Patna Pustak Mela 2022
संस्मरण मंगलवार 23 दिसम्बर 2025
[भारतीय-हिन्दी साहित्य ने अपना एक रत्न लोकप्रिय रचनाकार विनोद कुमार शुक्ल को आज ही गंवा दिया है। वे पटना पुस्तक मेला में भी उपस्थित रहते थे। उनकी चर्चा पटना पुस्तक मेला २०२२ (2022) में भी हुआ करती थी]
पटना पुस्तक मेला 2022
अवधि: शुक्रवार 2 दिसंबर से मंगलवार 13 दिसंबर 2022
PATNA BOOK 📚 FAIR 2022
FRIDAY DECEMBER 2 – TUESDAY 13 DECEMBER 2022
Complex: Gandhi Maidan, Patna
परिसर: गांधी मैदान, पटना
थीम (Theme): मोबाइल छोड़िए, किताब पढ़िए
01. मुख्य प्रवेश/निकास द्वार (Main Entry/Exit Door) : पाटलिपुत्र द्वार
02. प्रशासनिक स्थल (Administrative Office): राजगृह प्रशासनिक भवन
03. विचार गोष्ठी/संगोष्ठी भवन (Seminar Hall): नालन्दा संगोष्ठी सभागार
04. मुख्य मंच: बोधगया मुक्ताकाश मंच
05. भागीदारों का ब्लॉक: i) सीतामढ़ी प्रखण्ड ii) मधुबनी प्रखण्ड एवं iii) भागलपुर प्रखण्ड
शुक्रवार 2 दिसम्बर 2022
[पटना पुस्तक मेला में कई सांस्कृतिक और साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसके अंतर्गत बच्चों, महिलाओं, संस्कृतिकर्मियों और साहित्यकारों के लिए विविध कार्यक्रम होंगें। विशेषकर बच्चों के लिए आयोजित क्विज कांटेस्ट का भी आयोजन होगा। मेले में स्टेट हेल्थ सोसाइटी के द्वारा स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम भी चलेगा। इस बार पटना पुस्तक मेला में शब्द साक्षी, जनसंवाद और गुफ्तगू कार्यक्रम का भी आयोजन हो रहा है। मेला परिसर में प्रतिदिन ‘नुक्कड़ नाटक’ भी होगा। ‘बैल कोल्हू’ की ओर से विशेष अभियान भी चलाया जाएगा। ‘कौमिक पढ़ना कूल है, इस अभियान के तहत स्क्रीन छोड़कर कौमिक्स पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। ‘माना जाता है कि पुस्तकें सबसे अच्छा साथी होती हैं और सौ दोस्तों के मुकाबले एक पुस्तक आपको ज्यादा सीख देती है। पहले ही दिन बच्चे और युवा पुस्तक प्रेमियों से रहा गुलजार पटना पुस्तक मेला। कोरोना संक्रमण के कारण गांधी मैदान में 3 वर्षों के बाद अमित झा के संयोजत्व में आयोजित पटना पुस्तक मेला के पहले दिन पाठकों की भीड़ उमड़ी।
लेखकों, कलाकारों, साहित्यकारों, कवियों, विचारकों की दुनिया उतर आयी है सीआरडी पटना पुस्तक मेला में। वाणी प्रकाशन के स्टाल पर धर्मवीर भारती की किताब गुनाहों के देवता, समय से मुठभेड़, चंद्रमुखी, वैशाली की नगरवधू समेत अन्य किताबों की मांग रही। वहीं राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी, प्रसन्न कुमार चौधरी की 1857; बिहार झारखण्ड के महायुद्ध समेत कई पुस्तकों की मांग है। मेले में बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति की ओर से मुफ्त स्वास्थ्य जागरूकता शिविर का आयोजन किया जा रहा है। इसके तहत डायबिटीज टेस्ट,ब्लड टेस्ट, ओरल कैंसर और इसीजी टेस्ट ये सभी निशुल्क कराई जा रही है। स्टेट हेल्थ सोसाइटी बिहार के सौजन्य से एक एम्बुलेंस, दो डाक्टर, दो ह्वीलचेयर और पारामेडिक्स मौजूद रहेंगे। पुस्तक प्रेमियों ने पहले ही दिन ईसीजी,ब्लड टेस्ट समेत नेत्र जाँच भी कराई]
