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पटना पुस्तक मेला का स्वर्णिम दौर: 1990 के घाटे से 1992 की भव्य सफलता तक

1990 पटना पुस्तक मेला के समापन के बाद जब हर कोई इसकी सफलता पर जश्न मनाने में लगा हुआ था, आयोजक कुछ मुतासिर से लग रहे थे। मेले के आर्थिक मामलों के प्रभारी श्री संजीब बोस ने मेला के आयोजन में हुए भारी नुकसान की चर्चा करते हुए कहा कि इस घाटे की पूर्ति आगामी पुस्तक मेले से भी कर पाना असम्भव जान पड़ता है। लिहाजा 1990 पटना पुस्तक 📚 मेला के घाटे को पूरा करने के लिए 1991 में पुस्तक मेला के साथ-साथ एक व्यापार मेला का भी आयोजन करने का फैसला किया गया। 1991 में आयोजित पुस्तक मेला सह व्यापार मेला अपने-आप में एक अनूठा आयोजन था, जो अप्रत्याशित ढंग से सफल रहा और लगभग 12 दिनों तक मेला स्थल राजधानी की गतिविधियों का केन्द्र बना रहा। फिर भी पटना पुस्तक मेला 1991 में शामिल होनेवाले प्रकाशकों में काफी नाराजगी थी; उनका ख्याल था कि मेले के दर्शकों ने अपना अधिकांश पैसा ‘पटना व्यापार मेला’ में ही खर्च कर दिया इसीलिए पुस्तकों की बिक्री इस संयुक्त आयोजन से प्रभावित हुई। इस आरोप में काफी दम भी है लेकिन 1991 का “पुस्तक-सह-व्यापार मेला” मशहूर हस्तियों को जुटाने में कामयाब रहा। इन हस्तियों में ब्रिटेन के डिप्टी हाई कमिश्नर श्री इयान मैक्लनी, कार्टूनिस्ट आर०के० लक्ष्मण एवं श्री दिलीप पडगाँवकर (सम्पादक, टाइम्स ऑफ इंडिया, बम्बई) खास तौर पर उल्लेखनीय रहे।

स्वाभाविक है कि इतने वृहत पैमाने पर कोई आयोजन कर पाना किसी एक व्यक्ति के लिए नामुमकिन ही है। मेले की आयोजन समिति के मार्गदर्शन हेतु एक औपचारिक ‘सलाहकार समिति’ गठित की गई जिसकी समय-समय पर बैठक हुआ करती है। इन बैठकों में योजनाएं तैयार की जाती हैं। इस समिति में पटना पुस्तक मेला के संरक्षक प्रोफेसर डी०डी० गुरु, प्रोफेसर चेतकर झा, प्रोफेसर प्रधान हरिशंकर प्रसाद, प्रोफेसर सच्चिदानन्द, प्रोफेसर उमाचरण झा, प्रोफेसर एल०एम० राय, प्रोफेसर शैलेश्वर सती प्रसाद, डॉ० लाला सूरजनन्दन प्रसाद, डॉ० जितेन्द्र सहाय, पटना वीमेंस कॉलेज की प्राचार्या सिस्टर लिसेरिया, सिस्टर बेनेडिक्टा (विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र), फादर नोर्बट मेंजिस (प्राचार्य, सेंट माइकल हाई स्कूल), श्री एस०के० श्रीवास्तव, श्री भवनाथ मिश्रा, श्री ए०यू० शर्मा, श्री सतीश भटनागर, श्री आर०एन० दास, श्री जियालाल आर्य, श्री ए०सी० रंजन, श्री वाई०पी० बक्सी, श्री बी०डी० टेकरीवाल (भारतीय डाक सेवा), श्री बी०एन० प्रसाद, श्री संतोष कुमार, श्री अरूण चौधरी, हिन्दुस्तान टाइम्स के मुख्य प्रबंधक श्री वाई०सी० अग्रवाल, श्रीमती श्रुति शुक्ल, टाइम्स ऑफ इंडिया के स्थानीय सम्पादक श्री उत्तम सेन गुप्ता, सुश्री अनुश्री सरकार, डॉ० अरूण कुमार वर्मा (आकाशवाणी, पटना), श्री बिजयनन्दन प्रसाद सिंह (निदेशक सदस्य, पीआरडीए) समेत अनुग्रह नारायण सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान के निदेशक एवं बिहार सरकार के कतिपय विभागों के पदेन सदस्य हैं। इसके अतिरिक्त सलाहकार समिति में लेफ्टिनेंट जनरल श्री एस०के० सिन्हा, लेफ्टिनेंट कर्नल डॉ० जे०सी० जैन, डॉ० कुमार बिमल, प्रोफेसर जाबिर हुसैन, श्री प्रकाश झा (फिल्म प्रोड्यूसर-निदेशक), प्रोफेसर मंगलमूर्त्ति (अंग्रेजी विभाग, कामर्स कॉलेज), प्रोफेसर उत्तम कुमार सिंह, प्रोफेसर अमर नाथ सिंह, श्री यू०के० सिंहा, श्री अरविन्द कुमार झा, श्री आर०एन० महंत्ती, डॉ० एम०एन० झा (आकाशवाणी), श्री ब्रह्मानन्द चौधरी (आकाशवाणी), श्री तड़ित कुमार बोस (भारती भवन), श्री उदितेन्दु बोस (पापुलर बुक स्टोर), श्री हीरालाल गुप्ता (सेलिना पब्लिशर्स, दिल्ली), श्री ओ०पी० शास्त्री (सोविनयर पब्लिशर्स, दिल्ली)‌ एवं श्री वाई०पी० रानाडे (स्कालर पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली) सहित कतिपय अन्य व्यक्तियों को भी ‘विशेष आमंत्रित’ सदस्यों के रूप में शामिल किया गया है।

