
पुस्तक मेले क्यों बनते जा रहे हैं कर्मकांड?
पुस्तक मेले कर्मकांड बनते चले जा रहे हैं। मेलों में पुस्तक की अभिरुचि विकसित करने की ओर कम ध्यान दिया जाता है। वैसे किसी समय ऐसी योजना होती थी। लेखक और पाठकों की समस्याओं पर विचार किया जाता था।
पिछले पच्चीस-तीस वर्षों में पुस्तक व्यवसाय में गुणात्मक परिवर्तन हुआ है। इस परिवर्तन में सरकारी थोक खरीद की बड़ी भूमिका है। यह थोक खरीद ही महत्वपूर्ण परिवर्तन है। इससे छोटे-छोटे पुस्तक विक्रेताओं का सर्वनाश हुआ है। छोटे शहरों में जो पुस्तक विक्रेता बिखरे हुए थे, वे लगभग समाप्त हो गए। किसी जमाने में ये ही दुकानें साहित्यिक केंद्र भी हुआ करती थीं। इनकी बड़ी भूमिका हुआ करती थी। वह लगभग समाप्त हो गई। अब प्रकाशक रिश्वत, सिफारिश से अफसर तक पहुँच कर अपनी पुस्तक बेचना पसंद करता है।
उसे पुस्तक विक्रेता तक पहुंचना रास नहीं आता। उनकी दिलचस्पी पैसा कमाने में रह गई है। इस प्रक्रिया में एक बात और हुई है, वह है कमीशन। हिंदी में कुछ प्रकाशक 60-65 प्रतिशत तक कमीशन देते हैं। वे कीमत बढ़ाकर यह कमीशन देते हैं। पुस्तकों की कीमत के बारे में कोई सामान्य सिद्धांत तक नहीं बन पाया है। सहकारी संस्थाएं बनाने से लेखकों के हित सुरक्षित होंगे, साथ ही पुस्तकालय आंदोलन पर जोर देना होगा। सरकारी जिला पुस्तकालयों की खराब हालत देखकर सरकार के ऊपर तो कम से कम भरोसा नहीं किया जा सकता। नए पुस्तकालय बन नहीं रहे हैं। कुछ स्कूलों में पाठ्यपुस्तकों की लाइब्रेरी नहीं बन रही है।
जिन लेखकों को पुरस्कार मिलते हैं वे भी कहते हैं कि पुरस्कार देने की बजाय सरकार पुस्तक को ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुंचाने में मदद करे। लेखक कहते हैं कि हम अपनी पुस्तक की मेहनत का दाम चाहते हैं, इनाम नहीं चाहते। शासन का पूरा दृष्टिकोण मुफ्त का यश कमाने की ओर है, इसीलिए वह पुरस्कार देने में यश पाता है। पुस्तकालय बनाने या चलाने में यश नहीं मिलता। लोगों तक किताबें पहुंचाने में सरकार की रुचि इसलिए भी नहीं है कि वे नई चेतना की वाहक हैं।
इससे सरकार के उद्देश्यों को चोट पहुंचती है। आज जो साहित्य लिखा जा रहा है वह व्यवस्था का समर्थक साहित्य नहीं है। उसको जनता तक पहुंचाने में भी सरकार की कोई रुचि नहीं है। ऐसा नहीं है कि गरीब में साहित्य के प्रति रुचि नहीं है। शहर के नवधनाढ्य या शिक्षित समुदाय और कस्बे के गरीब के बीच में जो अरुचि दिखाई देती है, उसमें फर्क है। हमारे यहां पुस्तक के बारे में बहुत सम्मान का भाव है। अगर कोई गरीब पढ़ सकता है तो वह पहला काम यह करता है कि गीता प्रेस गोरखपुर की छपी पुस्तक ले जाता है। रामचरितमानस की एक प्रति ले आता हैं। मौके-मौके पर उसे पढ़ता है। नहीं पढ़े तब भी उसे यह अहसास रहता है कि उसके घर रामायण है। इससे यह मालूम होता है कि मन में श्रेष्ठ साहित्य के प्रति सम्मान तो है। कस्बों में पुस्तक को रद्दी के भाव में बेचना पाप समझा जाता है। पुस्तक के प्रति जिस देश में इस तरह का सम्मान-भाव हो उस देश के गांवों में छोटा-सा पुस्तकालय तो खोला जाना चाहिए।
वस्तुतः हिंदी के एक लेखक का दूसरे लेखक पर विश्वास नहीं है। इससे यह भाव भी पैदा हो जाता है कि प्रकाशक शोषक है। हकीकत यह है कि बड़े पूंजी के लोग प्रकाशन जगत में आए ही नहीं है। सब टूटपूँजिया हैं। अगर आपसी सद्भाव और विश्वास हो तो प्रकाशन व्यवसाय फलेगा-फूलेगा और लेखकों को भी लाभ मिलेगा। आदर्श गिल्ड में लेखकों को लेकर कोई चिंता नहीं है। लेखकों को अपने संघ बनाने चाहिए। उससे उनका हित साधन होगा।
डॉ. नामवर सिंह
(आलोचक-विचारक)