पटना पुस्तक मेला 2022 में आज
*नुक्कड़ नाटक: लवर्स रिटर्न (ग्रुप: क्रिएशन, पटना)
*शब्द साक्षी ऋषिकेश सुलभ: अंचित, अपराह्न 2:15 से 3 बजे तक
*गुफ्तगू: विनोद अनुपम, गिरिधर झा- प्रशांत, अपराह्न 3:15 से 4:00 बजे तक
*लेखक रत्नेश्वर के उपन्यास ’32 हजार साल पहले पर बात, संध्या4:15 से 5 बजे तक
*सखी बहिनपा, मैथिली मातृभाषी मिलन सम्मेलन, संध्या 5:15 से 6 बजे तक
*रविशंकर उपाध्याय की किताब ‘बिहार के व्यंजन’ का विमोचन, संध्या 7:15 से 8 बजे तक
राजगृह प्रशासनिक भवन के समीप बने साहित्य तक के स्टाल में प्रतिदिन लाइव स्ट्रीमिंग होगी। मेले में शिरकत करने वाले साहित्यकार, लेखक और कवि यहाँ न सिर्फ अपनी रचनाओं के बारे में बताएंगे बल्कि लाइव के दौरान अनुभवों को भी साझा करेंगे !
पुस्तकें इंसान को देती है ताकत: डिजिटल के दौर में अक्षरों का महत्त्व बताते सेन्टर फार रीडरशिप डेवलपमेंट (CRD) पटना पुस्तक मेले का सायंकाल दीप जलाकर उद्घाटन गांधी मैदान में शुक्रवार,2 दिसम्बर 2022 को शाम 4.30 बजे राज्यसभा के उप सभापति श्री हरिवंश नारायण सिंह ने किया। उन्होंने कहा कि पुनर्जागरण के दौर को आगे बढ़ाता है पटना पुस्तक मेला। ‘मोबाइल छोड़िए, किताब पढ़िए’ की थीम के साथ शुरू हुए मेले में किताबों की जरूरत बताते हुए हरिवंश जी ने कहा कि अकेले पढ़ते इंसान को पुस्तकें ताकत देती हैं। छपे हुए शब्दों का मन पर गहरा असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि अक्षर ही हमारे ज्ञान की खिड़की को दुनिया से जोड़ते हैं। मनुष्य की चेतना को जागृत करती है। पुस्तकें हमें नए ढंग से सोचने की ओर अग्रसर करती हैं। बिहार खूब लिखता है, ये पटना पुस्तक मेले से पता चलता है। साहित्य सृजन की सभी विधाएं विचार को बदल सकती है। उन्होंने कहा कि मेले में साहित्य की हर अद्भुत विधाओं के एक साथ आने से लोग रू-ब-रू होते हैं। यहाँ उपस्थित होकर एक दूसरे से मिलना अच्छा लगता है। तकनीक से लेकर साहित्य, कला, पत्र-पत्रिकाएं, राजनीति, पढ़ने-लिखने वाले, सोचने-समझने वाले सभी क्षेत्र में लोग यहाँ आते हैं।
पटना पुस्तक मेला का आयोजन बड़े पैमाने पर होता रहा है। यहाँ आने से संसार, देश-विदेश में साहित्य सृजनशीलता की जानकारी मिलती है। पटना पुस्तक मेला में आने से साहित्य में हो रहे नए विकास के बारे में पता चलेगा। इतिहास जानने व समझने में भविष्य बेहतर होता है। उन्होंने अपने अनुभवों के बारे में बताते हुए कहा कि कोलकाता में काम करने के दौरान कोशिश रहती थी कि यादगार पुस्तक मेलों में शिरकत करूं। उन्हें कवर करूं। पुस्तक मेले का इतिहास क्या था, कैसे इसमें लेखकों के बाद रंगकर्मियों ने अपनी जगह बनाई। यह सब एक लम्बा इतिहास है। इसपर नहीं जाऊंगा लेकिन पुस्तक मेला का खास महत्त्व है। इससे पहले श्री हरिवंश नारायण सिंह ने लेखक रत्नेश्वर की पुस्तक ’32 हजार साल पहले’ का विमोचन किया। उन्होंने कहा कि रत्नेश्वर की किताब का शीर्षक ही आकर्षक है। किताब हमें इतिहास तक पहुँचने में मदद करेगी। दुनिया को विचारों ने बदला और विचार साहित्य की ही देन है। दुनिया को समझने की खिड़की उपन्यास है। बिहार विचारों की राजधानी है। पाटलिपुत्र को ‘पटना पुस्तक मेला’ जीवन्त करता है। पटना पुस्तक मेले का संघर्ष पूर्ण और सम्पन्न इतिहास है। जिस दौर में हर कोई घरों तक सिमट रहा है उस समय पटना पुस्तक मेला का आयोजन महत्त्वपूर्ण है।
