patna book fair 1988
मेले को सफल बनाने के लिए त्रुटिविहीन योजना तैयार की गई थी। पेशेवर सजावटकर्त्ता कर्मी बृंद को कलकत्ता से बुलाया गया था। पटना में सम्भवतः पहली बार गांधी मैदान में प्रशासनिक भवन का एक ऐसा विशाल ढांचा तैयार किया गया था, जो मेला परिसर को एक राजमहल का रूप प्रदान कर रहा था। राजस्थान की कलाकृतियों और बिजली के लट्टुओं से उसकी बेहतरीन सजावट की गई थी। शाम में यह नजारा देखते समय ऐसा लगता था मानों आज ‘पेरिस’ में अपनी शाम गुजार रहे हों। पटना पुस्तक मेला के उद्घाटन के दूसरे दिन (14 नवम्बर 1988) मेला-स्थल पर ‘हंगामा’ हो गया। दरअसल, आयोजकों की बगैर पूर्व जानकारी के तत्कालीन रेलमंत्री श्री जार्ज फर्नांण्डिस मेला परिसर में नजर आए। आयोजक अपने बीच एक केन्द्रीय मंत्री को देखकर बड़े हर्षित हुए और उन्होंने उनका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया। ध्वनि विस्तारक यंत्र पर भी उनके आगमन की घोषणा की गई। पर, इस घोषणा के तुरत बाद कुछ युवकों ने मंत्रीजी का घेराव कर दिया और मंडल आन्दोलन के पक्ष और विपक्ष में नारे लगाने शुरू कर दिए।
स्मरणीय है कि मंडल विवाद ने उस वक्त देश में उग्र रूप धारण कर रखा था। गांधी मैदान थाने के तत्कालीन प्रभारी श्री हसनैन की चुस्त व कारगर पहल पर पुलिस और समारोह स्थल पर तैनात सुरक्षा गार्डों की मदद से माननीय मंत्रीजी का बचाव किया जा सका। इस घटना के बावजूद आयोजकों ने सूझबूझ के साथ मेला का कार्यक्रम चलाया। बिहार की प्रतिष्ठा का सवाल जो था। फिर भी एहतियात के तौर पर उन्होंने गृह आयुक्त श्री जियालाल आर्य से पर्याप्त सुरक्षा-व्यवस्था प्रदान करने का अनुरोध किया ताकि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो। गृह आयुक्त के निर्देश पर तुरत सीआरपीएफ (CRPF) के जवानों समेत अतिरिक्त पुलिस बल मेला-स्थल पर तैनात कर दिए गए। सुरक्षा-व्यवस्था के संयोजन में पुस्तक व्यवसायी श्री अशोक चौधरी (स्टूडेंट्स फ्रेंड्स), श्री उदितेन्दु बोस (पापुलर बुक स्टोर), श्री निरंजन सिन्हा (निरंजन पुस्तक सदन) तथा श्री जालंधर तिवारी (बुक सेंटर) का योगदान भी सराहनीय रहा।
पटना पुस्तक मेला की सफलता के ढेरों कारण गिनाए जा सकते हैं। वैसे तो साक्षरता-दर के आधार पर बिहार को शैक्षणिक रूप से पिछड़े प्रांत का दर्जा दिया जाता है, मगर हकीकत यह है कि बिहार में न तो पुस्तक-प्रेमियों की कमी है और न ही किताबों की माँग की। सही अर्थों में तो माँग और पुस्तक की उपलब्धि के बीच एक बड़ी खाई है– और यह पुस्तक मेला उस खाई को पाटने का कार्य करता है। बिहार पुस्तक खपाने का एक बेहतरीन बाजार है क्योंकि यहाँ ग्यारह विश्वविद्यालय, दो कृषि विश्वविद्यालय, नौ मेडिकल कॉलेज, सत्ताइस पोलिटेकनिक व इंजीनियरिंग कॉलेज, सैंकड़ों डिग्री कॉलेज तथा तकरीबन पैंसठ हजार स्कूल हैं। इस पुस्तक मेले में देश के विभिन्न भागों से जो प्रकाशक भाग लेते हैं उन्हें अपनी पुस्तकों को खपाने के लिए नए बाजारों का आकलन करने का अवसर मिलता है। सच तो यह है कि पुस्तक मेले में अप्रत्याशित कारोबार से प्रभावित होकर अनेक प्रकाशकों ने पटना में अपनी शाखाएं खोलनी शुरू कर दी। यह पाठकों तक पुस्तकें पहुँचाने की दिशा में एक अच्छी शुरुआत कही जा सकती है।
