cultural heritage debate

भारतेन्दु, मालवीय, पराड़कर और द्विवेदी की कद-काठी में भी कटौती: ‘स्मृति शेष’ में विरासत से छेड़छाड़

संस्मरण: माघ कृष्ण 30 घण्टा 25/22 मकर घण्टा 16/41 विक्रम संवत् 2082 : रविवार 18 जनवरी 2026 पटना पुस्तक मेला 1994 अवधि: 14 से 26 दिसम्बर 1994 शुक्रवार 23 दिसम्बर 1994: ‘आज’ पटना पटना, 22 दिसम्बर 1994: *राजकमल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित ‘शिवपूजन सहाय स्मृति शेष’ में की गई उलट-फेर न सिर्फ शिवजी की रचनाओं…


संस्मरण: माघ कृष्ण 30 घण्टा 25/22 मकर घण्टा 16/41

विक्रम संवत् 2082 : रविवार 18 जनवरी 2026

पटना पुस्तक मेला 1994

अवधि: 14 से 26 दिसम्बर 1994

शुक्रवार 23 दिसम्बर 1994: ‘आज’ पटना

पटना, 22 दिसम्बर 1994:

*राजकमल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित ‘शिवपूजन सहाय स्मृति शेष’ में की गई उलट-फेर न सिर्फ शिवजी की रचनाओं एवं उनकी मूल भावनाओं को कतरती है बल्कि कई विभूतियों एवं साहित्य मनीषियों की कद-काठी भी छांट देती है। पण्डित मदन मोहन मालवीय, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबू राव विष्णु पराड़कर आदि कुछ ऐसे ही प्रमुख नाम हैं।

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् से प्रकाशित ‘शिवपूजन रचनावली’ और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित ‘शिवपूजन सहाय स्मृतिशेष’ को सामने रखकर किए गए अध्ययन से सहज ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि रचनावली में शिवजी ने अपने समकालीनों को और श्रेष्ठ विभूतियों को याद करते हुए जिस गहरे भाव और ललक का इजहार किया है, वे ‘स्मृतिशेष’ में शेष है। संक्षेपण का आलम यह है कि रचनावली प्रत्येक अध्याय स्मृति शेष में सारांश बन गया है। इस लीपापोती की कुछ बानगी:-

(क) मानवीय जी पर रचनावली में एक अध्याय है जिसका शीर्षक है ‘पूज्य मालवीय’। लेख का पूरा शीर्षक भी तारांकित है- पूज्य मालवीय जी की कुछ चिरस्मरणीय बातें। अध्याय के अन्त में, साप्ताहिक ‘अभ्युदय’ (प्रयाग) 11 जनवरी 1937 ईस्वी में इस लेख के छपने का हवाला भी दिया गया है जबकि मदन मोहन मालवीय (1861–1946)। मूल लेख के चार पैरे इस पुस्तक में गायब है और उनकी जगह तीन नए पैरे किए गए हैं जो मालवीय जी के शोषण के अंश लगते हैं। मूल पुस्तक से लिए गए पैरे की भी बीच की कई पंक्तियाँ गायब हैं। गायब पैरा और पंक्तियों के साथ ही मालवीय जी के व्यक्तित्व के चित्रण के कई सूक्ष्म पहलू भी लापता हो जाते हैं। इसमें कई महत्त्वपूर्ण तथ्य अंकित हैं। मसलन ‘भारत कला भवन’ की नींव डालने का यश मालवीय जी को ही है। …… परिस्थिति सम्भालने के लिए किसी नेता के आगे बढ़ने का साहस न दिखाया… निवेदन- अनुरोध पर मालवीय जी उठे…..श्री विशुद्धानंद विद्यालय में सनातन धर्म मण्डल की नींव पड़ी। बूढ़ा ‘भारत मित्र’ इसी मण्डल का मुख पत्र बना।


(ख) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के बारे में शिवपूजन रचनावली के पाँच पैरे स्मृति शेष में गायब हैं।‌ उनके बदले ६ नए पैराग्राफ जोड़े गए हैं। मूल लेख के ११वें पारे को ‘स्मृति शेष’ में अन्तिम पारा बनाया गया है। बीच-बीच से कई महत्त्वपूर्ण संदर्भ लापता है।‌ मूल लेख के साथ इस तरह छेड़छाड़ की गई है कि हिन्दी भाषा-भाषी की भावी पीढ़ियों को गौरवान्वित करने वाले शिवजी के आह्वान भी गायब हैं। अध्याय के आरम्भ के दो पैरे जिन्हें ‘स्मृति शेष’ में हटा दिया गया है, यहाँ हू-ब-हू उद्धृत कर देना उचित होगा। ये जगन्नाटक सूत्रधार है। उसने अपने मनोरंजन के लिए यह संसार सभी नाट्यशाला बनाई है। रूपक में कहा जाता है कि पृथ्वी रंगमंच है, जंगल-पहाड़, नदी-समुद्र, घटा-बिजली, इंद्र-धनुष आदि पर्दे के विचित्र चित्र हैं और प्राणी मात्र अभिनेता है। यदि ऐसी बात है तो विश्व रंगमंच पर आज से 50 वर्ष पूर्व एक अपूर्व अभिनेता अवतीर्ण हुआ था- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र वैसा अभिनेता पिछली शताब्दियों के इतिहास में विरले ही मिलेंगे। यह कहीं अतिशयोक्ति नहीं…मासिक विश्वामित्र (कलकत्ता) वर्ष ३, माघ संवत् 1991 वि०।

(ग) पराड़कर जी पर रचनावली में दो लेख संकलित हैं जो क्रमशः साप्ताहिक ‘आज’ विशेषांक (काशी) 23 जनवरी 1955 ईस्वी और मासिक ‘पाटल’ (पटना), वर्ष 3,”अंक 4, जनवरी-फरवरी 1955 से लिए गए हैं। मुख्य शीर्षक है- जन-गण-मन के पारखी पराड़कर जी और उप शीर्षक है – सम्पादक सृष्टा पराड़कर जी। इन दोनों लेखों का एक ‘कैप्सूल’ बनाकर सवा तीन पेज में रख दिया गया है। ‘जन-गण-मन’ के पारखी और ‘सम्पादक स्रृष्टा’ को हटाकर बाबूराव विष्णु पराड़कर(1883–1955) के नाम से ‘स्मृति शेष’ में छपा है। प्रथम लेख के चार पृष्ठ सफाचट है। इसी तरह दूसरे लेख का चार पारा भी गायब है।

आचार्य शिव जी का पराड़कर जी से प्रथम परिचय का वह महत्त्वपूर्ण संदर्भ भी गायब है जिसके बारे में वह स्वयं लिखते हैं- ‘पूज्य (बाबू रावविष्णु) पराड़कर जी के प्रथम दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ था सन् 1924 या 25 ईस्वी में। जहाँ तक स्मरण है लखनऊ के साम्प्रदायिक दंगे से बचकर मैं काशी आया था। मेरे साथ पण्डित शांतिप्रिय द्विवेदी भी थे… काशी पहुँचने पर भाई उग्र जी ने मुझे पराड़कर जी की सेवा में उपस्थित किया…भाई उग्र जी ने उनको मेरा परिचय दिया, तब उन्होंने हंसकर पूछा था- ‘तुम तो शांत स्वभाव के मालूम होते हो। मतवाला के योग्य लेख कैसे लिख लेते थे।’ इसी तरह के अनेकानेक संदर्भ जिनसे शिवजी और पराड़करजी समेत कई शीर्ष साहित्यकारों के जीवं-व्यवहार पर प्रकाश पड़ता है, नदारद है।

(घ) परिषद् की रचनावली में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में शिवपूजन सहाय जी ने 20 पृष्ठों में खुद के लिखे संस्मरण के साथ-साथ अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपे विभिन्न लेखकों के संस्मरण को संकलित किया है। ‘स्मृतिशेष’ में बाँकी सबको छोड़ सिर्फ शिवजी के संस्मरणों के ही कुछ हिस्से जिधर-तिधर से उठाकर 7 पृष्ठों में इकट्ठा कर दिए गए हैं। परिणाम यह कि शिवजी का द्विवेदी जी के प्रति श्रद्धा और अनुराग भाव वाले ऐसे अंश से भी पाठक वंचित रह जाते हैं- ‘मैं केवल एक बार आचार्य द्विवेदी जी के चरणों का स्पर्श कर कृत्य-कृत्य हुआ था- काशी की नागरी प्रचारिणी सभा में आज से लगभग 10 वर्ष पूर्व।…एक धुंधली स्मृति और है। अखिल भारत वर्षीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का छठा अधिवेशन प्रयाग में हुआ था। बाबू श्यामसुन्दर दास जी सभापति थे।सखा भारतेन्दु सखा प्रेमयन जी भी पधारे थे। दूर से ही एक सज्जन ने बतलाया यहीं द्विवेदी जी भी बैठे हैं। बगलबंदी और पंडिताऊ टोपी तथा चमरौंधा पहने, साहित्यिकों के पुरोधा की तरह। यही प्रथम दर्शन एक शब्द साधना बन गया।’ ये कुछ बानगी है। गम्भीरता से पुस्तक का अध्ययन करने पर ऐसे उदाहरण अनगिनत मिलते हैं।


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