4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

पटना की सड़कें : कल से कल तक

पटना शहर की कहानी पाटलिपुत्र से शुरू होती है। पाटलिपुत्र के नाम से इस नगर की स्थापना गौतमबुद्ध की मृत्यु के बाद हुई। बुद्ध के काल में इसे पाटलिग्राम कहा जाता था। गाँव के निवासियों एवं पड़ोसियों द्वारा यातायात के साधन के रूप में जिन मेढ़ों और कच्ची सड़कों का निर्माण किया गया वे ही सड़कें मौर्य साम्राज्य के काल में अति बेहतर रूप में विकसित की गईं। आज भी नगर के जीवन-स्तर को मापने के लिए स्थल मार्ग को एक प्रमुख मापदंड माना जाता है। अच्छी सड़कें विकसित नगर की बात बताती हैं।

पाटलिपुत्र की सड़कों को देखने के लिए इस नगर की भव्यता और मौर्य शासकों की उच्चतम जीवन शैली को संक्षेप में देखना आवश्यक होगा। गंगा और सोन के संगम पर बसा पाटलिपुत्र भारत का मौर्य काल में सबसे बड़ा नगर हो गया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के राजमहल की भव्यता विश्व प्रसिद्ध थी। राजमहल के उद्यानों में पालतू मोर और चकोर रखे जाते थे। देश-विदेश के पेड़ों से महल अलंकृत था। यहाँ के तोते मनुष्य की बोली की नकल आसानी से कर लेते थे। प्रसाद के प्रांगण में निर्मित तालाब बड़ी-बड़ी मछलियों से भरे होते थे। इन्हें पकड़ने की अनुमति नहीं थी।

मौर्य शासकों के ऐश्वर्यशीलता की कोई इंतहा नहीं थी। जब राजा प्रजा को दर्शन देने की कृपा करता तो उसके परिचर हाथों से चाँदी के इत्रदान लेकर चलते थे और सारी सड़क पर जिससे उसे गुजरना होता, सुगन्ध छिड़कते थे। सोने की पालकी में राजा आराम से बैठता था जिसमें मोती जड़े होते थे और उसकी झालरें चारों ओर लटकती रहती थीं। राजा महीन मलमल के कपड़े पहनता जिस पर सोने के काम किये होते थे। पालकी के पीछे सशस्त्र सैनिक और उसके अंगरक्षक चलते थे। इनमें से कुछ अपने हाथों में पेड़ों की डालें लिये चलते थे। इन डालों पर ऐसी चिड़िया बैठी रहती थीं, जिनको अपनी चोंच से काम रोकने की ट्रेनिंग मिली रहती थी। राजा वन में धनुषों और गाती हुई गणिकाओं से घिरा शिकार करता था। छोटी यात्राओं के लिए घोड़ा और बड़ी यात्राओं के लिए वह हाथी का प्रयोग करता था। इन जानवरों का शरीर झालरों से ढका होता जिन पर सोने के काम किये गये थे। बेशर्मी में कोई कसर न रह जाय इसलिए उसके साथ गणिकाओं की एक जमात चलती जो पालकियों पर सवार रहती थीं। राजा का खाना औरतें परोसतीं। वे ही राजा को मदिरा पान करातीं और राजा नशे में जब धुत्त हो जाता तो औरतें उसे पलंग तक पहुँचातीं। वे अपनी देशी भाषा में गीत गातीं और राजा सो जाता था।

उपर्युक्त सम्पूर्ण भव्यता अतिविकसित मौर्य कालीन अर्थव्यवस्था की बात बताते हैं। विकसित व्यापार ने विकसित अर्थव्यवस्था को जन्म दिया। विकसित व्यापार यातायात के अच्छे साधनों के बिना सम्भव नहीं। प्रारम्भ में जलमार्ग के माध्यम से व्यापार ज्यादा सुरक्षित था किंतु नदी से दूर स्थित क्षेत्रों तक व्यापार करने के लिए स्थलमार्गों का होना जरूरी था। मौर्यकाल से पूर्व पाटलिपुत्र की सड़कें कच्ची, पतली और उबड़-खाबड़ थीं। इन पर बैलगाड़ियाँ चलतीं। मुख्य सड़कें चौड़ी और अन्य सड़कें पतली होतीं। इन पर रात में लुटेरे घूमते रहते थे। सुनसान इलाके में तो दिन में ही सड़क पर चलने वाले राहगीर लूट लिये जाते थे।

