4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

पुरस्कारों की भीड़ में उपेक्षित रचनाकार

पिछले दिनों कन्नड़ लेखक प्रो. उर अनंतमूर्ति को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। इससे पहले हिंदी के एक कवि को ‘दयावती मोदी सम्मान’ मिला है। साहित्य अकादमी का वार्षिक पुरस्कार भी भारत की विभिन्न भाषाओं के लेखकों को मिला। इसके अलावा बिड़ला संस्थान द्वारा ‘सरस्वती सम्मान’ और ‘व्यास सम्मान’ जैसे पुरस्कार हैं, ज्ञानपीठ द्वारा हिंदी लेखकों को ‘मूर्ति देवी पुरस्कार’ भी मिलता है। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, मध्यप्रदेश कला परिषद, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद और राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली और अन्य राज्य अपने लेखकों को कुछ उनकी समग्र सेवा के लिए और कुछ विशेष कृतियों पर प्रतिवर्ष पुरस्कृत करते हैं। भारत सरकार के अनेक मंत्रालय भी अपने मंत्रालय के विषयों पर हिंदी में लिखी पुस्तकों पर पुरस्कार देते हैं। यह सब सुनकर ऐसा लगता है कि कवियों और लेखकों का स्वर्णकाल आ गया है और शायद ही कोई कवि या लेखक बचता होगा, जिसे सम्मानित और पुरस्कृत न किया गया हो।

हठात हमारा ध्यान समाचारपत्रों की उन सुर्खियों में जाता है जिसमें कहा गया है कि मेरठ में एक वयोवृद्ध उर्दू शायर को मानव संसाधन विकास मंत्री ने दस हजार रुपए का अनुदान दिया है। श्री हफीजुर्हमान आज भी शायरी करते हैं और उनकी शायरी पसंद की जाती है। ऐसा नहीं है कि बीस वर्ष से उन्होंने एक लाइन न लिखी हो, लेकिन रायल्टी के बदल पर चैन की जिंदगी जी रहे हैं। जिस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री उर्दू के विकास के लिए हजारों उर्दू अध्यापकों की नियुक्ति किए जा रहे हैं, उस समय ऐसे उर्दू कवि की विपन्नता पर उन्हें दया क्यों नहीं आई? उन्होंने हाल ही में हरिवंश राय बच्चन, उनके पुत्र और उनकी पुत्रवधू को एक-एक लाख रुपए के यश भारती पुरस्कार से सम्मानित किया था, जबकि सही बात यह है कि बच्चन परिवार में एक लाख रुपए की कीमत एक कौड़ी से अधिक की नहीं होगी।

एक समय था जब भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय राज्य सरकारों के सहयोग से विपन्न लेखकों की सहायता के लिए पेंशन दिया करती थी। बाद में राज्यों की उपेक्षा से वह बंद हो गई। हमें ज्ञात है कि उत्तर प्रदेश में राज्यपाल के एक फंड से हिंदी-उर्दू लेखकों को पेंशन दी जाती थी। पहले जिन लोगों को पेंशन मिलती थी, उन्हें डेढ़ सौ या सौ रुपए मासिक मिल जाते थे। बाद में जैसे समय बढ़ता गया, पेंशन राशि कम होती गई। हुआ यह होगा कि राज्यपाल को दी जाने वाली मद में परिवर्तन नहीं किया गया और जिनको पैसा दिया जाना था उनकी सूची लंबी होती गई, इसलिए हरेक का हिस्सा कटता गया। मथुरा में एक विद्वान थे, उन्होंने प्राचीन इतिहास की शोध की थी-बालमुकुंद शास्त्री। पहले उन्हें सौ रुपए मिले और बाद में पच्चीस रुपए हो गए थे। उस पर तुर्रा यह था कि पच्चीस रुपए का चैक आता था, जो लखनऊ का होता था और मथुरा में बैंक उस चैक का भुगतान सर्विस चार्ज काटकर कर देता था।

जी पी श्रीवास्तव हिंदी के अत्यंत लोकप्रिय हास्य लेखक हुए हैं। 1976 की बात है कि एक समाचारपत्र में उनकी बीमारी का समाचार पढ़ा और यह भी पाया कि उनकी चिकित्सा का कोई प्रबंध नहीं है। मैंने इस संबंध में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को 14 मई, 1976 को एक पत्र लिखा, जिसके जवाब में उनके निजी सचिव का पत्र आया, जो इस प्रकार था- ‘प्रसिद्ध लेखक जीपी श्रीवास्तव को आर्थिक सहायता दिए जाने के विषय में आपका 14 मई, 1976 का पत्र मुख्यमंत्री जी को प्राप्त हुआ, धन्यवाद। उन्हें श्री श्रीवास्तव की बीमारी की सूचना पहले ही मिल गई है और उन्होंने अपने कोष से 1500 रुपए की सहायता स्वीकार कर दी है। यह धनराशि उन्हें भेजने की व्यवस्था की जा रही है।’
श्रीवास्तव जी गिर पड़े थे, जिससे कमर में चोट आ गई और उन्हें बिस्तर पर रहना पड़ा।

