अच्छी किताब से बढ़ कर कुछ नहीं
हमारे सबसे अधिक संवेदनात्मक संबंध तो अपने परिवार से हैं, साथियों-मित्रों से हैं, उसके बाद पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों से है, पर यदि जीवन-विहीन वस्तुओं की बात कहें तो जितना गहरा, प्यारा और सार्थक संबंध पुस्तकों से हो सकता है, उतना किसी अन्य वस्तु से नहीं। पुस्तकें भी ‘जीवन विहीन वस्तु’ केवल भौतिक विज्ञान की दृष्टि से हैं। सच्चाई यह है कि जीवन-विहीन होते हुए भी पुस्तकें कितने रंग-बिरंगे और ओजपूर्ण जीवन से भरी हुई हैं। उनमें कविता का रस है और दिल की ऐसी जगह छूने की क्षमता है जिस जगह का हमें कविता पढ़ने से पहले एहसास ही नहीं था। उनमें कहानी की वह तीखी चिकोटी है जो जीवन के ऐसे अनजाने पक्षों, ऐसी संवेदनाओं के प्रति हमें अचानक जगाती है जिनके प्रति हम अभी तक उदासीन थे। उनमें उपन्यास की वह निरंतरता है। वह अपनापन है, जो हमें ऐसे पात्रों के पास ले जाते हैं, उनके ऐसे अनुभवों से हमें गुजारते हैं कि वे पात्र हमारे लिए बिल्कुल सजीव हो उठते हैं, अपने बन जाते हैं।
पुस्तकों की जिल्द में वे प्रेरणादायक जीवनियां सुरक्षित हैं जो हमारे अपने जीवन को बदल सकती हैं और नई ऊंचाइयां छूने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। उनमें वह दर्शन है जिसमें गोता लगाकर हम जीवन की ऐसी गहराइयों को छू सकते हैं जिन तक पहुंचने के बाद ही पता चलता है कि हम अब तक कितना सतही जीवन जी रहे थे। उनमें वह ज्ञान-विज्ञान है, जो हमारे लिए दुनिया के नए दरवाजे खोलता है और दैनिक जीवन की अनेक समस्याओं को नियंत्रित करने में सहायक होता है।
कुछ लोग कहेंगे कि पुस्तकों का इतना महिमागान मत कीजिए, यह जमाना तो टेलीविजन और फिल्मों का है। इन दिनों तो सब इन्हीं माध्यमों के दीवाने हो रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि जो बात पुस्तकों में है वह टीवी में कहां! कितनी ही बार टीवी पर कोई अच्छा कार्यक्रम देखते हुए भी ऊल-जुलूल विज्ञापनों से हम खीझ उठते हैं। कितनी ही बार कोई टीवी कार्यक्रम केवल आदतन देखने के बाद हम यह कहते हुए उठते हैं कि यों ही इतना समय व्यर्थ गंवाया। चूंकि टीवी अपने दर्शक की ओर से कोई प्रयास नहीं मांगता है, अतः टीवी देखने की आदत के लत बनने में और हमें निठल्लेपन की ओर धकेलने में देर नहीं लगती। साथ ही कुछ पता नहीं कि अब विज्ञापन के बहाने या किसी कार्यक्रम में ही, टीवी हमें ऐसी बेहद आपत्तिजनक चीज दिखा देगा जो हमें एक थप्पड़ की तरह लगेगी या बच्चों पर बहुत बुरा असर डालेगी। दूसरी ओर पुस्तकों को हम सावधानी से चुन सकते हैं और किसी टीवी चैनल की कृपा का इंतजार किए बिना जब चाहें टैगोर और जब चाहें प्रेमचंद जैसे लेखकों के लेखन का आनंद ले सकते हैं।
टीवी हर पात्र को, अनेक प्रत्येक हाव-भाव को साफ-साफ दिखा देता है, उसमें हमारी कल्पना के लिए भला बचता ही क्या है? दूसरी ओर पुस्तकें पात्रों से हमारा अपनापन तो स्थापित करती है, पर साथ ही बहुत हमारी कल्पना के लिए भी छोड़ देती हैं। अपनी कल्पना के ताने-बाने बुनते हुए हम इन पात्रों के और नजदीक आ जाते हैं।