मेले में चित्रों का बड़ा महत्त्व: मुख्य अतिथि कला गौरव पद्मश्री डॉ० श्री श्याम शर्मा ने कहा कि साहित्य के मेले में चित्रों का बड़ा महत्त्व है। शब्द चित्र और रेखा चित्र एक सिक्के के दो पहलू हैं। साहित्य में जो कथात्मकता है वह चित्र से आती है। शब्दों का अनुवाद दूसरी भाषा में हो सकता, चित्र का अनुवाद नहीं हो सकता क्योंकि वह अपने आप में सम्पूर्ण है। शब्द का पर्यायवाची हो सकता है रंग का कोई पर्यायवाची नहीं होता। बिना चित्र के शब्द की रचना नहीं की जा सकती। शब्द अपने आप में कलाकृति हैं। उन्होंने संकेत करते हुए कहा कि शब्द, साहित्य और चित्रकला सहोदर कला है। सहोदर कला मिलकर समाज का विकास करते हैं। शेर पढ़ते हुए उन्होंने कहा- चारों तरफ उसका नजारा ही नजारा है। सिकी नजर हो जितनी उतना ही देखता है। उन्होंने कहा कि साहित्य प्रेमियों का संगम पटना पुस्तक मेला बिहार की सांस्कृतिक पहचान है। मेले का नाम लेने पर मन में एक आकृति बनती है। देश-विदेश के लोग साहित्य के इस कुम्भ में भाग लेते हैं। पटना पुस्तक मेला अपनी गरिमा के शिखर पर पहुँच चुका है। इस पुस्तक मेले की स्वीकार्यता केवल लेखकों और प्रकाशकों के बीच ही नहीं है। छात्र, बुद्धिजीवी और शिक्षकों के लिए भी यह मेला अहम मंच साबित हुआ है।
पढ़ता ही नहीं, लिखता भी है बिहार: लेखक रत्नेश्वर ने कहा कि पटना पुस्तक मेला यह बताता है कि बिहार पढ़ता ही नहीं, लिखता भी है। यह देश का तीसरा सबसे बड़ा मेला है। इस मेले ने सांस्कृतिक आन्दोलन चलाया है। हमारे यहाँ के लेखक कितना सोच रहे हैं, इसकी तस्दीक गांधी मैदान आकर की जा सकती है। संसार के बौद्धिक जगत में भारत कंट्री आफ आनर के रूप में है। बिहार में मौजूद पढ़ने की ललक दुनिया भर के पाठकों को स्तब्ध करती है। बिहार के विचारकों की राजधानी रही है पटना, उसकी जीवन्तता दिखती है पटना पुस्तक मेला में। देश भर के यशस्वी साहित्यकारों, लेखकों, समालोचकों, कवियों की भागीदारी से गौरवान्वित पुस्तक मेला में अनन्य है, पटना पुस्तक मेला। पुस्तक की अतीत का आइना बताते हुए उन्होंने कहा कि बिहार के गाँव को पढ़ना हो, जानना हो तो ‘मैला आंचल ‘ पढ़ लें। छपे शब्दों का प्रभाव मानव पटल पर पड़ता है। सही सोचने के रास्ते पर विचार ही ले जाते हैं और विचार किताब के ज्ञान से प्राप्त होता है। इतिहास से भविष्य निर्माण की ऊर्जा मिलती है। बिहारी खूब पढ़ता है के साथ अब बिहारी खूब लिखता है भी दिखता है। पुस्तक मेला के सचिव अमरेन्द्र कुमार झा ने कहा कि पुस्तक मेला का इस वर्ष का थीम है ‘मोबाइल छोड़िए, पुस्तक पढ़िए’: जो कि पुस्तक मेला में आगन्तुकों को प्रेरित