4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

महानदी जैसे नागार्जुन

उबड़खाबड़ खुरदरे चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी-पारदर्शी आंखों में झांकती चंचलता। चंचलता भी ऐसी जिसमें हर वक्त एक अजीब बेचैनी बुनती रहती है।

जर्जर शरीर पर एक के ऊपर एक लदे कपड़ों की परतें। कंधे पर थैला जिसमें कोई एक किताब, डायरी, पैन, ईनोसाल्ट, पोस्टकार्डों का बंडल, छोटा सा ट्रांजिस्टर और नौ सफेद बड़े मोतियों की माला। जब तक घुटनों में दम निरंतर भागता रहा यह व्यक्ति एक जगह से दूसरी जगह। दस दिन यहां तो पंद्रह दिन वहां। मनुष्य से मनुष्य तक की एक अविराम यात्रा पोस्टकार्डों के माध्यम से एक-दूसरे से निरंतर जुड़ता। आज भी अपने गांव की मिट्टी की गर्द, वहां की लहलहाती फसलों के बीच की पगडंडियों, खेत खलिहानों से जुड़े लोगों का दर्द, धूल धूसरित जीवन की मस्ती और रसमयता—यही है गाँव घर के ‘ठक्कन मिसिर’ बैद्यनाथ मिश्र-यात्री और नागार्जुन-

नागार्जुन को सबसे पहले बाबा किसने कहा, पता नहीं। पर उनके शरीर पर जो बुढ़ापा आया है, वह सिर्फ काल का क्रम भर है, नहीं तो मन से वे उतने ही जवान हैं, उनमें उतनी ही ताजगी है, आदमी बने रहने की प्रक्रिया से बराबर जुड़ाव है। हर प्रकार के प्रभामंडल और कृत्रिमता को नोंच कर फेंकने वाले बाबा। चटखारे लेकर खुद पर हँसने वाले, कविता को दुर्लभ कहने वाले बाबा अपनी कविताओं में कितने ही प्रयोग करते हैं। अपनी पीड़ा और जमाने की पीड़ा में कोई फर्क नहीं है बाबा के लिए।

मिथिला का यह ‘यात्री’ एक लंबी यात्रा पर है। कितने ही पड़ावों से गुजरा है और जब-जब जिंदगी में हारने की नौबत आई है उन्होंने कविता आगे कर दी। काठियावाड़, पंजाब, श्रीलंका, तिब्बत और रूस—जितना पढ़ा, जितना जाना उससे आगे जानने की जिज्ञासा। भटकने की भी कोई सीमा होती है, पर बाबा का भटकना महज खुद को बहकाना और छलना नहीं, बल्कि सीखने की एक जीवंत जिज्ञासा रही है। आदमी बनने का सपना रही, इसीलिए बाबा अपने समय के हर सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के साथ खड़े दिखाई दिए हैं। आम जन के आगे उन्हें कोई सत्ता कभी न बाँध पाई। बिना भय के जो मन आया सो कहा। इमरजेंसी के आतंक के दौर में बाबा ने लिखा था, ‘इंदुजी इंदु जी’ क्या हुआ आपको? सत्ता की मस्ती से भूल गई बाप को’

फक्कड़ पन-गुस्सा-फटकार, स्नेह, अपनापन, सादगी, एक अजीब सी बेचैनी और विकलता। यही सब तो है बाबा की कविता। यह कभी समझ नहीं आया कि हिंदी के विश्वविद्यालयी आलोचक क्यों उन्हें शुद्ध साहित्य को खोजने से लगे हैं? विचारधारा की कसौटियाँ क्यों कम रहे हैं? गोपाल कृष्ण कौल ने साहिबाबाद के प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में कहा था कि बाबा को किसी कविता आंदोलन की जरूरत नहीं हैं, वे स्वयं एक आंदोलन हैं।

जब निम्न मध्यवर्ग किसानों-मजदूरों के बीच जन्म लेने वाले कवि पैदा होंगे तब विद्वान आलोचकों को फिर लोकप्रिय साहित्य और कविता के कला पक्ष की चिंता सताएगी। साहित्य और राजनीति के अंतरसंबंधों की तरह-तरह से व्याख्या होगी, लेकिन एक बात साफ है बाबा की कविता उन सब उत्पीड़ितों की प्रेरक शामिल होंगे।

