हिंदी

संस्मरण: पटना पुस्तक मेला 2022: तकनीक शासित आज के समाज में पुस्तकों का महत्त्व बढ़ाना जरूरी

अवधि:2–13 दिसम्बर

रविवार 4 दिसम्बर 2022

पुस्तकों के शब्द सागर में रविवार को 3 पुस्तकें अंकित हुईं- कलश, पथ के प्रकाश पुंज और सृष्टि का मुकुट कैलाश-मानसरोवर। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश की इन पुस्तकों का विमोचन सेंटर फॉर रीडरशिप डेवलपमेंट (CRD) पटना पुस्तक मेले में पूर्व सांसद व गांधीवादी चिन्तक रामजी सिंह, दैनिक जागरण बिहार-झारखण्ड राज्य के हेड आलोक मिश्रा, समाचार सम्पादक अश्विनी कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार अंकित शुक्ला, अजय कुमार और वाणी प्रकाशन के चेयरमैन सह प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने किया। इस दौरान फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने हरिवंश से बातचीत की। हरिवंश ने तीनों पुस्तकों को लिखने का किस्सा साझा किया। हरिवंश ने कहा- “देश-दुनिया में अनेक ऐसे लोग हुए हैं, जिन्होंने आखिरी समय में आध्यात्मिक चेतना को समझने की कोशिश की। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, महर्षि अरविंद, रमण महर्षि समेत अनेक ऐसे महापुरुष हुए, जिन्होंने भारत को नई दिशा दी।” हरिवंश जी ने कामराज की दृष्टि, स्टीव जाब्स की सोच प्रक्रिया, रूसी इमलाला, नवनीत के सम्पादक नारायण दत्त, स्वामी प्रणवानंद समेत कई महापुरुषों की खूबियों से भी रू-ब-रू कराया। उन्होंने कहा- “जिन्दगी में बहुत से लोगों में प्रभावित होकर पुस्तक लिखी। पुस्तकों के नाम निजी जीवन में मिली सीख के आधार पर बनाकर रखे। पुस्तक मित्र की तरह है, पर हमारे जीवन को तकनीक (Technology) शासित कर रही है।

ऐसे में पुस्तकों का महत्त्व समझना होगा। शीर्ष पर रहे लोग भी जीवन के अन्तिम दिनों में अकेले पड़े। इस कड़ी में गांधी भी शामिल रहे। बापू का मार्ग आध्यात्म के द्वारा समाज को बनाने का रहा। पुस्तक ‘कैलाश-मानसरोवर’ पर विषय में बहुत कुछ कहा नहीं जा सकता। इसका केवल अहसास किया जा सकता है। इस दुनिया को उन्होंने ही गढ़ा है, जो धुन व संकल्प के धनी थे। ऐसे ही लोगों ने संसार को अपने सृजन, कल्पना और मनोबल से पत्थर युग, कृषि युग, औद्योगिक युग, सूचना क्रांति से आगे बढ़ाते हुए प्रौद्योगिकी से हो रहे अविश्वसनीय बदलावों के द्वार तक आज पहुँचाया है। यह मानव जिद व संकल्प का चमत्कार है। ‘पथ के प्रकाश पुंज’ में ऐसे महापुरुषों का आलेख है, जिन्होंने समाज को प्रभावित किया है। ‘सृष्टि का मुकुट: कैलाश मानसरोवर’ एक यात्रा वृत्तांत और ‘कलश’ में संतों व योगियों से साक्षात्कार व संस्मरण है।” लोकार्पण के बाद किताबों पर लेखक हरिवंश से बात करते हुए विनोद अनुपम ने पूछा अध्यात्म की कितनी जरूरत आप आज के समय महसूस करते हैं ? हरिवंश ने कहा- “मैं प्रोफेसर कृपानाथ से मिला, वो अर्थशास्त्री थे, बाद में बौद्धिष्ट हो गए। मेरे मन में सहज सवाल आया कि वो दार्शनिक क्यों हो गए ? पण्डित रामनंदन मिश्र राजनीति छोड़ अध्यात्म की ओर चले गए। पाल ब्रंटन के सर्च इन सीक्रेट्स इंडिया और स्टीफन हार्किंस की ब्रीफ आंसर्स टू द बिग क्वेश्चंस ने अध्यात्म में मेरी रुचि जगा दी। इनको सभी को पढ़ना चाहिए। सब पढ़ने और आश्रमों में जाने के बाद पता लगा कि एक दुनिया और जहाँ अभी वैज्ञानिक पहुँच नहीं पाए हैं।” कैलाश मानसरोवर की यात्रा और वहाँ की अलौकिक, पारलौकिक अनुभूतियों को साझा करते हुए हरिवंश जी ने कहा- “मानसरोवर में एक रात मेरे नाक से खून आने लगा, मैंने किसी को जगाया नहीं, कपूर नाक पर रखा, बाहर निकला, देखा चांदनी रात में प्रकृति दिव्य लग रही थी।”

लोकार्पण के बाद किताबों पर लेखक हरिवंश गांधीवादी शिक्षक रामजी सिंह ने कहा- “गांधी मैदान आने में 5 जून याद आता है। गांधी जी के लिए जेपी (जयप्रकाश नारायण) को भी याद करना होगा। हरिवंश की 3 पुस्तकों में 3 रत्न हैं। लेखक में आध्यात्मिक धारा का स्रोत है। पुस्तकों का महत्त्व तो है, पर पुरस्कार की भी महत्ता कम नहीं है। किताबें तो महान् होती ही हैं लेकिन लेखक का महत्त्व उससे भी ज्यादा होता है।” आलोक मिश्रा ने कहा- “पटना पुस्तक मेले में आज 18 साल बाद आना हुआ। कभी हमलोग थोड़े-थोड़े पैसे बचाकर किताबें खरीदा करते थे। हरिवंश की तीनों पुस्तकें राजनीति, यात्रा वृत्तांत और साधु-संतों पर आधारित हैं। ये पुस्तकें पाठकों के लिए मील का पत्थर साबित होंगी। हमारी पीढ़ी के लिए पत्रकार के रूप में हरिवंश एक माडल की तरह रहे हैं, जिससे अनेक वैसे पत्रकारों ने भी बहुत कुछ सीखा है,जो इनके साथ प्रत्यक्ष तौर पर कभी काम नहीं किए।

इनके पत्रकारिता काल में लिखे गए लेखों का संकलन से तैयार ये किताबें महत्त्वपूर्ण हैं। इससे यह प्रेरणा मिलेगी कि रोजमर्रा की पत्रकारिता करते हुए भी हम कैसे सोच और सरोकार के दायरे का विस्तार कर लेखन को भी एक मुकम्मल दिशा दे सकते हैं।” वरिष्ठ पत्रकार अंकित शुक्ला ने कहा- “हरिवंश ने पत्रकारिता करते हुए पीपुल्स कनेक्टिविटी और ग्राउंट कनेक्शन को अपनी मूल पूंजी बनाया। अब लेखक के रूप में जिन तीन किताबों को इस बार वे लेकर आए हैं,उसका साफ संदेश है कि भारतीय चेतना, मूल्यों और परम्परा से भी वे गहरे जुड़ें रहे हैं।” अश्विनी कुमार सिंह ने कहा- “यह पुस्तक नहीं शब्दों की श्रृंखला है। इनके माध्यम से पाठकों को शब्द सागर में डूबने का मौका मिलेगा। डिजिटल युग में नई पीढ़ी को अतीत के साथ अपनी संस्कृति को जानने का अवसर मिलेगा।” पत्रकार अजय कुमार ने कहा- “पुस्तक में हरिवंश की लेखनी का अनुभव है। लेखक ने साधु-संतों के साथ समाज के मूल की बात की है।” पत्रकार अंकित शुक्ला ने कहा- “हरिवंश की पुस्तक काफी उम्मीदों से भरी है।” अरुण माहेश्वरी ने कहा- “यह कवितामय पुस्तक है। इसके माध्यम से पाठकों को दर्शन और प्रकृति दिखेगी। आयोजन में पूर्व मंत्री शिवानंद तिवारी, दैनिक जागरण के जीएम एसएन पाठक, पूर्व डीजीपी डीएन गौतम,आइएएस आइसी कुमार, पटना आइआइटी के निदेशक टीएन सिंह, शैलेंद्र सिंह, नरेन्द्र कुमार झा, रत्नेश्वर सिंह सहित कई गणमान्य भी मौजूद रहे। कार्यक्रम की रूपरेखा से निराला ने परिचित कराया। संचालन विशाल तिवारी व धन्यवाद ज्ञापन संजय सिंह ने किया।


पटना पुस्तक मेला 2022 के दूसरे दिन किताबों की खूब बिक्री हुई। मेले में बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की किताबों से लेकर धार्मिक साहित्य तक की किताबों की खूब बिक्री देखी गई। दोपहर से रात तक मेला परिसर गुलजार रहा। हरिवंश परसाई की कहानी लवर्स रिटर्न पर आधारित नुक्कड़ नाटक का निर्देशन उत्तम कुमार ने संस्था क्रिएशन के बैनर तले किया। नाटक निर्देशक विजय आनंद, राजेश कुमार, अक्षय कुमार, अभिषेक आवेद, अजय कुमार, गुलशन, सन्नू, अमरनाथ, विक्रम, वीणा गुप्ता मुख्य पात्र रहे। समाज में व्याप्त घूसखोरी, दलाली, मुनाफाखोरी‌ एवं प्रशासनिक विफलताओं को नाटक में दर्शाया गया और आम जनता को इसे दूर करने का संदेश दिया गया।
शब्द साक्षी के अन्तर्गत संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित ऋषीकेश सुलभ से युवा कवि अंचित ने बातचीत की। गुफ्तगू कार्यक्रम के अन्तर्गत सिनेमा पर कला समीक्षक विनोद अनुपम और गिरिधर झा ने सिनेमा में बदलाव, सिनेमा का असर और सिनेमा के प्रभाव पर चर्चा की।

हर औरत और लड़की नायिका हैं: जयंती रंगनाथन: पुस्तक मेले में जनसंवाद कार्यक्रम के अन्तर्गत ‘साहित्य में स्त्री नायक’ पर हिन्दुस्तान की वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन, राकेश बिहारी और सिनीवाली शर्मा ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम की शुरुआत साहित्यकार जयंती रंगनाथन से हुई।क्ष कृष्ण काली जैसे पत्रों को पढ़ कर उन्हें हिन्दी साहित्य में रुचि हुई। उनका मानना है कि नायिका वो होती है जो आपका व्यक्तित्व बनाती है। उन्होंने जो जीवन देखा उसके मुताबिक आज भी उत्तर भारत की कई लड़कियों को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा- “साहित्य में जिन नायिकाओं के बारे में लिखा गया है उसमें कॉमन बात यह है कि वे सभी अपने हक के लिए लड़ने वाली हैं।” लेखिका सिनीवाली शर्मा ने अलग-अलग उपन्यासों में महिलाओं की भूमिका का वर्णन किया। उन्होंने रामायण और महाभारत जैसे उपन्यासों में भी महिलाओं के पात्रों की चर्चा की। उनका एक नया उपन्यास भी आने वाला है। राकेश बिहारी जी ने संवाद शीर्षक पर व्यंग्य करते हुए कहा- “क्या हमें महिलाओं को सशक्त सिद्ध करने के लिए पुरुष की परिभाषा देनी जरूरी है ? हमें पितृसत्ता से मिली कुछ शब्दावलियों से मुक्त होना होगा। महिलाओं को सशक्त और शक्तिशाली दिखाने के लिए मर्दानी जैसे शब्दों का प्रयोग करना मुनासिब नहीं है।”
‘सबसे अच्छा समाज वही, जहाँ कमजोर भी सुख से जी सके’: शब्द साक्षी के ही एक कार्यक्रम के अन्तर्गत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अरुण कमल से राकेश रंजन की बातचीत। कार्यक्रम में उनकी अपनी केवल धार, मुक्ति, पुतली में संसार जैसी रचनाओं का जिक्र हुआ। उन्हें पाठकों को अभिभूत कर देने वाली कविताओं को लिखने में आनन्द आता है। अंग्रेजी के शिक्षक होते हुए भी उनके व्यक्तिगत में एक ठेठ हिन्दीपन है। करीब 45 वर्षों से लिखने के बावजूद उनका मानना है कि अब भी उनको बहुत कुछ सीखना बाकी है। और, कोई भी कवि हमेशा शब्दों की खोज में रहता है। उन्होंने कहा- “जो भी श्रेष्ठ लोग लिखते हैं, वे प्रलोभन छोड़ कर आते हैं। सबसे अच्छा समाज वही होता है, जहाँ सबसे कमजोर व्यक्ति भी सुख से जीवन जी सके। किसी भी लेखक का सारा ध्यान लिखने पर और उनके मूल्यों पर होना चाहिए। जब तक साहित्य लिखा जाएगा, तब तक उनकी आलोचनाएं भी होती रहेंगी।”