करेगा। पटना पुस्तक मेला के संस्थापक नरेन्द्र कुमार झा ने इस मेले की श्रेष्ठता के बारे में बताया और कहा कि युवाओं के लिए विशेष उपयोगी है पटना पुस्तक मेला। अध्यक्षीय उद्गार सीआरडी के संस्थापक-सदस्य एचएल गुलाटी ने कहा कि कोरोना के दौर में पुस्तक और टीवी ही हमारी दोस्त बनी। पटना में पुस्तकों के लिए हो रहा यह आयोजन नहीं, त्योहार है। सबसे अच्छा यह है कि पुस्तक मेले में स्कूली बच्चों का आना होता है, जिससे उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
शनिवार 3 दिसम्बर 2022
रचना का चयन गहरे पानी में मोती चुनने के समान: किताबें खरीदने के लिए हर स्टाल पर पुस्तक प्रेमियों का जमावड़ा रहा। लेखकों से बातचीत हुई। साथ ही नाटक की भी प्रस्तुति की गई। शब्द साक्षी कार्यक्रम के अन्तर्गत संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित श्री ऋषिकेश सुलभ ने कहा कि रचना का चयन गहरे पानी में मोती चुनने के समान है।
हमें थियेटर्स चाहिए, फिल्म सिटी नहीं: सीआरडी की ओर से गांधी मैदान में आयोजित पटना पुस्तक मेला के दूसरे दिन शनिवार को गुफ्तगू कार्यक्रम में सिनेमा पर नेशनल अवार्ड से सम्मानित कला समीक्षक विनोद अनुपम और जाने-माने लेखक व वरिष्ठ पत्रकार गिरिधर झा ने बातें साझा कीं। उन्होंने कोराना के बाद फिल्मों में बदलाव की बात की। एक तरफ मंच पर देश के लेखक और फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम और दूसरी तरफ उनको तल्लीन होकर सुनते श्रोता।
बातचीत में समीक्षक विनोद अनुपम ने सिंगल स्क्रीन थिएटर को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने कहा कि हमारे पास फिल्मों की खान है लेकिन उन्हें दिखाने के लिए थियेटर्स नहीं हैं। हमें थियेटर्स की जरूरत है न कि फिल्म सिटी की। हम क्या करेंगे फिल्म सिटी का, जब हमारे डायरेक्टर्स के पास दिखाने के लिए थियेटर्स ही नहीं होंगे। आज हमारी लोकभाषाओं की फिल्में दुनियाभर में अपनी पहचान बना रही हैं। उन्होंने कहा कि आज के निर्माता -निर्देशको में प्रेरणा की कमी है। पहले के निर्देशक अपनी संतुष्टि के लिए फिल्में बनाते थे और आज की फिल्में बाजार के लिए बनती हैं। सिनेमा का अब एकाधिकार नहीं है। अब और बाजार में ओटीटी प्लेटफार्म के जरिए नए कलाओं को भी मौका मिल रहा है। मल्टीप्लेक्स और बाजार का फिल्म के निर्माता ओर निर्देशक पर प्रभाव है।
तीसरे सत्र में लेखक रत्नेश्वर की पुस्तक ’32 हजार साल पहले’ पर पत्रकार शांभवी सिंह ने गुफ्तगू की। रत्नेश्वर सिंह ने कहा कि किताब हमारे प्रजातियों के सर्वाइवल पर निर्धारित है। इस किताब को लिखने में उन्हें करीब 8 साल लगे हैं और उनमें से 6 साल उन्होंने इसके लिए किए गए रिसर्च को किया। कुल 550 कहानियों के संग्रह में से चुन कर 63 कहानियों की 3 उपन्यासों की श्रृंखला तैयार की है जिसमें से यह पहली किताब है। हिस्ट्री चैनल पर प्रसारित हुए एक वीडियो से मिली। इस किताब को लिखने के लिए उन्होंने फिजिक्स का भी अध्ययन किया। उनके उपन्यास में स्त्री को वारियर का दर्जा दिया है। उन्होंने कहा कि यह खूबसूरत-सी सांस्कृतिक दुनिया जो आप देख रहे हैं… यह दुनिया स्त्रीयों ने बनाई है। उनके उपन्यास में किन्नरों को भी सशक्त और बराबर का दर्जा दिया है।
