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पटना पुस्तक मेला 1992: गांधी मैदान में सजे एक अनोखे संसार का अनुभव

संस्मरण: पटना पुस्तक 📚मेला 1992 (13 नवम्बर से 25 नवम्बर)

✍️हम भी औरों की तरह पटना के गांधी मैदान में लगे पटना पुस्तक मेला का आदर करते हैं।‌ दाद देते हैं उस शख्सियत को जिसके दिमाग में यह बात उपजी और धरती पर जिसने इस मेले को लगाया। निश्चित रूप से पटना के पाठकों के लिए एक बेहतरीन शुरुआत है। हम पटना में रहकर भी पटना में नहीं हैं। आप चौंकिए मत ! अगर आप भी यहाँ हैं तो आप भी पटना में रहकर पटना में नहीं हैं।‌ और सच तो यह है कि आप आए ही यहाँ हैं इसलिए कि कुछ ही पल, कुछ ही घण्टे के लिए आप यह अहसास कर सकें कि आप पटना में रहकर भी पटना में नहीं हैं।

यह अहसास कितना सकून दे रहा है आपको ! अचानक आपमें इतनी तब्दीली क्यों आ गई है। आप पूरे पटना से अलग इस टुकड़े पर चहलकदमी करते हुए अपने आपमें क्या महसूस कर रहे हैं। आप पटना शहर या इसके बाहर और किसी जगह पर थे तब और यहाँ जब आप हैं तो देखिए कितना अन्तर महसूस कर रहे आप अपने आपमें। जहाँ कभी पाकेटमार टहलते थे, और फिर टहलेंगे, जहाँ जोशीले भाषण से आप छले जाते थे और फिर छले जाएंगे।‌

जहाँ कभी सूअर स्वच्छन्द विचरण करते थे और फिर विचरण करेंगे वहाँ आप कितनी निश्चितता, कितनी ललक और कितनी चाहतके साथ आप टहल रहे हैं। आप सोच रहे हैं और आप हैरत में हैं कि यह कौन सी जगह है जहाँ हम टहल रहे हैं और यह जगह पटना शहर से बाहर है। तो हाँ जनाब ! 70 हजार स्क्वायर वर्गफीट में यह जगह है ‘पटना पुस्तक मेला ‘। देखिए अब आप भी महसूस करने लगे न कि आप पटना शहर में रहकर भी पटना से बाहर हैं और अब आप यह भी महसूस करने लगे न कि इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार और आप आ भी रहे हैं बार-बार ! यह पुस्तक मेला धीरे-धीरे राजधानी के शैक्षिक जगत का हसीन नजारा बनता जा रहा है। अज्ञान के अंधकार को चीरेगा पुस्तक मेला।

पटना पुस्तक मेला का तीसरा दिन लगभग हर स्टाल पर भीड़ है। मेला परिसर में लोग चहलकदमी कर रहे हैं, एक-एक कर हर स्टाल में जा रहे हैं, मनचाही और अपने पसन्द की पुस्तकें देख रहे हैं। चुनाव कर रहे हैं, मोल-चाल कर रहे हैं और खरीद रहे हैं।‌ लगभग अपराह्न तीन बजे से रात आठ बजे तक मेला शबाब पर है। लगभग 15 हजार लोगों से मेला परिसर गुलजार है और इसके भी दो तिहाई से ऊपर कॉलेज और विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राएं हैं। स्कूली छात्र-छात्राएं भी हैं और मध्यम तथा उच्च मध्यम वर्ग के कुछ बड़े बुजुर्ग भी हैं। सब अपने-अपने हिसाब से और अपनी-अपनी जगह। आज तीसरे दिन भी पुस्तकें देखने, उनके सर्वेक्षण जरूरी पुस्तकों की जानकारी के संदर्भ में बातचीत ज्यादा हुई है। खरीददारी कम फिर भी पर अमूमन दो दिनों की अपेक्षा पुस्तकें ज्यादा खरीदी गई हैं।

आधुनिक भारत के निर्माताओं ने भारतीय संस्कृति की विभिन्नताओं को परिवेश में जिस मजबूत व एकजुट भारत का सपना संजोया था, इस भारत को पटना पुस्तक मेला में एक ही स्थान पर साकार होते देखा जा सकता है।‌ इसके माध्यम से होने वाला सांस्कृतिक विनिमय निश्चय ही राष्ट्रीय एकता की मजबूत आधारशिला है। पुस्तकें ही एकता का संदेश का सबसे सशक्त माध्यम होती हैं। हमारे इस महान देश की सांस्कृतिक धरोहर भाषा, धर्म और रहन-सहन की हर बाधा नकारती हुई हमारी पुस्तकों में ही सुरक्षित है।

आज जब हम २१वीं शताब्दी की दहलीज पर खड़े हैं, पटना पुस्तक मेला आयोजन समिति ने विशेषकर बिहार वासियों को विभिन्न विषयों पर प्रकाशित हो रहे नवीनतम प्रकाशनों से अवगत कराने उद्देश्य से इस मेले का आयोजन किया है। नि:संदेह यह मेला इस राज्य के पिछड़ेपन व अज्ञान के अंधकार को शिक्षा की ज्योति से प्रज्वलित करेगी।‌ भारत ने अपने गरिमामय अतीत में नालंदा की भूमि पर विश्व का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय स्थापित कर ज्ञान और विवेक की मशाल जलाकर वाभी सारी दुनिया को आयोजित किया था।‌

पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में 13 से 25 नवम्बर तक तृतीय पटना पुस्तक मेला अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता एवं अम्बेदकर जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित की गई थी। गत वर्ष 1 दिसम्बर से 12 दिसम्बर 1991 तक का चतुर्थ पुस्तक मेला एवं वर्तमान 13 नवम्बर से 25 नवम्बर 1992 तक चलने वाले पुस्तक मेला में किसी स्तर से सरकार द्वारा आर्थिक सहायता अप्राप्त रहने के बावजूद मेला की प्रगति संतोषजनक रही है।

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