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विज्ञान की लोकप्रियता के लिए हिन्दी में लेखन जरूरी : नये विज्ञान लेखकों में धैर्य, परिश्रम का अभाव: श्री गुणाकर मुले (पटना पुस्तक मेला 1996)

पटना पुस्तक मेला 1996
(1–15 दिसम्बर 1996)
थीम: ‘सन् 2010 तक सबके लिए नारी शिक्षा’

स्मृति

मुख्य (प्रवेश) द्वार: डा० राजेन्द्र प्रसाद
प्रशासनिक भवन: डा० जाकिर हुसैन
प्रखण्ड: कर्पूरी ठाकुर – बी०पी० मण्डल – जगजीवन राम
प्रभाग मार्ग: फणीश्वरनाथ रेणु-रामधारी सिंह दिनकर – भिखारी ठाकुर – सच्चिदानंद सिन्हा – शंकर दयाल सिंह

रविवार 08 दिसम्बर, 1996
विज्ञान की लोकप्रियता के लिए हिन्दी में लेखन जरूरी : नये विज्ञान लेखकों में धैर्य, परिश्रम का अभाव: श्री गुणाकर मुले

*✍️’आकाश दर्शन’, ‘अंतरिक्ष दर्शन’ व ‘नक्षत्र लोक’ जैसी प्रसिद्ध विज्ञान पुस्तकों के जाने-माने लेखक श्री गुणाकर मुले की राय (8 दिसम्बर ) में नयी पीढ़ी के विज्ञान लेखकों में धैर्य व दृष्टिकोण का अभाव है।‌ वे परिश्रम नहीं करना चाहते, उन्हें तो ‘रेडीमेड मैटेरियल’ की बदौलत रातोंरात अमीर बनना है।‌

रविवार 8 दिसम्बर 1996 को श्री गुणाकर मुले (TOPPER IAS) ‘पटना पुस्तक मेला’ पहुँचे। भारतीय प्रशासनिक सेवा की नौकरी को लात मारकर स्वतन्त्र पत्रकारिता व विज्ञान लेखन से वे लगभग पिछले 40 वर्षों, यानी वर्ष 1956 से जुड़े हैं। लगभग 35 वर्षों तक वे लगातार ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ व ‘धर्मयुग’ में विज्ञान लेखन करते रहे हैं। ज्ञातव्य है कि विज्ञान को हिन्दी माध्यम से लोकप्रिय बनाने में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही है।

विज्ञान का लेखन जबतक भारतीय भाषाओं में नहीं होगा तबतक विज्ञान लोकप्रिय नहीं होगा। यह मानना है देश के प्रसिद्ध विज्ञान लेखक श्री गुणाकर मुले का। पटना पुस्तक मेला 1996 के प्रशासनिक भवन में श्री मुले (8 दिसम्बर 1996) पत्रकारों से अनौपचारिक बात कर रहे थे।

श्री मुले ने कहा कि हिन्दी विज्ञान को पूरी तरह व्यक्त करने में सक्षम है लेकिन जानबूझ कर यहाँ अंग्रेजी का वर्चस्व बना दिया गया है। यहाँ संस्थानों द्वारा बाहर के लोगों को दिखाने के लिए अंग्रेजी में काम किया जाता है। ऐसा जानबूझ कर किया जाता है क्योंकि यदि ये चीजें हिन्दी में आ गईं तो आम लोग सच्चाई जान जायेंगे कि कुछ काम नहीं हो रहा है।‌श्री मुले ने देश के प्रमुख वैज्ञानिकों व वैज्ञानिक शोध केन्द्रों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि उन्हें डर है कि भारतीय भाषाओं खासकर हिन्दी में लोगों को जानकारी देंगे तो आप लोग जान जायेंगे कि वे कुछ नहीं कर रहे हैं। मुले की राय में उन लोगों ने एक ऐसी किलाबंदी कर ली है कि जिसमें भारतीय भाषा प्रदेश नहीं कर सके। धनबाद स्थित सीएसआईआर (CSIR) का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि बिहार में अवस्थित होने के बावजूद यहाँ से एक भी जानकारी हिन्दी में नहीं दी जाती है। इसके निदेशक पर अंग्रेजीयत का भूत सवार है।‌

जबकि बिहार के लोगों को ‘खान व तेल’, नमक के सम्बन्ध में अद्यतन जानकारी हिन्दी में उपलब्ध करानी चाहिए। संस्थान के निदेशक विदेशों से ऐसे-ऐसे शब्द आयातित कर लाते हैं जिसका हिन्दी अनुवाद काफी कठिन है।

बिहार यात्रा के क्रम में मेला आकर श्री गुणाकर मुले चकित थे। श्री मुले बिहार के लोगों की पठनीयता पर अभिभूत थे। उन्होंने कहा कि यह एक सुखद आश्चर्य है कि मेरे सबसे ज्यादा पाठक बिहार में हैं। दिल्ली के पुस्तक मेला में मुझे कोई नहीं पहचानता लेकिन पटना पुस्तक मेला में लोग मुझे पहचान गए और मुझसे बातें की। वे कहते हैं कि दिल्ली व अन्य स्थानों पर लेखकों और साहित्यकारों को कोई नहीं पूछता है। उनकी राय में दिल्ली ने बनारस, पटना व प्रयागराज (इलाहाबाद) को कंगाल बना दिया है। उन्होंने कहा कि दिल्ली के पुस्तक मेला की अपेक्षा पटना पुस्तक मेला की व्यवस्था अच्छी है। उन्होंने कहा कि एक समय पटना मेडिकल कालेज और सायंस कालेज पर हमें गर्व होता था लेकिन आज इनकी स्थिति बहुत खराब है।

श्री मुले ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में कहा कि 40 साल पहले उनका पहला लेख वाराणसी से प्रकाशित ‘आज’ में छपा था। तब विज्ञान लेखन अनिवार्य नहीं था। बाद में पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञान पर लेखों का छपना अनिवार्य हो गया। उन्होंने नयी पीढ़ी के विज्ञान लेखकों के बारे में कहा कि परिश्रम करना नहीं चाहते। इसलिए जिस दृष्टिकोण से विज्ञान लेखन होना चाहिए। वह अब समाप्त हो गया है। उन्होंने कहा कि इस देश में वैज्ञानिकों का माफिया है। यहाँ पदों के लिए भाई-भतीजावाद होता है।

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