4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

हिंदी साहित्य और पुस्तक संस्कृति का संकट: पाठक क्यों घट रहे हैं, लेखक और प्रकाशक क्यों परेशान हैं?

क्षेत्रीय भाषाओं के अपने प्रदेश हैं, उनकी जातीय पहचान भी है। वहां के बाशिंदे अपनी इस पहचान को सहेजकर रखते हैं। यह पहचान प्रांतीयता के आधार पर नहीं, जातीयता के बोध से जुड़ी है। कन्नड़, मलयालम, बंगला, मराठी में आम तौर पर पाठक जानता है कि उसके लिए कौन-कौन लिख रहा है। हिंदी-उर्दू भाषी क्षेत्र और जनता में बिल्कुल विपरीत स्थिति है। इन भाषाओं का न कोई प्रांत है, न कोई क्षेत्र। कुछ हद तक उर्दू से एक समुदाय में लगाव मिलेगा। पर वह भाषा भी अब मर रही है। हिंदी का कोई माई-बाप नहीं है, उसका कोई गौरव, कोई पहचान नहीं है। उसके पाठकों में न भाषा के लिए ललक है, न साहित्य के प्रति अनुराग। इसका कारण यह है कि हिंदी के बहुत से लेखक हिंदी में इतर भाषा से आए हैं। हिंदी इन लेखकों के घर की भाषा नहीं है। जैसे अवधी, मैथिली या भोजपुरी। वहां से निकलकर इन्होंने संपर्क भाषा के रूप में खड़ी बोली हिंदी का उपयोग किया है। मुझे कभी-कभी लगता है कि हिंदी इन लेखकों के लिए सजावट की भाषा है। मैं तीस साल से लिख रहा हूँ, मुझे नहीं मालूम मेरा पाठकवर्ग कहां फैला हुआ है।

आज प्रकाशकों का पहला नारा यह है कि किताब बिकती नहीं है। उन्होंने अपनी बिक्री का तंत्र फैलाया नहीं है, प्रकाशकों में अनुराग-भाव नहीं है। थोक खरीद के लिए भागते हैं, स्टाल लगाना पसंद नहीं करते। किसी जमाने में हिंदी के प्रकाशकों में अनुराग था। जहां तक लेखक से प्रकाशक के ताल्लुक का सवाल है, लेखक लगभग एक ऐसी लड़की की तरह होता है जिसे बहू बनके जाना होता है। सास उसे बड़े प्यार से बुलाती है और कुछ ही दिनों में (पहली पुस्तक) ही वह उसे मिट्टी के तेल से जला डालती है। लेखक की तरह मैंने एक किताब तैयार की। इसमें मेरा लहू-पसीना लगा है। प्रकाशक उसे कुछ तो हक दे। वह लेखक को पंद्रह प्रतिशत दे दे, तो भी गनीमत है। परंतु प्रकाशक दूसरे प्रकाशक को 25 प्रतिशत से ज्यादा कमीशन देता है। यानी कि लेखक की बनिस्बत प्रकाशक होने में फायदा है। प्रकाशक लेखक को पुस्तक की सही बिक्री और प्रकाशन के लिए पूर्वानुमान लेना तक पसंद नहीं करता। कभी-कभी प्रकाशक बिना अनुमति के रचनाएं छाप देते हैं। मैं भी इसका शिकार बना हूं।

ऐसे पुस्तक मेले से कोई फायदा नहीं पहुँचेगा, न पाठक समुदाय बढ़ेगा। इनमें जो पाठक जाते हैं वे अधिकांशतः अंग्रेजी भाषा की पुस्तकों की तलाश में जाते हैं। कुछ लोग मेले के लिए, सज-धजा के जाते हैं। रौनक देखने जाते हैं। हिंदी या भारतीय भाषाओं के स्टाल में सन्नाटा होता है। एक बार मैं भी आटोग्राफ के साथ पुस्तक बेचने के लिए गया था। अरे, कौन आपको पूछता है! काहे के दस्तखत! काहे के लिए यह तमाशाखोरी हो रही है। कुल मिलाकर बहुत ही त्रासद स्थिति है। मुझे नहीं मालूम इसे कैसे बदला जाए। फिर भी सरकार की कहीं न कहीं जिम्मेदारी बनती है। सरकार ऐसा माहौल पैदा करे कि पुस्तकें सस्ती हों, साहित्य का आकर्षक प्रचार अभियान चले। परंतु संस्कृति कर्म के प्रति सरकार भी उदासीन लगती है। सिर्फ नाच पेश करने से संस्कृति नहीं बचेगी। दूसरी तरफ संचार माध्यमों की मार से साहित्य अधमरा हुआ जा रहा है। मुझे लगता है शब्दों की मौत का युग आ रहा है।

शानी
(कथाकार-उपन्यासकार)