हिंदी साहित्य और पुस्तक संस्कृति का संकट: पाठक क्यों घट रहे हैं, लेखक और प्रकाशक क्यों परेशान हैं?
क्षेत्रीय भाषाओं के अपने प्रदेश हैं, उनकी जातीय पहचान भी है। वहां के बाशिंदे अपनी इस पहचान को सहेजकर रखते
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Read Moreपुस्तक मेले कर्मकांड बनते चले जा रहे हैं। मेलों में पुस्तक की अभिरुचि विकसित करने की ओर कम ध्यान दिया
Read Moreउबड़खाबड़ खुरदरे चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी-पारदर्शी आंखों में झांकती चंचलता। चंचलता भी ऐसी जिसमें हर वक्त एक अजीब बेचैनी बुनती
Read Moreपिछले दिनों कन्नड़ लेखक प्रो. उर अनंतमूर्ति को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। इससे पहले हिंदी के एक कवि को ‘दयावती
Read Moreहमारे सबसे अधिक संवेदनात्मक संबंध तो अपने परिवार से हैं, साथियों-मित्रों से हैं, उसके बाद पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों से है,
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