आज भी बेहद स्वार्थी होती जाती दुनिया में किताबों जैसा मेहरबान मित्र कहां मिलेगा। किताबें हमें देती बहुत कुछ हैं, पर हमसे मांगती कुछ नहीं हैं, टीवी की तरह बिजली, बैटरी, कैसेट या केबल-आपरेटर किसी की जरूरत नहीं, कहीं भी कमरे में आंगन में या पार्क में हम किताबों की दुनिया में खो सकते हैं। किताबें टीवी की तरह चीखेंगी-चिल्लाएंगी नहीं, वे आपको टोकेंगी, रोकेंगी नहीं।
हमारे जीवन में पुस्तकों की इतने महत्वपूर्ण और वफादार मित्र की भूमिका हो सकती है, पर इसके साथ ही यह स्वीकार करना भी जरूरी है कि आज किताबों की दुनिया भी बेहद प्रदूषित हो चुकी है। अगर हम अपने आसपास पढ़ी जा रही किताबों पर एक नजर डालें तो पता चलेगा कि कुंजीनुमा अधकचरा ज्ञान देने वाली पुस्तकें, अश्लील और क्षणिक उत्तेजना वाली पुस्तकें, घटिया रोमांस, मार-धाड़ और जासूसी की पुस्तकें ही अधिक छाई हुई हैं। इनमें से बहुत सी पुस्तकें ऐसी हैं जिनकी आंखों को थकाने, भ्रमित करने या परेशान करने वाली उत्तेजना पैदा करने के अतिरिक्त और कोई भूमिका नहीं है। सबसे अधिक दुख की बात तो यह है कि पैसे की अंधी दौड़ में अब कुछ बड़े मशहूर लेखक भी अश्लीलता से परहेज नहीं करते। इस सबके कारण पुस्तक का अपमान भी हो रहा है। पुस्तक जगत की सार्थकता इसी में है कि अधिक से अधिक उपयोगी, मार्गदर्शक और स्वस्थ मनोरंजन वाली पुस्तकें जनसाधारण तक पहुँचे और पुस्तकों की बेहतर समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहे।
समाज की समस्याएं बढ़ रही हैं, पेचीदा हो रही हैं, इसलिए पुस्तकों की बढ़ती उपयोगिता के बारे में तो सवाल ही नहीं है। साक्षरता कार्यक्रम के फैलने से नव-साक्षर साहित्य की भी बहुत जरूरत है। पर लेकिन विडंबना यह है कि पुस्तकों की बेहद उपयोगी भूमिका की संभावना को पुस्तक लेखन, प्रकाशन और वितरण से जुड़े लोग पूरी तरह सार्थक नहीं कर पा रहे हैं। पुस्तक प्रकाशन और वितरण की अनेक समस्याएं हैं जैसे कागज का महंगा होना, डाक समय पर न मिलना, खरीदी गई पुस्तकों का मूल्य चुकाने में देर होना आदि। इन समस्याओं को कैसे दूर किया जाए, इस पर भी ध्यान देना जरूरी है। ऐसी ही कोशिश इस दिशा में भी होनी चाहिए कि जो पुस्तकें छप और बंट रही हैं, उनकी सार्थकता और उपयोगिता बढ़ती रहे।
शुद्ध मनोरंजन के लिए पुस्तकें लिखना भी अच्छी बात है, हंसना-गुदगुदाना भी जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है, पर इस बात का ध्यान रखना होगा कि यह मनोरंजन घटियापन और अश्लीलता तक न उतरे और किसी धर्म, जाति, लिंग या किसी समुदाय विशेष का मजाक न उड़ाए, उन्हें जाने-अनजाने चोट न पहुँचाए। इससे भी अधिक जरूरत उन पुस्तकों की है जो सामाजिक बदलाव के इस नाजुक दौर में एक सार्थक भूमिका निभा सकें। वे पुस्तकें, जो शोषित और कमजोर वर्गों की समस्याओं के साथ हमें जोड़ें, जो पर्यावरण और आजीविका बचाने के संघर्षों के नजदीक हमें ले जाएं, जो विशेषकर उन महान व्यक्तियों के विचार सरल भाषा में लोगों तक पहुँचाएं जो आज बहुत प्रासंगिक हैं, जो हर तरह की हिंसा का विरोध करें जो बच्चों और युवाओं को एक नई और बेहतर दुनिया का संदेश दे, मानवीय संबंधों को बेहतर बनाएं और हमारी संवेदनाओं को आसपास बिखरे दुख-दर्द के प्रति सचेत करें। ऐसी पुस्तकों की आज सबसे अधिक जरूरत है।
