Patna Book Fair
आज के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम में पुस्तक मेले भी महत्वपूर्ण अनुष्ठान हो गए हैं—भले ही उन्हें खेलों, फिल्मों अथवा अन्य सांस्कृतिक-राजनीतिक समारोहों के समरूप विज्ञापन नहीं मिलता। इसमें कोई संदेह नहीं कि पुस्तक मेला जैसे आयोजन देश में पुस्तकों के प्रति रुचि जागृत करने में सहायक होते हैं। पुस्तक चेतना का विकास हमारी एक राष्ट्रीय अग्रता है। विशेषकर नई शिक्षा नीति के परिप्रेक्ष्य में। इस संदर्भ में पुस्तक मेले की अनिवार्यता और भी बढ़ जाती है। वास्तव में पुस्तकों का अनोखा संसार है, ज्ञान का संसार, कल्पना का संसार, सपनों का संसार, हमारी अमूर्त कामनाओं की पूर्ति का संसार जो हम वास्तविक जीवन में नहीं पा सकते, उसे पुस्तकों में कहीं-न-कहीं अवश्य पा सकते हैं। यह एक ऐसा संसार है जो अपने दामन को समूचे इतिहास को, मानव जाति के समूचे अनुभवों, उसकी सिद्धियों और असिद्धियों को समेटे हुए है। किसी जाति विशेष या व्यक्ति विशेष में पुस्तकों के प्रति कितना प्रेम है, यह उसके शैक्षिक और सांस्कृतिक स्तर का एक मापदण्ड है।
भारत की आजादी के उपरांत यहां के पुस्तक प्रकाशकों ने प्रकाशन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। आज भारत पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में 10 बड़े प्रकाशक देशों में शामिल है। अमेरिका और ब्रिटेन के बाद भारत का ही स्थान है। साथ ही भारत में प्रकाशित अंग्रेजी की पुस्तकें अफ्रीकी-एशिया देशों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले तीन देशों में से एक है। भारतीय लेखकों द्वारा रचित अनेक पुस्तकों ने हाल के दिनों में विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनायी है। भारत में कम व्यय पर स्तरीय छपाई एवं प्रकाशन ने विश्व का ध्यान आकृष्ट किया है।
इतना ही नहीं, अनेक विदेशी प्रकाशकों ने भारत में अपनी पुस्तकों की छपाई करवाने का सिलसिला प्रारंभ किया है। भारत में प्रकाशित पुस्तकों का विषय विस्तार आकाश की तरह विस्तृत है। भारत में 13000 प्रकाशक हैं जो प्रतिवर्ष करीब 60,000 नई पुस्तकें प्रकाशित करते हैं। यहाँ तेरह हजार पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रकाशित होती हैं। पुस्तकों के विषय राजनीति, प्रशासन, कला, साहित्य, कृषि, सामाजिक-आर्थिक विकास, अभियंत्रण, तकनीकी, दर्शन, संस्कृति औषध आदि हैं और इनमें से हर वर्ष पंद्रह हजार पुस्तकें अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ करती हैं। इसके साथ ही सरकारी एवं अर्धसरकारी प्रकाशनों की भी कमी नहीं है। भारत के अनेक लेखकों ने विश्व स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है।
बिहार प्रदेश की राजधानी ‘पटना’ में वर्ष 1971 में ‘केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय’ द्वारा प्रथम बार पुस्तक मेला आयोजित हुआ था जिसमें केवल 12 प्रकाशकों ने भाग लिया था। बिहार में पुस्तक मेला का आयोजन विगत तीन दशकों के केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय, दिल्ली, नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया एवं बिहार प्रदेश के साथ-साथ केन्द्र के भी विभिन्न संघों, संस्थाओं द्वारा होता रहा है। यह समारोह एक राष्ट्रीय शैक्षणिक, सामाजिक व सांस्कृतिक महोत्सव का रूप धारण कर चुका है जिसमें लेखक, कवि, कलाकार, साहित्यकार, बुद्धिजीवियों व आम जनता के साथ-साथ सम्मानीय मंत्रियों, राजनीतिज्ञों, अधिकारियों एवं स्कूल व कालेज के प्राचार्य, शिक्षकों, छात्रों महाविद्यालय के कुलपति की भी भागीदारी होती है। मेला परिसर में बिहार के अतिरिक्त अन्य राज्यों के भी लेखक, कवि, शोधकर्ता एवं अन्य कोटियों के सृजनकर्मी को भी विभिन्न कार्यक्रमों में जोड़ने का हम प्रयास करते हैं। साथ ही हमारी कोशिश रहती है कि विशेषकर नए राज्यों में पुस्तक प्रकाशन की एक स्वस्थ परंपरा प्रारंभ हो, यहां की जनजातीय तथा क्षेत्रीय भाषाओं में अधिक पुस्तकें प्रकाशित हों और उनका अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं में भी हों।