दिल्ली के प्यारे लाल भवन में गोष्ठी हो रही है। बाबा अध्यक्षता कर रहे हैं। अपने-अपने पर्चों से तर्कों के तीर निकाल कर मित्रों ने क्रांति की तैयारी कर ली है और बुर्जुआ लोगों की श्रेणी में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से लेकर नामवर सिंह को खड़ा कर दिया गया है। अंग्रेजी, रूसी और फ्रांसीसी साहित्य और कार्ल मार्क्स से हर विद्वान अपने-अपने तर्कों की अपने-अपने ढंग से पुष्टि कराने में जुटा है। बाबा के मन की विकलता चेहरे पर उभर आई है लेकिन किसको फिक्र थी-उनकी। अपनी-अपनी साहित्यिक चौधराहट का सिक्का जमाने के लिए लोग बिफरे पड़े थे। बीच-बीच में बाबा ने एक-दूसरे को झिड़का और अनंत चलने वाली इस गाल बजाऊ गोष्ठी को किसी तरह सिकोड़ा। अध्यक्षीय वक्तव्य देने के वक्त तक उन्हें दमा उखड़ आया और अब याद नहीं कि एक शब्द में कुछ कहा था। उठकर चल दिये थे: मेरे पास आकर कहा चलो घर चलो घर चल रहे हैं!

अब घर में बाबा की बातचीत का विषय दादी पर आ गया है यानी की पत्नी अपराजिता देवी—बाबा उनकी महानता और अपनी स्वघोषित मूर्खताएं बता रहे हैं कि उनकी वजह से क्या-क्या नहीं सहा दादी ने। बाबा बीच-बीच में खिलखिला कर दांत निपोर रहे हैं! अपने विषाद को कम करने का बाबा का यह नितांत अपना ही तरीका है जो एक उत्सव का रूप ले जाती है। जब-जब भी बाबा घर आए हैं उत्सव का ही माहौल रहा है। खाते हैं थोड़ा सा और शोर दुनिया भर था। सरला, दो चम्मच छैना दो—गाजर की सब्जी—हाँ आज उड़द की दाल के पकौड़े—
खाना खाते वक्त अक्सर उन्हें अपने मित्र कवि त्रिलोचन का जिक्र करते सुना है आत्मीयता और निजता का एक-दूसरा ही रूप।
15 या 16 फरवरी सन् 1987 रहा होगा। त्रिवेणी में एक गोष्ठी थी। पहुँचते ही बाबा का अल्टीमेटम मिला-‘गोष्ठी के बाद तुम मुझे किडनैप कर लेना? मैं जब उनको स्कूटर में लेकर घर चला तो रास्ते भर स्कूटर वाले से बतियाते रहे। रास्ते में उतर कर लड्डू और संतरे खरीदे। घर पहुँच कर सीधे रसोई में मेरी पत्नी सरला के पास जा पहुँचे। बाव रसोई के दरवाजे में बोरी बिछाकर वहीं बहुत देर बैठे दिवंगत अम्मा के बारे में बतियाते रहे। मिनी चार-पाँच महीने की थी। मिनी को आँखें गड़ा कर देखते सरला को पुकारा-‘सरला यही बहिन जी हैं तेरी सास। ये लड्डू मोहल्ले में बांट दो जिससे सबको पता चल जाए तेरा बाबा आया है’ अध्यापकों का मोहल्ला था और बाबा की कविता दसवीं के कोर्स में। हजूम लग गया बाबा को देखने वालों का। बाबा कुछ देर तक तो शिष्टाचार वश बातें करते फिर आंखें बंद कर लेट जाते उनके जाने के बाद मुझ पर झुंझलाते—मैं क्या करूं लड्डू तो तुमने ही बंटवाए हैं!

इसी बीच बेचारे एक मिडिल स्कूल के हेडमास्टर सरदार सिंह अपार श्रद्धा के साथ कवि नागार्जुन के दर्शन के लिए आए-उनके साथ एक-दूसरे अध्यापक भी थे। शिष्टाचार तक तो ठीक था-बेचारे सरदार सिंह को क्या पता था कि कवि किस मूड में हैं उन्होंने गलती से कविता सुनाने का आग्रह कर दिया। बाबा बिगड़ गया-‘कविता ऐसे सुनाई जाती है कविता दुर्लभ होती है।’ और मुंह ढक सो गए। उसी शाम सरला और मुझे सामने बिठा कर काफी देर तक बहुत सी कविताएँ सुनाई थी।

लेखक – प्रदीप मांडव