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पटना पुस्तक मेला 1994 (अवधि: उद्घाटन बुधवार 14 नवम्बर – समापन सोमवार 26 नवम्बर)
मंगलवार 20 दिसम्बर 1994
✍️’पटना पुस्तक मेला’ न केवल विभिन्न विषयों की पुस्तकों की खरीददारी के केन्द्र के रूप में वरन् साहित्यिक सांस्कृतिक एवं खेल-कूद विषयक परिचर्चाओं के स्थल के रूप में ढलते जा रहा है। पटना पुस्तक मेला में आज (मंगलवार 20 दिसम्बर 1994) भारतीय संस्कृति के विद्वान डॉ० कर्ण सिंह ने एक परिचर्चा को सम्बोधित करते हुए पटना पुस्तक मेला स्मारिका 1994 एवं एक पुस्तक का लोकार्पण भी उन्होंने किया।
पटना पुस्तक मेला ने अपनी परिचर्चाओं की श्रृंखला में आज “जीवन में पुस्तकों का महत्त्व” विषयक परिचर्चा में ‘मुख्य अतिथि’ पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ० कर्ण सिंह ने कहा कि किसी भी संस्कृति के रक्त का प्रवाह पुस्तकों से मापा जाता है। पुस्तकों के बिना जीवन निरस्त हो जाता है। क्योंकि ये मनुष्य में भावों का प्रवाह कर चेतना पैदा करती है। दूरदर्शन का साहित्य पर हमला के सम्बन्ध में बोलते हुए उन्होंने कहा कि दूरदर्शन के कार्यक्रमों के कारण भारत ही नहीं विदेशों में भी पढ़ने की आदत छूटती जा रही है। उन्होंने दूरदर्शन और पुस्तकों के बीच सम्बन्ध निर्धारित करने के लिए लेखकों, प्रकाशकों एवं बुद्धिजीवियों को आगे आने का आह्वान किया।
पुस्तकों में संग्रहित विचारधारा व्यक्ति को प्रगति के पथ पर ले जाती है। पुस्तक प्रेम विचारधारा के प्रति आग्रह पैदा करता है। डॉ० कर्ण सिंह ने भारतीय संस्कृति कोश विचारधारा प्रधान बताते हुए विचारधारा को जनता के बीच ले जाने के काम को आसान बनाने के लिए दूरदर्शन की उपयोगिता पर बातें कहीं। उन्होंने कहा कि टेलीविजन हमारे जीवन का एक यथार्थ बन चुका है। हमें उसके सदुपयोग की चिन्ता करनी चाहिए। उन्होंने आज के कश्मीर की स्थिति पर दु:ख व्यक्त करते हुए कहा कि धरती का स्वर्ग आज नारकीय स्थल बन चुका है।
परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए ‘विशिष्ट अतिथि’ के रूप में साहित्यकार सांसद साहित्यकार डॉ० शंकर दयाल सिंह (संसदीय राजभाषा समिति के उपाध्यक्ष, दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी व रेलवे बुक स्टॉल समिति के अध्यक्ष) ने कहा कि पुस्तकें आधार, संस्कार और विचार देती हैं। लेकिन, आज दुनियाँ दूरदर्शन के कारण पुस्तकों को भूलती जा रही है। दूरदर्शन केवल मनोरंजन माध्यम हो सकता है। वह विचार चिन्तन नहीं दे सकता है। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में पिछड़ने के बावजूद बिहार में सर्वाधिक बौद्धिक क्षमता एवं पाठक हैं। उन्होंने कहा कि दूरदर्शन के प्रभाव में आकर युवा पीढ़ी पुस्तकों से छुटती जा रही है। दिल्ली में कराए गए एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि दूरदर्शन के कारण पाठकीयता में 17% की गिरावट आई है। पुस्तकें हमारा आचार, विचार एवं संस्कार बनाती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज पाठक और पुस्तक के बीच दूरी बढ़ रही है जिसके कारण मानव को जीवन दर्शन तथा उद्देश्यों का ज्ञान नहीं हो पाया है।
