patna book fair 1988 history
संस्मरण
अवधि: रविवार 13 नवम्बर से बुधवार 23 नवम्बर 1988
उद्घाटन तिथि: 13 नवम्बर 1988
उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता: भूतपूर्व उपराष्ट्रपति श्री बी०डी० जत्ती (प्रधान संरक्षक) द्वारा
✍️पुस्तकों की पहली वृहद अखिल भारतीय प्रदर्शनी नई दिल्ली में 26 नवम्बर 1963 से 5 सितम्बर 1964 को नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया द्वारा आयोजित की गई, जिसने दो वर्ष बाद राष्ट्रीय पुस्तक मेले का रूप धारण कर लिया और 1966 में इन्हीं तिथियों में बम्बई में प्रथम राष्ट्रीय पुस्तक मेला सम्पन्न हुआ। इसके बाद से यह एक नियमित राष्ट्रीय आयोजन का रूप धारण कर चुका है।
1972 में राष्ट्रीय पुस्तक मेले का प्रथम विश्व पुस्तक मेले में विलय हो गया और अब विश्व पुस्तक मेलों का एक नियमित द्विवार्षिक अंग बन चुका है। यूनेस्को द्वारा 1972 का वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तक वर्ष के रूप में मनाने की सिफारिश की गई जिसके अनुसरण में केन्द्रीय शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्रालय ने नई दिल्ली में 18 मार्च से 24 अप्रैल 1972 तक विश्व पुस्तक मेला आयोजित करने का निश्चय किया। भारत सरकार ने इसमें नेशनल बुक ट्रस्ट और फेडेरेशन आफ पब्लिशर्स एण्ड बुकसेलर्स एसोशिएशन इन इंडिया का सहयोग भी आमंत्रित किया। 18अप्रैल 1972 को भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री वी०वी० गिरी ने 3 हजार विद्वानों, संसद सदस्यों, राजनयिकों, विदेशी प्रतिनिधियों, लेखकों, प्रकाशकों और पुस्तक प्रेमियों की उपस्थिति में प्रथम विश्व पुस्तक मेले का उद्घाटन विण्डसर प्लेस में किया। मेले को प्रबुद्ध जनता का उत्साहवर्धक समर्थन मिला जिसे देखते हुए मेले की अवधि २ दिन और बढ़ानी पड़ी। इस मेले को दो लाख से अधिक व्यक्तियों ने देखा, जिसमें भारत के राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति एवं केन्द्रीय मंत्रियों सहित सिक्किम की महारानी और कई विदेशी मेहमान भी थे। मेले में कई अन्य देशों ने भी अपने महत्वपूर्ण प्रकाशन भिजवाए उनमें प्रमुख थे इंग्लैंड, अमेरिका, रूस, फ्रांस पश्चिम जर्मनी, पूर्वी जर्मनी, स्वीटजरलैंड, न्यूजीलैंड, हंगरी, इटली, ग्रीस, ईरान, चेकोस्लोवाकिया, स्पेन, श्रीलंका, कम्पूचिया, मलेशिया, कोरिया, जनवादी गणराज्य तुर्की, अफगानिस्तान, केनिया, तन्जानिया, जापान, यूगोस्लाविया और बांग्लादेश आदि। इनमें से सौ से अधिक भारतीय प्रकाशकों ने एक किताब बाजार भी लगाया जिसमें छटी हुई दरों पर पुस्तकों की खासी अच्छी बिक्री हुई।
भारत में पुस्तक मेलों का आरम्भ कैसे हुआ इसका सारा श्रेय डॉ० बी०बी० केसकर को जाना चाहिए जो नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष रहे। नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में डॉ० केसकर फ्रैंकफर्ट के पुस्तक मेले में भाग लेने गए। उन्हें ब्रिटिश काउन्सिल ने यूके (UK) की यात्रा पर आमंत्रित किया था। इंग्लैंड में उन्हें इस पर विचार-विमर्श का अवसर मिला कि बुक ट्रस्ट जैसा संगठन जनता की सेवा के लिए कितना उपयोगी हो सकता है। जो सन्देश वह वहाँ से लाए थे उसमें कहा गया था कि ट्रस्ट को अपनी क्रियात्मकता का अधिकाधिक उपयोग प्रोत्साहन कार्यों में करना चाहिए और प्रकाशन के कार्यों में कम। ट्रस्ट को इस खाई को भरने का प्रयत्न करना चाहिए। इसे यथासम्भव भारत में निजी क्षेत्र में पूरक प्रकाशन होना चाहिए। इसी उद्देश्य से जनता के सम्मुख पठन सामग्री के प्रदर्शन के लिए पुस्तक मेले के विचार ने जन्म लिया। इसी कारण क्षेत्रीय प्रदर्शनियों का विचार सामने आया और इसी से प्रेरित होकर ट्रस्ट ने 1972 में विश्व पुस्तक मेले की तैयारी की।
दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला को देखते हुए फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले के उस समय के निदेशक डॉ० स्टोबर्ट ने कहा था: “यह दर्शनीय और विश्वसनीय है।” यह नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास) के इतिहास में अत्याधिक शानदार है। स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जिन्होंने पहले खेदपूर्वक समयाभाव के कारण मेले को उद्घाटन करना अस्वीकृत कर दिया था, बाद में स्वयं मेले में गई और काफी समय तक घूम-घूमकर हर स्टॉल पर पुस्तकों को देखती रही। इस प्रकार राष्ट्रीय पुस्तक मेला नेशनल बुक ट्रस्ट नियमित कार्यावली का अंग बन गया। मेला दिल्ली, कलकत्ता और मद्रास में लगाए गए। पुस्तक वर्ष के बाद से नेशनल बुक ट्रस्ट हर दूसरे वर्ष प्रगति मैदान के प्रदर्शनी कक्ष में विश्व पुस्तक मेले की भांति हर दूसरे वर्ष लगता है किन्तु विश्व पुस्तक मेले के अगले वर्ष जो राज्यों की राजधानियों में आयोजित किया जाता है। वार्षिक मेले की मुख्य प्रदर्शनी में प्रदर्शित पुस्तकें छोटी प्रदर्शनियों में बाँटकर देश में विभिन्न भागों में जहाँ क्षेत्रीय प्रदर्शनियाँ लगाई जा रही हैं, भेज दी जाती हैं।
रविवार 13 नवम्बर को उद्घाटन के उपरान्त सोमवार 14 नवम्बर 1988 से मेला परिसर का सार्वजनिक प्रवेश द्वार आम नागरिक हेतु बुधवार 23 नवम्बर (पूर्ण अवधि) तक खुला रहेगा। पटना के गांधी मैदान में पटना पुस्तक मेला 1988 का प्रायोजन योजन बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ पटना, भारतीय शैक्षिक प्रकाशक महासंघ दिल्ली एवं भारतीय बाल शिक्षा परिषद् ने किया है। पुस्तक विक्रेताओं को दुकानों का आवंटन लाटरी प्रणाली द्वारा किया जाएगा। दुकानों की कीमत 4,200 से लेकर 7,000 रुपए रहेंगे। मेले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक शाखा खुलने की आशा है। वैसे बिहार में पुस्तक प्रकाशन की दशा और दिशा दोनों दयनीय है। जहाँ कभी यहाँ के खड्रगाविलास प्रेस ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्य प्रकाशित किया था, और पुस्तक भंडार लहेरियासराय, अजन्ता प्रेस (प्रकाशन) आदि अच्छी प्रकाशन संस्थाएं मानी जाती थीं वहाँ अब चिराग लेकर ढूंढे पर भी कोई अच्छी प्रकाशन संस्था दिखाई नहीं देती।
दर्जनों अच्छी और बड़ी प्रतिभाएं अपनी पाण्डुलिपियाँ को वर्षों संजोकर अन्त में किसी कबाड़ी को बेचने को मजबूर होते हैं, जो प्रकाशन संस्थाएं हैं भी तो पाठ्य पुस्तकों तक ही अपने को सीमित रखती है। ले-देकर अनुपम प्रकाशन और बिहार हिन्दी ग्रन्थ कुटीर ही दिखलाई देती है। इनमें शुद्ध रूप से परिजात प्रकाशन को ही साहित्यिक प्रकाशन कह सकते हैं। क्योंकि इस प्रकाशन संस्था ने विगत बीस वर्षों, 1967 to 1987 में चालीस लेखकों की प्रथम वृत्तियों को प्रकाशित करने का गौरव प्राप्त किया है जिसमें उषा किरण खां, डॉ० ऋचा शुक्ल, शैवाल, सत्यनारायण, डॉ० रविन्द्र राजहंस, राका रश्मि जैसे लेखक लेखिकाएं हैं। लेकिन इसके विपरीत बिहार में लेखक और पाठकों की संख्या पूरे देश में सबसे अधिक है। यहाँ जितनी पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें बिकती हैं उतनी देश के किसी राज्य के किसी हिस्से में नहीं। पिछली बार,अवधि 30 सितम्बर से 7 अक्तूबर 1985 में जब गांधी मैदान में मूलतः बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी के तत्वावधान, 1985 में नेशनल बुक ट्रस्ट के सहयोग से पुस्तक मेला का आयोजन हुआ था तो प्रकाशकों तथा पुस्तक विक्रेताओं का कहना था कि इतनी(1985) बिक्री उनकी और कहीं भी अभी तक नहीं हुई। लेकिन देखना यह है कि इस 1988 पुस्तक मेले में क्या होता है।
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