William Shakespeare birthday

23 अप्रैल क्यों है खास? — शेक्सपियर के 462वें जन्मदिन पर साहित्य की नई शुरुआत

✍️23 अप्रैल विलियम शेक्सपियर का 2026 में 462वां जन्मदिन है। 13 वर्ष के अधिकतम किशोरी/किशोर जो अब 8वीं कक्षा में पहुँचते हैं और इस दिन बेहद उत्साह से वे अपने अभिभावकों को फोन करके बताते हैं कि वे इस साल शेक्सपियर पढ़ना शुरू करेंगे। हम कोर्टरूम वाला दृश्य करेंगे ‘द मर्चेंट आफ वेनिस से’। यह…


✍️23 अप्रैल विलियम शेक्सपियर का 2026 में 462वां जन्मदिन है। 13 वर्ष के अधिकतम किशोरी/किशोर जो अब 8वीं कक्षा में पहुँचते हैं और इस दिन बेहद उत्साह से वे अपने अभिभावकों को फोन करके बताते हैं कि वे इस साल शेक्सपियर पढ़ना शुरू करेंगे। हम कोर्टरूम वाला दृश्य करेंगे ‘द मर्चेंट आफ वेनिस से’। यह संदेश अभिभावकों के लिए थोड़ा चौंकाने वाला है। कई साल पहले, जब अभिभावक स्वयं 8वींं कक्षा में थे, उन्होंने चार्ल्स और मैरी लैम्ब के दो हल्के नाटकों — ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम’ और ‘द टेम्पेस्ट’ — के दो सत्र किए थे, उसके बाद 11वीं कक्षा में जाकर मूल ‘द मर्चेंट आफ वेनिस’ पढ़ा था। आईसीएसई पाठ्यक्रम बदला है,पर थोड़ा ही।‌ आज के छात्र यह भी बताते हैं कि उनकी कक्षा निकट भविष्य में ‘जूलियस सीजर’ और ‘मैकबेथ’ भी पढ़ेगी। ये दोनों भारी नाटक हैं, और निश्चित रूप से ये नाटक नहीं हैं जो उनके अभिभावकों ने विद्यालय में पढ़े थे। अभिभावकों ने पहली बार मैकबेथ स्नातक स्तर पर पढ़ा था।

फिर भी, जो छात्र आज बता रहे हैं, वह एक ऐसा दृश्य है जो पिछले कई वर्षों से हजारों शहरी भारतीय कक्षाओं में दोहराया जा रहा है — जहाँ एक मध्यम-विद्यालय शिक्षक पाठ्य-पुस्तक खोलता है,शेक्सपियर का ‌एक अंश पढ़ाता है और पूरी पीढ़ी को दुनियाँ के सबसे महान् नाटककार से पहली बार मिलवाता है।‌ पूर्व और वर्तमान छात्र-छात्राओं के मामले में, बोर्ड में उनका पहला वास्तविक सामना तब होता है जबकि वे 13 या 14 वर्ष के होते हैं, और दोनों बार, यह ‘द मर्चेंट आफ वेनिस’ के जरिए होता है। दोनों बार, वे सबसे पहले उनकी प्रतिभा को उसी सबसे प्रसिद्ध कोर्टरूम दृश्य में देखते हैं जिसमें ‘शाइलाक’ एक असम्भव, पर न्यायोचित माँग करता है, जिसमें ‘एंटोनियो‌’ अनिच्छुक और अपने भाग्य के प्रति समर्पित खड़ा है।

‘शेक्सपियर‘ ने ऐसी औरतें लिखीं जो पलटकर जवाब देती हैं — समाज से, सत्ता से, सच से। ‘द मर्चेंट आफ वेनिस’ में ‘पोर्शिया’ कानूनी दर्शन पर बहस करती है, जबकि ‘बीट्रिस, मच अडो अबाउट नथिंग’ में, किसी भी सामाजिक स्थिति में चुप या विनम्र रहने से इनका करती है — वह हर पुरुष से हाजिरजवाबी में टक्कर लेती है और ज्यादातर से आगे निकल जाती है। रोजालिंड ‘एज यू लाइक इट’ में, पुरुष के भेष में, एक पूरे रोमांटिक प्लाट को सर्जन (शल्यकार) की सटीकता से रचती है। ‘ट्वेल्फ्थ नाइट’ में ‘वायोला’ शोक, भेष बदलने और एकतरफा प्यार कोई अपने आसपास के किसी भी पुरुष से ज्यादा स्पष्टता से सम्भालती है। ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम” में ‘हेलेना’ बिना माफी माँगे वह हासिल करती है जो वह चाहती है।

यह ‘द मर्चेंट आफ वेनिस’ के जरिए हैं कि हम देखते हैं कि ‘शाइलाक’ एक असम्भव, पर एक प्रसिद्ध कोर्टरूम में न्यायोचित माँग करता है जिसमें ‘एंटोनियो’ अनिच्छुक और अपने भाग्य के प्रति समर्पित खड़ा है। उस महत्त्वपूर्ण क्षण में, एक निराशाजनक स्थिति है — एक प्रतिपक्षी एक पाउंड मांस माँगता है, और एक व्यापारी उस शर्त को पूरा करने के लिए अपनी जान देने को तैयार है, यह जानते हुए कि उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा। और फिर, युद्ध में दहाड़ती हुई, ‘पोर्शिया’ का प्रभाव है, जो बस चलकर आती है और बिना किसी के जाने कि वह वास्तव में कौन है — जिसमें उसका अपना सचमुच अयोग्य पति भी शामिल है — कोर्टरूम दिन जीत लेती है।