पटना पुस्तक मेला में शनिवार को व्यंजनों के बहाने बिहार की संस्कृति का दर्शन है पुस्तक: राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने युवा पत्रकार रवि शंकर उपाध्याय की पुस्तक ‘बिहार के व्यंजन: संस्कृति और इतिहास’ का लोकार्पण कर विमोचन किया। उन्होंने कहा कि यह किताब बिहारी खानपान का इतिहास समाज के बुनावट के बारे में बताती है। सिलाव का खाजा, उड़वंतनगर का खुरमा, थावे की खुरचन, बोधगया में बुद्ध को सुजाता के खीर खिलाया, पांचवीं शताब्दी में फाहयान व सातवीं शताब्दी में ह्वेन्तसांग के यात्रा वृत्तांत से बिहार के खान पान के बारे में पता चलता है। किताब में 65 प्रकार के व्यंजनों की चर्चा की है। रविशंकर उपाध्याय ने कहा कि बिहार के व्यंजनों को लेकर एक स्टीरियोटाइप छवि रही है। मैंने काम के दौरान व्यंजनों के बारे में लिखना शुरू किया। इसके प्राचीन ग्रंथों जैसे रामायण, वेद पुराण आदि का अध्ययन किया। बिहार के हर क्षेत्र में अलग-अलग व्यंजन है। आईपीएस अधिकारी सुशील कुमार ने कहा कि यह किताब खानपान, लोकजीवन से परिचय कराती है। खुदा बख्श लाइब्रेरी के पूर्व निदेशक इतिहासकार इम्तेयाज अहमद ने कहा कि इतिहास के अनदेखे खोने, कोने को सामने लाती है। बिहार की चटनी, अचार को जोड़ दिया जाए किताब और अच्छी हो जाएगी। ऐसे ही बाकरखानी बिहार को छोड़ कहीं नहीं पाई जाती है। अनिल उपाध्याय ने अतिथियों को ‘स्मृति चिन्ह’ प्रदान किया।
लेखन के समय निर्मम किस्म की तटस्थता जरूरी: कवि अंचित से बातचीत में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित ऋषिकेश सुलभ ने कहा कि कौन सी रचना पढ़नी है, इसका चुनाव गहरे पानी में मोती चुनने के समान है। ‘दाता पीर’ पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि उपन्यास लिखने के लिए चीजों पर गौर करना जरूरी है। लेखन के समय निर्मम किस्म की तटस्थता होनी चाहिए। ऋषिकेश ने बताया कि वे अपने नए उपन्यास पर काम कर रहे हैं। कार्यक्रम में उनके उपन्यास ‘अग्निलीक’ का भी जिक्र हुआ। इस दौरान ऋषिकेश ने अपने 30-35 वर्ष के अनुभवों को साझा किया।
रविवार 4 दिसम्बर 2022
‘जंगल से लौटकर’ का विमोचन: प्रगतिशील लेखक संघ, पटना के तत्वावधान में चर्चित कवि प्रवीण परिमल के संग्रह ‘जंगल से लौटकर’ का लोकार्पण पटना पुस्तक मेला के नालन्दा संगोष्ठी सभागर में किया गया। लोकार्पण समारोह हिन्दी के चर्चित कवि आलोक धन्वा, अरुण कमल, निवेदिता झा, संजय कुमार कुंदन, असलम हसन और चन्द्रबिंद सिंह द्वारा किया गया। इस मौके पर अच्छी खासी संख्या में शहर के बुद्धिजीवी, साहित्यकार आदि मौजूद थे। प्रारम्भ में प्रवीण परिमल ने अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया। साहित्य अकादमी से सम्मानित कवि अरुण कमल ने प्रवीण परिमल के काव्य संग्रह से बचा रहे प्रेम का पाठ किया तथा उनकी कविताओं पर कहा कि प्रवीण परिमल से मेरी मुलाकात काफी पहले से है जब ये गया में थे। मैंने उनका सभी संग्रह पढ़ा है। इनकी प्रेम कविताओं का सुन्दर संग्रह है। आजकल हिन्दी कविता में गरीब, साधारण लोगों के बारे में कम लिखा जा रहा है। प्रवीण परिमल की कविताएं दु:ख झेलने वाले लोगों तथा उसका प्रतिकार करने वाली हैं।