इनके अथक व अनवरत प्रयास से भी पुस्तक मेले की मान्यता अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी स्थापित हो चुकी है जो बिहार के लिए महानतम गौरव है। पटना पुस्तक मेला में विश्व के अन्य देशों के कतिपय ऐसे भागीदारों के भी आने की संभावना रहती है जो दिल्ली में नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया द्वारा आयोजित होने वाली विश्व पुस्तक मेला में भाग लेते रहते हैं।
बिहार में क्षेत्रीय भाषा अथवा भाषाई पुस्तकें अनुपलब्ध होती हैं जबकि पटना पुस्तक मेला में हिन्दी व अंग्रेजी के साथ-साथ उर्दू, बंगला, पंजाबी, तमिल, तेलगू, कन्नड़, उड़िया, संथाली, संस्कृत, मैथिली, भोजपुरी, मगही, मुंडारी, नागपुर वज्जिका, आसामी, मराठी, गुजराती आदि भाषा की पुस्तकें भी उपलब्ध रहती हैं। यह प्रतिष्ठा और गर्व की बात है कि बिहार के इन पुस्तक मेलों में प्रांत के सभी प्रमुख प्रकाशन गृहों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी भी होती है।
एक पुस्तक प्रदर्शनी खासकर छोटे शहरों में भी जहाँ कि देश के दूरस्थ भागों में लोग आ सकते हैं, उन लोगों के मन में आशा और प्रेरणा की किरण जगाती है जिनका शिक्षा पद्धति से विश्वास खत्म हो गया है। एक पुस्तक प्रदर्शनी न केवल पढ़ने की प्रवृत्ति जगाती है या अंततोगत्वा सामाजिक आर्थिक सुधार में योगदान करती है। पढ़ने की आदत, नया ज्ञान, युक्ति और विचार प्रदान तो करती ही है साथ ही इससे सोचने समझने, सामाजिक जागरूकता, नैतिक मूल्यों का विकास होता है जो कि मानव के विकास क्रम हेतु आवश्यक है।
काल के ठोकरों से किताबें बची रही हैं और इन्होंने राजनैतिक व्यवस्था और ज्ञान तथा विवेक को पीढ़ी दर पीढ़ी अनुप्राणित किया है। पुस्तकें आधुनिक विकास का जनक हैं क्योंकि तकनीकी ज्ञान की शक्ति इनमें हैं। पुस्तकों ने हमें कुछ पाठ भी दिया है जो कि मानवता के संबंध में दूर दृष्टि देते हैं और कृत्रिम बंटवारों से दूर करते हैं।
पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था—’पुस्तकों की दुनिया मनुष्य की विशिष्टतम कृति है, वह जो भी अन्य बनाता है स्थाई नहीं रहती-स्मारक गिर जाते हैं, राष्ट्र नष्ट हो जाते हैं, सभ्यताएं पुरानी होकर लुप्त हो जाती हैं, और एक अंधकार युग के बाद नई प्रजाति दूसरा बनाती है किन्तु पुस्तकों की दुनिया में ऐसे खंड है जिन्होंने ऐसा बार-बार होते देखा है और फिर भी वह रहती हैं, युवा, नूतन ऐसी जैसी की अभी-अभी लिखी गई हों, अभी तक मनुष्य के हृदय से बोल रही हों।’ पं. नेहरू के ये शब्द विश्व के बारे में उनकी विहंगम दृष्टि के भाव दिखलाते हैं, एक विश्व जो कि अनेक उच्च उपलब्धियों के रास्ते पर बढ़ रहा है फिर भी अनेक ऐसे तत्वों को नजर अंदाज कर बढ़ रहा है जैसा कि सामाजिक चिंतकों ने सोचा था।
ऐसे तत्व कभी-कभी राजनैतिक व्यवस्था के लिए दुरुह होती है और उसे सुधारने के लिए अनवरत प्रयत्न की मांग करती है। पुस्तकें इन परिस्थितियों में मानवता की सहायता के लिए सर्वाधिक शक्तिशाली शस्त्रों के रूप में कुरीतियों को दूर करने एवं विवेक और सद्भाव की स्थापना के लिए आती हैं।
साभार –
पटना पुस्तक मेला 2005 स्मारिका
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