तीन साहित्यकार हुए सम्मानित: हिन्दी के कथा सम्राट प्रेमचंद ने प्रगतिशील भारतीय जीवन मूल्यों की एक नई व्याख्या दी है। कथाकार प्रेमचंद की महानता भारतीय जीवन को नकारात्मकता में नहीं, बल्कि सकारात्मकता में देखने समझने की रही है। यह कवि तुलसीदास की तरह भारतीय समाज को अमंगल से मंगल की ओर ले जाने के लिए प्रयत्नशील रहे। ये बातें लेखक डॉ० कमल किशोर गोयनका द्वारा लिखित आलेख के द्वारा, डॉ० भावना शेखर के वाचन में कही गई। 66 वर्षीय सुप्रसिद्ध समीक्षक डॉ० कमल किशोर गोयनका को उदय राज स्मृति सम्मान से नवाजा गया, जो अपनी अस्वस्थता के कारण इस सम्मान समारोह में उपस्थित नहीं थे। भारतीय नृत्य कला मन्दिर के सभागार में प्रसिद्ध कथाकार महेश दर्पण, चर्चित व्यंग्यकार सुभाष चंदर और चर्चित कवि शहंशाह आलम को नई धारा से विभूषित किया गया। समारोह की मुख्य अतिथि (पटना पुस्तक मेला आयोजन समिति की सदस्या) सुप्रसिद्ध कथा लेखिका उषा किरण खांन रहीं। प्रथमराज सिंह के हाथों सभी चयनित साहित्यकारों को सम्मान प्रदान किया गया। मुख्य अतिथि और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० उषा किरण खान ने कहा कि नई धारा साहित्यकारों की कई पीढ़ियों को तैयार किया है।

सोमवार 5 दिसम्बर 2022

मोबाइल छोड़िए किताब पढ़िए थीम पर युवाओं में दिखा रूझान
पटना पुस्तक मेला में पुस्तक प्रेमी मोबाइल छोड़िए किताब पढ़िए की थीम की ओर रूझान करते हुए दिख रहे हैं। पुस्तक मेले में दिनों-दिन पुस्तक प्रेमियों की भीड़ बढ़ती जा रही है। स्कूल, कालेज एवं निजी संस्थान में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं ने पुस्तक में किताबें खरीदते दिख रहे हैं। इससे स्पष्ट दिख रहा है कि भले ही मोबाइल पर आनलाइन किताबें बिक रहीं है, लेकिन जब पुस्तक मेला लगते हैं तो पुस्तक प्रेमी किताबें खरीदने जरूर आते हैं। मेले में आई छात्रा कुसुम कुमारी ने कहा- “जब पटना पुस्तक मेला लगता है, तब मैं यहाँ पर आती हूँ। क्योंकि यहाँ पर लगभग सभी तरह की किताबें उपलब्ध है। यहाँ पर आने के बाद एक-दो किताबें खरीद लेती हूँ। हम तो पटना पुस्तक मेला का बेसब्री से इंतजार करते हैं।” भारती सिन्हा ने बताया- “हमलोग भले ही किताबों की मंगाते हैं, लेकिन असली आनन्द तो पुस्तक मेला में ही आता है। मजबूरी में हमलोगों को आनलाइन किताबें मंगाने पड़ते हैं। हालांकि, हम तो सिविल सर्विसेज की तैयारी करती हूँ।”

शिक्षा को केन्द्र में रखे बगैर विकास की कल्पना अधूरी: पटना पुस्तक मेले के नालन्दा सभागार में सोमवार, 5 दिसम्बर को ‘बिहार में शिक्षा’ पर संवाद का आयोजन किया गया। संवाद में बढ़ना है तो पढ़ना सीखो,जो पढ़ेगा वही बढ़ेगा की अपील की गई। कार्यक्रम में राज्य के प्रमुख सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ राजनीति, शिक्षाविद्, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, रंगकर्मी एवं शिक्षण संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए। कलम सत्याग्रह अभियान के संयोजक आनंद माधव ने कहा- “समाज में बदलाव तभी आ सकता है जब नकारात्मक राजनीतिक बहस में बदला जाए। कलम सत्याग्रह मंच का निर्माण बिहार में शिक्षा को मुख्य मुद्दे के रूप में स्थापित करने के लिए किया गया है। जब तक शिक्षा राजनीतिक दलों के केन्द्र में नहीं आएगी, तबतक किसी भी विकास की कल्पना अधूरी है। राज्य के विश्वविद्यालयों में परीक्षा एवं सत्र दोनों लम्बित चल रहे हैं। कलम सत्याग्रह आज अपनी प्रतिबद्धता दुहराता है और यह तय करता है कि राज्य में शिक्षा व्यवस्था में सुधार आने तक हम अपना अभियान जारी रखेंगे और अगर परिस्थिति नहीं बदली तो ये अभियान आन्दोलन का भी रूप ले सकता है।

बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में कलम सत्याग्रह दबाव समूह के रूप में भी काम करेगा और सरकार चाहेगी तो कदम कदम पर एक उसका सहयोग भी करेगी।” आनन्द ने बताया कि राज्य में कुल सरकारी विद्यालयों की संख्या 72,663 है लेकिन 37.1 फीसदी स्कूलों को अपनी जमीन नहीं है।‌ अध्यक्षता करते हुए कलम सत्याग्रह के संस्थापक सदस्य ग़ालिब खान ने कहा- “कलम सत्याग्रह के रूप में बिहार के शिक्षा एवं मानव विकास से जुड़े विभिन्न संगठनों ने संयुक्त रूप से बिहार में शिक्षा की बदहाली पर चिन्ता प्रकट करते हुए नागरिक आन्दोलन की परिकल्पना की है।” मौके पर प्रोफेसर सुधीर कुमार, डॉ० मेहता नागेंद्र प्रसाद सिंह, शशिरंजन, राघव शरण शर्मा, अंशुमन, सौरभ सिन्हा ने भी अपनी राय रखी।‌ संचालन डॉ० मधुबाला ने किया। कार्यक्रम में डॉ० शेफाली राय, डॉ० अदिति त्यागी, डॉ० प्रदीप कुमार, अनीश अंकुर, अणु प्रिया, जयप्रकाश, रूपेश कुमार, रतन कुमार, रूसेन कुमार, कुमुद कुमार समेत अन्य रहे।

जनसंवाद में हुई साहित्य के विभिन्न रूपों पर चर्चा सहित सर्वभाषा कवि गोष्ठी जनसंवाद के अन्तर्गत बिहार के युवा लेखकों द्वारा लिखित कविताओं पर पूनम सिंह, रमेश ऋतंभर, सीमा संगासर तथा अरुण नारायण ने अपने विचार रखे। पूनम सिंह द्वारा ‘बागल वीर’ और ‘रूह लपेटी आग’ जैसे उपन्यासों का वर्णन किया। इस उपन्यास में विस्थापन का दर्द और विध्वंश की लीला का मुख्य रूप से वर्णन है। उन्होंने गीता श्री की उपन्यास ‘आम्रपाली’ तथा रश्मि भारद्वाज का ‘साल बयालीस’ उपन्यास का वर्णन किया। इन लेखकों ने साहित्य के विभिन्न रूपों को अपनी चर्चा में पेश किया। दूसरी वक्ता के रूप में सीमा संगसार ने अशोक पांडे को फोनेटिक के जादूगर कहकर सम्बोधित किया। उन्होंने गीतांजलि श्री की ‘रेत समाधि’, दिव्य विजय का ‘सगबग मन’, योगिता यादव की ‘गलत पतों की चिट्ठियां, रत्नेश्वर सिंह की ‘32,000 साल पहले’ उपन्यास को एक लोकप्रिय उपन्यास बताया। तीसरे वक्ता में रमेश ऋतंभर ने बिहार की युवा कवयित्री अनामिका द्वारा लैंगिक विभेद पर आधारित कविता संग्रह ‘पानी को सब याद था’, ‘पुरुष मित्र’, ‘टोकरी में दिगंत’, ‘मेरे गर्भ में चांद’ का वर्णन किया है। अंत में अरूण नारायण ने सबदर हासमी की कविता का वाचन किया, परमानदं राम की कविता ‘आइना अपना चेहरा नहीं दिखता’, मोहन मुक्त की ‘हिमालय दलित है’, वंदना टेटे की आदिवासी कविता ‘किन्नीर और भाषा को जेंडर मत बनाओ’ का मुख्य रूप से वर्णन किया। कार्यक्रम का संचालन राजेश कमल ने किया।

पटना पुस्तक मेला में ‘आखर’ की ओर से आयोजित “सर्व भाषा कवि गोष्ठी” कार्यक्रम में पाँच अलग-अलग भाषाओं में कविताएं पढ़ी गईं। इसमें डॉ० विद्या चौधरी, प्रभात वर्मा, नेहा नुपुर, डॉ,० पुतुल प्रियंवादा, श्रीकांत व्यास ने भाग लिया। डॉ० विद्या चौधरी ने बज्जिका में स्वयं रचित कविता ‘हम बिहार हथीन’ का पाठ किया। उनकी कविता में कोरोना काल में दूसरे शहरों में काम करने वाले मजदूरों ने जिन संकटों का सामना किया इसका जिक्र है। वहीं प्रभात वर्मा ने मगही में अपनी कविता ‘सुना हमर मगही बातीया’ का पाठ किया। उनकी कविता मगही माई को समर्पित है। उन्होंने कविता में मगही भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की बात कही ‌ नेहा नुपुर ने भोजपुरी में ‘कहला पे लग जाई धक से’ कविता का पाठ किया। उन्होंने ग़ज़ल पढ़ने से शुरुआत की। श्रीकांत व्यास ने अंगिका में 2-3 कविताओं का पाठ किया जिनमें डायन प्रथा पर ‘डायन सिद्ध हो गैल हो गई’, कलयुग के साधुओं पर ‘साधु बड़ा रंगीला छई’ और शिक्षा पर केन्द्रित ‘तेतरी के भेजबो रोज’ स्कूल कविताएं थी। डॉ० पुतुल प्रियंवादा ने मैथिली भाषा में कविता पाठ किया। उनकी कविता में स्त्री को देवी की तरह पूजा तो जाता है, लेकिन उन्हें अपने अधिकार और सम्मान नहीं दिए जाने पर जिक्र है।

डॉ० उपेंद्र नाथ पांडे की लोकाभिराम श्रीराम का किया गया लोकार्पण/विमोचन: पटना पुस्तक मेला में बिहार सरकार के मंत्रिमंडल समन्वय विभाग के पूर्व विशेष सचिव और बिहार प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी डॉ० उपेंद्र नाथ पांडे की पुस्तक लोकाभिराम श्रीराम का बोधगया मुक्ताकाश मंच से भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी राम उपदेश सिंह विदेह ने लोकार्पण किया और कहा कि भारतीय संस्कृति में राम जनचेतना के प्रतीक हैं। कैसे उठना-बैठना है, कैसे चलना-फिरना है, किससे क्या व्यवहार करना है, शोक-विपत्ति में कैसे रहना है, विजय-पराजय पर कैसी प्रतिक्रिया देनी है, यह सब ज्ञान रामकथा सुनने-पढ़ने से हो जाएगा। राम जन-जन में बसे हुए हैं। यह भी कहा कि पुस्तक के वास्तविक लेखक ईश्वर होते हैं। लेखक केवल माध्यम होता है। बताते चलें कि रामउपदेश सिंह विदेह गीता और दुर्गासप्तशती के 700 श्लोकों का पद्यानुवाद करनेवाले और चरितांगद समेत 16 पुस्तकें लिख चुके हैं।

‘लोकाभिराम श्रीराम’ पुस्तक के लेखक डॉ० उपेंद्र नाथ पांडे ने अपनी पुस्तक के विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा- “राम के व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम नामक शोध प्रबन्ध तैयार करते समय अपने मन में इस पुस्तक की रचना की परिकल्पना बनी थी। वैदेही-गाथा के प्रकाशन के बाद इस पुस्तक को जनमानस के सामने लाना समीचीन हो गया‌ था। राम के विराट व्यक्तित्व और तुलसीदास माध्यम से छूने की कोशिश की गई है।” इस वातायन प्रकाशन से प्रकाशित यह डॉ० उपेंद्र नाथ पांडे की चौथी पुस्तक है। इससे पूर्व ‘वैदेही-गाथा’, ‘विचार-कल्प’ और ‘कयाधु नंदन’ ये तीन पुस्तकें छपकर किताबों की दुनिया में आ चुकी हैं। मुम्बई की प्राध्यापक डॉ० लीना झा भी इस अवसर पर उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का संचालन वातायन प्रकाशन के राजेश शुक्ला ने किया। साहू जैन संस्थान, मीरगंज से आए गायक कलाकार कृष्ण कुमार ने विनय पत्रिका और रामचरित मानस के कुछ अंशों का गायन किया। इस अवसर पर IIT मुम्बई की प्राध्यापक लीना झा, पटना पुस्तक मेला के संस्थापक नरेन्द्र कुमार झा, सचिव अमरेन्द्र कुमार झा, राजकीय अतिथिशाला के अधीक्षक केके यादव, मुख्य अभियंता एनके तिवारी, आचार्य भक्तिशरण शास्त्री आदि उपस्थित थे।

माइथोलॉजी की किताबें, स्टोरी बुक और दादी माँ की कहानियां खरीद रहे हैं बच्चे: पटना पुस्तक मेले में किताबों की बहार है। इंदिरा गांधी, गीतांजलि श्री, परवीन शाकिर, गुलजार, जवाहरलाल नेहरू, नरेन्द्र मोदी, महात्मा गांधी जैसी विषयों पर किताबें काफी पसन्द की जा रही हैं। इस साल (२०२२) मेले में कोई कोना सबसे गुलजार है तो वह है बुक स्टॉल जहाँ बच्चे हिन्दी और अंग्रेजी में माइथोलॉजी, स्टोरी बुक और दादी माँ की कहानियां मिल रही हैं। मेले में सिर्फ किताबें नहीं बल्कि नुक्कड़ नाटक, क्राफ्ट, स्टोरी टेलिंग की कार्यशालाएं भी चल रही हैं। खास बात यह है कि मेले की थीम मोबाइल छोड़िए किताब पढ़िए पूरी तरह बच्चों को किताबी दुनिया से जोड़ने में सफल हो रही है।‌ युवाओं की बात करें तो सबसे अधिक रेत समाधि, बोलना ही है, स्वामी विवेकानंद की विभिन्न किताबें खरीदना पसन्द कर रहे हैं। सेंट जेवियर्स स्कूल में पढ़ाई करने वाले नीलकंठ अपनी मम्मी के साथ मेला घूमने आया। उन्होंने बताया- “एक साथ इतनी किताबें देखकर अजीब लग रहा है।” उन्होंने अपनी बहन को कई बार किताबें पढ़ते हुए देखा। उनकी किताबों में फोटो नहीं होती पर उसे फोटो वाली किताबें खरीदना पसन्द है। इसलिए अपने पसंदीदा किरदारों की किताबें खरीदी है। इसमें चाचा चौधरी, छोटा भीम, मोटू-पतलू शामिल है। यूकेजी में पढ़ाई कर रही आयुषी ने बताया- “इस बार मेले में अपनी मम्मी और भाई के साथ आई है। मैं अभी छोटी हूँ मुझे उतने अच्छे से पढ़ना नहीं आता तो चौथी कक्षा में पढ़ने वाले मेरे भइया आयुष मुझे कहानी पढ़कर सुनाते हैं। जिस किताब की पिक्चर अच्छी लगती है उसे भइया को दे देती हूँ और भइया किताबों के बारे में बताते हैं।” डीएवी बीएसईबी स्कूल के चौथी के छात्र आरव ने बताया- “मेले में पहली बार आया हूँ। अभी तक कई बुक्स देखी है, जिसमें से अंग्रेजी भाषा की मायथोलॉजिकल किताबें पसन्द आई हैं। रात में मम्मी स्टोरी सुनाती है, उन्होंने भगवान् से जुड़ी कई कहानियां सुनाई है, जिससे सुनने में मजा आता है।”

पटना पुस्तक मेले का युवाओं के बीच खूब क्रेज देखने को मिल रहा है। युवाओं की भीड़ पुस्तक मेले के कार्यक्रम से लेकर प्रकाशकों व खान-पान के स्टाल तक भारी संख्या में पहुँच रही है। खास बात यह है कि मेले में जाने वाले अधिकतर युवा अपने लक्ष्य से जुड़ी किताबों को पढ़ने व खरीदने में समय लगा रहे हैं। मेले में अलग-अलग कालेजों के अलावा स्कूली छात्र-छात्राओं व प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों में खूब उत्साह दिखता है। छात्र जिन विषयों के बारे में नहीं जानते हैं, उसमें भी रुचि दिखा रहे हैं। छात्रों का कहना है कि मेला परिसर में किताबों की दुनिया के बीच कई तरह की नवीन जानकारियां मिल रही हैं। साथ ही बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, उर्दू अकादमी के स्टाल पर भी महत्त्वपूर्ण किताबों को पसन्द किया जा रहा है। वाणी प्रकाशन के स्टाल पर हमेशा से अधिक बिकने वाली किताबों की तुलना में इस बार नरेंद्र कोहली की पुस्तक ‘न भूतो न भविष्यति’ लोगों को खूब भा रही हैं।‌ अनामिका कहती हैं- “औरतें युवाओं से लेकर बड़े लोगों को भा रही हैं।”

दर्शकों को भा रही श्रीराम शर्मा आचार्य की पुस्तक: पटना पुस्तक मेला में अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा लगाए गए बुक स्टॉल पर बच्चों को मोटिवेट करने वाली पुस्तकें दर्शकों को काफी भा रही है। ऐसे गायत्री परिवार के संस्थापक पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित ३२०० पुस्तकें यहाँ उपलब्ध है। गायत्री परिवार ट्रस्ट,कुरथौल स्थित नव चेतना केंद्र की शांति सिंह, दिनकर सिंह और उपेंद्र प्रसाद ने बताया कि यहाँ पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा लिखित पुस्तक मैं क्या हूँ, ज्ञान यज्ञ अभियान, सफल दाम्पत्य जीवन के मौलिक सिद्धांत, समस्या आज की समाधान कल के, योग, बच्चों को मोटिवेट करने वाली पुस्तक बाल निर्माण आदि पुस्तकें बिक रही हैं। कोई भी व्यक्ति यहाँ से पुस्तक खरीद सकता है और इन पुस्तकों को पढ़कर अपने में बदलाव कर सकता है।

बुजुर्गो को राजनीति तो युवाओं को शायरी पसन्द: पटना पुस्तक मेले में आए बुजुर्गो को राजनीति में रुचि है तो नई पीढ़ी को शेर-ओ-शायरी पसन्द आ रही है। आध्यात्म के साथ ग़ज़ल और सफल लोगों के संघर्ष की कहानियों से जुड़ी पुस्तकें हाथों हाथ खरीदी जा रही हैं। राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर प्रतिनिधि कहानियों की मांग अधिक है। 60 से लेकर 100 रुपए तक में छोटी-छोटी कहानी और किस्से उपलब्ध हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल की संस्कृति वर्चस्व और प्रतिरोध, कैलाश सत्यार्थी की तुम पहले क्यों नहीं आए, काशी नाथ सिंह की काशी का अस्सी, रेणु की मैला आंचल जैसी पुस्तकों की मांग है। बच्चे भी पुस्तकें देखने पहुँच रहे हैं। उनके लिए एक था मोहन और बाबू की पाती जैसी पुस्तकें उपलब्ध हैं। राजकमल प्रकाशन के कर्मी धमेंद्र कुमार व योगेंद्र कहते हैं कि पटना पुस्तक मेले में पाठक महंगी किताबें भी खरीद रहे हैं। वाणी प्रकाशन व ज्ञानपीठ प्रकाशन के रविंदर बताते हैं कि युवा शेर-ओ-शायरी, ग़ज़लें और पाठ्यक्रम से सम्बन्धित पुस्तकें खरीद रहे हैं। अन्य लोग उपन्यास और इतिहास से जुड़ी पुस्तकें टटोल रहे हैं।

मंगलवार 6 दिसम्बर 2022

बोधगया सभागार में ‘समय से संवाद’ पुस्तक का लोकार्पण: प्रेम कुमार मणि और प्रमोद रंजन द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘समय से संवाद’ पुस्तक का लोकार्पण मानवधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, कवि आलोक धन्वा द्वारा किया गया। प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता और गांधीवादी हिमांशु कुमार ‘समय से संवाद: जन विकल्प संचयिता’ के विमोचन समारोह में बतौर मुख्य वक्ता ने एक किस्सा सुनाते हुए कहा- ” मेरे ऊपर सुप्रीम कोर्ट ने 5 लाख का जुर्माना लगाया। हमने कहा कोई जुर्माना नहीं देंगे भले आप हमें गिरफ्तार कीजिए। बस्तर में 16 लोगों की हत्या कर दी गई थीं। एक बच्चे की उंगली काट दी गई थी, एक औरत के सर पर चाकू मार दिया गया था। मैं उसी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा आपको पुलिस की जाँच पर भरोसा करना चाहिए था। मैंने कहा कि यहाँ पुलिस ही तो आरोपी है। सभी प्राकृतिक संसाधनों की मालिक जनता है। सरकार पूंजीपतियों के लिए संसाधनों पर कब्जा करना चाहती है। इसके लिए जनता के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है। यह युद्ध जनता पर थोपा गया है। हमारे सिपाही इन दिनों सबसे ज्यादा आदिवासी इलाकों में हैं। आप खुद सोचें कि वे क्यों गए हैं ? वे पूंजीपतियों के लिए संसाधनों पर कब्जा करने गए हैं।

सरकार का जनता के खिलाफ यह छिपा हुआ युद्ध है। यह युद्ध अब आदिवासी इलाकों पर सीमित नहीं है, बल्कि अब देश भर में फैल रहा है। यह आपके दरवाजे पर भी आएगा।” प्रमोद रंजन ने कहा- “कालजयिता के चक्कर में प्रासंगिकता को छोड़ देता है। आज से १५ वर्ष पहले वैश्वीकरण के बारे में यह स्ट्रैंड लिया था कि हमें अपनी शर्तों के साथ उसमें शामिल होना चाहिए था।” प्रेम कुमार मणि ने बताया कि मेरे व प्रमोद रंजन के सम्पादन में जनविकल्प पत्रिका निकलती थी। इसके 11 अंक निकले थे। उसी पत्रिका में छपे लेखों को लेकर यह किताब छपी है। लोकार्पण में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता और संस्कृतकर्मी मौजूद रहे। इस अवसर पर अतुल माहेश्वरी, जफर इकबाल, पंकज शर्मा, दानिश, संतोष, राघव शरण शर्मा, विधुतपाल, राकेश रंजन, मनोज कुमार सहित अन्य लोग भी उपस्थित रहे।‌

अब कोई भी विषय अकाव्योचित नहीं : सेंटर फॉर रीडरशिप डेवलपमेंट के द्वारा आयोजित पटना पुस्तक मेला के बोधगया सभागार में जन संवाद के अन्तर्गत ‘काव्य की नई परम्परा’ विषय पर समीर परिमल, संजय कुमार कुंदन तथा IIT मुम्बई की प्राध्यापक लीना झा द्वारा अपने विचार व्यक्त किया गया। विषय पर बोलते हुए शायर समीर परिमल ने कहा- “काव्य की नई परम्परा यही है कि यह परम्परागत निश्चित पैटर्न का निषेध करती है। आज की कविता भोगे हुए यथार्थ का चित्रण करती है। आज कोई भी विषय अकाव्योचित नहीं है।” संजय कुमार कुंदन ने अपने सम्बोधन में विषय को विस्तार देते कहा- “चूंकि साहित्य समाज का दर्पण है, इसलिए जब समाज अपनी पुरातन परम्पराओं के बंधन तोड़ रहा है तो काव्य की पुरानी परम्पराओं को टूटना अस्वाभाविक नहीं है।” विदुषी लेखिका प्राध्यापक लीना झा ने काव्य की नई परम्पराओं पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा- “नई परम्पराओं ने आधुनिक कविता को समृद्ध किया है। कविता छंदबद्ध हों या छंदमुक्त, उसकी सबसे पहली आवश्यकता है कविता होना, उसमें आंतरिक लय का होना। कार्यक्रम का संचालन किया ज्योति स्पर्श ने। इससे पूर्व CRD ने तीनों वक्ताओं को पटना पुस्तक मेला 2022 का थैला/झोला देकर सम्मानित किया। दर्शक दीर्घा में उपेंद्र नाथ पांडे, रश्मि गुप्ता,राज कांता, चंदन द्विवेदी समेत सैकड़ों पुस्तक एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

गीता प्रश्नोत्तरी का हुआ विमोचन:
बोधगया मुक्ताकाश मंच पर प्रसिद्ध लेखिका डॉ० ममता मेहरोत्रा की पुस्तक गीता प्रश्नोत्तरी का विमोचन बिहार विधान परिषद के सभापति देवेश चंद्र ठाकुर ने किया। विमोचन समारोह में उद्योग विभाग के विशेष सचिव और साहित्यकार दिलीप कुमार, गजलकार समीर परिमल, सामाजिक कार्यकर्ता पंकज सिंह भी मंचासीन रहे। पुस्तक विमोचन के उपरान्त बिहार विधान परिषद के सभापति देवेश चंद्र ठाकुर ने कहा- “यह पुस्तक समाज को मार्गदर्शन देने का काम करेगा। ममता मेहरोत्रा की लेखनी ने लम्बा सफर तय किया है। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपनी यात्रा शुरुआत करते हुए सबसे पहले अनुभव आधारित पुस्तकें लिखीं और फिर कथा, नाटक, शैक्षणिक पुस्तकें आदि लिखने के बाद अब गीता पर यह पुस्तक लिखी है जो युवाओं के लिए तो उपयोगी हैं ही, यह सब के लिए उपयोगी है। इस पुस्तक से हमें पता चलता है कि गीता का सार क्या है। धर्म के रास्ते पर चलते हुए लक्ष्य को प्राप्त करना हमारे जीवन का ध्येय होना चाहिए। ममता मेहरोत्रा दूरदर्शी होने के साथ-साथ काफी मेहनती भी हैं।”

लेखिका ममता मेहरोत्रा ने कहा- “यदि हम नियमित रूप से गीता का अध्ययन करें तो जीत-हार, मित्र-शत्रु, उत्थान-पतन के द्वंद्व का बेहतर तरीके से सामना कर पाएंगे। हम सबके अन्दर असीम क्षमताएं हैं जिसका ज्ञान कराने के लिए हमें मधुसूदन यानी कि एक सच्चे गुरु की आवश्यकता है। महाभारत युद्ध केवल दौरान कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन का मार्गदर्शन भगवान श्रीकृष्ण ने किया। हम सब को भी अपने जीवन में मार्गदर्शन करने वाला सच्चा गुरु प्राप्त हो। गीता सिर्फ धर्मग्रंथ नहीं है बल्कि हमारा सहचर, सखा और मार्गदर्शक भी है।” कार्यक्रम में समीर परिमल ने कहा- “डॉ० ममता मेहरोत्रा ने 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं हैं और उन्होंने अलग-अलग विषयों पर लिखा है जिससे उनकी विद्वता जाहिर होती है। विमोचन समारोह का संचालन श्वेता गजल ने किया। विमोचन के समय डॉ० पूनम चौधरी, मुकेश महान, विभा सिंह, आशुतोष मेहरोत्रा, दिव्या यादव, एंजेल, राज कांता, सुधा पांडे, डॉ० नीलू नवगीत, मीना परिवार, रत्नेश्वर आदि की उपस्थिति रही।