मौर्यों के काल में पाटलिपुत्र की सड़कें बेहतर हुईं। इन पर सुरक्षा की व्यवस्था की गई। लम्बी दूरी से व्यापार होने के कारण पाटलिपुत्र की सड़कें चौड़ी और भारत के प्रमुख नगरों से जुड़ गईं। जलमार्ग से व्यापार करने पर कम खर्च पड़ता था। श्रम भी कम लगता था और व्यापारिक माल आसानी से लाया-जाया जा सकता था। किंतु समुद्री डाकुओं, तूफान, समुद्री जीवों और नाव में खराबी हो जाने के कारण जान और माल-दोनों की क्षति हो जाती थी। किंतु स्थलमार्ग से इतनी दिक्कतें नहीं होतीं। अतः स्थलमार्ग को श्रेष्ठ माना गया।

पाटलिपुत्र में एक सड़क वैसी थी जो नदी के किनारे निर्मित थी। इससे नदी के किनारे स्थित नगरों तक आसानी से पहुँचा जा सकता था। ऐसी सड़कें कूलपथ कहलातीं। पाटलिपुत्र के उत्तरी भाग में स्थित सड़कें कूलपथ कहलातीं। पाटलिपुत्र के उत्तरी भाग में स्थित सड़कें दक्षिण से बेहतर एवं सुरक्षित तथा ज्यादा उपयोगी थीं। आधुनिक कुम्हरार मुहल्ला से सटा सड़क ही पाटलिपुत्र का दक्षिण पथ और आधुनिक अशोक राजपथ पाटलिपुत्र का उत्तरपथ था। अशोक राजपथ का इलाका मौर्यकाल में ज्यादा श्रेष्ठ था क्योंकि इस इलाके में हाथी, घोड़े, कस्तूरी, दांत, रजत भूषण, स्वर्णभूषण आदि कीमती व्यापारिक वस्तुएं मिल जातीं (कौटिल्य का अर्थशास्त्र श्री वाचस्पति गैरोला द्वारा सम्पादित चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, 1984, पृ. 513-14)। शंख, हाथी, हीरा, मणि, मोती, सुवर्ण आदि व्यापारिक वस्तुओं की खरीद-बिक्री के लिए पाटलिपुत्र के दक्षिण में स्थित मार्ग का महत्व ज्यादा था।

व्यापारिक सड़कें चौड़ी और पैदल सड़कें पतली होतीं थीं। पाटलिपुत्र की मुख्य सड़कों पर गदहा, ऊंट, हाथी, बैलगाड़ी आदि साधनों से लम्बी दूरी वाले व्यापार किये जाते थे।
पाटलिपुत्र में गुप्त सड़कें भी मौर्यकाल में थीं। इनका प्रयोग सम्राट द्वारा संकट काल में किया जाता था। नगर में छ: राजपय थे। तीन राजपथ उत्तर से दक्षिण और तीन राजपथ दक्षिण से उत्तर जाते थे। नगर की गलियाँ 24 फीट (चार दंड) चौड़ी थीं। राजपथ की चौड़ाई 48 फीट (आठ दंड) थी। जलाशयों तथा जंगलों की ओर जाने वाली सड़कों की चौड़ाई 24 फीट थी। हाथियों के आने जाने का मार्ग और खेतों को जाने वाली सड़क 12 फीट चौड़ी होती थी। रथों को जाने वाली सड़क साढ़े सात फीट (पांच अरत्रि) चौड़ी थी। नगर से सटे तथा नगर में मनुष्य तथा भेड़-बकरी आदि छोटे पशुओं के लिए तीन फीट चौड़ा रास्ता होता था। यह बड़ा ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि आधुनिक कालीन पटना शहर में मेन रोड 48 फीट चौड़ा पाते हैं। इस चौड़ाई में अगर कमी है तो उसका कारण मार्ग के दोनों ओर गैरकानूनी कब्जा है जिससे मुक्त कराने का पहला प्रयास 1995 से प्रारम्भ किया गया है। राजेन्द्र नगर, बोरिंग रोड आदि मुहल्लों में 24 फीट चौड़ी सड़कें हैं। पटना के अनेक भागों में 12 फीट चौड़ी सड़कें पाते हैं। साढ़े सात फीट चौड़ी गलियाँ पटना सिटी में अनगिनत हैं जो मुख्यपथ से जुड़ी हैं तथा इनके माध्यम से एक मुहल्ले से दूसरे मुहल्ले में आसानी से पहुँचा जा सकता है।

