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संस्मरण: पटना पुस्तक मेला 1988 (13 से 23 नवम्बर) — किताबों के जरिए ज्ञान, जागरूकता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

संस्मरण

किताबों की अहमियत को कौन चुनौती दे सकता है भला ? इंसान के अन्दर छाए अज्ञान के के अन्धेरे को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है किताबें। सचमुच किताबें एक मार्गदर्शक की तरह अनजान चीजों और अपरिचित क्षेत्रों से आपका परिचय कराती हैं, आपमें सोचने-समझने की क्षमता जागृत करती हैं तथा इंसानियत का पाठ पढ़ाकर आपको एक अच्छा मनुष्य बनाने में अहम् भूमिका निभाती हैं।

वैसे तो सारे देश में शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है मगर बिहार में शैक्षिक व एक सीमा तक सांस्कृतिक स्तर में हो रही गिरावट अखबारों की सुर्खियाँ बनती जा रही हैं।‌ राज्य के कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों की गिरती साख और बौद्धिक गतिविधियों की कमी अनेक प्रश्न-चिन्ह खड़े कर दिए गए। लिहाजा, 1988 में पटना में प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े चन्द उत्साही युवाओं ने इन आरोपों को गम्भीरता से लिया और बिहार में पठन-पाठन को सुचारू रूप से चलाने तथा लोगों में पुस्तकों के प्रति अभिरुचि व उत्साह जगाने हेतु पुस्तक मेला आयोजित करने की एक महत्त्वाकांक्षी योजना 1985 में ही तैयार की गई।‌ वैसे भी पटना में लम्बे अर्से से रह रहे लोग भी बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहे थे कि पटने में नई शैक्षिक गतिविधियाँ शुरू हों ताकि आम लोगों को रोजमर्रे की जिन्दगी से थोड़े समय के लिए ही सही, निजात मिले।

पटना पुस्तक मेला 1988 आयोजित करने की परिकल्पना 1985 में ही बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ (स्थापना: वित्तीय वर्ष 1950–51) के तत्वाधान में अर्ध-सरकारी सामुदायिक भवन (स्थल: राजेन्द्र नगर) में हुए वार्षिक अधिवेशन में की गई। इस बीच बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ एक सशक्त संगठन का रूप अख्तियार कर चुका था। बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ से जुड़े कतिपय युवा उत्साही सदस्यों ने प्रतिवर्ष पुस्तक मेला आयोजित करने के लिए एक अलग संस्था बनाने का सुझाव दिया।‌ इस अधिवेशन में मेसर्स नोवेल्टी एण्ड कम्पनी के निदेशक नरेन्द्र कुमार झा (महासचिव बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ) एवं प्रबन्धक अमरेन्द्र कुमार झा पूर्णतया उपस्थित रहे। 1985 के वार्षिक अधिवेशन का सभापतित्व हिन्दी प्रगति समिति के सदस्य डॉ० उमाचरण झा (सेवानिवृत्त दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष, राँची विश्वविद्यालय) ने की।

वैसे तो पटना पुस्तक मेला की 1985 में सपने की परिकल्पना को युवा सदस्यों ने 1988 में साकार कर दिया लेकिन ऐसी राय बनी कि इस मेले को प्रतिवर्ष आयोजन करना सम्भव नहीं होगा लिहाजा दर्शको द्वारा नियमित रूप से हर वर्ष आयोजन करने की माँग को नजरअंदाज करते हुए दो वर्ष के अन्तराल के बाद पटना में पुस्तक मेला आयोजित करने का निर्णय लिया गया।
1988 का पुस्तक मेला शानदार ढंग से सफल रहा और पाठकों ने भारी संख्या में पुस्तकें खरीदीं। इस मेले की सफलता का श्रेय काफी हद तक राज्य के प्रशासनिक अधिकारी, गृह सचिव जियालाल आर्य, बुद्धिजीवी वर्ग तथा संचार माध्यमों समेत टाइम्स आफ इण्डिया के तत्कालीन स्थानीय सम्पादक पी० सेन, प्रतिनिधि उज्ज्वल सिंह, प्रतिनिधि संजय दत्ता, हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञापन प्रबन्धक एस० एस० रघुनाथ, प्रतिनिधि डॉ० श्रीवास्तव, संवाददाता श्रुति शुक्ला, आज के प्रतिनिधि सुधांशु शेखर, विभिन्न समाचार-पत्रों के संवाददाता, महिमा एडवरटाइजिंग एजेंसी के संस्थापक अरूण गुप्ता, उसी संस्था से जुड़े खुर्शीद अहमद (अब निजी प्राइवेट एजेंसी एडवांटेज मीडिया) तथा मेले के फोटोग्राफर नौशाद रिजवी आदि को जाता है। इसके अतिरिक्त 1988 के स्टालों के निर्माण एवं साज-सज्जा का श्रेय स्थानीय डेकोरेटर को जाता है।

