हिंदी

क्यों नहीं बिकतीं उर्दू किताबें?

दस वर्ष पर जनगणना के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे दिखाते हैं कि भारत में उर्दू पढ़ने वालों की तादाद बढ़ रही है। अभी यह संख्या सात करोड़ से अधिक है मगर यह कड़वी सच्चाई है कि उर्दू पुस्तकों को पाठक नहीं मिलते। उर्दू पत्र-पत्रिकाओं के पढ़ने वालों की संख्या भी घट रही है। इसका प्रमाण यह है कि उर्दू का सर्वाधिक प्रसारित अखबार दैनिक ‘हिन्दी समाचार’ जो दस वर्ष पूर्व तक एक लाख से ज्यादा प्रकाशित हुआ करता था, अब घटकर 60 हजार से नीचे चला गया है। इसके प्रकाशक विजय कुमार चोपड़ा कहते हैं कि जब किसी बूढ़े की अर्थी जाती है तो उन्हें लगता है कि उनका एक पाठक कम हो गया। उर्दू की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका ‘शमा’ पांच वर्ष पूर्व प्रकाशन बंद कर चुकी है। उर्दू के तमाम अहम प्रकाशन संस्थान बंद हो चुके हैं या मरणासन्न हैं।

उर्दू पुस्तकों का पहला व्यावसायिक प्रकाशक संस्थान 1860 में मुंशी नवलकिशोर ने 1859 में लखनऊ में खोला था। इसने केवल 30 वर्षों में 400 से अधिक शीर्षक प्रकाशित किए थे जिनमें उर्दू के अलावा फारसी, अरबी, हिन्दी और संस्कृत की पुस्तकें भी थीं। नवलकिशोर प्रेस में 1200 लोग काम करते थे और उसका नेटवर्क देश भर में ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ था। उन्होंने अपने प्रकाशन की शाखा लंदन में खोली थी। यह मुंशी नवलकिशोर का ही कारनामा था कि उन्होंने उर्दू की साहित्यिक पुस्तकों को गांव-गांव तक पहुंचा दिया था। उनके प्रेस में पवित्र कुरान का प्रकाशन बड़े पैमाने पर होता था। परन्तु उसके साथ साहित्यिक पुस्तकें भी काफी छपती थीं। उर्दू की भारी-भरकम किताब ‘दास्ताने अमीर हमगा’ भी उन्होंने ही छापी थी जो 46 जिल्दों में है। इसके पृष्ठों की संख्या बियालिस हजार है। इसका प्रकाशन 1883 से आरंभ हुआ और अंतिम 46वीं जिल्द 1917 में प्रकाशित हुई। मुंशी नवलकिशोर का देहान्त 1895 में हुआ, किंतु उनका संस्थान 1940 तक चलता रहा। आजादी के बाद जब मौलाना अबुल कलाम आजाद देश के पहले शिक्षामंत्री हुए तो वह चाहते थे भारत सरकार अनुदान देकर स्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन आरंभ करवाए परन्तु ऐसा हो न सका।

बंटवारे से पहले उर्दू के ज्यादातर बड़े प्रकाशन लाहौर में थे जो वहीं रह गए। मगर भारत में भी नसीम बुकडिपो, हाली पब्लिशिंग हाउस, अहलूवालिया बुक डिपो, मक्तवा शाहराह, मक्तवा महारिफ, मक्तवा जामिया लिमिटेड और शर्मा बुक डिपो इत्यादि थे। मोती लाल बनारसी दास, पुस्तक भंडार, हिन्दुस्तानी सभा भी उर्दू की पुस्तकें प्रकाशित करते थे मगर यह सिलसिला उन्होंने बंद कर दिया है।
एक अंदाज के अनुसार हर वर्ष उर्दू में 1500 से अधिक शीर्षक प्रकाशित होते हैं परन्तु इनके सही आंकड़े प्राप्त करना भी कठिन है। नेशनल लाइब्रेरी जिसे किताब के प्रकाशन के 72 घंटों के अन्तर पर पुस्तक प्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार है, वहाँ भी सारी पुस्तकें नहीं पहुंच पाती हैं। उर्दू के प्रख्यात आलोचक प्रो. गोपीचन्द नारंग ने 1980 से हर वर्ष की उर्दू पुस्तकों का कैटलॉग प्रकाशित करना शुरू किया था, मगर वह इस सिलसिले को दस वर्ष से ज्यादा जारी नहीं रख सके। दिल्ली उर्दू अकादमी ने उर्दू प्रकाशकों की निर्देशिका प्रकाशिता की है मगर उसकी खराबी यह है कि उर्दू का लेखक या कवि की अपनी किताबों को प्रकाशित कर लेता है और उसके लिए एक प्रकाशन संस्थान भी बना लेता है। जहां से आदमी केवल उसकी अपनी पुस्तक ही प्राप्त हो सकती है। यह सब नाम उस पुस्तक में शामिल हैं।