जब मैंने मुख्यमंत्री की सहायता की सूचना उनके पास भेजी, तो 26 मई, 1976 को उनके भांजे श्री निर्मल कुमार सिन्हा का जो उत्तर आया था, उसका अंश इस प्रकार है- ‘यहाँ अस्पताल का कोई डॉक्टर नहीं देखने आता शायद छुट्टी नहीं मिलती, डा. शांति प्रकाश ही आकर देख जाते हैं। डा. शांति प्रकाश हिंदी लेखक श्री भगवतीचरण वर्मा के दामाद हैं। जबसे मामाजी बीमार पड़े हैं तब से वही देखभाल करते हैं। संसद सदस्य त्रिवेणी सहाय ने मामाजी के बारे में माननीय स्वास्थ्यमंत्री जी से बात की थी तब स्वास्थ्य सचिव के कहने से गोंडा के सीएमओ आकर देख गए थे। उसके बाद डिप्टी सीएमओ श्री शर्मा भी आए थे। इसके पश्चात करीब छह माह हो गए कोई भी सरकारी डॉक्टर देखने नहीं आया है और डा. शांति प्रकाश का ही इलाज चल रहा है।’

‘शासन की तरफ से अभी तक कोई हाल-चाल लेने नहीं आया। आपके आदेशानुसार मैं मुख्यमंत्री महोदय से संपर्क स्थापित करने का प्रयत्न कर रहा हूँ। वैसे मैंने प्रधानमंत्री महोदय को एक प्रार्थनापत्र डाला था। उनके सचिव से ज्ञात हुआ कि मामाजी का पत्र उचित कार्यवाही हेतु उत्तर प्रदेश शासन को अग्रसारित कर दिया गया, पर उस प्रार्थनापत्र पर क्या कार्रवाई हुई, यह आज तक न ज्ञात हो सका।’
आजकल मामाजी की हालत काफी चिंताजनक है। मामाजी काफी निराश हो चुके हैं। उनका कहना है कि शासन शायद मेरे मरने के बाद चेते क्योंकि मुझ बूढ़े और बेकार के पास अब रखा ही क्या है, न लिख सकता हूँ न सोच सकता हूँ। उनकी बहकी-बहकी बातें सुनकर मन काफी भारी हो जाता है।’

श्रीवास्तव जी की शंका सही निकली। कोई भी व्यक्ति वह चैक या ड्राफ्ट लेकर नहीं पहुँचा। जब उनका देहांत हो गया तो अनेक मंत्रियों ने वहाँ जाकर घोषणा की अमुक स्कूल का नाम जीपी श्रीवास्तव स्कूल कर दिया गया है, अमुक सड़क का नाम जी पी श्रीवास्तव मार्ग कर दिया गया है।

हाल ही में कानपुर के ‘शील’ जी की मृत्यु का समाचार आया था। वे प्रसिद्ध गीतकार थे। अखबारों में छपा था कि उनके अंतिम दिन बड़े आर्थिक कष्ट में बीते, तब किसी ने सुध नहीं ली। पिछले दिनों ही एक अखबार में एक लेख छपा था, जिसमें कहा गया था कि श्री विष्णु प्रभाकर अपने प्रकाशकों से रायल्टी का हिसाब मांगते हैं, तो रुपया तो दूर उत्तर तक नहीं मिलता। वे प्रसिद्ध लेखक हैं और दिल्ली में बैठे हैं, तब यह हाल है। बड़े-बड़े लेखक भी इस कष्ट से मुक्त नहीं हैं। मैथिलीशरण गुप्त अपने समय के सबसे सफल लेखक थे, उनकी किताबें कोर्स में लगीं, खूब बिकी और वे स्वयं राज्यसभा के सदस्य हुए, पद्मभूषण हुए पर उनकी मृत्यु के बाद परिवार में संपत्ति के अधिकार को लेकर विवाद हो गया, किताबें छपनी बंद हो गईं। उनकी पौत्री के विवाह की समस्या कठिन हो गई, तो उनकी पत्नी श्रीमती सरयू देवी ने इंदिरा गांधी को एक पत्र भेजा, जिसके उत्तर में इंदिरा जी ने उन्हें पाँच हजार का ड्राफ्ट भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा था- ‘मुझे यह जानकर बहुत दुख हुआ कि स्वर्गीय श्री मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखी पुस्तकों की रायल्टी पर परिवार में आपस में तनाव हो गया जिसके कारण आपको परेशानियों का सामना करना पड़ा। स्वर्गीय मैथिलीशरण गुप्त ने अपने साहित्य साधना से देश की बड़ी सेवा की है। स्वतंत्रता संग्राम में भी उनका योगदान सराहनीय रहा है। आपकी कठिनाइयों से मेरी पूर्ण सहानुभूति है। मैं आपकी तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पाँच हजार रुपए का चैक भेज रही हूँ। आपकी कठिनाइयों और अन्य समस्याओं के बारे में उत्तर प्रदेश सरकार को लिख रही हूँ।’
श्रीमती गाँधी के आदेश पर उत्तर प्रदेश सरकार का एक अधिकारी चिरगांव गया और वहाँ प्रस्तावित फार्म पर श्रीमती सरयू देवी के हस्ताक्षर कराकर उनकी पेंशन बांध दी गई। यह इसलिए संभव हो सका कि गुप्त जी स्वतंत्रता सेनानी भी थे और जो लेखक तथा कलाकार इस कोटि में नहीं आते, उनकी देखरेख के लिए राष्ट्र ने कोई व्यवस्था नहीं की है।

लेखकों का सम्मान हो रहा है, पर इस बहाने वास्तव में सम्मानकर्ता अपना ही सम्मान और दबदबा बढ़ाते हैं। आवश्यकता है कि ऐसी योजना हो, जो कवियों और कलाकारों को विपन्नावस्था में सुरक्षा प्रदान कर सके और अखबारों में यह न छापना पड़े कि अमुक बीमार है, उनके इलाज का प्रबंध नहीं है। पर क्या हमारी उदार अर्थव्यवस्था इतनी उदार हो सकेगी?

लेख़क- जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी