समय से जुड़े समय से परे परसाई
परसाई अविवाहित रहे। कम लोग जानते हैं कि वे अविवाहित क्यों रहे। उन्होंने मुझे बताया था—मेरे पिता जंगल के ठेका लेते थे। हम संपन्न नहीं थे, गरीब भी नहीं थे। पिता रोब-दाब से रहते थे। हाई स्कूल पास किया ही था कि पिताजी की मृत्यु हो गई। भाई-बहन छोटे थे। परिवार चलाने के लिए स्कूल मास्टरी की। सोचा कि बहन की शादी हो जाएगी तो देखेंगे। बहन की शादी कर दी। कुछ वर्षों बाद ही बहन विधवा हो गई। वह कहाँ रहे, किसके साथ? उसके छोटे-छोटे बच्चे थे। सोचा छोटे-छोटे भानजे-भानजी किसी लायक हो जाएं तो देखेंगे। जब भानजे-भानजी किसी लायक हुए तो अपनी उम्र विवाह की नहीं रह गई।
हिंदी के अप्रतिम व्यंगकार हरिशंकर परसाई जब यह बता रहे थे तो मैं सोच रहा था, परसाई का अपना जीवन भी यातना-गर्भित व्यंग्य है।
विवाह नहीं हुआ तो पुत्र कहाँ? परसाई ने एक निबंध ‘पहला सफेद बाल’ में लिखा-‘अपना कोई पुत्र नहीं। होता तो मुश्किल में पड़ जाते। क्या देते? —तो इतना रंक नहीं हूँ-विराट भविष्य तो है। और उत्तराधिकारी की समस्या भी हल हो गई। पुत्र तो पीढ़ियों के होते हैं। केवल जन्मदाता किसी का पिता नहीं होता। विराट भविष्य को एक पुत्र ले भी कैसे सकता है —मेरी पीढ़ी के समस्त प्रभो। मैं तुम्हें यह भविष्य देता हूँ। होने दो हमारे बाल सफेद। हम काम में तो लगे हैं-जानते हैं कि काम बंद करने और मरने का क्षण एक ही होता है।’
व्यंग्य नाम से हम जिस विधा या शैली से परिचित थे यह उससे भिन्न हैं। परसाई ने व्यंग्य को स्वातंत्र्योत्तर भारत के हिन्दी साहित्य की गंभीर और शायद केंद्रीय विधा बनाया।
उनका लेखन इतिहास-बिद्ध है। वे स्वातंत्र्योत्तर भारत की स्थितियों के रचनाकार हैं। काल-बिद्ध हुए बिना कोई रचना कालजयी नहीं होती। परसाई के व्यंग्य का आधारसूत्र केवल वैयक्तिक रुचि या शैली नहीं। उसका आधार युगीन अर्थात स्वातंत्र्योत्तर भारत का विषम एवं विसंगत यथार्थ है। व्यंग्य जो युगीन कुरूपता की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है, रोग की पहचान कराता है कि उसका निदान हो सके। परसाई का प्रतिबद्ध व्यंग्य उन स्थितियों से हमें युद्ध करने के लिए उनका चित्रण करता है। परसाई के व्यंग्य-निबंधों को अलग-अलग पढ़ने पर एक विशिष्ट प्रभाव होता है किन्तु उन्हें एक साथ पढ़िए तो वे महाकाव्यात्मक युग-गाथा का प्रभाव पैदा करते हैं। इस महाकाव्यात्मक युग-गाथा का नायक निम्नवर्गीय व्यक्ति है। उसकी रोजमर्रा की मामूली जिंदगी-सारी वीरनायकौचित मिथकीय गरिमा से रहित-अनगणित लोगों की मामूली जिंदगियों की एक दूसरे से उलझी-अंतस्सूत्रित घटमानता इस महागाथा का कथानक है। वर्तमान में जो घटित हो रहा है-उसकी समझ एवं संवेदना परसाई के व्यंग्य की भूमि है। उनके व्यंग्य की संवेदना निम्नवर्गीय अंतर्संबंधित और समावेशी है। इसीलिए उनके व्यंग्य में अभूतपूर्व व्यापकता है।
उन्होंने लगभग तीन दशकों तक देश-विदेश की हर महत्वपूर्ण घटना पर लिखा। पता नहीं कितने राजनैतिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक व्यक्तित्वों पर संस्मरण, टिप्पणियां लिखीं। कहानियाँ लिखीं, पत्रिकाओं के नियमित स्तंभ लिखे। हिंदी के सर्वाधिक पठनीय गद्य लेखकों में गणनीय हुए। लेकिन इससे बड़ी उपलब्धि थी-किसी राजनेता, सेठ, नवकुबेर के अलंकार नहीं बने। जिस निम्नवर्गीय जनता के पक्ष में लिखा उसी जैसे रहे। जो रंगीन समृद्ध पत्रिकाएं परसाई के लेखों की आतुरता पूर्वक मांग करती थीं उनमें वे जब चाहते तब नौकरी पा लेते-अगर व्यंग्य के तीरों का निशाना बदल देते। फरमाइशी लेखन करने लगते। पर परसाई के लेखन की लोकप्रियता ही थी कि स्वतंत्र लेखन के बूते पर वे अपना और लंबे अर्से तक अपनी बहन के परिवार का खर्चा चलाते रहे। परसाई अपने एक भाई को भी हर महीने कुछ न कुछ भेजते थे। वैयक्तिक जीवन में परसाई में श्रमिक-लेखक का वह पारंपरिक स्वाभिमान है जिसके प्रतीक कबीर हैं-ताना-बाना चलाकर भक्ति और कविता करने वाले हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्यकार कबीर। परसाई का तेवर यह है-
“अपनी बात कहूँ तो यह कि 18 साल की उम्र से काम कर रहा हूँ। जंगल विभाग से नौकरी शुरू की। बाद में कई साल अध्यापकी की। अध्यापकी छोड़ी तो नियमित लिखता रहा। मैं औसत आदमी से ड्योढ़ा काम करता हूँ। औसत आदमी अगर 8 घंटे काम करता है तो मैं 14 घंटे काम करता हूँ। आसन-भंग आदमी नहीं हूँ। आसन से मत डोल रे तोहे पिया मिलेंगे। कहानी, निबंध, उपन्यास के सिवा मैं हर हफ्ते कालम लिखता हूँ-जी हाँ, 3 कालम। ये व्यंग्य के कालम होते हैं और व्यंग्य रचनात्मक लेखन होता है। बलात्कार, चोरी और अपहरण की रिपोर्टिंग नहीं होता। न कभी भूखा रहा न फटे कपड़े धारण किए।”
आत्मदया से रहित, काम भर का जो मिल जाए उसमें संतोष—यह कबीर, तुलसी, निराला, प्रेमचंद का जथा लाभ संतोष है। रूखी-सूखी में मगन, अपने समय की शोषक सत्ता को ठेंगा दिखाना-यह रचनाकार का तेवर है। वर्ग विभक्त, विषम समाज-व्यवस्था में मानवतावादी सर्जन में व्यंग्य अनिवार्यतः मौजूद होता है। घटिया लेखक चिपटी नाक और तोंद की हंसी उड़ाते हैं। सार्थक रचनाकार सामाजिक कुरूपता पर प्रहार करता है। कुरूपता का बोध इतिहास बोध से निर्णीत होता है। इतिहास बोध वर्तमानता में निहित होता है।
परसाई की रचनाएं व्यंग्य के माध्यम से नए सौंदर्य-बोध की प्रतिष्ठा करती हैं। परसाई के लेखन की नैतिकता अनावश्यक-रहितता या अपरिग्रह पर आधारित है। स्वातंत्र्योत्तर भारत में बढ़ोत्तरी (ग्रोथ) और विकास में फर्क करने से नैतिकता का यह रूप समझ में आता है। विकास सर्वांगीण होता है। बढ़ोत्तरी अगर एक ही अंग की या कुछ ही अंगों की हो तो आकार या ढांचा दानवाकार-कुरूप हो जाएगा। एक ही घटक (या वर्ग) की बढ़ोत्तरी स्वास्थ्य नहीं, कसर का लक्षण है। प्रसिद्ध सौंदर्यशास्त्री वाल्टरपेटर ने बताया कि सौंदर्य का लक्षण अतिरिक्त (सरप्लस) को छांटते रहना है। अतिरिक्त अथवा अनावश्यक के रहते कोई समाज या व्यक्ति नैतिक एवं सुंदर नहीं हो सकता। आवश्यक और अनावश्यक का निर्णय इतिहास बोध और सामाजिक यथार्थ करता है। अहंकार भी मन का अतिरिक्त है, जो हास्यास्पद आचरण में दिखलाई पड़ता है।
परसाई के व्यंग्य का लक्ष्य यही अनावश्यक है। अतिशय विनम्रता छद्म है, अनावश्यक उत्तेजना कुरूप है। यह अनावश्यक आचरण में हास्यास्पद, कुरूप और भोंड़ा होता है। परसाई मनोविकारों और आचरण के अनावश्यक को व्यंग्य के वसूले से छोलते, काटते हैं, वे एक आदर्श, सुंदर नैतिक व्यक्ति को गढ़ते हैं। यही उनके व्यंग्य लेखन की कालविद्धता है। यही कालविद्धता उन्हें कालजयी बनाएगी।
परसाई 73 वर्ष के लगते ही नहीं थे। वे पढ़ने पर और मिलने पर युवा लगते थे। शारीरिक अक्षमता के बावजूद। उनका जाना इसीलिए आकस्मिक दुर्घटना जैसा लगता है।
लेखक – विश्वनाथ त्रिपाठी