उत्तर भारत का सबसे बड़ा उर्दू पुस्तकों का प्रकाशन संस्थान नसीम बुक डिपो भी बंद हो चुका है, जिसने अकेले 1500 से अधिक शीर्षक प्रकाशित किए थे। प्राइवेट सेक्टर में केवल मक्तबा जामिया लिमिटेड ही ऐसा है जो निरन्तर हर प्रकार की पुस्तकें प्रकाशित करता है, वरना अब तो केवल सरकारी या अर्धसरकारी संस्थानों द्वारा ही उर्दू पुस्तकों का प्रकाशन हो पा रहा है। भारत सरकार के कौमी कौंसिल ‘बराए फरोग‘ उर्दू जबान ने अब तक 350 से अधिक शीर्षक प्रकाशित किए हैं और इसकी पुस्तकें काफी बिकती हैं। यह वार्षिक 55 लाख की किताबें बेच लेता है। नेशनल बुक ट्रस्ट ने भी उर्दू के 200 से अधिक शीर्षक प्रकाशित किए हैं। प्रकाशन विभाग एवं साहित्य अकादमी की उर्दू पुस्तकें काफी अच्छी और ऊंचे स्तर की हैं। उनके शीर्षकों की संख्या भी दो सौ से अधिक है।
भारत के 15 प्रदेशों में उर्दू अकादमियाँ हैं यह उर्दू की साहित्यिक पुस्तकें तो प्रकाशित करती ही हैं, उसके साथ प्रादेशिक भाषाओं के उच्च कोटि के साहित्य का अनुवाद भी प्रकाशित कराती हैं। इन अकादमियों ने 500 से भी अधिक शीर्षक प्रकाशित किए हैं मगर दुश्वारी यह है कि यह बाजार में उपलब्ध नहीं है एक अकादमी की किताबें दूसरी अकादमी में भी उपलब्ध नहीं हैं। जिसके कारण चाह कर भी उपभोक्ता यह पुस्तकें खरीद नहीं सकता।

देश में हर साल लगभग 20 हजार शीर्षक प्रकाशित होते हैं उनमें भी 50 प्रतिशत अंग्रेजी की पुस्तकें हैं। इनमें 1500 के करीब उर्दू शीर्षक हैं तो यह संख्या कम नहीं है मगर आज इन किताबों को प्राप्त करना चाहें तो उसका उपलब्ध हो पाना कठिन है, क्योंकि ज्यादातर पुस्तकों के प्रकाशक लेखक या कवि स्वयं होते हैं। उर्दू अकादमियाँ बन जाने के बाद यह काम आसान हो गया है क्योंकि अकादमियाँ 60 से 75 प्रतिशत सब्सिडी दे देती हैं। यह सब्सिडी प्रकाशक को नहीं लेखक को दी जाती है और यह पुस्तकें ज्यादा से ज्यादा चार या छः सौ की तादाद में प्रकाशित की जाती है जो लेखक अधिकतर अपने दोस्तों में बांट देता है या पत्र-पत्रिकाओं को समीक्षा के लिए भेज देता है। पुस्तकों का वितरण और विक्रय उसके बस की बात नहीं है। अपनी किताब वह प्रकाशकों को इसलिए नहीं देता कि किसी पारिश्रमिक की बात तो दूर रही वे छपाई का पूरा व्यय लेने के बाद उसे 40-50 प्रतियां भी देने में आना-कानी करता है।
उर्दू में काव्य संग्रह ज्यादा प्रकाशित होते हैं, जिनकी बाजार में मांग नहीं है। गालिब, फैज, निदा फाजली, जावेद अख्तर और बशीर बद्र के काव्य संग्रह उर्दू से ज्यादा देवनागरी लिपि में बिकते हैं।