1991 के पटना पुस्तक मेला में एक नई बात यह देखने में आई कि इसमें आयोजन व सलाहकार समिति ने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देनेवाले चार हस्तियों को अलग-अलग पुरस्कार प्रदान किए। पुस्तक मेला के समापन समारोह के मुख्य अतिथि माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री बिमल चन्द्र बसाक ने अपने हाथों से ये पुरस्कार प्रदान किए।‌ रंगमंच के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘भिखारी ठाकुर पुरस्कार’ श्री रामेश्वर सिंह कश्यप (अब स्वर्गीय) को, साहित्य के क्षेत्र में ‘फणीश्वर नाथ रेणु पुरस्कार’ साहित्यकार श्री हिमांशु श्रीवास्तव को, संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘रामचतुर मल्लिक पुरस्कार’ तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन, प्रकाशन के क्षेत्र में ‘आचार्य रामलोचन शरण पुरस्कार’ उभरते युवा प्रकाशक किरण प्रकाशन के श्री सत्यनारायण प्रसाद को। कुछ अन्यों को भी कुछ और पुरस्कार प्राप्त हुए।
1991 का पुस्तक-सह-व्यापार मेला इस कदर सफल हुआ कि इंडियन एक्सप्रेस (दैनिक अंग्रेजी समाचार पत्र) और इंडिया टूडे (पाक्षिक पत्रिका) समेत अन्य राष्ट्रीय समाचार-पत्रों ने भी मेला विषयक लेख प्रकाशित किए।