बिहार के अतीत और वर्तमान की झलक: पुस्तक मेला में सूत्रधार खगौल द्वारा वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत लिखित नीरज कुमार द्वारा निर्देशित नाटक ‘मैं बिहार हूँ’ नुक्कड़ नाटक की भावपूर्ण प्रस्तुति की गई। सूत्रधार के महासचिव नवाब आलम ने कहा- “यह नाटक बिहार के अतीत और वर्तमान को सजीवता से दिखाता है।” साहित्यकार प्रसिद्ध यादव ने नाटक को दिल छू लेने वाला बताया। पत्रकार मोईन गिरिदिहृ ने कलाकारों को प्रोत्साहित किया। नाटक में महात्मा बुद्ध, वैशाली गणराज्य, महावीर, शहीद पीर अली, कुंवर सिंह, चम्पारण सत्याग्रह, गांधी जी, किसान आन्दोलन, स्वामी सहजानंद सरस्वती, मजदूर, किसान की दयनीय स्थिति, पलायन, भुखमरी, जेपी आन्दोलन, जातिवाद, धर्म, मजहब, नक्सल आन्दोलन, गया के ता़ती टोला शिक्षा, नालंदा, राजगीर, बोधगया, गंगा, बाढ़, सुखाड़ को कलाकारों ने अपने कला एवं संवाद से दर्शकों का दिल छू लिया। पटना पुस्तक मेला के संस्थापक ने कलाकारों के मनोबल को बढ़ाया। कलाकारों में नीरज कुमार, शशि भूषण कुमार, दीपक कुमार,रत्नेश कुमार,सुधीर कुमार सिंह आदि ने अपने अभिनय से दर्शकों को खासा प्रभावित किया।

और कुंदन ने परिवार को टूटने से बचा लिया: पटना पुस्तक मेला में ‘माध्यम फाउंडेशन पटना’ द्वारा नुक्कड़ नाटक ‘खुच्चड़’ की प्रस्तुति की गई। नाटक ‘खुच्चड़’ प्रेमचंद की कहानी खुच्चड़ पर आधारित है जिसका नाट्य रूपांतरण एवं निर्देशन धर्मेश मेहता ने किया है। माध्यम फाउंडेशन द्वारा प्रस्तुत नाटक खुच्चड़ की कहानी कचहरी में काम करने वाले मुंशी कुंदन लाल और उनकी पत्नी रामेश्वर एवं उनके मित्र बाबूलाल के जीवन शैली एवं कार्य शैली के इर्द-गिर्द घूमती है। यह एक पारिवारिक एवं सामाजिक हास्य व्यंग नाटक है: कुंदन लाल आदत से लाचार है, बात बात में अपनी पत्नी और सहकर्मी को उपदेश देना ना भूलते हैं जिसके कारण बात बात में तू तू मैं मैं से बात आगे बढ़ कर रोने धोने तक पहुँच जाती है तो उनकी पत्नी रमेश्वरी उन्हें सीधा करने के लिए ट्रिक अपनाती है कि जो कहेंगे वही करेंगें ना एक इंच कम ना ज्यादा। इससे घर में समस्या उत्पन्न हो जाती है फिर कुंदन लाल अपनी समझदारी का परिचय देते हुए पत्नी से माफी मांग कर परिवार को टूटने से बचा लेते हैं और दोनों एक दूसरे को समझते हुए खुशी खुशी रहने लगते हैं। नाटक को नुक्कड़ में साकार किया- धर्मेश मेहता, हौव्हिन्स कुमार, सोनल कुमारी, अभिषेक कुमार, अमित गुप्ता, मोहम्मद बदरुद्दीन,तस्व हुसैन, मनोज कुमार।


पुस्तक डिजिटल इंडिया पर हुई चर्चा: नालंदा सभागार में ३ बजे दूरदर्शन समाचार के सहायक निदेशक अजय कुमार की पुस्तक डिजिटल इंडिया पर एक चर्चा का आयोजन किया गया। इस चर्चा में जगजीवन राम राजनीतिक शोध संस्थान के निदेशक डॉ० नरेंद्र पाठक ने कहा- “हमारा देश तेजी से डिजिटल होता जा रहा है, इस बदलाव का हमें स्वागत करना चाहिए।”
बदलाव की नीति अपनाने की जरूरत: पटना पुस्तक मेले में शब्द साक्षी कार्यक्रम के अन्तर्गत ‘नई शिक्षा नीति’ विषय पर मनीष वर्मा, कुमार चंद्रदीप और डॉ० अनिल कुमार राय ने अपने विचार व्यक्त किए। मनीष वर्मा ने कहा कि बदलाव अच्छा होता है, इसलिए हमें इस नीति को अपनाना चाहिए।

बुधवार 7 दिसम्बर 2022

स्क्रीन से पढ़ना गलत नहीं, क्या पढ़ रहे हैं यह महत्त्वपूर्ण है: पटना पुस्तक मेला में स्क्रीन टाइम बनाम किताब विषय पर जनसंवाद का आयोजन किया गया। इस मौके पर साइबर क्राइम विभाग के आइपीएस सुशील कुमार ने कहा- “90% लोग इस बात से चिन्तित हैं कि बच्चों का स्क्रीन टाइम दिन पर दिन बढ़ रहा है।” उन्होंने आनलाइन गेम्स, सोशल मीडिया को स्क्रीन टाइम का मुख्य कारण बताया। सबसे पहले लेखक और ब्लॉगर प्रभात रंजन ने कहा- “स्क्रीन टाइम पढ़ने और लिखने का जुनून कम नहीं करता। स्क्रीन टाइम ने विमुख होते बच्चों को भी वापस एकत्रित किया है।” एएन कॉलेज में हिन्दी की प्राध्यापिका भावना शेखर ने कहा- “स्क्रीन से पढ़ना गलत नहीं बल्कि, हम क्या पढ़ रहें यह महत्त्वपूर्ण है। आज पुस्तकों के आनलाइन आ जाने से उनकी उपलब्धता बढ़ गई है और हम एक साथ कई किताबों का संग्रह अपने साथ ले कर चलते हैं, लेकिन किताबें हमें पढ़ने के लिए आमंत्रित करती हैं जो कि किंडल या फोन में रखी किताबों की ओर आकर्षण कम होता है।” उन्होंने बच्चों को जीवनी पढ़ने के लिए प्रेरित भी किया। शब्द साक्षी कार्यक्रम में संतोष दीक्षित और अंकित के बीच बातचीत हुई।

संतोष दीक्षित ने कहा- “आज विकास का सम्बन्ध सड़कें बनवाने और इमारत खड़ी करने से होता है, चीजें बनवाने से कुछ नहीं होगा, लोगों को विचारधारा भी बदलनी होगी।” अंत में दिवंगत नरेंद्र कोहली का स्मरण करते हुए उन्हें नमन भी किया गया। साइबर क्राइम में कार्यरत आइपीएस सुशील कुमार ने इस वर्ष के पुस्तक मेला की थीम ‘मोबाइल छोड़िए‌ किताब पढ़िए’ की सराहना की। उन्होंने सूचित किया कि स्क्रीन टाइम की शुरुआत -1897 में हुआ और लगभग 90 प्रतिशत लोग इस बात से चिन्तित हैं कि बच्चों की स्क्रीन टाइम दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। उन्होंने आनलाइन गेम्स, सोशल मीडिया को स्क्रीन टाइम का मुख्य कारण बताया। सबदर हाजमी के कविता की कुछ पंक्तियों के साथ अपने भाषण को विराम दिया।

गौरैया पर दो पुस्तकें खींच रही हैं पाठकों का ध्यान: पटना पुस्तक मेला में बिहार की राजकीय पंक्षी गौरैया के संरक्षण को लेकर गौरैया संरक्षण में वर्षों से सक्रिय लेखक संजय कुमार की दो पुस्तक ‘ओ थी गौरैया’ और ‘अभी मैं जिन्दा हूँ’ गौरैया के प्रति लोगों की रुचि बढ़ती जा रही है। इन किताबों से गौरैया युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित कर रही है। युवाओं का मानना है कि इस किताब के माध्यम से गौरैया के बारे में अधिक से अधिक जानकारी मिल जाएगी।
‘आज कल नाटक’ विषय पर पटना पुस्तक मेला में परिचर्चा: रंगकर्मियों-कलाकारों के साझा मंच हिंसा के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी की ओर से पटना पुस्तक मेला के नालन्दा सभागार में नाटक को लेकर विमर्श का आयोजन किया गया। विमर्श का विषय था आज कल नाटक विमर्श में पटना रंगमंच के कलाकार, रंगकर्मी, सुधी दर्शक व सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे। पटना पुस्तक मेले में वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल अंशुमन ने कहा- “रंगमंच में रंग-बिरंगे कर्म सबसे अधिक पल्लवित-पुष्पित हो रहे हैं। नाटक को भारत में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र तो वैश्विक स्तर पर ब्रेख्त ने सामाजिक सरोकार से जोड़ा। 1980 से 1990 दशक के अन्दर काफी नुक्कड़ नाटक हुआ।

इस विधा पर हो हल्ला करने का आरोप लगा। जो लोग नुक्कड़ नाटकों पर प्रचार का आरोप लगाते थे, वही लोग आज सबसे बढ़ कर प्रोजेक्ट के नाम पर नुक्कड़ नाटक कर रहे हैं। बाजार और कॉरपोरेट ने इसका इस्तेमाल किया है। प्रोफेशनलिज्म के खोल के अन्दर कॉमर्सियलिज्म को बढ़ाया जा रहा है। नाटक यदि सामाजिक जरूरत है तो उसे हमें फिर से समझना होगा।” परिचर्चा में अभिनेत्री ऐनाक्षी डे विश्वास ने कहा- “थियेटर डिजिटल बन गया है। जल्दबाजी में नाटक होता है। समय नहीं दिया जाता। नाटक की समीक्षा नहीं होती। आज कल डायरेक्टर एक्टर को पपेट समझते हैं। नाटक, नाटक कम चित्रहार की तरह नजर आता है।” राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित रंगकर्मी रणधीर कुमार ने कहा- “समय के साथ चीजें बदलती हैं, उसे समझना होगा। परफार्मिंग आर्ट में थिएटर में काफी दिक्कतें हैं जिन पर बात होनी चाहिए।” संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष आलोक धन्वा ने कहा- “रंगकर्मियों को पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देना चाहिए, नुक्ता कहाँ लगेगा यह सीखना चाहिए। रुपवाद की तरफ नहीं जाइए। असली बात कथ्य है। कथ्य आपको रात भर बेचैन रखेगा। जैसे ग़ालिब को रात भर नींद नहीं आती थीं। नाटक और सिनेमा में कोई झगड़ा नहीं है। हमने इमरजेंसी में उत्पल दत्त को पटना में हजारों लोगों के साथ देखा। उनके कल्लोल नाटक देखा, जनता के पास जाइए दूसरा कोई उपाय नहीं जितने बड़े नेता हुए सबों को जनता के पास जाना होगा। ‌लोकतंत्र में यदि 5 आदमी भी हो तो उसको बोलने का मौका मिलना चाहिए। जैसी बाढ़ आ रही है अमेरिका,ब्रिटेन,चीन में वैसी बाढ़ पिछले 500 साल में नहीं आई थीं।” इस मौके पर वरिष्ठ रंगकर्मी वीरेंद्र कुमार, शायर संजय कुमार कुंदन, भिखारी ठाकुर स्कूल आफ ड्रामा से जुड़े चर्चित नाटककार व निर्देशक हरिवंश, वरिष्ठ रंगकर्मी अतिरंजन, चर्चित कवि आलोक धन्वा समेत कई रंगकर्मियों ने भी विचार रखे। अतिथियों का स्वागत जयप्रकाश ने किया जबकि संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश रंजन तथा धन्यवाद ज्ञापन गौतम गुलाल ने किया।

पटना पुस्तक मेला में फैजाबाद, लखनऊ व जम्मू की पूछ, कद्रदानों की भीड़ : पुस्तकों की ज्ञान गंगा से पाटलिपुत्र की धरती तृप्त हो रही है। गांधी मैदान में आयोजित पटना पुस्तक मेला में पुस्तकों के कद्रदानों की भीड़ खूब उमड़ रही है। पुस्तक मेले में फैजाबाद, लखनऊ और जम्मू पर आधारित पुस्तकों की मांग है। वाणी प्रकाशन के स्टॉल पर नदीम हसनैन की पुस्तक दूसरा अध्याय, यतीन्द्र मिश्र सम्पादित पुस्तक शहरनामा फैजाबाद, किरण कोहली नारायण की पुस्तक कश्मीरवादी की असली कहानी समेत अन्य पुस्तकें पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही है। राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर बाबा नागार्जुन, दिनकर समेत बिहार के अन्य रचनाकारों की पुस्तक पाठकों का ध्यान खींच रही है। यूं तो हर तरह की पुस्तकें बिक रही हैं लेकिन महापुरुषों और इतिहास से जुड़ी पुस्तकों की बिक्री खूब हो रही है। मेले में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस आदि महापुरुषों से जुड़ी पुस्तकें काफी डिमांड में हैं। वहीं दूसरी ओर विभिन्न ऐतिहासिक विषयों पर लिखी किताबें भी पाठकों को पसन्द आ रही हैं। कश्मीर पर लिखी किताब हो या पटना पर लिखी किताब या अन्य ऐतिहासिक घटनाओं पर अच्छी संख्या में बिक रही हैं। मेले में पौराणिक पुस्तकें भी खूब बिक रही हैं। ये किताबें हर वर्ग के पाठकों के बीच लोकप्रिय हैं। मेले में लोगों का रुझान धार्मिक पुस्तकों की खरीदारी पर तो है ही।