उल्लेखनीय है कि यूबीएस पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स दिल्ली के व्यवस्थापक चावला जी ने वर्ष 1985 में अपने प्रतिष्ठान की पटना शाखा स्थापित की। पटना के वाशिंदा इस शाखा के प्रबन्धक हरवंश लाल गुलाटी गैर-बिहारी होने के बावजूद भी पटना में पुस्तक मेला आयोजित करने में भरपूर दिलचस्पी की। उन्हें देश में इस तरह के आयोजित मेले का अनुभव भी था। बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ के महासचिव नरेन्द्र कुमार झा ने न सिर्फ यूबीएस पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स को सक्रिय सहयोग दिया बल्कि प्रबन्धक गुलाटी की प्रसन्नता के विभिन्न दायित्वों का वहन भी किया।

इस बीच पटना पुस्तक मेला के संस्थापक (नरेन्द्र कुमार झा) दिल्ली के प्रमुख सांसद डीपी यादव एवं 1988 पुस्तक मेला समारोह के सहयोगी भारतीय बाल शिक्षा परिषद् व भारतीय शैक्षिक प्रकाशक संघ दिल्ली के प्रतिनिधियों से मिलने के बाद हमने आयोजन समिति के प्रतिनिधियों के साथ कुछ केन्द्रीय प्रशासनिक उच्चाधिकारियों से भी मुलाकात की। केन्द्रीय सरकारी अधिकारियों ने हमें बताया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मशती 14 नवम्बर 1988 के अवसर पर‌ हम पटना पुस्तक मेला से सम्बद्ध बाल पुस्तक मेले का भी आयोजन करें जिसके आधार पर आयोजकों (संघों) को आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी।

विदित हो कि 1985 के पुस्तक मेले के बाद 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से 13 नवम्बर 1988 को पटना पुस्तक मेला को उनके द्वारा उद्घाटन की अग्रिम स्वीकृति हमें कुछ पहले ही उनके हस्ताक्षरित स्लोगन ‘हर पुस्तक एक मशाल है’ के साथ मिल चुकी थी। उनका यह वाक्य पुस्तकों के प्रति उनके रूझान का प्रतीक था/है। मेले के प्रति उनका यह रूख बहुत ही उत्साहवर्धक रहा। ज्ञात हो कि देश में 1988 के आम चुनाव के कारण ही राजीव गांधी पुस्तक मेला 1988 की अवधि में पटना पधार नहीं सके।
पटना पुस्तक मेला 1988 से सम्बद्ध दिल्ली में हुई बैठकों के आलोक में ही बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ के झण्डे तले भारतीय बाल शिक्षा परिषद् तथा भारतीय शैक्षिक प्रकाशक संघ दिल्ली के सहयोग से 13 नवम्बर से 23 तक पुस्तक मेला आयोजित करने का मूल निर्णय तत्काल लिया गया।

ज्ञातव्य है कि दिल्ली में पूर्व उपराष्ट्रपति डॉ० बी०डी० जत्ती (आजीवन मुख्य संरक्षक: पटना/राँची पुस्तक मेला) के सभापतित्व में पटना पुस्तक मेला आयोजन समिति एवं सलाहकार समिति की संसद भवन, दिल्ली में 21अक्तूबर 1988 को अन्तिम बैठक हुई थी।
इस मेले में देश-विदेश के लगभग 100 प्रकाशकों ने भाग लिया था। मेले के स्टॉल धारकों हेतु शेल्फों की व्यवस्था नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया (एनबीटी) ने की। हालांकि स्टालधारकों को थोड़ी असुविधाओं का सामना करना पड़ा लेकिन कुल मिलाकर 1988 पुस्तक मेला सफल रहा। बहुत बड़ी संख्या में पाठकों ने पुस्तकें खरीदीं।‌

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