महुआ बीनने वाली औरतें, मोची पिता आदि में ऐसे लोगों की बातें की गई हैं। कविता उनलोगों की बात करती है, जिसकी सुध कोई नहीं लेता। यहाँ तक कि भगवान् भी नहीं। कवि के बारे में बात करने का सबसे अच्छा तरीका है कि कवि की बात की जाए। प्रेम के सबसे अच्छे दृश्य पहाड़ पेड़ नदी जैसे भदृश्य के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है। शायर संजय कुमार नंदन ने कहा कि प्रवीण परिमल की कविताओं का रेंज बहुत बड़ा है। परिमल जी ने बड़ी आँख से दुनिया को देखा है। वह किसी खास वर्ग और खास आँख से देखी हुई कविता नहीं है, यही उनकी बहुत बड़ी सफलता है। इनकी लहना सिंह उदास कविता पसन्द आई। बदलते गाँव का एक दर्द झलकता है। अभी के गाँव को उन्होंने कविताओं में लाने की कोशिश की है। अपनी एक कविता में पिता की तुलना पहाड़ से की है। निवेदिता झा ने कहा हम जो भी शब्द रचते हैं वह कविता ही हुआ करती है। कविता को रचना अपने भीतर रखना और बाँटना बेहद जरूरी है।
युवा कवि व प्रशासनिक पदाधिकारी असलम हसन ने कहा- ‘इन कविताओं की इतनी विविधता है, इंद्रधनुष के इतने रंग हैं, कविता में धान कूटती औरतें हैं, पिता हैं, उनका चमरौधा जूता है तथा शहर की बदबू कविता है। इन कविताओं से पता चलता है कि उनमें संवेदना है।’ युवा कवि चन्द्रबिंद सिंह ने कहा- ‘संग्रह में संघर्षशील चेतना के बिंब दिखाई पड़त हैं। गाँव पर शहर का प्रभाव, गाँव की विद्रुपताओं को सामने लाती है। उनकी कविता पढ़ते हुए विनोद कुमार शुक्ल की याद आती है। पिता और बेटी को रखकर कविता लिखी गई है।’ इतिहास जब करवट बदलता है, तब समय में उसका असर पड़ता है। प्रख्यात कवि आलोक धन्वा ने भी ‘जंगल से लौटकर’ से अपनी पसन्द की कविता पढ़ते हुए कहा- ‘प्रवीण परिमल हमारे परिवार के कवि हैं। पाठक को जो मुहब्बत है, वहीं कवियों का सबसे बड़ा पुरस्कार है। अपनी बेचैनी को कवि भाषा प्रदान करता है।
अन्त में राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष जेपी पांडे ने कवि को सम्मानित किया। संचालन प्रगतिशील लेखक संघ के राजकुमार शाही, अतिथियों का स्वागत व धन्यवाद ज्ञापन गजेंद्रकांत शर्मा ने किया। कार्यक्रम में पुष्पराज, कवि चंदन, श्रीकांत व्यास, बालगोविन्द सिंह, बीएन विश्वकर्मा, पटना आर्ट कालेज के प्राचार्य अजय पांडे,ज्योति स्पर्श, रूपक सिन्हा, अवधेश कुमार, मृत्युंजय शर्मा, अशोक कुमार गुप्ता, विजय कुमार, सुनील सिंह, जयप्रकाश, राज आनंद, अनीश अंकुर, आदि उपस्थित थे।
