीजिए। सभी क्षेत्रों में वह शक्ति प्राप्त करता है। रस मात्र योग या हल्के किस्म का सुख-आस्वाद-लज्जत नहीं है। न मात्र आनंद ही, वह एक पूरा जीवन दर्शन है- संस्कार का सौंदर्य बोध है या सौंदर्य का बोध शास्त्र है। वह पश्चिम के एस्थेटिक्स या सौंदर्य का पर्याय नहीं है। क्योंकि पर्याय नहीं है- इस बात को गहराई से समझने पर ही भारतीय रस चिंतन का दृष्टिकोण पकड़ में आ जाता है। रस से जुड़ा साधारणीकरण सिद्धांत दर्शन से जुड़ा है। फलतः एक क्या हजार पश्चिमी साहित्य के निर्वैयक्तिकतावादी सिद्धांत मिल कर उसका पर्याय नहीं हो सकते। लेकिन हमें औपनिवेशिक दासता की मानसिकता के कारण भट्टनायक और अभिनवगुप्त पर भरोसा ही नहीं है। हालत यह है कि हम अरस्तू, कालरिज, मैथ्यू, आर्नल्ड, क्रोचे, हीगल, रिचर्ड्स और एलियट की आँखों से भारतीय काव्य शास्त्र के रस सिद्धांत या रस दर्शन का मूल्यांकन करना चाह रहे हैं। छलनी में दूध दुहकर करम को दोष दे रहे हैं। पश्चिमी आलोचना शास्त्र की दृष्टि से भारतीय काव्य शास्त्र को नहीं समझा जा सकता। भारत का नाट्य शास्त्र भारतीय संस्कृति-धर्म दर्शन की देन है। उसी दृष्टि से उसे समझा जा सकता है। तुलनात्मक अध्ययन के नाम पर या पश्चिमी साहित्य सिद्धांतों की आड़ में भारतीय काव्य शास्त्र को बधिया किया जा रहा है। पाठ्यक्रम तक बनाते समय हम पश्चिमवाद से मुक्त नहीं हो पाते हैं। हमारे चार हजार वर्ष के चिंतन को इस ढंग से चूना लगाया जा रहा है।

तुलनात्मक काव्यशास्त्र और उससे भी आगे बढ़ कर विश्व साहित्यशास्त्र की परिकल्पना करने वाले विद्वान समय-समय पर विश्व दृष्टि का डंका पीटते रहते हैं। पाप म्यूजिक की तरह बज जाने के बाद की थकान-निराशा का हमें मुंह देखना पड़ता है। फ्रायड, मार्क्स, हीगल और रिचर्ड्स के सिद्धांतों से क्या कोई भारतीय कवि जयदेव के गीत गोविंद और कालिदास के कुमारसंभव को समझ सका है? जयशंकर प्रसाद की कामायनी को क्या न्यू क्रिटिसिज्म से पाठक के सामने परोसा जा सकता है? क्या गोदान को उत्तर संरचनावादी शैली या वैज्ञानिक सिद्धांतों से छुआ तक जा सका है? पश्चिम का पूरा काव्यालोचन या आलोचना शास्त्र गोदान या कामायनी को समझने-समझाने में क्यों असमर्थ हैं? कारण, इनमें हमारी चिंतन परंपरा का धर्म दर्शन-इतिहास सक्रिय है जो उन सिद्धांतों की पकड़ से बाहर है। इसीलिए भारतीय काव्यशास्त्र को भारतीय चिंतन-परंपराओं के संदर्भ में पढ़ने-पढ़ाने की जरूरत है- पश्चिमी ढंग से नहीं।