आरम्भ में पटना पुस्तक मेला आयोजन/सलाहकार समिति के सदस्य व स्वागताध्यक्ष गृह आयुक्त श्री जियालाल आर्य ने अतिथियों का स्वागत किया जबकि इस समारोह का संचालन महासचिव श्री नरेन्द्र कुमार झा ने किया। डॉ० कर्ण सिंह ने इस अवसर पर श्री जियालाल आर्य लिखित ‘इज्जत की जिन्दगी’ नामक पुस्तक एवं एक मेला की स्मारिका 1994 का लोकार्पण किया। बाद में डॉ० कर्ण सिंह पटना पुस्तक मेला का अवलोकन करने गए। उन्होंने इस्कॉन, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् एवं श्री रामकृष्ण मिशन आश्रम के स्टॉल को देखा। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के निदेशक डॉ० महेन्द्र प्रसाद यादव ने उन्हें ‘नेपाल देश और संस्कृति’ नामक पुस्तक भेंट की।
पटना पुस्तक मेला 1994 की 80 पृष्ठों की स्मारिका श्री रंजन घोष दस्तीदार, रोति जैन एवं श्री संजय कुमार ने तीन दिनों में तैयार किया था। डॉ० कर्ण सिंह ने उन्हें भी प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया।
बुधवार 21 दिसम्बर 1994
डॉ० कर्ण सिंह दूसरे दिन बुधवार 21 दिसम्बर 1994 को पटना पुस्तक मेला परिसर में आयोजित एक समारोह में आए। इस समारोह में तत्कालीन विधानसभाध्यक्ष श्री गुलाम सरवर ने श्री जियालाल आर्य रचित पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम बुद्धिजीवियों की भूमिका’ का लोकार्पण किया उधर, पूर्व केन्द्रीय शिक्षा मन्त्री डॉ० कर्ण सिंह ने सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी श्री राम उपदेश सिंह ‘विदेह’ द्वारा लिखित चण्डिकायन ‘श्री दुर्गा सप्तशती’ का समश्लोकी पद्मनुनाद्र का लोकार्पण किया।
मेला परिसर में सम्पन्न इस समारोह की अध्यक्षता करते हुए श्री गुलाम सरवर ने कहा कि श्री जियालाल आर्य की पुस्तक में 1942 की क्रान्ति का इतिहास साहित्यिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में बुद्धिजीवियों की भूमिका के अतिरिक्त श्री आर्य ने इस पुस्तक में क्रान्तिकारियों के बारे में जो तथ्य लिखे हैं, उनसे नई पीढ़ी प्रेरणा लेगी। 1942 के आन्दोलन के दौरान शहीद हुए 7 बिहारी नौजवानों की चर्चा प्रेरणाप्रद है। श्री ग़ुलाम सरवर ने भारतीय संस्कृति को दुनियाँ की सर्वाधिक प्राचीन संस्कृति बताते हुए बुद्धिजीवियों का आह्वान किया कि वे इसकी रक्षा करें, तथा समृद्ध बनाएं। उन्होंने विश्व सुन्दरी ऐश्वर्या राय को प्रधानमंत्री द्वारा सम्मानित किए जाने को भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल बताया।
इस अवसर पर डॉ० रामवचन राय (प्राध्यापक हिन्दी विभाग, पटना विश्वविद्यालय) ने 1942 के राष्ट्रीय आन्दोलन को समाजवादियों का आन्दोलन बताते हुए श्री आर्य की पुस्तक की विस्तार से चर्चा की।
बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के निदेशक डा० अमर कुमार सिंह, पुलिस महानिदेशक श्री विजयपाल जैन आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सिनेमा के वरिष्ठ प्रख्यात अभिनेता श्री ए०के० हंगल ने भी आज पटना पुस्तक मेला का अवलोकन किया तथा पुस्तकें भी खरीदीं। वे इप्टा के राष्ट्रीय स्वर्ण जयंती समारोह के सिलसिले में बम्बई से पटना आए हुए थे।
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