4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

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विष्णु प्रभाकर: समय का अवसाद

गांधीवादी लेखक चिंतन और बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवनीकार, विष्णु प्रभाकर ने 21 जून को जीवन के पिचासवें वर्ष पूरे किए हैं। बहुतेरे पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत जीवन के इस छोर में भी वे अत्यधिक सृजन की ऊष्मा, विचारोत्तेजना और प्रवाह से भरे हैं और सुबह उठ जाते हैं। मगर अब ठीक से सुन भी नहीं पाते, आंखों की रोशनी मद्धिम होती जा रही है, ‘मेग्नीफाइंग ग्लास’ से अखबारों की सुर्खियां भी कठिनाई से पढ़ पाते हैं और आशुलिपिक की मदद से अपने को रचनाशील बनाए हुए हैं। उनका संपूर्ण साहित्य प्रभात प्रकाशन इक्कीस खंड में छाप रहा है जिसमें से बारह छप चुके हैं। अब तक 30-40 पीएचडी भी विष्णु प्रभाकर के साहित्यकर्म पर हो चुकी हैं और एमफिल के 20 से अधिक प्रबंध लिखे जा चुके हैं। लेकिन विष्णु प्रभाकर अब बहुत व्यथित नजर आते हैं। शायद सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में उदारीकरण और सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार से।

पूछने पर वे कहते हैं: ‘जनसंख्या विस्फोट देख रहे हो। जब मैं दिल्ली आया था तब जंगल पास खड़े नजर आते थे। अब सड़क पर चलने को जगह नजर नहीं आएगी। अगले वर्षों में आप घर से नहीं निकल पाएंगे। इसमें मजे कौन कर रहा है—पाँच प्रतिशत का सत्ताधारी। मध्य वर्ग और निम्न वर्ग भुगत रहा है। आजादी से पहले लोग समर्पित थे। दरियां बिछाते थे। पैसा बीच में नहीं था। संबंधों से लेकर राजनीति तक पैसा संलग्न नहीं था और आज घोटाले-ही-घोटाले। कभी किसी की जांच का परिणाम आया क्या? अब हवाला शुरू है।’ बोलते-बोलते उनकी आवाज धीमी पड़ती है और लड़खड़ा जाती है। फिर थोड़ी ही देर में वे जागृत हो गए।

बावजूद इलैक्ट्रोनिक क्रांति के विष्णु प्रभाकर में कुछ नहीं बदला। वही सादा लिबास, खादी का सफेद पाजामा, कुर्ता, बंडी, टोपी। आँखों पर उत्तल लेंस का चश्मा। दीवार पर खूँटी पर टंगा थैला और उस पर बैंत लटकी हुई। आलमारी में पुरस्कार, अलंकरण के चित्र और मूमेंटों। ‘निराला-श्री पुरस्कार’ भी अभी जनवरी में उन्हें मिला है। वे चेतन में लौटकर फिर से पहचानने की कोशिश करते हैं। और कुछ पलों का सन्नाटा तोड़ते हुए कहते हैं:-‘नाटक लिखने की इच्छा है। आज पीढ़ियों का संघर्ष है। पीढ़ियों का अंतर है। महाभारत काल में भी यही था। वेदव्यास जी कुंआरी से उत्पन्न हुए-महान ऋषि बने कर्ण को गाली देते थे। आज भी जातीययता बढ़ गई है। तब कर्ण के साथ भी वही हुआ। विदुर, वेदव्यास का पुत्र, उसे अपमान मिला। इस उपन्यास ‘आशीर्वाद’ की भूमिका लिख ली है।’ वे फिर से बुदबुदाने लगे। फिर एक शिथिलता।

अपने संघर्ष पर विष्णु प्रभाकर को हमेशा विश्वास रहा है। कभी उन्होंने कहा था: ‘जीवन में सारी कुंठाओं के बावजूद स्वाभिमान मैंने कभी नहीं छोड़ा। यह अहं हो सकता है, कोई और संज्ञा भी इसको दी जा सकती है। तथ्य यह है कि मैंने आज तक किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। प्रेरणा के लिए प्रार्थना नहीं की, आशा भी नहीं की। सह अस्तित्व में मेरा अटूट विश्वास है। पूंजीवाद में मुझे रत्ती भर विश्वास नहीं। मैं नहीं जानता, यह आशीर्वाद है या पलायनवाद। मैं मूलतः मानवतावादी हूँ। उत्कृष्ट मानवता की खोज मेरा लक्ष्य है। आकाश के तारों से प्रेम करता हूँ, पर यह भी मानता हूँ कि यह धरती एक सुंदर तारा है, इसलिए मैं यथार्थ से कभी नहीं भागता।

जीवन और साहित्य दोनों को अलग करके मानने की मेरी इच्छा नहीं है। जो सचमुच जीना जानता है, वही साहित्य का साध्य है।’ चेतन अवस्था में लौटने पर विष्णु प्रभाकर कहते हैं: ‘इंसान मर गया है। इंसानियत नहीं है। कभी मानवता के सहारे जीते थे। राजनीति भी खंड-खंड होने की स्थिति में हैं। सब कुछ उदारीकरण पर निर्भर है। ये नीतियां दासता की ओर ले जा रही हैं। अंग्रेजों की सी दासता नहीं होगी, पर उन पर निर्भर होकर रहेंगे, हम डिक्टेट करेंगे।’

साहित्य और साहित्यकार की स्थिति के बारे में सवाल करने पर वे कहते हैं: साहित्य तो सारे समाज के साथ जुड़ा है। वही रिफ्लेक्ट होगा। लेखक पर निर्भर है। वह शक्ति देने वाला लिखे। पर बेचारा साहित्यकार तो इस देश में हाशिए पर है। पत्रकार को मैं बहुत अलग नहीं मानता, लेकिन उसकी पूछ बनी है। स्वार्थवश और फिर साहित्य में भी तो पोलिटिक्स गई।

1947 से 1990 के बीच में साहित्य के गतिरोध पर चर्चा भी होती थी, लेकिन इसके बाद नए साहित्यकार दूसरे ही रास्ते चल पड़े। मुझे लगता है ऐसे में पत्रकार का रोल ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। लेखक क्या करेगा? —मैं दंभ नहीं पालता कि कुछ किया/दिया समाज को या साहित्य में कुछ कर दिखाया। बिना किसी वाद-विवाद और प्रपंच के लिखता रहा-ईमानदारी से लिख रहा हूँ।’ वे रुके, फिर बोले, ‘मैं खुश हूँ-साहित्य से। पर पूरा समाज क्या खुश है? पीड़ित तो सभी हैं। लेखक तो लेखक से ईर्ष्या-द्वेष पाले हुए है। वह भले ही अच्छा लिख रहा हो।’ कहते-कहते उनकी आवाज फिर डूबने लगती है। वे थक गए हैं। उन्हें नींद सी आने लगी है।

लेखक- डा० यश गोयल