भारत में ऐसा कोई साहित्य या शास्त्र नहीं है जिसमें धर्म-दर्शन, अध्यात्मक, इतिहास, प्रकृति-लय, चेतना सभी कुछ एकाकार रूप में मौजूद न हों। आप एक को दूसरे से अलग नहीं कर सकते। अखंडता-समग्रता में भारतीय चिंतन का मूल है और पश्चिम का चिंतन समग्रता में धर्म-दर्शन, अध्यात्म को मिला कर सोच ही नहीं सकता। खंड-खंड सोचने के कारण तात्विक भिन्नता साफ है। इस तात्विक भिन्नता को भुलाकर या धोखा देकर तो भारतीय विद्यार्थी को भटकाया ही जा सकता है और सच यह है कि वह भटक भी रहा है। जयशंकर प्रसाद और अज्ञेय जैसे रचनाकारों के साहित्य का शैली, वैज्ञानिक अध्ययन, सौंदर्य शास्त्रीय अध्ययन, समाजशास्त्रीय विवेचन कोढ़ में खाज ही बन रहा है। पश्चिमी कोल्हू में अज्ञेय की पिराई का नतीजा हम देख रहे हैं कि वे एक सांस में व्यक्तिवादी, रूपवादी, कलावादी, सामंतवादी, अभिजात्यवादी सिद्ध किए जा रहे हैं।

अज्ञेय को समझने के ये पश्चिमी औजार ही गड़बड़ हैं। इनसे अज्ञेय के सृजन कर्म की हत्या तो की जा सकती है- अज्ञेय के रचना मर्म को थाहा-पाया नहीं जा सकता। भारतीय काव्यशास्त्र के ध्वनि और वक्रोक्ति सिद्धांतों से अज्ञेय को कस कर देखिए- तार्किक और तृप्तदायक निष्कर्ष आते हैं। रीति, गुण, अलंकार, औचित्य और रस को नए अर्थ संदर्भ में उठाया जा सकता है। पर रस का संविद विश्रांति का सिद्धांत आप अज्ञेय पर लागू करेंगे तो न्याय नहीं होगा। कारण, अज्ञेय में व्यक्ति स्वातंत्र्य की स्वाधीन चेतना का विस्फोट प्रबल है। और यह प्रभाव पश्चिमी चिंतन से ही उन पर आया है। इसलिए भारतीय काव्यशास्त्र को भारतीय रचनाकारों के सृजन से जोड़ कर समझने-बढ़ाने की जरूरत है, पश्चिम का पिछलग्गू बनाने की नहीं।

संस्कृत काव्यशास्त्र की परंपरा को भारतीय भाषाओं के साहित्य के साथ हिंदी ने आत्मसात किया है। समग्र देश की सांस्कृतिक अस्मिता को अग्रणी बन कर वाणी देने के कारण उसे देश की संविधान सभा ने राजभाषा घोषित किया। पर दुर्भाग्य यह हुआ कि वह राजनीति के वात्याचक्र में पड़ कर दुर्दिन का शिकार हो गई। हिंदी का रचनाकार कभी भाषा की समस्या से जूझा कभी साहित्य की। साहित्य के दो अंग शास्त्र और काव्य की समृद्धि का प्रश्न आया तो अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने धर दबोचा। फिर विश्वविद्यालय स्तर पर हिंदी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन का प्रश्न आया तो हिंदी के काव्यशास्त्र की बात उठी। कहा गया है कि क्या हिंदी का कोई अपना काव्यशास्त्र या आलोचना शास्त्र है। काव्यशास्त्र से तात्पर्य साहित्यालोचना की साहित्य संहिता से है जिसे अंग्रेजी में पोयेटिक्स, थियरी आफ लिटरेचर या प्रिंसिपल्स आफ लिटरेरी क्रिटिसिज्म कहा जाता है। भूलना न होगा कि काव्यशास्त्र या साहित्यालोचन काव्य नियमों की संहिता मात्र नहीं है।

