पटना पुस्तक मेला 1992 में वृहस्पतिवार 19 नवम्बर 1992 को एक विषय ‘किशोरी और महिला संरक्षण पर हुई गोष्ठी की सत्यकथा
संस्मरण : शुक्रवार 16 जनवरी 2026
✍️”किशोरी और महिला संरक्षण : कितना सच और कितना झूठ” इस विषय पर बृहस्पतिवार 19 नवम्बर 1992 को गांधी मैदान में पटना पुस्तक मेला 📚 1992 के अन्तर्गत एक गोष्ठी का आयोजन राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद यादव की मौजूदगी में हुआ। काफी महिलाओं, पुरुषों ने इसमें हिस्सा लिया। धुआंधार तकरीरें नारियों, किशोरियों की अस्तित्व-रक्षा, उनके विकास को लेकर हुई। अर्थात् नारी और सरकार दोनों आमने-सामने थीं। यह एक अच्छी शुरुआत लगी, मगर सवाल सच्चाई को जमीन पर उतारने का है।
मुख्यमंत्री ने नारियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि उन्हें हर कदम पर न्याय मिलेगा और महिलाओं को प्रताड़ित करने वाले लोगों को दण्डित किया जाएगा, चाहे वो सरकारी मुलाजिम ही क्यों न हो। मुख्यमंत्री जी ने एक सवाल छोड़ दिया, जिसे हम जोड़ देना मुनासिब समझते हैं- वो यह है कि उन सफेदपोश गुण्डों का क्या होगा जो औरत को महज ‘खिलौना’ समझते हैं ? सत्ता के नशे में धुत्त होकर जो नारी का बड़ा से बड़ा अपमान करने से बाज नहीं आते। पूरे नेता के दामन पर जो बदनुमा दाग की तरह उभरकर सामने आते हैं। क्या ऐसे लोगों को दण्डित करने का साहस दिखाकर मुख्यमंत्री जी नए इतिहास का कीर्तिमान कायम करके दिखाएंगे ?
फैसले की घड़ी है, नारी भी सामने है और आरोपित अपराधी भी। नारी का नाम है ‘सुशीला’, जिसने साहस बटोर कर फेमिली कोर्ट में अपनी अस्तित्व-रक्षा के लिए एक मामला दायर किया है। सब कुछ लुटाकर अब आजीविका की गुहार लगा रही है समाज के उस ‘गैरतमंद इंसान’ के नाम, जिसने एक औरत को फूल की तरह तोड़ा, सूंघा और मसलकर फेंक दिया।
सच क्या है ? झूठ क्या है ? इसकी तह में जाना राजा का काम है। फैसला करना, दण्ड देना राजा के हाथ में है। प्रजा तो तमाशबीन बनी सिर्फ न्याय का तमाशा देखना चाहती है।
सवाल तत्कालीन (शनिवार 21 नवम्बर 1992) घोषणा का है, जवाब सरकार (लालू जी) के हाथ में है।…
चूंकि वर्ष 1991 में व्यापार मेला के साथ पटना पुस्तक मेला किया गया था जिसके कारण इसकी अवधि 15 दिनों 1 से 15 दिसम्बर की थी, फिर भी पुस्तक मेला चूंकि 12 दिनों के लिए ही घोषित की गई थी अतः पुस्तक व्यवसायी भागीदार 13 दिसम्बर से ही Exist Pass प्राप्त करने के लिए स्वतन्त्र थे लेकिन उनके चाहने पर वे पुस्तक मेला में 15 दिसम्बर तक भागीदार बन सकते थे। इस आधार पर पुस्तक मेला के भागीदार लगभग 75% 13 दिसम्बर को चले गए लेकिन 25% रूककर 15 दिसम्बर तक अपना स्टाल चलाते रहे।




