Patna Book Fair

किताबों और लेखकों की ऐसी कद्र और कहां !

पटना में पुस्तक मेला अपने उफान पर है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ कांग्रेस की चौंकाने वाली पराजय के बावजूद बिहार के मंत्री दंभपूर्ण बयान दे रहे हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के निष्ठावान, समर्पित युवा इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे की हत्या का सदमा माहौल में तारी है। निवर्तमान डीजीपी ओझा के ‘दुस्साहसी’ बयानों की…


पटना में पुस्तक मेला अपने उफान पर है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ कांग्रेस की चौंकाने वाली पराजय के बावजूद बिहार के मंत्री दंभपूर्ण बयान दे रहे हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के निष्ठावान, समर्पित युवा इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे की हत्या का सदमा माहौल में तारी है। निवर्तमान डीजीपी ओझा के ‘दुस्साहसी’ बयानों की गूंज हवा में है तो उन्हें हटा दिए जाने की ताजा सनसनी भी। मन में एक साथ कई मुद्दों का सवाल उमड़ते-घुमड़ते हैं। कभी वे टकराते हैं, कभी एक में गुम्फित हो जाते हैं और कभी दूर-दूर छिटक जाते हैं। यह बिहारी समाज की विशेषता है या बिहार को हमेशा गर्मागर्म मुद्दों से घिरा देखने की हमारी नजर का फर्क?

पटना का पुस्तक मेला ललचाता है, बार-बार खींचता है। समाज में किताब और लेखक की ऐसी कद्र देखकर गर्व होता है कि किताबों का ऐसा उत्सव मनाने वाला पटना या बिहार ‘पिछड़ा’ क्यों है? वह किस रूप में पिछड़ा है? विकास के प्रचलित मानकों का किताबों और इतना पढ़ने वालों से क्या रिश्ता है? क्या लेखक और किताबें समाज में कोई सीधा हस्तक्षेप करती हैं? दूसरे बड़े हिन्दी भाषी राज्यों की जनता जब आश्चर्यजनक रूप से सत्ता पलट रही है तब पिछड़े बिहार की जागरूक जनता क्या सोच रही है? कुछ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अब विकास चुनावी मुद्दा बनने लगा है। वे तर्क दे रहे हैं कि दस साल से राज कर रहे दिग्विजय सिंह को मध्यप्रदेश की गड्ढों में धंसी सड़कों वाले बिहार की जनता के मन भी क्या काई उथल-पुथल हो रही है?

क्या सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, बाढ़, सूखा, कानून-व्यवस्था बिहार में मुद्दा बन सकते हैं? लेकिन तभी दूसरे विशेषज्ञ छत्तीसगढ़ की चमकदार सड़कें लेकर सामने खड़े हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ जैसी सड़कें आज किसी राज्य में नहीं। तो अजीत जोगी क्यों चुनाव हारे? अशोक गहलोत की भी सड़क-बिजली-पानी वाले विकास से कोई दुश्मनी नहीं थी। उनका ताज क्यों छीन गया? यानी विकास उतना बड़ा मुद्दा नहीं है। जनता का असली मुद्दा है परिवर्तन। बदलाव की इच्छा विकास न होने से जाते या सिर्फ परिवर्तन की कामना से, दूसरे राज्यों में उठती-उमड़ती दिखाई देती है। बिहार की जनता क्या जाति-उपजाति के पंक में ही अपनी कामनाएं डुबोती रहेगी?

एक तरफ किताबों का यह अद्भुत उत्सव और दूसरी तरफ जाति-उपजाति ऐसे मारक फंदे! अगर हम यह कह बैठें कि जाति-उपजाति की जितनी नकारात्मक राजनीतिक साजिशें बिहार के पढ़े-लिखे समाज में हैं, उतनी ग्रामीण जगत में नहीं तो क्या बहुत गलतबयानी हो जाएगी? यह बिहार का कैसा कड़वा सच है! क्या यह पूरे भारत का भी सच है और सिर्फ बिहार में ही नंगे रूप में दिखाई देता है?

यह सवाल पीछा भी नहीं छोड़ते कि कानपुर आईआईटी के मेधावी छात्र रहे, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के इंजीनियर सत्येन्द्र दुबे की हत्या का सदमा मन को डुबोने सा लगता है। बिहार में और बिहार के बाहर भी आम से खास जन की हत्याएं होती रहती हैं। मगर सत्येन्द्र दुबे की हत्या बहुत गहरी पीड़ा इसलिए पहुंचाती है कि उसे बिहार में राजमार्ग निर्माण में हो रहे घोटाले की शिकायत करने के कारण मार दिया गया।

इकतीस वर्ष का वह मेधावी इंजीनियर आईआईटी से निकलकर अमेरिका-यूरोप की दौड़ भी लगा सकता था जैसा कि आमतौर पर लड़के करते हैं। मगर उसने अपने उस बिहार में नौकरी की जहां से सब प्रतिभावान भागना चाहते हैं। उसे प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज योजना में बिहार में हो रही भारी गड़बड़ियों का पता चला। उसने प्रधानमंत्री को गोपनीय शिकायत भेजी। अपना नाम जाहिर न करने का आग्रह भी किया था। प्रधानमंत्री का दफ्तर लापरवाह निकला। सत्येन्द्र का नाम जाहिर कर दिया गया और उसे मार डाला गया। इकतीस साल के उस प्रतिभाशाली इंजीनियर में बिहार में बेहतर काम होता दिखने की तीव्र इच्छा रही होगी। यह तमन्ना बिहार के लिए बहुत जरूरी थी मगर उसे कत्ल कर दिया गया।

यह भरोसा कैसे जागे कि सत्येन्द्र की मासूम तमन्ना के हत्यारों तक कानून के हाथ पहुंच पाएंगे? पटना में पुस्तक मेला चल रहा है मगर बिहार में बेहतरी की ख्वाहिश और शिकायतें करने का साहस रखने वाले सहमे हैं। मंत्री दंभ में हैं। कहते हैं किताबें मनुष्य को सचेत और निर्भय बनाती हैं। क्या गांधी मैदान में सजी और बिकती किताबों के पन्नों में सत्येन्द्र की तमन्ना भी फड़फड़ा रही है? क्या वह किताबों के साथ हाथों, घरों और दिमागों तक पहुंच पा रही है?

लेख़क- नवीन जोशी


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