पुस्तक मेले में पत्रकार हरिवंश की तीन किताबों का लोकार्पण: रविवार 4 दिसम्बर को पटना पुस्तक मेला के बोधगया मुक्ताकाश मंच से लेखक-पत्रकार व राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश की तीन पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ये तीन किताबें क्रमशः सृष्टि का मुकुट: कैलास मानसरोवर, कलश और पथ के प्रकाश पुंज हैं। पुस्तक लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि वरिष्ठ गांधीवादी विचारक, शिक्षाविद् डॉ० रामजी सिंह थे। डॉ० सिंह ने कहा- “किताबें तो महान् होती ही हैं, लेकिन लेखक का महत्त्व उससे भी ज्यादा होता है। लेखक न होते तो किताबें कैसे लिखी जातीं। लेखक हरिवंश ने पत्रकारिता में रहते हुए एक मूल्य और आदर्श गढ़ा और अब लेखक के रूप में भी एक अलग रूप में सामने हैं। भारत की आध्यात्मिक परम्परा यहाँ की पहचान और मूल ताकत हैं। हरिवंश ने आरम्भिक काल से ही संवेदना, सरोकार और भारतीय मूल्यांक को सतत उभारा है।”
समारोह में विशिष्ट अतिथि के तौर पर पत्रकार अंकित शुक्ला, अजय कुमार, आलोक मिश्रा, अश्विनी सिंह उपस्थित थे। अश्विनी सिंह ने कहा- “हरिवंश ने हम सबों को पत्रकारिता के जीवन में बहुत कुछ सिखाया है।” वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार ने कहा- “हरिवंश बिहार-झारखण्ड की पत्रकारिता में कुम्हार की तरह रहे हैं,जिन्होंने अनेक युवाओं को अनपढ़ मिट्टी से गढ़कर सुघर आकार दिया है।” पत्रकार आलोक मिश्रा ने कहा- “हमारी पीढ़ी के लिए पत्रकार के रूप में हरिवंश एक माडल की तरह रहे हैं, जिनसे अनेक वैसे पत्रकारों ने भी बहुत कुछ सीखा है, जो इनके साथ प्रत्यक्ष तौर पर कभी काम नहीं किए।”
लोकार्पण समारोह में लेखक हरिवंश के साथ तीनों किताबों पर बातचीत वरिष्ठ फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने की। विनोद अनुपम के सवालों का जवाब देते हुए लेखक हरिवंश ने अपनी तीन किताबों के बारे में, तीनों किताबों की लिखने की प्रेरणा के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा- “वे मानते हैं कि सृष्टि के रहस्य को समझने के लिए भारतीय आध्यात्मिक परम्परा और विरासत को जानना जरूरी है। देश दुनिया में अनेक ऐसे लोग हुए जिन्होंने आखिरी समय में आध्यात्मिक चेतना को समझने की कोशिश की। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, महर्षि अरविंद,रमण महर्षि अनेक ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने भारत को एक नई दिशा दी।” लेखक हरिवंश ने अपनी तीनों किताबों की रचना प्रक्रिया और इन विषयों में रुचि के बारे में विस्तार से बताया।
कार्यक्रम में शिवानंद तिवारी, श्रीकांत, डॉ० अजीत प्रधान, आइआईटी पटना के निदेशक टीएन सिंह, पूर्व आइपीएस अधिकारी डीएन गौतम, पूर्वी आइएएस अधिकारी आइसी कुमार, डॉ० (प्रोफेसर) नवल किशोर चौधरी, आइपीएस अधिकारी सुशील कुमार, एएन कॉलेज के प्राचार्य एसके शाही, नरेन्द्र कुमार झा, एसएन पाठक, रत्नेश्वर सिंह, प्रणव चौधरी समेत अन्य गण्यमान्य लोग पटना के साहित्यप्रेमी, लेखक, कलाकार मौजूद रहे। संचालन विशाल तिवारी ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन संजय सिंह ने किया।
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