बिहार की भाषा सांस्कृतिक अतीत और वर्तमान का दर्शन, संग्रहण का दुर्लभ अवसर सुलभ है, पटना पुस्तक मेला के बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् स्टॉल में बिहार के साहित्य गौरव की कृतियां उपलब्ध हैं। महामहोपाध्याय रामावतार शर्मा, महामहोपाध्याय गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, महाकवि सोमदेव भटृ, पण्डित केदार नाथ शर्मा, पण्डित जटाशंकर झा, प्रफुल्ल चन्द्र ओझा मुक्त, महामहो पंडित राहुल सांकृत्यायन, डॉ० बासुदेव अग्रवाल, पण्डित केदारनाथ शर्मा सारस्वत, आचार्य शिवपूजन सहाय, डॉ० धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री, डॉ० भुवनेश्वर नाथ मिश्र ‘माधव’, पण्डित मोहन लाल महतो वियोगी, त्रिवेणी प्रसाद सिंह ICS, फादर कामिल बुल्के,नलिन विलोचन शर्मा, पण्डित हंस कुमार तिवारी, रामनारायण शास्त्री, परशुराम चतुर्वेदी,डा डॉ० रामवृक्ष बेनीपुरी, डॉ० शिवनन्दन प्रसाद, डॉ० लक्ष्मी नारायण सुधांशू जैसे विद्वान। यशस्वी साहित्यकारों, विद्वानों की साहित्य और संस्कृति पर लिखित पुस्तकें बिहार के गौरवशाली साहित्य विरासत की चेतना जगानेवाली हैं। परिषद् के निदेशक सत्येन्द्र कुमार के निर्देशन में पटना पुस्तक मेला में परिषद् के साथ-साथ बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी का भी स्टॉल लगा है। मेले में रोजाना ही कई तरह के सांस्कृतिक, सामाजिक व साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। मेला परिसर में दोपहर में नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति होती है। वहीं मंचों पर विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श भी।

वृहस्पतिवार 8 दिसम्बर 2022

कवि सम्मेलन- मैं जन्मजात हिन्दी वाला, हिन्दी में हंसता-रोता हूँ: CRD कवि से मिलिए सम्मेलन के डॉक्टर विनय कुमार विष्णुपुरी ने अपनी काव्य यात्रा का अनुभव साझा किया। विष्णुपुरी साहित्य के साथ-साथ समाज और राजनीति से भी गहरे जुड़े हैं। मुखिया भी रह चुके हैं। ट्रेड यूनियन में मंत्री, महामंत्री अध्यक्ष भी रहे राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर साहित्य परिषद् के अध्यक्ष, बज्जिका साहित्य परिषद् के अध्यक्ष हैं डॉक्टर विनय कुमार विष्णुपुरी। ‘प्यार’ शीर्षक से अपनी कविता में भाव व्यक्त करते हुए विष्णुपुरी ने प्यार का अपना अनुभव कविता की पंक्तियों में साझा की। ‘इंतजार’ शीर्षक से अपनी कविता में मुश्किलों के बावजूद खिल उठने का जज्बा व्यक्त किया। प्रखर कवि आनंद किशोर शास्त्री ने हिन्दी हित चिन्तन को अपनी कविता में गाते हुए कहा- “मैं जन्मजात हिन्दीवाला, हिन्दी में हंसता-रोता हूँ। हिन्दी में जीता मरता हूँ, हिन्दी में जागता सोता हूँ!”

मोबाइल वरदान है बशर्ते गीता के दो श्लोक साथ में रहे: पटना पुस्तक मेला के नालन्दा सभागार में पटना पुस्तक मेला के थीम ‘मोबाइल छोड़िए‌ किताब पढ़िए’ पर प्रेरक व्याख्यान देते हुए योग विशेषज्ञ हृदयनारायण झा ने कहा- “मोबाइल जब से आया है काव्य सृजन की धारा में भी बदलाव आया है। पूर्वज यशस्वी कवियों, साहित्यकारों के अंशदानों को पएने की प्रवृत्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मोबाइल जीवन के लिए वरदान भी है और अभिशाप भी। वरदान इस अर्थ में कि मोबाइल में ज्ञान, विज्ञान, कला,कौशल का समग्र उपलब्ध है। अभिशाप इस रूप में कि हिंसा, हिंसक झड़प,अनाचार, दुराचार, व्यभिचार, पशुवत व्यवहार, आश्लील आडियो, वीडियो,मैसेज आदि का साम्राज्य बसा हुआ है मोबाइल में। ‘मोबाइल छोड़िए‌ किताब पढ़िए’ थीम हम सभी मोबाइल यूजर के लिए संदेश देता है कि हम अभिशाप से बचें और वरदान से अपने जीवन को सफल बनाएं।

इसके लिए श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का दो श्लोक औषधि के समान है। वह श्लोक है- ‘ध्यायतो विष्यान्युंस: संगस्तेसुपजायते। संगत संजायते काम: कामात् क्रोधोमिजायते’ क्रोधाद्भवति समारोह सम्मोहातस्मृति विभ्रम: स्मृति भ्रंशाद् बुद्धि नाशो बुद्धि नाशात् प्रणश्यति ‘ अर्थात् जिस विषय में चित लग जाता है उसमें आसक्ति हो जाती है आसक्ति से कामना,कामना पूर्ति में बाधा उत्पन्न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से संमोह अर्थात् मूढ़ता की स्थिति बन जाती है स्मृति का नाश हो जाता है और इस प्रकार वह जीवन नष्ट हो जाता है। मोबाइल के साथ ये दो श्लोक साथ में रखें तो मोबाइल वरदान बनाने की दिशा में प्रवृत्ति होगी।” अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उत्तर प्रदेश में प्रतिभागिता का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा- “नई शिक्षा नीति 2020 में कॉलेज एवं विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से अपेक्षा की गई है कि उनमें वैश्विक नागरिक बोध हो साथ ही सामाजिक दायित्व के प्रति भी वे जागरूक हों ‌ केन्द्र सरकार स्तर पर इसके लिए मास्टर ट्रेनर बनाने की योजना आरम्भ की गई है किन्तु बिहार में इस दिशा में कार्य होना अभी बाँकी है।”

इतिहास लेखन में तथ्य ही ईश्वर: बोधगया मुक्ताकाश मंच पर साहित्य की धारा से इतिहास की मूल बातों के साथ गुमनाम नायकों को पटना पुस्तक मेला में ठौर मिला। वृहस्पतिवार (8 दिसम्बर 2022) को मंच पर दैनिक जागरण के एसोसिएट एडिटर अनंत विजय थे। ‘आजादी के 75 साल’ विषय पर प्रोफेसर दिव्या गौतम से बातचीत में अनंत विजय ने कहा- “इतिहास लेखन में तथ्य ही ईश्वर है। हमारे यहाँ तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर इतिहास लिखा गया। 75 साल की गड़बड़ी में कुछ अच्छे कार्य भी हुए। इतिहास लेखक न्यायाधीश की तरह है। इसलिए इतिहास को इतिहास की तरह ही लिखा जाना चाहिए, लेकिन हमारे इतिहास लेखन की प्रविधि में भारत भूमि के नायकों के कार्यों पर कम स्थान मिला। हम आजादी के अमृत महोत्सव के 75 साल में जनता को जनतंत्र का मतलब नहीं समझा सके। भारत के लोग विदेश की ज्ञान परम्परा से ज्यादा आक्रांत हुए। संविधान के पहले संशोधन के बाद से ही पाबंदियां लगाई जाने लगीं। शिक्षा के क्षेत्र में कम काम हुए। हमारी शिक्षा का बजट हिन्दी से ज्यादा उर्दू के लिए है। फैज को पढ़ने में कोई आपत्ति नहीं, मगर फैज के साथ हरिवंश परसाई को भी पढ़ाया जाना चाहिए। निराला, दिनकर और रेणु को भी उर्दू के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।” पुराने दौर की बातें करते हुए उन्होंने कहा- “उस समय मन्दिरों पर हमला नहीं, हमारी संस्कृति पर आक्रमण किया गया।”

गंगा के साथ जमुना भी बहनी चाहिए: अनंत विजय ने कहा- “दास्तानगोई में कथा वाचन को भूलना ठीक नहीं। यह विदेश की चीजों का हम पर आधिपत्य दिखाता है। हम गंगा जमुना की जगह भारतीय तहजीब क्यों नहीं कहते ? होना तो ये चाहिए कि गंगा भी बहे और जमुना भी।” बातचीत के दौरान चर्चा सिनेमा पर भी आई। अनंत ने कहा- “फिल्मकार कभी समाज सुधारक नहीं हो सकता। वह माहौल देखकर मुनाफा कमाने के लिए फिल्म बनाता है।”
पटना पुस्तक मेला में साक्षी कार्यक्रम: पुस्तक मेले में आज (वृहस्पतिवार 8 दिसम्बर 2022) तरह-तरह के कार्यक्रम का आयोजन किया गया। साक्षी कार्यक्रम के तहत् पद्मश्री उषा किरण खान और भावना शेखर (एएन कॉलेज हिन्दी विभाग की अध्यापिका) के बीच बातचीत हुई। उषा की लेखनी में प्रेमचंद और रेणु जी का सामंजस्य है। प्रेमचंद को वह बहुत बड़ा कथाकार मानती हैं। नागार्जुन का उनके जीवन में बहुत प्रभाव रहा है। इस मौके पर उषा किरण खान ने कहा- “उन्हें पढ़ने का शौक बचपन से ही था। कहानियों के माध्यम से अपने भाव को बेहतर तरीके से व्यक्त किया जा सकता है, जो कविता के जरिए नहीं हो सकता। मैं आज भी बैलगाड़ी और नाव से अपने गाँव जाती हूँ। युवा कथाकारों को अपने गाँव से जुड़ना चाहिए। आज के लेखकों की जीवन पद्धति बदलने से लिखने की शैली में परिवर्तन हुआ है। नए पाठक सिर्फ समीक्षा पढ़ते हैं और टिप्पणी कर देते हैं। नए लोगों को विस्तार से किताब पढ़ने की जरूरत है।” पुस्तक मेले में शब्द साक्षी कार्यक्रम में मनोचिकित्सक एवं कवि डॉ० विनय कुमार और नताशा के बीच भी बातचीत हुई। डॉ० विनय कुमार ने कहा- “कविता से खाली कोई समाज कभी रह नहीं सकता है। यदि भाषा एक दीवान-ए-आम है तो कविता दीवान-ए-खास है। कविता उपचार का माध्यम भी है।” उन्होंने मगही साहित्य पर आधारित अपने अनुभवों को साझा भी किया।

‘अवधेश प्रीत: लिखी हुई चीज बहुत दूर तक असर करती है’: शब्द साक्षी कार्यक्रम के अन्तर्गत अवधेश प्रीत और मो. दानिश के बीच बातचीत हुई। अवधेश प्रीत ने कहा- “कोई भी लिखी चीज बहुत दूर तक असर करती है। लेखन अपनी बात कहने का एक जरिया है और पढ़नेवालों पर कहीं न कहीं असर जरूर डालता है। जनसत्ता के दौर में पत्रकारिता में रचनात्मकता थी। मैं चार दशक से पटना में ही रह रहे हैं।”
अशोक राजपथ, हमजमीन, जैसे उपन्यासों की चर्चा: हमजमीन का मंचन दो बार कालिदास रंगालय में किया जा चुका है। अवधेश प्रीत का मानना है कि जब समकालीन लेखक आपकी रचना को अपनाते हैं और सहारते हैं, तो लिखने का श्रम वसूल हो जाता है। रूई लपेओ आग में पोखरण परमाणु परीक्षण, उद्योगीकरण जैसे मुद्दों का वर्णन है। अपनी पुस्तकों में अलग-अलग भाषा का प्रयोग करते हैं ताकि पात्र विश्वसनीय लगे। उनकी उपन्यासों में हिन्दी, उर्दू,बंगाली,,अवधि जैसी भाषाओं का इस्तेमाल किया है। उनकी नई पुस्तक में सत्ता का क्रूर चेहरा सामने लाया गया है। उनकी पुस्तक चांद के पार एक चाभी एक सच्ची घटना पर आधारित है।