1990 के पटना पुस्तक मेला में केवल भारत के प्रमुख प्रकाशन संस्थानों ने ही नहीं वरन् अनेक विदेशी संस्थाओं मसलन बुल्गेरिया के दूतावास, सिंगापुर की मैक्सवेल-मैकमिलन कम्पनी आदि ने भी भाग लेकर मेले की सफलता में चार चांद लगा दिए। पटना के लोगों का मेले के प्रति जो रूझान और उत्साह जबरदस्त ढंग से देखने को मिला, उसकी आयोजकों ने कल्पना भी नहीं की थी। और ऐसा हो भी क्यों नहीं, आखिर बिहार एक युग में विश्व की शिक्षा का केन्द्र स्थल रहा था और प्राचीनकाल में दूर-दूर से शिक्षा हासिल करने के उद्देश्य से लोग यहाँ आया करते थे।
मूलतः श्री नरेन्द्र कुमार झा से मुलाकात के बाद पटना पुस्तक मेला 1990 का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ही करने वाले थे जिसकी स्वीकृति उन्होंने अपने स्पेशल असिस्टेंट के पत्र दिनांक 20 अप्रैल 1990 के माध्यम से दी थी। 1990 के पुस्तक मेले में देश के छोटे प्रकाशकों ने शिरकत तो की ही, कई बड़े व्यापारिक संगठनों ने भी अनेक कार्यक्रमों को प्रायोजित कर एक ओर तो आयोजकों की मदद की वहीं दूसरी ओर अपने प्रतिष्ठानों और अपने उत्पादन के प्रचार-प्रसार हेतु इस माध्यम का भरपूर इस्तेमाल किया। संचार माध्यमों ने भी मेले के आयोजन की महत्ता को समझते हुए अपने स्टाल लगाए। नमिता रेस्तरां के स्वादिष्ट व्यंजनों का स्वाद आज भी खाने के शौकीन पुस्तक प्रेमी भूले नहीं हैं और इसका सारा श्रेय उसके संचालक श्री तपस मुखर्जी और श्री अशोक मुखर्जी को जाता है।
इस मेले में मनोरंजन का बेहतरीन सरंजाम था और ऐसा मंजर पटना शहर में पूर्व में देखने को नहीं मिला था। इस अवसर पर नयनाभिराम रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन ‘मिथिला महिला महाविद्यालय’, राजेन्द्र नगर, पटना की ओर से किया गया था जिसमें युवा और उदीयमान कलाकारों को अपना जौहर दिखलाने का भरपूर मौका मिला। इन कलाकारों ने श्रोता-दर्शकों का मनोरंजन किया और उनकी वाहवाही लूटी। इसके आयोजन का सम्पूर्ण श्रेय डॉ एम०एन० झा (आकाशवाणी गौहाटी) एवं श्री ब्रह्मानन्द चौधरी (आकाशवाणी इटानगर) को जाता है। प्रवेश-टिकटों का लाटरी ड्रा, बुक लवर्स ड्रा, वाद-विवाद प्रतियोगिता, क्विज प्रतियोगिता, विचार गोष्ठियाँ, सोविनियर पब्लिशर्स, नई दिल्ली द्वारा आयोजित पेंटिंग प्रतियोगिता आदि पटना पुस्तक मेला के अन्य विशेष आकर्षण थे। टाइम्स ऑफ इंडिया की सुश्री अनुश्री सरकार ने भी इन कार्यक्रमों में उल्लेखनीय योगदान दिया।
1990 के पुस्तक मेले की एक खासियत यह भी थी कि इसका आयोजकों ने पहली बार बिलकुल स्वतंत्र रूप से किया था। इससे पूर्व (1988) पुस्तक मेले के आयोजन में अहम् भूमिका अदा करने वाले श्री वाई० पी० रानाडे (स्कालर पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली) और श्री ओ०पी० शास्त्री (सोविनियर पब्लिशर्स, नई दिल्ली) को ‘विशिष्ट अतिथि’ के तौर पर आमंत्रित कर आयोजकों ने उनके प्रति आभार व्यक्त किया। इस मेले की एक और विशेषता यह रही कि पटना पुस्तक मेला में बिहार के प्रकाशन, भारती भवन के युवा एवं उत्साही संचालक श्री संजीब बोस का मेला-स्क्रीन पर आगमन हुआ। श्री संजीब बोस ने उसी कुशलता से आयोजन के दायित्व को निभाया जिस जिम्मेदारी से उनके चाचा श्री तड़ित कुमार बोस इस दायित्व को निभाया करते थे।
इस मेले की उपलब्धियों की जनसंचार माध्यमों ने खुलकर अपने लेखों में चर्चा की, बुल्गेरिया दूतावास ने भी अपने देश की पत्रिका में पटना पुस्तक 📚 मेला का बहुत विस्तार से उल्लेख किया।
इस मेले में उभर कर सामने आने वाले अन्य प्रतिभाशाली युवा प्रकाशकों में एक है किरण प्रकाशन पटना के श्री सत्यनारायण प्रसाद जिनकी यह दिली ख्वाहिश है कि पटना पुस्तक मेला का यह बिरवा जल्द-से-जल्द एक वट वृक्ष की शक्ल अख्तियार कर ले।
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