वह काव्य का दर्शन है। काव्य दर्शन में संस्कृति की मूल्य चेतना बोलती है। भारतीय काव्य शास्त्र की चेतना ही हिंदी काव्य शास्त्र की चेतना है। उसका विस्तार है। यह विस्तार सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य में दृष्टिगत होता है। फिर हिंदी साहित्य, संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश के साहित्य का रस रूप ग्रहण करके भी अपनी बनावट और संवेदना में अपने पूर्ववर्ती साहित्य से भिन्न है। भिन्नता तात्विक नहीं है। ऊपरी है। इसी बात को समझते हुए रामचंद्र शुक्ल ने रस मीमांसा और नगेंद्र ने रस सिद्धांत जैसे शास्त्र ग्रंथ लिखे थे। धीरे-धीरे यह चिंतन व्यापक होता गया जिसकी परिणति नामवर सिंह के कविता के नए प्रतिमान और लक्ष्मीकांत वर्मा के नई कविता के प्रतिमान में हुई। हिंदी के सभी बड़े रचनाकारों ने इस क्षेत्र में योगदान दिया। जयशंकर प्रसाद ने काव्य और अन्य निबंध और गमा मुक्तिबोध ने नई कविता का आत्म संघर्ष और अन्य निबंध लिख कर इस क्षेत्र का विस्तार-परिष्कार किया। कहना न होगा कि हिंदी काव्यशास्त्र की यह अपनी मौलिक चिंतन भूमि है। इसी भूमि पर हजारी प्रसाद द्विवेदी, साहित्य सहचर खड़ा करते हैं। हिंदी के रीतिकालीन आचार्यों ने संस्कृत काव्यशास्त्र की परंपरा को लाने का प्रयास किया। हालांकि उनके कार्य में रीतिशास्त्र में मौलिक चिंतन का अभाव है। हिंदी काव्यशास्त्र के विकास और निर्माण में उनका योगदान नगण्य है। लेकिन आधुनिक काल के अधिकांश रचनाकारों ने भारतीय काव्यशास्त्र को विकसित करने का हिंदी में प्रयत्न किया। जनचेतना-स्वाधीनता से जुड़ा जागरणवादी काव्यशास्त्र भारतेंदु बाबू के साथ आया और बराबर रचनाकारों-आलोचकों ने उसे आगे बढ़ाया। हिंदी साहित्य का पाठ्यक्रम इनकी दीप्ति से भरा रहा।

इधर आकर पश्चिमीकरण का हमला तीव्र हो गया है। भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों का पाश्चात्य काव्यशास्त्र और विचारधाराओं के आधार पर विवेचन हो रहा है। जब कि होना यह चाहिए कि भारतीय काव्य सिद्धांतों और विचारधारा के आधार पर हम पश्चिमी साहित्य शास्त्र का विवेचन-विश्लेषण करें। हिंदी में यही राह रामचंद्र शुक्ल और जयशंकर प्रसाद ने दिखाई और बताई है। लेकिन इस राह को हर तरह से मिटाने का एक सुनियोजित प्रयास चल रहा है। साहित्य का समाजशास्त्र के नाम पर हिंदी के राय बहादुर आचार्य अडोल्फ तेन, लियोला थेंथल, लूसिए गोल्डमान, रेमंड, विलियम्स के नाम की माला का जाप कर रहे हैं। भरत, भामह, वामन, कुंतक, शुभेंद्र, विश्वनाथ, मम्मट, अभिनव गुप्त को हर तरह से पीछे धकेला जा रहा है। इतना ही नहीं मार्क्स, वाल्टर, बेंजामिन, हेसेमर, एलन टेट, लेविस स्ट्रास के सिद्धांतों को भी हर जगह चस्पा कर दिया जाता है। यह बड़ी ही कठिन स्थिति है। इधर बहुत से आलोचक उत्तर आधुनिकतावाद का कनस्तर जोर से बजा उठे हैं। यह पूरी स्थिति-परिस्थिति भारतीय काव्यशास्त्र और चिंतन के बौद्धिक पर्यावरण को प्रदूषित कर रही है। पश्चिमीकरण की यह बाढ़ हमारे चार हजार वर्ष के चिंतन को चार वर्ष में चरे जा रही है। अंग्रेजी-अमेरिकी स्पष्ट ही अपनी संस्कृति का विस्तार चाहता है और इसके लिए उसे सबसे अनुकूल परिस्थिति भारत में ही दिखाई देती है। नया अमेरिकी बाजारवाद साहित्य का समाजशास्त्र रच रहा है ताकि वहाँ का घटिया साहित्य यहाँ खप सके। पश्चिम जो सांस्कृतिक उपनिवेशवाद और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद भारत पर स्थापित करने जा रहा है उसकी चपेट में तिलक-गाँधी-अरविंद, विवेकानंद नहीं भरत, अभिनवगुप्त और कुंतक भी आ रहे हैं। भारतीय काव्यशास्त्र को गया-बीता सिद्ध करके पश्चिमी साहित्यालोचन की जो महत्त्व-प्रतिष्ठा की जा रही है उससे उत्पन्न खतरों के प्रति सावधान रहने की आवश्यकता है।

लेखक- कृष्णदत्त पालीवाल