पाठकों की बात: ‘प्रतियोगी परीक्षा से लेकर साहित्य, संस्कृति धार्मिक व अन्य सभी तरह की किताबें आसानी से मिल रही है। मैंने प्रतियोगी परीक्षा व साहित्य की किताबें खरीदी। यहाँ किताब ढूंढ़ने में दिक्कत नहीं है। किताबों का संग्रह बढ़िया है।’
-खुशबू, सासाराम
‘यहाँ किताबों को देखकर बहुत बढ़िया लगा। मैंने अपनी पसंद की किताब में अजीज प्रेमजी की आत्मकथा और चैतन्य महाप्रभु से जुड़ी किताब खरीदी है। पुस्तक मेला में सामान्य ज्ञान व प्रतियोगी परीक्षा की किताबें विशेष छूट पर मिल रही है।’
-काव्या, पटना सिटी
‘बीएससी की पढ़ाई कर यही हूँ। मेला की खासियत है कि इसमें घूमने से ही किताबें पसंद आ रही हैं। अलग अलग सेगमेंट की किताबें खूब बिक रही हैं। कई ऐसी किताबों को देखा जिसके बारे में पहले से जानते तक नहीं थे। मेरी मनपसंद कई किताबों को खरीदना आसान हो गया।’
–विद्या भारती, औरंगाबाद

पटना के पुस्तकप्रेमी किताबों को सीने से लगाए फिरते हैं:‌ बिहार के पाठकों की पुस्तकप्रियता अद्भुत है। पटना के पाठक तो किताबों को सीने से लगाए फिरते हैं। बिहार के लोगों के पुस्तक प्रेम की चर्चा देश भर में होती है। पटना पुस्तक मेले में एक विशेष सत्र में भाग लेने पहुँचे वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित लेखक अनंत विजय ने हिन्दुस्तान से खास बातचीत में कहा- “पटना पुस्तक मेले से जुड़ाव तो छात्र जीवन से ही रहा है। जब से जमालपुर में छात्र जीवन में थे तो कक्षाएं छोड़कर पुस्तक मेले में आया करते थे। आज भी उन दिनों खरीदी गई निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, अमृत लाल नागर की पुरानी किताबें देखकर स्मृतियां जीवंत हो जाती हैं। दरअसल, पटना पुस्तक मेला एक मेला तक सीमित नहीं, यह सांस्कृतिक मेल-जोल की सुन्दर जगह है। इस बार पुस्तक मेले का क्षेत्रफल भले ही छोटा है लेकिन समृद्ध है। इस बार युवाओं की मेले में उपस्थिति से यह आयोजन और समृद्ध हो गया है। प्रकाशकों के पास किताबों की अच्छी रेंज है। इंटरनेट पर उपलब्ध किताबों या आनलाइन सामग्री में प्रामाणिकता का अभाव होता है। कई किताबों की आनलाइन उपलब्धता भी नहीं हो पाती लेकिन पुस्तक मेले में वे दुर्लभ किताबें भी उपलब्ध हो जाती हैं। इस बार विविध विषयों पर आधारित किताबों की बड़ी रेंज दिखी।

साहित्य अब केवल कविता या कहानी तक ही नहीं है। अब जीवनी, विज्ञान, यात्रा वृत्तांत, फिल्म और पटकथा लेखन से जुड़ी किताबें भी खरीदी-पढ़ी जा रही हैं।‌ इस बार भी मैं कई किताबें मेले से खरीदकर जा रहा हूँ।”
पटना पुस्तक मेले में 5 दिन और बचे हैं: 13 दिसम्बर तक किताबों की यह दुनिया पटना में सजी रहेगी। ऐसे में पुस्तक प्रेमियों का रेला हर दिन मेले तक पहुँच रहा है। पटना पुस्तक मेला में पाठकों की महती उपस्थिति देखने को मिल रही है। पुस्तक प्रेमी खुशनुमा व गुलाबी ठंड और गुनगुनी धूप के बीच पुस्तकों का आनन्द उठा रहे हैं। प्रदेश के प्रमुख रचनाकार रेणु, दिनकर, नागार्जुन पर आई पुस्तकों के साथ नई पुस्तकों के तलाश में पाठक मेले में भटकते रहे। सेतु प्रकाशन की ओर से भारत यायावर की रचना रेणु की तलाश,युगचारण दिनकर, नदी पुत्र समेत कई पुस्तकों ने पाठकों को आकर्षित किया। प्रकाशन से जुड़े संतोष मिश्रा व रामनरेश सिंह ने कहा कि ये सारी पुस्तकें नई आई हैं और पाठकों को आकर्षित कर रही है। कई पुस्तकें हाथों-हाथ बिक गईं। अलग-अलग सत्र में आयोजित हो रहे कार्यक्रम में अतिथि वक्ताओं के व्याख्यान भी बुद्धिजीवी पाठकों और युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं।

बोधगया मुक्ताकाश मंच पर सखी बहिनपा मैथिलानी समूह की ओर से रंगारंग कार्यक्रम: सांस्कृतिक प्रस्तुति में सखी बहिनपा मैथिलानी समूह द्वारा रंगारंग कार्यक्रम व बच्चों को पुस्तक का महत्त्व बताते हुए वाद-विवाद का आयोजन किया गया। इसमें बच्चों ने नृत्य, कविता और चुटकुले की प्रस्तुति दी।
विभिन्न स्वरचित कविताओं का पाठ: समन्वय की ओर से आयोजित कविता पाठ में तीन कवियों ने स्वरचित पाठ किया। प्रशांत विप्लवी ने मेराडोना, पिता की पासबुक, अरविंद पासवान ने अम्बेडकर, उसने कहा, उम्मीद, मैं रोज लड़ता हूँ विषय पर कविता का पाठ किया। वहीं सिद्धार्थ वल्लभ ने अपने दो संग्रह ‘कुकनुस’ और ‘सुनो सोना’ से कविताओं का पाठ किया। मंच संचालन राजेश कमल ने किया।
बड़ा लेखक बनने के लिए गाँव पर भी लिखना जरूरी: युवा कथा साहित्य पर प्रवीण कुमार और कुमार सुशांत ने अपनी बातें रखीं। प्रवीण ने कहा- “आज की पीढ़ी सिर्फ गाँव को छू कर निकल जाती है। जो गाँव के बारे में नहीं लिखेगा, वह बड़ा लेखक नहीं हो सकता। आज के लेखकों का सबसे ज्यादा खतरा फेक पाठक और खुद से है।” कार्यक्रम का संचालन सुशील ने किया। पुस्तक मेले में ‘दावानल-माओवाद से जंग’ किताब पर जितेंद्र कुमार के साथ अनीष अंकुर ने बात की। वार्तालाप में लेखक ने मुख्य बातों का वर्णन किया।

शुक्रवार 9 दिसम्बर 2022

लघुकथा: पटना पुस्तक मेला के बोधगया मुक्ताकाश मंच पर प्रसिद्ध साहित्यक संस्था लेख्य-मंजूषा के तत्वाधान में लघुकथा पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जयप्रकाश विश्वविद्यालय छपरा की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ० अनिता राकेश ने की। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार एवं प्रगतिशील लघुकथा मंच के महासचिव डॉ० ध्रुव कुमार मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित थे। इस मौके पर एकता कुमारी, सीमा रानी, मधुरेश नारायण, राजकान्ता राज, पूनम कतरियार, अमृता सिन्हा, रवि श्रीवास्तव, कमल किशोर कमल, प्रेमलता सिंह राजपूत, डॉ० पूनम देवा, मीरा प्रकाश, डॉ० मोना कुमारी परिहार, मिनाक्षी कुमारी, प्रियंका श्रीवास्तव ‘शुभ्र’, डॉ० प्रतिभा रानी, डॉ० पूनम आनन्द तथा प्रवीण श्रीवास्तव ने अपनी लघुकथाओं का पाठ किया। इस अवसर पर प्रोफेसर अनीता राकेश ने लेख्य-मंजूषा तथा संस्था की अध्यक्षा विभा रानी श्रीवास्तव को बधाई देते हुए कहा कि लघुकथा के क्षेत्र में लेख्य उत्कृष्ट कार्य कर रही है। डॉ० ध्रुव कुमार ने लघुकथा की बारीकियों को समझाते हुए कहा- “लेख्य-मंजूषा अपनी सक्रियता से साहित्य और समाज को जागरूक करने के प्रति निरंतर प्रतिबद्ध रही है।” कार्यक्रम का मंच संचालन संस्था के सचिव रवि श्रीवास्तव और धन्यवाद ज्ञापन पूनम कतरियार ने किया।

प्रिंट मीडिया मीडिया और चुनौतियां: CRD द्वारा आयोजित पटना पुस्तक मेला में जनसंवाद कार्यक्रम के तहत् ‘प्रिंट मीडिया और चुनौतियों’ विषय पर चर्चा की गई जिसमें वरिष्ठ पत्रकारों ने अपना-अपना विचार व्यक्त किए। इस जनसंवाद में चंदन, अजय कुमार, विनोद बंधु और निवेदिता झा ने भाग लिया। वरिष्ठ पत्रकार विनोद बंधु ने कहा- “प्रिंट मीडिया की लोकप्रियता कभी कम नहीं आंकी जा सकती। जरूरत है अच्छे कंटेंट क्रिएटर और पत्रकारों की। प्रिंट मीडिया की लोकप्रियता हमेशा रही है और रहेगी।” वरिष्ठ पत्रकार चंदन ने कहा- “आधुनिक युग में प्रिंट मीडिया का कोई दूसरा स्वरूप सामने नहीं आ सकता। खबरों को पाठकों तक सही रूप में प्रिंट मीडिया पहुँचाता है।” वरिष्ठ पत्रकार अजय ने कहा- “अमेरिका में सबसे अधिक मोबाइल फोन का प्रयोग होने के बावजूद पत्रिका खूब पढ़ी जाती है। कोविड के कारण प्रिंट मीडिया को थोड़ी परेशानी हुई थी।” निहारिका झा ने बताया कि प्रिंट मीडिया दिन पर दिन खतरे की ओर बढ़ रही है।

लिखें मंच के लिए कविता: प्रभा खेतान फाउंडेशन ‘आखर’ की ओर से हुए गुफ्तगू कार्यक्रम के अन्तर्गत मगही साहित्य पर बातचीत हुई। शुरुआत लघु कथा और कहानियों से की गई। मगही, पाटली आदि पत्रिकाओं की चर्चा की गई। निष्कर्ष निकला कि मगध का पूरे विश्व में नाम है। मगही को बेहतर स्थान दिया जाना चाहिए। कार्यक्रम में धनंजय क्षेत्रिय और ओम प्रकाश जमुआर ने हिस्सा लिया। धनंजय क्षेत्रिय ने कहा- ” मगही में पत्र-पत्रिकाएं कम हैं पर पुस्तकों का प्रकाशन खूब हो रहा है। गद्य साहित्य भाषा को समृद्ध करता है। काव्य-महाकाव्य के बिना साहित्य की परिकल्पना अधूरी है। शब्दों को बिगाड़ने की जरूरत नहीं है। शब्द को विकृत करना मगही है, ये बात दिमाग से हटानी होगी। तत्सम शब्द का रूप बिगाड़ना साहित्य के लिए ठीक नहीं है। नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। युवाओं को योगेश्वर प्रसाद, रामनरेश पाठक और मथुरा प्रसाद जैसे कवियों को पढ़ने की जरूरत है। मंच को पकड़ना है तो कविता लिखनी होगी और यदि साहित्य में जगह चाहिए तो गद्य लिखना होगा। लिखने में संज्ञा को नहीं बिगाड़ना चाहिए। आखर के तहत मगही पर चर्चा कम प्रकाशित हो रही है लेकिन इसमें काम बहुत किया जा रहा है।” उधर, युवा कवि चंद्रबिंद के चर्चित काव्य संग्रह ‘फल्गु किनारे’ का लोकार्पण किया गया। इस समारोह में प्रसिद्ध कवि आलोक धन्वा, प्रसिद्ध आलोचक प्रोफेसर तरुण कुमार, प्रोफेसर सुनीता गुप्ता, मनोचिकित्सक एवं कवि डॉ० विनय कुमार, बिहार हेराल्ड के सम्पादक विद्युत पाल, सत्राची पत्रिका के सम्पादक डॉ० आनंद विहारी, सुनील कुमार सिंह एवं कवि असलन हसन जैसे साहित्यकार एवं विचारक उपस्थित थे। आलोक धन्वा ने उनकी कविताओं पर कहा कि प्रेम कविताएं, जो हमारे युवा कवि चंद्रबिंद अधिक लिख रहे हैं, उसके पीछे एक ऐसा समाज है जहाँ यौन हिंसा की बर्बर एवं मध्ययुगीन घटनाएं घट रही हैं।”

[साहित्यकार आलोक धन्वा रूबन में भर्ती: वरिष्ठ साहित्यकार और गीतकार आलोक धन्वा आज ही – शुक्रवार 9 दिसम्बर 2022 – पुस्तक मेले में गिरकर घायल हो गए। उनकी कलाई में चोट आई है। इसके बाद उन्हें उनके मित्र डॉ० सत्यजीत सिंह के पाटलिपुत्र स्थित रूबन मेमोरियल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। डाक्टरों के अनुसार उनकी कलाई में हेयर फ्रैक्चर आया। लड़खड़ाकर गिरने के क्रम में पूरे शरीर का भार हाथ पर आने से ऐसा हुआ है।]