बड़े प्रकाशक न होने के कारण किताब मेलों में भी उर्दू प्रकाशकों के स्टाल नाम मात्र के होते हैं क्योंकि स्टाल ले जाकर भी वह क्या करें उनकी इतनी पुस्तकें भी नहीं बिक पातीं कि वह अपना खर्च निकाल सकें। गत चार वर्षों से कौमी कौंसिल बराए फरोज उर्दू जवान ने उर्दू प्रकाशकों का किताब मेला लगाना शुरू किया है। अब तक नई दिल्ली, जयपुर, मुम्बई और श्रीनगर में उन्होंने मेले लगाए हैं। इनके नतीजे तो उत्साहवर्धक रहे हैं मगर नहीं कहा जा सकता कि इनकी इस गतिविधि से उर्दू पुस्तक प्रकाशन को गति मिल सकेगी भी या नहीं क्योंकि अभी उर्दू पुस्तक प्रकाशन व्यवसाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती वितरण की है। जब संचार के इतने माध्यम नहीं थे तो उर्दू पुस्तकें गांव-गांव पहुंच जाती थीं। मुंशी नवल किशोर के जमाने में तो कहा जाता था कि या तो हर जगह सरकार के कारिन्दे हैं या फिर नवल किशोर प्रेस के। उसी जमाने के एक लेखक अब्दुल हलीम शरर अपने चाचा के बारे में लिखते हैं जो पुस्तकों के वितरक थे। उन्होंने हाजी हरमैन शरीफैन के एजेन्ट की हैसियत से रथों और बैलगाड़ियों पर सवार होकर और हजारों किताबों को साथ लेकर लखनऊ से रावलपिंडी तक सफर किया था। उनका बयान था कि किताबें उन दिनों दुर्लभ थीं। इधर हम किसी बस्ती में पहुंचे उधर खिलकत (जनसमूह) ने घेर लिया। भीड़ लग जाती थी और हम जिस किताब को जिस कीमत पर देते थे लोग बेउज्र (बरोक-टोक) लेकर आंखों से लगाते थे। इस पर हाल यह था कि हर मांग पूरी न कर सकते थे। एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचते-पहुंचते किताबों का जखीरा (भंडार) खत्म हो जाता और नए माल के इंतजार में महीनों ठहरना पड़ जाता। उन दिनों माल का पहुंचना दुश्वार था मगर हमने ऐसा इंतजाम कर लिया था कि माल लखनऊ से बराबर आता रहता।

एक शताब्दी पूर्व उर्दू पुस्तकों का वितरण सुनियोजित था और आज संचार के इतने साधन हो जाने के बावजूद उर्दू पुस्तकों के वितरण के सामने इतनी गंभीर चुनौती है। हम केवल यह कहकर बात को नहीं टाल सकते कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रसार के कारण किताबों के पढ़ने का शौक कम हो रहा है क्योंकि कम्प्यूटर कभी भी किताबों का विकल्प नहीं हो सकती। उर्दू के प्रकाशकों को यह चुनौती स्वीकार करके अपने लिए नए क्षितिज तलाश करने होंगे। आखिर बांग्ला और मलयालम में प्रकाशित होने वाली पुस्तकों का प्रसार क्यों हो रहा है?

लेख़क -डॉ. रिजवान अहमद

Facebook Comments Box
Leave a Comment
Show comments