मौर्यकाल में जिन तीन मुख्य मार्गों की चर्चा है उन्हें आज भी कुम्हरार से सटे राजपथ, अशोक राजपथ और दोनों के बीच में स्थित एक पथ से कर सकते हैं जो आधुनिक गाँधी मैदान के पास स्थित बाकरगंज पथ से पटना सिटी तक गया है। पुनर्तालाश करने पर अन्य तथ्य या इससे भिन्न तथ्य भी उभर सकते हैं।

पाटलिपुत्र नगर के उत्तर एवं पूर्व में उच्च वर्गों के और दक्षिण में निम्न वर्गों के शमशान थे। नगर में निर्मित मकानों के आगे सवाफुट गहरा नाली बनवाना पड़ता था। सड़क के दोनों ओर निर्मित मकानों के बीच एक हाथ का फासला होता था। प्रत्येक दो मकानों की छतों में चार अंगुल का अन्तर होता था। गली की ओर ओर एक हाथ की खिड़की बनायी जा सकती थी किंतु इस बात पर ध्यान देना आवश्यक था कि बगलगीर को परेशानी न हो। मैला, कूड़ा आदि घर के बाहर अनुचित ढंग से फेंकना गैरकानूनी था। मार्ग को बाधा पहुँचाने वालों पर शारीरिक और आर्थिक दंड लगाने का कठोर प्रावधान था।

मौर्यकाल में बड़े-बड़े राजमार्गों पर, शराब की दुकानों पर, होटलों में या सार्वजनिक स्थानों पर घूमने वाले संदिग्ध व्यक्ति को लोग पकड़कर अधिकारियों को सौंप देते थे। चौराहों पर गर्मी के मौसम में प्रशासन की ओर से हजारों घड़े पानी का इन्तजाम रहता था।
सड़क पर मिट्टी या कूड़ा-करकट डालने वाले व्यक्ति पर एक पण का आठवां हिस्सा दंड लगाया जाता था। जो व्यक्ति गाड़ी, कीचड़ या पानी से सड़क को रोकता उसे एक पण का चौथाई भाग दंड के रूप में देना पड़ता था। राजमार्ग को गन्दा करने वाले पर आधा पण का दंड लगाया जाता था (अर्थशास्त्र, पृ. 247)। राजमार्ग पर पैखाना करने वालों पर एक पण का दंड और पेशाब करने वालों पर आधा पण का दंड लगता था। सड़क पर मरा हुआ बिल्ली, कुत्ता, नेवला और सांप फेंकने वाले पर तीन पण का दण्ड लगता था। सड़क पर गधा, ऊंट, खच्चर तथा घोड़ा आदि को लावारिस रूप से छोड़ने वालों पर छ: पण का दंड लगाया जाता था। मनुष्य का लाश सड़क पर फेंकने वाले को पचास पण का दंड देना पड़ता था।

सड़क पर गिरे या छूटे आभूषण या अन्य सामान उस समय तक अधिकारी के पास रहता जब तक असली मालिक का पता न लग जाय।
मौर्यकाल में पाटलिपुत्र और बलख के बीच तथा पाटलिपुत्र और प्रतिष्ठान (दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के उत्तर में स्थित) के बीच राजमार्ग थे जिन पर होकर देश का अधिक व्यापार चलता था। पाटलिपुत्र के कारीगर एवं मजदूर सड़क बनाने में मेगास्थनीज के अनुसार बड़े कुशल थे। जे. डब्लू. मैक्रिण्डल बताते हैं कि पाटलिपुत्र की सड़कों पर हर दो मील के बाद स्तम्भ लगा दिये जाते जो उपमार्गों की ओर संकेत करते थे। राजमार्ग पर पड़नेवाले पड़ावों का प्रामाणिक खाता रखा जाता था। एरियन बताता है कि रास्ते में यात्रियों के आराम का प्रबन्ध होता था। यात्रियों के आराम के लिए अशोक ने पाटलिपुत्र के राजमार्गों पर कुंए खुदवाये और पेड़ लगवाये थे।