बेटी को पढ़ाना है, आगे बढ़ाना है: पटना पुस्तक मेला में हज्जू म्यूजिकल थियेटर HMT के कलाकारों ने बाल विवाह पर विनोद रस्तोगी लिखित एवं सुरेश कुमार हज्जू निर्देशित नाटक पालकी पलना की नुक्कड़ प्रस्तुति में पुस्तक प्रेमियों का ध्यान खींचा। नाटक की कथा वस्तु बाल विवाह की कुरीतियों को व्यक्त करती है। नाटक बाल विवाह से उत्पन्न समस्या और संवेदना की ओर दर्शकों का ध्यान आकृष्ट करता है। नाटक का अंत कुरीतियों को दूर करने की भावना को व्यक्त करता है। जब पिता को समझ में आती है और वह प्रतिज्ञा लेता है कि उसे बेटी कै पढ़ाना है,आगे बढ़ना है। नाटक को नुक्कड़ में साकार किया गोपी कुमार,सिमरन कुमारी, रोहित मेहता, विवेक कुमार, रिंकी कुमारी, नेहा कुमारी, मुस्कान कुमारी, सुजाता कुमारी, प्रिंस राज, साजन कुमार, आयुष कुमार, रौनक कुमार, हर्ष कुमार, बादल कुमार, शशि कुमार ने। नाटक में संगीत दिया जौनी ने। इनके साथ हारमोनियम पर चंदन उगना और रोहित चन्द्रा और नालपर स्पर्श मिश्रा और चन्दन घोष ने संगीत की। सहयोगी कलाकारों की भूमिका निभाई रिया कुमारी, अंकित कुमार, आदित्य कुमार ठाकुर, शशि कुमार, शिबू कुमार, शिवम कुमार, नितीश कुमार, आदित्य राज, कुमार गौरव सिन्हा,आशु शुक्ला,आर्यन कुमार ने।

कोसी तटबंध के विमर्श में उभरी पीड़ितों की व्यथा: साक्षी कार्यक्रम के अन्तर्गत मनोचिकित्सक एवं कवि डॉ० विनय कुमार और नताशा के बीच बातचीत हुई। उन्होंने कहा ने पीएम थेरेपी पर बात करते हुए कहा- “कविता पढ़ना टैबलेट खाने के समान है और कविता सुनना इंजेक्शन लेने के समान है यानी कविता सुनना ज्यादा कारगर है।” कोशी के मौजूदा बुनियादी सवालों पर विमर्श का हुआ आयोजन किया गया। विमर्श में कई प्रश्नों को उठाया गया जिसमें कोशी के तटबन्ध के बीच लोगों को भूल गई सरकार, विमर्श में कोशी क्षेत्र को विशेष क्षेत्र का दर्जा जैसे सवालों पर मुख्य रूप से चर्चा की गई। शुरुआत में महेंद्र यादव ने कोशी में मौजूदा चुनौतियों की तरफ ध्यान आकृष्ट कराया। तटबन्ध के बीच के पीड़ित प्रमोद कुमार राम ने विगत वर्ष अपने घर अपने की व्यथा बताई। सामाजिक कार्यकर्ता सुनील झा ने कहा कि विकास के नाम पर स्थानीय लोगों के जीवन के तरीके को नजरंदाज किया गया है। नदी विशेषज्ञ रणजीव कुमार ने राजनीतिक अर्थव्यवस्था के कारण बनते सिविल इंजीनियरिंग के नेतृत्व वाले आपदा नियंत्रण ढांचे से आई तबाही को बताया।

शनिवार 10 दिसम्बर 2022

जनसंवाद में दलित साहित्य और कविता पर कवियों ने रखे विचार: पटना पुस्तक मेला में कवि मुसाफिर बैठा ने कहा- “कोई कविता अगर दलितों के भावों को मूल रूप से नहीं रख पाती है,तो उसे दलित कविता की श्रेणी में स्थान नहीं मिल सकता है। दलित साहित्य नीग्रो आन्दोलन से प्रभावित है।” जनसंवाद के इस कार्यक्रम में कंचन कुमारी ने कहा- “दलित काव्य प्रतिरोध का काव्य है। यह काव्यशास्त्र सदियों पुराना है। मुख्य तौर पर इस काव्यशास्त्र पर ब्राह्मण की बसाई हुई व्यवस्था का विरोध किया गया है। इनके द्वारा ही क्रान्ति की शुरुआत हुई तथा इन्हें भी समाज में बराबर का सम्मान मिलना चाहिए।” अरविंद पासवान ने कहा – “दलित कवि सदैव सच की बात करते हैं। ये जो भी अपने जीवनकाल में भोगते हैं उसे ही पाठकों तक कविताओं के माध्यम से प्रकट करते हैं।” उन्होंने अंत में जयप्रकाश वाल्मीकि की कविता ठाकुर का कुआं का पाठ किया। वहीं हरिनारायण ठाकुर ने कहा- “दलित साहित्य पर चर्चा तब होने लगी जब इस समाज से आने वाले लेखकों ने अपनी रचना से प्रतिरोध करना शुरू किया। समाज में आरक्षण की तरह दलित कविता भी शामिल है!” कार्यक्रम का संचालन ज्योति स्पर्श ने किया।

मुद्रित अक्षरों का मन -मस्तिष्क पर होता है गहरा असर: पटना पुस्तक मेला में आज (शनिवार 10 दिसम्बर 2022) को शब्द साक्षी कार्यक्रम के दौरान मो. दानिश वरिष्ठ कथाकार और पत्रकार अवधेश प्रीत से बात कर रहे थे। अपनी लेखकीय यात्रा और लेखन की भाषा के बारे में अवधेश प्रीत ने कहा- “किताबें हो या अखबार, इनका असर होता है। कोई भी लिखी हुई बात बहुत दूर तक असर करती है। मुद्रित अक्षरों का मन मस्तिष्क पर गहरा असर होता है। पटना पुस्तक मेला इसलिए भी विशिष्ट है, क्योंकि यहाँ हर तरह की किताबें मिलती हैं तो पाठकों की जरूरत को पूरी करती हैं। हर लेखक के लिखने का अपना तरीका होता है। मैं अपनी पुस्तकों में अलग-अलग भाषा का प्रयोग करता हूँ ताकि पात्र विश्वसनीय लगें।” पटना वचन के लिए मनुष्य है या मनुष्य के लिए वचन ?: पटना पुस्तक मेला में आशा प्रभात ने उनके द्वारा लिखित पुस्तक ‘उर्मिला’ पर अवधेश प्रीत से बातचीत की। इस पुस्तक में उर्मिला के चरित्र को उकेरा गया है। इस उपन्यास में उर्मिला की सीमाओं की बात कही गई है। लेखिका का कहना है कि आज की पौराणिक कथाओं को पढ़ के बच्चे भ्रमित हो रहे हैं। इस उपन्यास के जरिए उर्मिला के पात्र को केन्द्र में लाया गया है। बचपन में जनक जी का सीता के प्रति लगाव से उर्मिला को ईर्ष्या होती थी।

हालांकि, जब बाद में उन्हें सीता के पालित पुत्री होने का पता चला, तो वह ईर्ष्या प्रेम में तब्दील हो गई। उर्मिला बचपन में कई बार प्रकृति में ऐसी चीज कृति थी जैसे फूलों को तोड़ना, तीलियों को छेड़ना आदि इसमें सीता का मन दुखी होता था, वह ऐसा सिर्फ सीता को छेड़ने के लिए करती थीं। लेखिका ने कहा- “हम हमेशा परिणाम की बात करते हैं, परिस्थिति की नहीं।” उन्होंने लक्ष्मण के जल समाधि प्रसंग के बारे में बताते हुए कहा कि इस समय में उर्मिला की पीड़ा जो किसी भी स्त्री को उस वक्त पर होती है उसे पढ़ना जरूरी है। रामचरितमानस वचनों पर केन्द्रित है। इस उपन्यास में उर्मिला का एक बहुत ही प्रमुख प्रश्न है कि वचन के लिए मनुष्य है या मनुष्य के लिए वचन ? लेखिका ने बताया कि राम ने कई रूढ़ियों को तोड़ा है। राम को समझने के लिए हमें उनके युग को समझना होगा। यह उपन्यास पठनीय है, इसमें उर्मिला अपनी पीड़ा खुद व्यक्त करती है। अंत में उन्होंने कहा कि रामायण के इस पहलू से हम परिचित नहीं हैं। उसे जानने के लिए इस उपन्यास को पढ़ना चाहिए।

सरकार की शक्ति बल में नहीं कानून में होती है – जनसेवक के लिए रचनात्मक होना जरूरी, सुनें सबकी लेकिन करें खुद की: पटना पुस्तक मेला में बोधगया मुक्ताकाश मंच पर पूर्व डीजीपी अभयानंद की पुस्तक अनबाउंडेड (Unbounded) पर बातचीत हुई। कार्यक्रम का संचालन जयप्रकाश ने किया। किताब में ला, फिजिक्स,पुलिसिंग और सुपर-30 के अलग-अलग पहलुओं पर व्याख्या की गई है। उन्होंने कहा- “बच्चों को पढ़ना उनका पैशन है यह एक स्ट्रेस बूस्टर की तरह है। मतलब, इससे तनाव भी दूर होता है। इस किताब का शीर्षक अनबाउंडेड रखने का मकसद पाठकों को उनकी सीमा विस्तृत करने को लेकर प्रेरणा देना है। किसी भी आइपीएस के पास रचनात्मकता होनी चाहिए। किसी भी विकासशील देश में ही क्राइम ज्यादा होती है। टेरर को हटाने के लिए टेररर का इस्तेमाल करना गलत एप्रोच है। सरकार की शक्ति बल में नहीं कानून में है, कानून कैसे इस्तेमाल होगा यह हमारे (डीजीपी के) सोच की चीज है। किसी भी जाति के बीच दंगा नहीं होता है, दंगे का मूल कारण अर्थ होता है।”

पटना पुस्तक मेला में ‘दर्द का देवता’ किताब का लोकार्पण/विमोचन: दर्द की देवता किताब में लेखक ने कोरोना काल में लोगों द्वारा झेली विवशता पर प्रकाश डाला गया है। महामारी के दौरान अपनों के बीच पराया बन कर जीने के दर्द को इस किताब में लेखक ने मार्मिक तरीके से लिखा है। आँखों के सामने बिछड़ते अपनों से लेकर जीने की उम्मीद छोड़ चुके लोगों की कहानी को लेखक ने शब्दों में पिरोया है। CRD पटना पुस्तक मेला में आज (शनिवार 10 दिसम्बर 2022) दर्द का देवता किताब का लोकार्पण बोधगया मुक्ताकाश मंच पर किया गया। दर्द का देवता किताब पटना विश्वविद्यालय के पूर्व उपाध्यक्ष व लेखक अंशुमन द्वारा लिखित और मेसर्स नोवेल्टी एण्ड कम्पनी द्वारा प्रकाशित है। पुस्तक का लोकार्पण वाणिज्य महाविद्यालय के डीन शिक्षाविद् डॉ० एनके झा, पटना वीमेंस कॉलेज की भौतिक शास्त्र विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अपराजिता द्वारा किया गया। डा० एनके झा ने कहा- “अंशुमन छात्र संघ के उपाध्यक्ष के रूप में अपने कुशल सकारात्मक नेतृत्व की भूमिका निभा चुके हैं।” मौके पर पटना वीमेंस कॉलेज की प्रोफेसर अपराजिता, प्रोफेसर दिव्या गौतम, सहित पटना पुस्तक मेला के संस्थापक आदि ने विचार रखे। विमोचन में कवि-लेखक दिलीप कुमार, पुस्तक मेला के सूत्रधार नरेन्द्र कुमार झा (संस्थापक) एवं सचिव अमरेन्द्र झा शामिल रहे। कार्यक्रम का संचालन स्वयं अंशुमान ने किया। कार्यक्रम के अंत में पटना पुस्तक मेला आयोजन समिति की ओर से अमरेन्द्र झा ने लेखक अंशुमान को युवा साहित्यकार सम्मान प्रदान किया।

लिखी हुई चीज बहुत दूर तक असर करती है, मन पर डालती है प्रभाव: पटना पुस्तक मेला में पटनावासियों की रौनक देखने को मिल रही है। पुस्तकप्रेमियों के साथ ही बिहार में रोजगार और विकास के लिए नए अवसर तलाशने वालों के लिए पुस्तक मेला खास रहा। मेला के बोधगया मुक्ताकाश मंच पर बिहार स्टार्टअप की ओर से जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जागरूकता कार्यक्रम में मुकेश कुमार ने पारम्परिक व्यवसाय और स्टार्टअप के बीच का अंतर समझाया, जबकि शिवेन्द्र कुमार ने कहा कि बिहार स्टार्टअप नीति के तहत जो भी आइडिया सबमिट किए जाते हैं,उनकी पूरी जाँच की जाती है और उसके बाद लाभार्थियों का चयन किया जाता है। उद्योग विभाग के उपनिदेशक नागेन्द्र शर्मा ने कहा कि बिहार स्टार्टअप नीति के तहत लाभार्थियों को पटना फ्रेजर रोड और मौर्य कम्प्लेक्स में की वर्किंग स्पेस उपलब्ध कराने की तैयारी पूरी कर ली गई है। कार्यक्रम में बिहार स्टार्टअप नीति के बारे में सैकड़ों लोगों को जानकारी दी गई। बिहार स्टार्टअप नीति के तहत चयनित उद्यमियों को 10 लाख रुपए तक की सीडफंड की राशि दी जा रही है और महिला उद्यमियों को 5% अधिक और अनुसूचित जाति-जनजाति एवं दिव्यांग वर्ग के उद्यमियों को 15% अधिक सीडफंड राशि दी जा रही है। उद्योग विभाग के विशेष सचिव दिलीप कुमार ने बताया- “एंजेल निवेशकों से निवेश प्राप्त होने पर स्टार्टअप फंड से भी 50 लाख तक का ऋण इस नीति के तहत दिया जा रहा है।” जीरो लैब की दीप्ति आनंद ने बताया कि बिहार स्टार्टअप का पोर्टल 1 दिसम्बर को पुनः खोला गया है और यह 31 दिसम्बर तक खुला रहेगा। जो लोग बिहार स्टार्टअप नीति के तहत लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें तुरन्त अपना आवेदन जमा करना चाहिए। किसी प्रकार की विशेष जानकारी के लिए उद्योग विभाग में अवस्थित जीरो लैब में काउंसिलिंग की सुविधा उपलब्ध है।
शब्द साक्षी कार्यक्रम लोगों का केन्द्र रहा। संवाद में अवधेश प्रीत और मो. दानिश के बीच बातचीत हुई। संवाद में साहित्य के कई पहलुओं पर चर्चा हुई। अवधेश प्रीत ने कहा कि उनका मानना है कि कोई भी लिखी हुई चीज बहुत दूर तक असर करती है। लेखन अपनी बात कहने का जरिया है और पढ़ने वालों पर कहीं न कहीं असर जरूर डालता है।