ज्ञातव्य है कि सर्वसम्मति से औपचारिक रूप से हमेशा के लिए 1992 में पुस्तक मेला प्रारम्भ होने से पूर्व ही मेले के आजीवन अध्यक्ष के रूप में डॉ० लाला सूरजनन्दन प्रसाद एवं आजीवन कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में प्रोफेसर सच्चिदानन्द को राष्ट्रीय शैक्षणिक-सांस्कृतिक महोत्सव सह पटना पुस्तक मेला का मनोनयन किया गया। इसी समय प्रोफेसर प्रधान हरिशंकर प्रसाद का भी आजीवन मुख्य संरक्षक के रूप में मनोनयन हुआ। यह मनोनयन डॉ० लाला सूरजनन्दन प्रसाद के निवास स्थल (नाला रोड, पटना) पर सितम्बर में अन्तिम रविवार को दिन में 11 बजे हुई एक बैठक में ही हुआ जिसमें आयोजन समिति व सलाहकार समिति के लगभग सभी सदस्य उपस्थित रहे। पटना पुस्तक मेला में हमेशा के लिए इन सबों के चयन में सफलता की बैठक के उपरान्त लाला साहेब के निवास स्थल पर उनकी ओर से सबों के लिए मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था भी की गई थी।
ज्ञातव्य है कि इन सबकी उपस्थिति में ही 1992 के पटना पुस्तक मेला की बारी आई जिसका उद्घाटन शुक्रवार 13 नवम्बर 1992 को स्थानीय गांधी मैदान में उच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश श्री बिमल चन्द्र बसाक ने किया। मेले के बजट को लेकर एक बार फिर आयोजन समिति के सदस्यों के बीच मतभेद पैदा हो गया। अनेक सदस्यों ने यह आशंका व्यक्त की कि इस बार मेले के प्रति बाहर के राज्यों के प्रकाशकों का रवैया सकारात्मक नहीं रहेगा। विदित हो कि इसी वजह से मेले के आयोजन का निर्णय सितम्बर 1992 के मध्य 15 तक अधर में झूलता रहा हालांकि मेला आयोजित करने की अनौपचारिक घोषणा पूर्व में ही कर दी गई थी और आवेदन फार्म वगैरह भी प्रेषित किए जा चुके थे। अनिश्चितता के इस मोड़ पर श्री नरेन्द्र कुमार झा ने पूर्ण परिपक्वता का परिचय देते हुए मेले के आयोजन में सम्भावित घाटा नहीं होने देंगे, इस बात का विश्वास जोरदार शब्दों में दिलाया और सारी जिम्मेवारी अपने ऊपर ले ली। फिर क्या था, 1992 पटना पुस्तक 📚 मेला आयोजित करने का काम जोर-शोर से शुरू हो गया और नतीजे के रूप में इस वर्ष (1992) का पुस्तक मेला (विगत वर्ष 1985, 1988, 1990 व 1991) की अपेक्षा बेहतर, वृहत और नए तेवर के साथ आयोजित हो रहा है।

बाद में श्री नरेन्द्र कुमार झा ने खुलासा करते हुए कहा कि 24 जनवरी 1992 को बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ जब वे (बिहार राज्य का प्रात्योजित प्राधिकारी) राज्य के अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशक संघ, जेनेवा (IPA: International Publishers Association Geneva) के 24वें कांग्रेस में भाग लेने दिल्ली गए तो वहाँ उनलोगों की बातचीत में भारतीय एवं विदेशी प्रकाशकों से हुई थी और उन सबों ने अगले पटना पुस्तक मेला में भाग लेने की तीव्र इच्छा जाहिर की थी, इसलिए मेले के आयोजन के बारे में कोई भी आशंका निर्मूल है। इसके लिए कार्यसमिति (आयोजन व सलाहकार समिति) के सभी सदस्यों का सहयोग एवं समर्थन प्राप्त है। उन्होंने कहा कि बाहर के अनेक प्रकाशकों ने मेले में भाग लेने हेतु स्टॉल के लिए अग्रिम बुकिंग भी कर दी थी। ऐसी स्थिति में पुस्तक मेले के आयोजन के स्थगन से पटना पुस्तक मेला आयोजन के औपचारिक आयोजन समिति व सलाहकार समिति की साख को तो धक्का पहुँचता ही, भविष्य में पुस्तक मेले के आयोजन की विश्वसनीयता पर भी अनेक प्रश्न-चिन्ह लग जाते।
वर्ष 1985, 1988, 1990 व 1991 को जोड़ने के उपरान्त पटना पुस्तक मेला का पाँचवां प्रदर्शन वर्ष 1992 है। इन वर्षों में इसने पुस्तक को पाठकों तक पहुँचाने का जो सराहनीय कार्य किया है, उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय वह कम ही है।‌ पुस्तक मेला की ओर लोगों का ध्यान बरबस आकृष्ट हो गया है। जिस तरह लोग दशहरा, होली, ईद, क्रिसमस, गुरु-पर्व आदि पर्व-त्योहारों की बेकरारी के साथ प्रतीक्षा करते हैं अब उसी तरह से वे पुस्तक मेले का इंतजार करते हैं। इतना ही नहीं, पर्व-त्योहारों की तरह वे पुस्तक मेले में पुस्तकों की खरीददारी हेतु अपने बजट में विशेष प्रावधान भी रखने लगे हैं। इसे पटना पुस्तक 📚 मेला की एक विशिष्ट उपलब्धि ही कही जाएगी। वास्तव में, मेले के दिनों में यह सम्पूर्ण राष्ट्र में या कम-से-कम बिहार में तो चर्चा का विषय बना ही रहता है।
बच्चे से लेकर युवक, युवतियाँ, महिलाएं, बुद्धिजीवी वर्ग, दूकानदार, व्यवसायी,पेन्टर, बढ़ई– सभी इन दिनों ‘मेला मंच’ हो जाते हैं, दुनियाँ किताबी लगने लगती है। और तो और, चेहरे भी किताबी हो जाते हैं।