राजमार्गों से आनेवाले विदेशी व्यापारियों की खातिरदारी के लिए पाटलिपुत्र में एक समिति होती थी। यह समिति नौकरों की मार्फत विदेशी व्यापारियों के चाल-चलन पर निगाह रखती थी। जब वे देश छोड़ते तब उनको पहुँचाने का काम समिति करती और दुर्भाग्यवश उनमें से यदि किसी की मृत्यु हो गई (मोतीचन्द्र सार्थवाह पृ. 78) तो उसके माल को उसके रिश्तेदारों के पास पहुँचाने का प्रबन्ध समिति करती। विदेशी व्यापारियों की मृत्यु हो जाने पर यही समिति अंतिम क्रियाकर्म करती थी।

पाटलिपुत्र कई मार्गों से देश की राजधानियों एवं बन्दरगाहों से जुड़ा था। स्थलमार्ग पाटलिपुत्र के लिए कभी-कभी हानिकारक भी प्रमाणित हुए। सिकन्दर ने तो केवल पश्चिमी पंजाब तक ही अपनी चढ़ाइयों को सीमित रखा; पर बलख के यूनानी तो स्थलमार्ग से पाटलिपुत्र तक पहुँच गए। डब्ल्यू डब्ल्यू टार्न के अनुसार यह घटना करीब ई. पू. 175 में घटी थी। यह यूनानी आक्रमण दिमित्र के नेतृत्व और मिलिन्द के सेनापतित्व में हुआ था। दिमित्र की सेना स्थलमार्ग से तक्षशिला, पंजाब और दिल्ली होते हुए पाटलिपुत्र पहुँच गई। युगपुराण के अनुसार, सेनापति मिलिन्द के नेतृत्व में यवन सेना मथुरा, साकेत, प्रयाग और बनारस होते हुए पाटलिपुत्र पहुँची और पाटलिपुत्र पर अधिकार कर लिया। उज्जैन, विदिशा, कौशाम्बी और पाटलिपुत्र की सड़कों पर मिलिन्द का दखल हो गया। इस तरह यूनानी शासक दिमित्र ने उत्तर और पश्चिम भारत की सम्पूर्ण पथ-पद्धति पर अधिकार कर लिया। वह तक्षशिला में बैठकर अपोलोडोटस को उज्जैन का और मिलिन्द को पाटलिपुत्र का शासक बनाकर संपूर्ण भारतवर्ष पर शासन करना चाहता था किंतु ऐसी स्थिति दस वर्षों तक बनी रही। इसके बाद करीब 167 ई. पू. ये युक्राटीद के आक्रमण से बलख का राज्य नष्ट हो गया। मिलिन्द की मृत्यु ई.पू. 150 और 140 के बीच हो गई और पाटलिपुत्र पर शुंगों का अधिकार हो गया।

पेशावर से पाटलिपुत्र तक का महापथ कुषाणों के अधिकार में रहा। पालिबोआ (पाटलिपुत्र) से एक सड़क बलख तक जाने की चर्चा टालेमी ने की है। इसका प्रयोग व्यापार के लिए किया जाता था।
गुप्तकाल में स्थलमार्ग ने पुनः पाटलिपुत्र को संकट में डाला। हूण पंजाब और उत्तरप्रदेश होते हुए पाटलिपुत्र जा पहुँचे और इस नगर को लूटकर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया (सार्थवाह, पृ. 176)
अशोक के काल में नगर से बाहर स्थित सड़कों के दोनों ओर गरीब और वृद्ध रहते जिन्हें हटा दिया जाता किंतु फिर आकर रहने लगते। पांचवीं शताब्दी में पाटलिपुत्र की सड़कें गया और राजगृह तक जाती थी। इन सड़कों की चर्चा चीनी यात्री फाहियान ने भी की है। सड़क पर शोभा-यात्राएँ निकलतीं। इन अवसरों पर नगर मार्गों पर सारी-सारी रात दीपक और मशाल जलते रहते थे। शोभा-यात्रा में आगे-आगे विशाल चतुश्चक्र रथ चला करते थे। इन रथों पर बांस के पंचमंजिले मंदिर बने होते थे। सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनत्सांग पाटलिपुत्र आया और यहाँ के जर्जर भवनों एवं सड़कों का वर्णन अपने यात्रा-वृत्तांत में की।

सातवीं शताब्दी के बाद सैकड़ों वर्षों तक पाटलिपुत्र के संबंध में कुछ विशेष जानकारी नहीं मिल पाती। ग्यारहवीं शताब्दी में अलबरूनी भारत आया। उसके अनुसार पटना से एक सड़क पूरब की ओर मुंगेर होती हुई गंगासागर तक जाती थी। वही सड़क पटना से पश्चिम की ओर बनारस-अयोध्या होते हुए बारी (आगरा की एक तहसील) तक जाती थी। 14-15 शताब्दी में बिहार की राजधानी पटना नहीं बल्कि बिहार शरीफ थी। अतः बिहार शरीफ से कई सड़कें भारत के कई शहरों तक जाती थीं।

