Patna Book Fair 1985
बिहार में पुस्तक मेला का इतिहास 100 वर्ष से भी ज्यादा, यानी बहुत ही पुराना है। यह उन्हीं दिनों की बात है जब बिहार बंगाल से अलग होकर एक पृथक राज्य के रूप में बजूद में आई थी। उन दिनों साहित्य सम्मेलन के 6 दिसम्बर, 1913 के साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन की मेजबानी का मौका भागलपुर शहर को मिला था।1913 का यह पुस्तक मेला सह पुस्तक प्रदर्शनी हिन्दी साहित्य सम्मेलन के चौथे अधिवेशन (6 दिसम्बर, 1913) मौके पर लगाई गई थी।
पटना पुस्तक मेला की शुरुआत 1985 में हुई थी, जब बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ पटना ने इसका आयोजन 30 दिसम्बर से 7 अक्तूबर, 1985 को किया था। इस मेले में देश भर उन दिनों हिन्दी साहित्य सम्मेलन लेखकों-रचनाकारों के लिए एक ऐसा मंच था, जहाँ सभी इकट्ठा होते थे। भागलपुर में भी देश के तमाम बड़े प्रतिष्ठित लेखक-रचनाकार-साहित्यकार जुटे। उन साहित्यकारों की मौजूदगी में आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी ने स्थानीय लोगों के हृदय में पुस्तकों के जरिए ज्ञान की ऐसी दीप प्रज्वलित की कि उसकी रोशनी से आज भी भागलपुर ही नहीं बल्कि आसपास के शहर पुर्णियाँ, कटिहार, मुंगेर, बेगुसराय के लेखक रचनाकार अपनी लेखनी से हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी और बंगला साहित्य के साथ-साथ अंगिका साहित्य को भी समृद्ध कर रहे हैं।
पटना में पुस्तक मेला आयोजित करने की परिकल्पना चार दशक पहले 1985 में बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ के अधिवेशन में की गई थी। इस परिकल्पना को साकार करने में मेसर्स नोवेल्टी एण्ड कम्पनी एवं मेसर्स भारती भवन सहित ‘बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ पटना’ के अन्य सदस्यों ने भी अभिरुचि जगाई। वर्ष 1985 पटना पुस्तक मेला की शुरुआती दिनों में ही पूर्व उपराष्ट्रपति डॉ बी० डी० जत्ती, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, सांसद डी० पी० यादव जैसे वरिष्ठ महानुभावों का नेतृत्व मिला। इसे नई दिल्ली में स्थापित भारतीय बाल शिक्षा परिषद् और भारतीय शैक्षिक प्रकाशक संघ का भी अभूतपूर्व सहयोग मिला।
पटना पुस्तक मेला पण्डित जवाहरलाल नेहरू की जयंती 14 नवम्बर से आयोजित हुआ करता था। बाद में प्रकाशकों और पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इसे नवम्बर के अन्तिम सप्ताह और दिसम्बर के प्रथम सप्ताह के आसपास आयोजित किया जाने लगा। तिथि निर्धारण के समय इस बात का खास ध्यान रखा जाता है कि 12 दिनों के मेले में दो शनिवार और दो रविवार पाठकों को मेला आने और किताबों का अवलोकन करने अवशयं मिले।
पिछले चार-पाँच दशक से यह पटना पुस्तक मेला एक सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप अख्तियार कर चुका है। अगर ऐसा हुआ है तो इसके ठोस कारण हैं। अब पुस्तक मेला देश में आयोजित होनेवाला इकलौता पुस्तक प्रदर्शनी है जहाँ हर वर्ष एक युवा साहित्यकार, एक रंगकर्मी और एक पत्रकार आयोजन समिति द्वारा सम्मानित किए जाते हैं। यहाँ प्रतिदिन रंगकर्मियों द्वारा नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किए जाते हैं, आर्ट गैलरी सजाई जाती है, शास्त्रीय लोकगीत की प्रस्तुति प्रतिष्ठित कलाकारों द्वारा होती है।
