4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

पुस्तक मेले, हिंदी साहित्य और पाठक वर्ग का संकट: प्रकाशन की बदलती दुनिया पर गंभीर सवाल

इस तरह के मेलों से अभिजात्य वर्ग और प्रकाशक को ही लाभ होता है। न तो लेखक को लाभ होता है और न पाठक वर्ग को। गांवों में रहने वाला पाठक वर्ग इस मेले में पहुंच नहीं पाएगा। इस तरह के मेले छोटे शहरों में तो पहुंचते नहीं।

हम तीन तरह की भाषा में जीते हैं। एक वह भाषा जिसे घर में बोलते हैं। दूसरी वह जिसे हम बाजार में बोलते हैं और तीसरी वह भाषा जिसमें लिखते हैं। इसके कारण भी अनेक दिक्कतें पैदा हुई हैं। साहित्य घरेलू भाषा में लिखा नहीं जा रहा है, जिससे पाठक को सुख नहीं मिलता। इसके कारण भी साहित्य से अलगाव बढ़ा है। खड़ी बोली हिंदी गढ़ी हुई भाषा है, इसका हमारी बोलचाल की भाषा से कोई लेनादेना नहीं। दूसरा कारण यह है कि हमारी रचनाओं में महानगरीय संस्कृति को विषय बनाया जा रहा है।

आंचलिक जीवन एक सिरे से गायब है। आंचलिक जीवन से जुड़कर जो साहित्य आएगा, वह अपनी जड़ें भी बनाएगा। सरकार के द्वारा थोक खरीद ने प्रकाशक को लालच एवं मुनाफे की दुनिया में पहुंचा दिया है। पहले प्रकाशक पुस्तक बेचने के लिए बाजार दौड़ता था। आज वह सरकारी अफसरों के पास दौड़ता है। आज जितनी रचनावलियां या पुस्तकें छप रही हैं, वे इतनी महंगी हैं कि उन्हें लेखक तक नहीं खरीद सकता। प्रकाशन व्यवसाय घिनौना हो गया है। स्वयं मेरी पचास पांडुलिपियां पड़ी हुई हैं। मैं छपा नहीं सकता।

सरकारी खरीद-फरोख्त में भी पक्षपात होता है। मेरी आपातकाल-विरोधी कविताओं का संग्रह किसी भी सरकार ने नहीं खरीदा। सरकारी हस्तक्षेप से स्वतंत्र विचारधारा के विकास में रुकावटें पैदा हुई हैं। इसके लिए स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आएं तभी कुछ परिवर्तन होगा। आज जरूरत है रामचंद्र शुक्ल रूपी मिशन की। हमारे मुल्क में कागज इतना महंगा हो गया है कि लेखक के लिए पुस्तक छापना संभव नहीं रह गया। सरकार अगर पाठक वर्ग का विकास करना चाहती है तो पहले कागज सस्ता करे। सरकारी खरीद-फरोख्त में बेईमानी एवं पक्षपात बंद हो।

जब पुस्तक मेले जैसे आयोजन हों तो वे हमारी सनातन साहित्य परंपरा से जोड़कर आयोजित किए जाएं। टी.एस. एलियट, कामू से जुड़कर मेले आयोजित नहीं किए जा सकते। मैं स्वयं टी.एस. एलियट की धारणाओं का प्रचारक था। अब मैं अनुभव करता हूं कि मैं गलत था।

लक्ष्मीकांत वर्मा
(कवि और चिंतक)