कुछ समय पहले हमने एक प्रयोग किया कि कम लागत के बस्ती या गांव स्तर के पुस्तकालय स्थापित करने के लिए एक हजार रुपए में सौ पुस्तकों का सेट उपलब्ध कराया जाए। इस सेट में श्रेष्ठ लेखकों और प्रकाशकों के उपन्यास, कहानी, कविता, जीवनी, निबंध, ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकें, बाल-साहित्य, नवसाक्षर साहित्य सभी जगह की पुस्तकों की उपलब्धि हो। पुस्तकें विभिन्न प्रकाशकों से श्रेष्ठता और कम कीमत के आधार पर चुनी जाएं और जिन महत्वपूर्ण विषयों पर ऐसी पुस्तकें न मिल रही हों तो स्वयं उन विषयों पर पुस्तिकाएं प्रकाशित कर सेट में रखी जाएं। विभिन्न प्रकाशकों के श्रेष्ठ प्रकाशनों को एकत्र करते हुए एक हजार रुपए के बजट में सौ पुस्तकों का सेट हम आसानी से तैयार कर सके और इसे अनेक छोटे स्तर के पुस्तकालयों के लिए उपलब्ध करा सके।
दूसरा प्रयोग हम यह कर रहे हैं कि बच्चों के लिए श्रेष्ठ प्रकाशकों और लेखकों की लगभग 15 पुस्तकों का ऐसा सेट तैयार कर सकें जो मात्र एक सौ रुपए में उपलब्ध हो। हमने अनेक स्कूलों में देखा कि पुरस्कार, प्रोत्साहन आदि के नाम पर जो पुस्तकें बच्चों को दी जा रही हैं उनमें ज्यादातर घटिया किस्म की पुस्तकें होती हैं। अतः सौ रुपए में लगभग 15 पुस्तकों का यह सेट तैयार करने का प्रयास हमने किया।
सांप्रदायिकता के सबसे तीखे दौर में हमारी सांप्रदायिकता विरोधी पुस्तिकाओं और पोस्टरों को जितनी सफलता मिली, वह हमारी अपनी उम्मीदों से भी कहीं अधिक थी। न केवल इन्हें हजारों की संख्या में खरीदा बांटा गया, अपितु कई व्यक्ति और संस्थाएं अनेक लेजर प्रिंट ले गए ताकि इन्हें अपने क्षेत्र में प्रकाशित कर और बड़ी संख्या में वितरित कर सकें।
अनेक कठिनाइयों के बावजूद इस तरह के अनुभवों से लगता है कि सार्थक साहित्य की इस समय ज्यादा मांग है विशेषकर उन जगहों पर जहाँ कुछ सामाजिक संस्थाएं एक बेहतर समाज के लिए प्रयासरत हैं, वे सामयिक विषयों पर सस्ती और सरल भाषा में लिखी पुस्तकों-पुस्तिकाओं की जरूरत महसूस करते हैं। इसमें एक ध्यान इस बात का रखना जरूरी है कि किसी तरह के विदेशी या सरकारी गैर सरकारी अनुदान के बिना ही यह काम किया जाए क्योंकि तभी दीर्घकालीन स्तर पर इस कार्य की पवित्रता बची रहती है और पाठकों की वास्तविक साझेदारी प्राप्त करने का दबाव भी उन पर बना रहता है। सार्थक साहित्य उपलब्ध कराने के कार्य में कई चुनौतियां हैं, पर बहुत संभावनाएं भी हैं। अच्छी पुस्तकों को दूर-दूर के गांवों बस्तियों में पहुँचाकर जो सुख मिलता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।