पटना पुस्तक मेला में सेमिनार, समर्पण समारोह, कवि सम्मेलन, वाद-विवाद प्रतियोगिता, बाल श्रम उन्मूलन, यूथ फिएस्टा सहित कई जनपयोगी कार्यक्रम किए जाते हैं। मीडिया लीडर में मीडिया जगत के शीर्ष पर विराजमान व्यक्तियों से साक्षात्कार भी कराया जाता है तो जनसंवाद के माध्यम से विभिन्न विषयों पर विचारोत्तेजक परिसंवाद होता है। कहानियों और कविता का पाठ होता है। प्रकाशन और लेखन की विभिन्न विषयों पर विचार गोष्ठियाँ आयोजित होती हैं।
पटना पुस्तक मेला में बुक वर्ग और नेताजी कहिनी जैसे नए कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। इसके जरिए पठन-पाठन पेशे से इतर जुड़े लोगों यथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, अधिवक्ता, ब्यूरोक्रेट्स, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी, राजस्व भूमि सुधार विभाग, आयकर, वाणिज्य कर विभाग सहित राजनीतिज्ञ, चिकित्सक जैसे कार्यरत साहित्य और पुस्तक प्रेमी शख्सियत से पाठकों का संवाद भी चलता है। नेताजी कहिन में में पटना पुस्तक मेला में आए पाठक राज्य व केन्द्र मंत्रियों से संवाद करते हैं। बाइस्कोप में कई महत्त्वपूर्ण डाक्यूमेंट्री सिनेमा और विश्वसनीय फिल्मों का प्रदर्शन भी होता है।
ऐसे तमाम कार्यक्रमों का उद्देश्य पटना पुस्तक मेला शैक्षणिक उत्सव को एक सांस्कृति-महोत्सव में बदल चुका है और विविध सांस्कृतिक आयोजनों ने ही इस मेले को देश-विदेश का सर्वाधिक सफल और चर्चित मेला में तब्दील कर दिया है। पिछले चार दशक के दौरान पटना में आयोजित होनेवाली पटना पुस्तक मेला के कारण ही सूबे की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति में बदलाव दृष्टिगोचर हो रहा है। यानी, गांधी मैदान में वर्ष 1985 में 30 सितम्बर से 8 अक्तूबर तक आयोजित प्रथम पटना पुस्तक मेला विशेषकर समाज का वह चेहरा है जिसके जरिए भविष्य में जीवन का सर्वोत्तम मूल्य गढ़ने की क्षमता का पता चलता है।
पटना पुस्तक मेला की सफलता का एक कारण यह है कि यह मेला केवल पुस्तकों की खरीद-बिक्री का स्थल नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक आन्दोलन है जो आम जनता को एक साथ लाता है और उन्हें ज्ञान और संस्कृति के बारे में जागरूक करता है।
वर्ष 1985 से पटना पुस्तक मेला लगातार आयोजित किया जाता रहा है, अपनी सफलताओं व विफलताओं की ताकतों और कमजोरियां के लिए एक महत्त्वपूर्ण विश्लेषण और मूल्यांकन का पात्र है । यह आयोजन न केवल पटना बल्कि पूरे बिहार एवं झारखण्ड राज्य के लिए एक विशिष्ट श्रेणी का आयोजन है। लोग महीनों तक इसकी प्रतीक्षा करते हैं और इसके उद्घाटन के बारे में बात करते हैं। बच्चे, युवा, महिलाएं, शिक्षाविद, पत्रकार , प्रेस, मीडिया, समाचार पत्र और सभी शैक्षिक लोग इस महान आयोजन में भाग लेने के लिए उत्सुक रहते हैं।
पटना की धरती हमेशा साहित्यकारों की कर्मभूमि रही है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वरनाथ रेणु, केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’, हंस कुमार तिवारी, नागार्जुन जैसे बड़े नामों ने पटना को अपनी कर्मभूमि बनाया था। नए दौर में कवि अरुण कमल, आलोक धन्वा जैसे बड़े नाम हैं जो देश-भर में चर्चित है। जिन प्रदेशों में हिन्दी भाषा कवियों का आदर से नाम लिया जाता है, उनमें बिहार का श्रेष्ठतम स्थान है।
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