रविवार 11 दिसम्बर 2022

बिहारी हर क्षेत्र में चौका-छक्का लगा सकते हैं: मेले में लेखक, कवि और मोटिवेटर दिलीप कुमार की नई पुस्तक टोक्यो ओलंपिक का लोकार्पण किया गया। ओलंपिक के खिलाड़ियों की प्रेरक कहानियों के संग्रह के पुस्तक टोक्यो ओलंपिक (टोक्यो ओलंपिक पुस्तक) के खिलाड़ियों की प्रेरक कहानियों का विमोचन पुस्तक मेला के बोधगया मुक्ताकाश मंच पर किया गया। विमोचन समारोह में बिहार के उद्योग मंत्री समीर कुमार महासेठ, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डॉ० रणजीत कुमार सिंह, अंतरराष्ट्रीय कबड्डी खिलाड़ी और एशियाड खेलों में दो बार स्वर्ण पदक जीत चुके राजीव कुमार सिंह, भारतीय फुटबॉल टीम की कप्तान एस आशा लता देवी उपस्थिति रही। उद्योग मंत्री ने कहा कि प्रत्येक खिलाड़ी की चाहत होती है कि वह ओलंपिक में हिस्सा ले और पदक जीते। 1896 में आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत यूनान से हुई। तीन बार विश्व युद्ध के कारण ओलंपिक खेल नहीं हुए। 2020 का ओलंपिक कोविड-19 के कारण खतरे में पड़ गया था, लेकिन बाद में ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए जापान ने कोविड-11 के प्रोटोकाल का पालन करते हुए टोक्यो ओलंपिक का आयोजन किया जो अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा।

उन्होंने कहा कि बिहार के लाल ईशान किशन ने अंतरराष्ट्रीय एक दिवसीय मैच में 200 रनों की शानदार पारी खेलकर साबित किया कि बिहारी खेलों में भी भारी है। अवसर मिलने की देर है, बिहारी हर क्षेत्र में चौका-छक्का लगा सकते हैं। प्रशासनिक अधिकारी और खेल प्रशासक डॉ० रणजीत कुमार सिंह ने कहा कि बिहार में खेल-कूद का माहौल बनाने के लिए आधारभूत संरचनाओं के विकास के साथ खेलकूद के सम्बन्ध में चरचा-परिचर्चा और लेखन भी जरूरी है। पावर लिफ्टिंग के अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी कृति राज सिंह ने बिहार में खेल और खिलाड़ियों के लिए अधिक सुविधाओं की उपलब्धता पर बल दिया। अंतरराष्ट्रीय स्तर के कबड्डी खिलाड़ी राजीव कुमार सिंह ने कहा कि सफलता के लिए कठिन श्रम और सतत प्रयास की आवश्यकता होती है। भारतीय महिला फुटबॉल टीम की कप्तान आशा लता देवी ने कहा कि खूब मेहनत करने पर ही खेल के क्षेत्र में सफलता हाथ लगती है। कार्यक्रम का संचालन किसलय किशोर ने किया।

‘एक लेखक की नरक यात्रा’ का हुआ विमोचन: चर्चित व्यंग्यकार डॉ० रामरेखा की व्यंग्य पुस्तक ‘एक लेखक की नरक यात्रा’ का विमोचन पटना पुस्तक मेला के संयोजक अमित झा, साहित्यकार रत्नेश्वर एवं पत्रकार सुजीत कुमार झा ने किया। पटना के रामपुर डुमरा के डॉ० रामरेखा अभी बेगूसराय के मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी हैं। वरिष्ठ साहित्यकार रामधारी सिंह दिवाकर ने नरक यात्रा के सम्बन्ध में कहा कि शरद जोशी और हरिशंकर परसाई की रचनाओं में हास्य व व्यंग्य की संयुति देखी जाती थीं। उनकी परवर्ती पीढ़ी में डॉ० ज्ञान चतुर्वेदी और डॉ० रामरेखा की व्यंग्य शैली में इसे बखूबी महसूस किया जा सकता है। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि प्रकाशन संस्था नयी दिल्ली से प्रकाशित ‘एक लेखक की नरक यात्रा’ हरिशंकर परसाई के बाद काफी महत्वपूर्ण रचना है। एक चिकित्सक होने के नाते डॉ० रामरेखा मरीज के इलाज के साथ समाज में मौजूद विद्रूपता पर जबर्दस्त कटाक्षों से छा गए हैं।

रेखा भारती मिश्रा की गजल संग्रह ‘बात आँखों की’ लोकार्पण एवं मुशायरा का आयोजन: इल्मी मजलिस बिहार के तत्त्वावधान में पटना पुस्तक मेला के नालन्दा सभागार में युवा कवयित्री रेखा भारती मिश्रा की सद्य: प्रकाशित गजल संग्रह का लोकार्पण समारोह एवं मुशायरा का आयोजन किया गया। बिहार उर्दू पुस्तकालय के अध्यक्ष अरशद फिरोज पूर्व जिला जज अकबर रजा जमशेद, मशहूर शायर खुर्शीद अकबर, सरकार में संयुक्त सचिव सैयद परवेज आलम, डॉ० विनय कुमार विष्णुपुरी और मेला के सूत्रधार नरेन्द्र कुमार झा के हाथों संयुक्त रूप से ‘बात आँखों की’ गजल संग्रह का लोकार्पण किया। अरशद फिरोज ने हिन्दी में गजल लिखने के लिए कवयित्री रेखा भारती मिश्रा की सराहना की, उत्साहवर्धन किया और गजल संग्रह की पंक्ति दुहराते हुए कहा-

“गमों से हारकर जीवन नहीं बरबाद करना तुम !
सुनी हर पल खुशी से पलकों को आबाद करना तुम !!

कवयित्री रेखा भारती मिश्रा ने मुशायरा का आरम्भ अपनी पुस्तक में संकलित हिन्दी गजल से करते हुए कहा –
“है गरीबी का असर क्या पास आकर देखिए !
मुफलिसी में जिन्दगी को तो बिताकर देखिए !!”

जियाउल अजीम ने कहा-
“तुमसे दूर जाते ही तुमको तन्हा पाता हूँ !
आंसुओं की बारिश में रोज मैं नहाता हूँ !!”

कवयित्री राजकान्ता राज ने अपनी गजल में कहा-
“गीत मेरे नाम का खिलना सनम !”

शायर नशरूल्लाह नस्तवी ने कहा-
“जो चादर तानकर सोता रहेगा !
वो ग़ाफ़िल उम्र भर रोता रहेगा !!”

खालिद इबादी ने कहा-
“वक्त धीरे से निकल जाता है !
फिर भी कितनों को कुचल जाता है !!
ए वतन ए वतन जाने मन जाने मन कहकर वाहवाहियां लूटी।

चर्चित शायरा निकहत आरा ने कहा-
“उनकी तस्वीर मेरे दिल में उतर जाएगी !
मेरी बिगड़ी हुई तक़दीर सवर जाएगी !!
तुमने चलने की कसम खाई है चलते जाओ !
तुम जो ठहरे तो ये गर्दिश भी ठहर जाएंगे !!”

शायर इरफान अहमद ने कहा-
“हर किसी पर से भरोसा उठ गया !
जब बड़ा सोया तो छोटा उठ गया !!”

डॉ० विनय कुमार विष्णुपुरी ने कहा-
“माया मोह ममता में इस कदर घिरा हूँ मैं !
दिखाई पड़ती है और किसी को क्या !!”

शमां कैशर समां,सैयद परवेज आलम, खुर्शीद अकबर, सरवर हुसैन सहित दर्जनाधिक शायर और शायरा ने अपनी शेर, गजल सुनाकर रसिक जनों को रस सिक्त किया। कार्यक्रम का संचालन मजलिस के महासचिव परवेज आलम ने किया।
फिरे ऐशो राणा दा को याद किया जाना बड़ी बात: चर्चित जननायक संस्कृतिकर्मी राणा बनर्जी पर केन्द्रित पुस्तक ‘फिरे ऐशो राणा दा’ का लोकार्पण हुआ। यह किताब राणा बनर्जी की स्मृति में लिखी गई है। इसका सम्पादन अनीश अंकुर ने किया है। राणा जी के जाने के 14 साल बाद लिखी गई इस किताब में राणा बनर्जी को जानने वाले और उनके साथ काम करने वाले लोगों के पर लेख और कविताएं हैं। लोकार्पण में विद्युत पल ने कहा कि उन्होंने पुराने दिनों की बातों को याद किया। राणा जी के साथ बिताए हुए पलों को याद किया। वक्ता निवेदिता झा ने कहा- “राणा हमेशा पुस्तक मेले में आया करते थे। आज इसी मेले में उनको याद किया जाना बहुत बड़ी बात है। हमारी पुरानी यादें जिन्दा हो गईं। वो ऐसे गायक बहुत कम होते हैं, जो गाते हैं। जिनकी आवाज गूंजती है,तो बहुत दूर तक सुनाई देती है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं।” अनिल अंशुमन ने इस पुस्तक में भागीदारी लेने वाले लोगों की ओर आभार व्यक्त किया। इसके अलावे वक्ता के रूप में नंदकिशोर, पुष्पेंद्र, राणा प्रताप आदि ने विचार व्यक्त किए। अंत में अनीश अंकुर ने किताब के छपने के पीछे की बातों से रूबरू किया।

मेला में ओ री गौरैया पुस्तक का हुआ विमोचन: पटना पुस्तक मेला में रविवार (11 दिसम्बर) को बिहार की राजकीय पक्षी गौरैया के संरक्षण में सक्रिय पीआईबी पटना के सहायक निदेशक व गौरैया संरक्षण में सक्रिय संजय कुमार की प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ओ री गौरैया’ का लोकार्पण पर्यावरणविद, लेखक यादवेंद्र, वाइल्ड लाइफ आफ ट्रस्ट के संरक्षण प्रमुख डॉ० समीर कुमार सिन्हा, उद्योग विभाग के संयुक्त सचिव दिलीप कुमार, जेड एसआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक व डाल्फिन विशेषज्ञ डॉ० गोपाल शर्मा, लेखक-पत्रकार ध्रुव कुमार ने संयुक्त रूप से किया। पुस्तक के लेखक संजय कुमार ने कहा- “यह सिर्फ पुस्तक नहीं बल्कि गौरैया संरक्षण का संदेश देता एक जीवंत दस्तावेज है, जो लोगों को गौरैया संरक्षण की पहल से जोड़ेगा। पुस्तक में गौरैया संरक्षण के विविध आयामों को समेटा गया है। गौरैया के बारे में छोटी बड़ी बातो को समेटा गया है।”

पर्यावरण लेखक यादवेंद्र ने कहा- ” ‘ओ री गौरैया’ सिर्फ किताब ही नहीं बल्कि लेखक का पैशन है। बचपन में हम गौरैया का संरक्षण करते थे और जिस घर में यह रहती थी वह घर सौभाग्यशाली माना जाता था, लेकिन आज यह घर आंगन से गायब हो गई है। ऐसे में संजय कुमार की ‘ओ री गौरैया’ की घर वापसी के लिए कारगर साबित होगी।” वाइल्ड लाइफ आफ ट्रस्ट के संरक्षण प्रमुख डॉ० समीर कुमार सिन्हा ने कहा- “गौरैया एक जंगली प्राणी है। हम इसके संरक्षण के लिए कुछ नहीं करते क्योंकि गौरैया एक घरेलू चिड़िया है, जो हमारे घरों में रहती है लेकिन बदलते परिवेश में यह गायब हो गई है। जरूरत है इसके वापसी की, अगर पहल से गौरैया वापस आती है तो यह इकोसिस्टम के लिए अहम होगा। जब गौरैया होगी तो पर्यावरण भी संतुलित होगा। जहाँ गौरैया रहती है वहाँ का पर्यावरण संतुलित रहता है।” उद्योग विभाग के संयुक्त सचिव दिलीप कुमार ने कहा- “एक समय था जब घर आंगन में पेड़-पौधे होते थे लेकिन अब गायब है। घरों में रोशनदान होता था जो अब नहीं है। रोशनदान से गौरैया घर के अन्दर आती थी। हमने गौरैया को घर से दूर कर दिया इसलिए अब हमें इसे बुलाने के लिए पहल करनी होगी।” वरिष्ठ वैज्ञानिक व डाल्फिन विशेषज्ञ डॉ० गोपाल

Facebook Comments Box
Leave a Comment
Show comments