अपनी भाषाओं के सम्मान की खातिर
हिंदी व अन्य भारतीय मातृ-भाषाएं अपने मुल्क में अपने ही लोगों के बीच ‘मात्र भाषा’ बन कर रह गई हैं। अंग्रेजी सर्वग्रासी बन कर सबको निगलती जा रही है, फिर भी हम अंग्रेजी के दीवाने बने हुए हैं। कोई अंग्रेजी की खिलाफत करते हुए हिंदी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं की वकालत करता है तो उसे हिकारत से देखा जाता है और माना जाता है कि वह अंग्रेजी न जानने की कुंठा से ग्रस्त होने के कारण भारतीय भाषाओं का पक्षधर है। हालत यह हो गई है कि स्वयं अंग्रेजी ही हमें हमारे अंग्रेजी मोह के लिए लताड़ने लगे हैं। कुछ समय पहले इंग्लैंड के हिंदी अध्येता और प्राध्यापक डा. रूपर्ट स्नेल ने कहा कि अंग्रेजों का राज तो चला गया लेकिन भारत में अंग्रेजी का राज बना हुआ है। भारत में तो हिंदी बोलने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है इसलिए इसकी संपर्क भाषा स्वाभाविक रूप से हिंदी ही होनी चाहिए।
जहाँ अपनी भाषा बोलना अपनी पहचान और स्वतंत्र अस्मिता के गौरव बोध का सूचक होना चाहिए वहाँ हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री और अधिकारी भी अंग्रेजी में बोलना ज्यादा पसंद करते हैं। 16 दिसंबर 93 को दिल्ली में सबके लिए शिक्षा विषय पर शिखर सम्मेलन हुआ था। इसमें इंडोनेशिया, मेक्सिको, चीन और ब्राजील के प्रतिनिधियों ने अरबी, स्पेनिश, चीनी और पुर्तगाली में बोलना पसंद किया मगर हमारे हिंदी प्रेमी राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा, प्रधानमंत्री नरसिंह राव और मानव संसाधन विकास मंत्री अंग्रेजी में बोले। यह इस तथ्य के बावजूद हुआ कि इस शिखर सम्मेलन में हिंदी, स्पेनिश, अरबी, चीनी, पुर्तगाली और अंग्रेजी भाषा में अनुवाद की व्यवस्था थी।
संघ लोक सेवा आयोग के बाहर हिंदी और भारतीय भाषाओं को आयोग की परीक्षाओं में उचित स्थान दिलाने और अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म कराने के लिए अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन 16 अगस्त 1988 से धरना दे रहा है। यह विश्व का सबसे लंबा और शांतिपूर्ण सत्याग्रह है मगर इन सत्याग्रहियों को गिरफ्तारी अथवा उत्पीड़न के जरिए खदेड़ने की अनेक नाकाम कोशिशें की जा चुकी हैं। 18 जनवरी 1968 को हमारी संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से संकल्प लिया था कि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के प्रत्येक स्तर से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करके भारतीय भाषाओं को उसका पूर्ण विकल्प बनाया जाए। इसके बाद 11 जनवरी 1991 को यही संकल्प संसद ने दुबारा पारित कर दिया मगर आज तक स्थिति ज्यों की त्यों है।
अफसोस की बात है कि संसद में इस मसले को लेकर अनेक बार चर्चा हुई है, सरकार को संसदीय संकल्प पूरा न करने के लिए आड़े हाथों लिया गया है लेकिन फिर भी कुछ नहीं हुआ। संसद से बाहर भी विभिन्न दलों के दिग्गज नेता हिंदी व भारतीय भाषाओं के सम्मान के पक्ष में विभिन्न गोष्ठियों-सभाओं में मुखर रहे हैं, इसके बावजूद नतीजे ढाक के तीन पात हैं। दो बार पारित संकल्प लागू नहीं होना संसद की गरिमा को चुनौती है।
पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह कहते रहे कि अंग्रेजी इस देश में नौकरानी बन कर आई थी और अब मालकिन बन कर बैठ गई है। आज हमारे देश में हमारी मातृ-भाषा का अपमान हो रहा है। यह हम सबके लिए शर्म की बात है। जब हम अपनी माँ को ही सम्मानजनक स्थिति नहीं दिलवा पा रहे हैं तो दूसरे हमारा सम्मान कैसे करेंगे? हमारे नेता लोकप्रियता हासिल करने के लिए संसद में तो अंग्रेजी में बहस करते हैं, हिंदी का ख्याल तो उन्हें बस अपने चुनावी भाषणों के दौरान ही आता है क्योंकि वे जानते हैं कि वहाँ अंग्रेजी से दाल नहीं गल सकती।
आज अंग्रेजी ही वैभव और संपन्नता की सीढ़ी बन गई है। मगर आम जनता की पहुँच में अंग्रेजी नहीं है। इसी का नतीजा है कि सिर्फ दो फीसदी अंग्रेजी जानने वालों के पास सरकार की ताकत है और बहुसंख्यक वर्ग उनके इशारों पर नाचने को मजबूर है। भाषा के सवाल पर आजादी के 48 साल बाद भी देश दो भागों में बंटा हुआ है। एक भाग इंडिया कहलाता है जिसके निवासी कान्वेंट और अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों के छात्र होते हैं। ये सभी आईएएस, आईपीएस बन कर ऊंचे सरकारी ओहदों पर जाते हैं और देश पर शासन करते हैं। वहीं दूसरे भाग के लोग भारत के हैं जो गांवों की झोपड़ी या बरगद के नीचे स्कूल में लालटेन की रोशनी से पढ़ कर आते हैं। इनकी तकदीर में क्लर्क बनना और हुक्म बजाना लिखा होता है। इस सबके मद्देनजर क्या नहीं लगता कि एक और आजादी की लड़ाई लड़ना बाकी है।
लेखक- क्रांति कुमार शर्मा