यह एक महत्त्वपूर्ण क्षण है,खासकर जब यह सोचा जाए कि ‘पोर्शिया’ ने ‘द मर्चेंट आफ वेनिस’ का ज्यादातर हिस्सा अपने दिवंगत पिता की वसीयत की शर्तों के तहत सौदेबाजी की वस्तु बनकर बिताया है। उसे मूर्ख दावेदारों को सन्दूकों में से चुनते हुए झेलना पड़ा है, और उसके पास व्यावहारिक रूप से कोई अधिकार नहीं था, जबतक कि वह उस कोर्टरूम में एक युवा पुरुष वकील के भेष में नहीं चलकर आती और इस तरह से बागडोर सम्भालती है कि कोई उससे उल्टा सवाल करने की हिम्मत नहीं करता। वह ‘शाइलाक’ के कानूनी मामले को समस्त नाटकीय साहित्य के सबसे शानदार सटीक तर्क से ध्वस्त कर देती है, और ‘एंटोनियो’ की जान बचाती है, वह भी पूरी तरह कानून के भीतर रहकर उसकी बेतुकीपन को उजागर करते हुए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह अपना मुकदमा (केस) लगभग सहजता से जीत लेती है।

यह वह पहला ‘शेक्सपियर’ है जिससे ज्यादातर भारतीय बच्चे — कम से कम वर्तमान पीढ़ी में — कभी मिलते हैं।‌ एक युवा महिला जो, अपने पास कोई अधिकार न होने के बावजूद, न केवल अपने पति के सबसे अच्छे दोस्त की जान बचाती है, बल्कि उस कमरे में न्याय के विचार को भी बचा लेती है। मध्यम विद्यालय के शिक्षक जानते हैं कि यह क्रान्तिकारी है, क्योंकि यह शेक्सपियर नहीं होगा। यह नारीवादी है और एक 13 वर्ष के युवा के लिए एक दिन अपने बड़े अभिभावक को गर्व से फोन करके यह घोषणा करना कि वे इसे खुद अध्ययन करने के लिए उत्साहित है, बिलकुल वही है जो जरूरी है।

शेक्सपियर के नारीवाद की शारीरिक संरचना: यहाँ सटीक होना जरूरी है, क्योंकि १६वीं सदी के नाटककार पर ‘नारीवादी’ शब्द चिपकाने के लिए कुछ बौद्धिक सावधानी चाहिए। शेक्सपियर ने यह शब्द इस्तेमाल नहीं किया, न ही उन्होंने परिस्थिति-उत्थान शिविरों में भाग लिया या नारीवादी घोषणा-पत्र लिखे। बहुत सीधे-सरल शब्दों में वे एक व्यावसायिक नाटककार थे जो थिएटर भरने की कोशिश कर रहे थे। और फिर भी, उन्होंने अपने 38 नाटकों में, महिला पात्रों का एक ऐसा समूह बनाया, जो पूर्णरूपेण साकार, नैतिक रूप में जटिल,और बौद्धिक रूप में प्रबल है, कि विद्वान् पिछली कुछ सदियों से उनकी गहराई व आयोमों पर बहस कर रहे हैं।

शेक्सपियर ने मूल रूप से ऐसी औरतें लिखीं जो पलटकर जवाब देती हैं- समाज से, सत्ता से, सच्चाई से। पोर्टिया, जैसाकि हमने स्थापित किया है, कानूनी दर्शन पर बहस करती है, जबकि बीट्रिस ‘मच अडो अबाउट नथिंग’ में किसी भी सामाजिक स्थिति में चुप या विनम्र रहने से इनकार करती है – वह हर पुरुष से हाजिरजवाबी में टक्कर लेती है और ज्यादातर से आगे निकल जाती है। ‘एज यू लाइक इट’ में रोजालिंड पुरुष भेष में एक पूरे रोमांटिक प्लाट को सर्जन (शल्यकार) की सटीकता से रचती है। ‘ट्वेल्फ्थ नाइट’ में वायोला शोक, भेष बदलने और एकतरफा प्यार को अपने आसपास के किसी भी पुरुष से ज्यादा स्पष्टता से सम्भालती है। ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम’ में हेलेना बिना माफी माँगे वह हासिल करती है जो वह चाहती है। और फिर उनकी गहरी, अधिक कठिन औरतें हैं- ‘लेडी मैकबेथ’, जो अनिवार्य रूप से उस नाटक का मुख्य इंजन है जो उसके पति के नाम पर है,जो मैकबेथ से खुद ज्यादा निर्दयी, ज्यादा निर्णायक, ज्यादा रणनीतिक रूप से स्पष्ट दिमागवाली है, और कमजोरी से नहीं बल्कि जो उसने किया है उसके भार से टूट जाती है। क्लियोपेट्रा, जो तर्कसंगत रूप से पूरे साहित्य में पूर्णतः गढ़ा गया पात्र हैं — चंचल, राजनीतिक, मजेदार, दुःखद — जिसे सीमित करना असम्भव है। गर्टरूड, जिसकी चुप्पी और स्पष्ट सहभागिता ‘हैमलेट’ में खुद एक तरह का चरित्र-चित्रण है। ये कार्डबोर्ड औरतें नहीं हैं,न ही ये पुरुष कथानकों की सहायक हैं, वास्तव में, वे इससे कोसों दूर हैं।

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