पटना पुस्तक मेला को सफल बनाने में प्रोफेसर उत्तम कुमार सिंह के योगदान को कदापि भुलाया नहीं जा सकता। श्री सिंह ने 1991 के पटना पुस्तक 📚 मेला को तो ही सफल बनाया और अब 1992 के पुस्तक मेले को सफल बनाने में व्यस्त हैं। उनके शब्दकोष में ‘असम्भव’ नाम की कोई चीज ही नहीं है। और जब क्विज कार्यक्रम, वाद-विवाद प्रतियोगिता और अन्य समरूप कार्यक्रमों के आयोजन और संचालन की बात होती है तो क्या हम कभी श्री राजीव रंजन एवं सुश्री अनुश्री सरकार का नाम भूल सकते हैं भला ? सांस्कृतिक कार्यक्रमों को सफल बनाने का दायित्व हमने श्री एम०एन० झा (आकाशवाणी गौहाटी) और श्री ब्रह्मानन्द चौधरी (आकाशवाणी इटानगर) को सौंपा था और वे हमारी कसौटी पर बिलकुल खरे उतरे और उन्होंने दर्शक श्रोताओं के भरपूर मनोरंजन का सामान जुटाया।
पटना पुस्तक मेला 1992 की सुनिश्चित सफलता के लिए प्रथम बार किरण प्रकाशन पटना के व्यवस्थापक श्री सत्यनारायण प्रसाद ने 50 हजार उद्घाटन समारोह का आमंत्रण कार्ड देश-विदेश में वितरित किया। साथ-ही-साथ मेला में आनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को पटना पुस्तक मेला निर्देशिका को मुफ्त वितरित किया।
इस वर्ष (1992) मेले में पुस्तकों की अन्य वर्षों की अपेक्षा अधिक खरीद-फरोख्त की आशा है क्योंकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुदान मिल जाने की वजह से शैक्षणिक संस्थानों द्वारा ढेर सारी किताबें खरीदी जाएंगी। विगत वर्षों में तो पुस्तकालयों द्वारा नहीं के बराबर ही खरीदारी की गई थी।
सर्वोपरि, आयोजक राज्य सरकार के आभारी हैं जिसने मुख्यमंत्री की पहल पर हर सम्भव सहायता प्रदान की। आयोजक मुख्यमंत्री तथा विभिन्न विभागीय प्रमुखों के व्यक्तिगत रूप से शुक्रगुजार हैं।

बिहार के पुस्तक-प्रेमियों की यह तमन्ना है कि पटना पुस्तक मेला कई दशकों तक आयोजित होता रहे। हमारी भी यह कोशिश है कि हम आशा और आकांक्षाओं के अनुरूप अपने कार्यकलाप में परिवर्तन लाते रहें। आखिर परिवर्तन ही तो जीवन है।
अगला पटना पुस्तक मेला एक वर्ष के अंतराल के बाद 1994 में आयोजित किया जाएगा। पुस्तक-प्रेमियों के लिए यह एक खुशखबरी है कि 1994 (15 से 26 दिसम्बर 1994) में अथवा किसी अन्य वर्ष में आपका शहर पटना सम्भवतः अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले की मेजबानी करने का गौरव हासिल कर सके बशर्ते अन्तर्राष्ट्रीय प्रकाशक संघ, जेनेवा दिल्ली में अपने वर्तमान 24वें कॉग्रेस के उपरान्त किसी वर्ष अपना अगला कॉग्रेस बिहार की राजधानी में सम्पन्न करने का फैसला कर सके। हम सबों की यही ख्वाहिश है कि पटना का यह पुस्तक मेला अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सदैव चर्चित हों तथा लोकप्रियता एवं सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर बिहार की संस्कृति को गौरवान्वित करें।

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