पाटलिपुत्र की प्राचीन सड़कें अपना महत्व खो चुकी थीं। कुछ ही सड़कें उपयोगी रह गई थीं। सोनपुर के मेला के समान पटना में बाज़ारें लगतीं थीं किंतु इनका रूप अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी था। बाज़ारों में काफी भीड़ रहती। दूर-दराज से भी लोग आते थे। पटना से स्थलमार्ग द्वारा (हाईवे) शाहाबाद, मुंगेर, भागलपुर, बनारस और दिल्ली तथा लखनौती (बंगाल) तक जाया जा सकता था। पालकी, बैलगाड़ी, घोड़ा, गदहा आदि वाहनों का प्रयोग किया जाता था। डाकुओं, लुटेरों और ठगों से राहगीरों को परेशानियाँ रहती थीं। एक बार मथुरा से माहुरी लोग व्यापारिक मालों के साथ पटना होकर गुजर रहे थे तो वथल नामक एक हिन्दू अधिकारी ने उन्हें यह कहकर लूट लिया कि उन्होंने चुंगी नहीं दिया है। माहुरी व्यापारियों ने इसकी शिकायत सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से किया तो उस हिन्दू अधिकारी को कठोर रूप में दंडित किया गया।

मौर्यकाल के बाद पटना को एक प्रमुख प्रशासनिक और व्यापारिक नगर बनाने का प्रयास सोलहवीं शताब्दी में शेरशाह द्वारा किया गया। योजनाबद्ध ढंग से सड़कों का निर्माण किया गया। 3 हजार मील लंबी पक्की सड़क का निर्माण शेरशाह ने कराया जो पटना से सोनारगांव (बांग्लादेश) और पटना से सिंधु नदी तक जाती थी। यह सड़क ग्रैण्ड ट्रंक रोड के नाम से विख्यात है। शेरशाह के शासन काल में पुरानी सड़कों की मरम्मत की गई और कुछ सड़कों को ग्रैण्ड ट्रंक रोड से जोड़ा भी गया। इसी समय गंगा के किनारे की सड़क, जो आज अशोक राजपथ के नाम से विख्यात है, राजमहल, गरही (तेलियागढ़ी), भागलपुर, सुल्तानगंज, मुंगेर, सूर्यगढ़ा, बलगुदर, बाढ़ और फतुहा को जोड़े हुए थी। पटना पुनः उत्तर प्रदेश से सड़क के माध्यम से जुड़ गया। पटना से एक सड़क बनारस तक और दूसरी सड़क दानापुर, मनेर, आरा, भोजपुर, चौसा, जमानिया और मुगलसराय तक गई। तीसरी सड़क पटना से फुलवारी शरीफ, नौबतपुर, अरवल, दाउदनगर, मोहनिया आदि होते हुए मुगलसराय तक गई। शेरशाह के शासनकाल की यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

सड़कों के कारण मौर्यकाल के बाद पटना के अच्छे दिन पुनः लौटे। विदेशी यात्री पीटरमंडी स्थलमार्ग से आगरा से पटना 1632 ई. में आया था। बहादुरपुर, सैयद राजा मोहनिया की सराय, खुर्रमाबाद, सासाराम, दाउदनगर, अल (सोनपुर) तथा आगा सराय होते हुए यूरोपीय यात्री तावर्नियर बनारस से पटना पहुँचा था। इन सड़कों का प्रयोग व्यापारी भी करते थे। शेरशाह के शासनकाल और बाद में भी पटना की सड़कों पर सुरक्षा की विशेष व्यवस्था रहती ताकि व्यापारियों को व्यापार करने में सुविधा हो। मुगल काल में पटना की सड़कें उन शहरों से होकर गुजरने लगीं, जो मुस्लिम काल में बने थे। तावर्नियर लिखता है कि पटना में डच सौदागर शोरे का व्यापार करते थे। पटना के सार्वजनिक मार्ग के किनारे शराब बिकती और लोग वहीं पीते थे। यहाँ ध्यान दिला दें कि सार्वजनिक सड़क के किनारे मदिरापान करने वाले मौर्यकाल में कठोर रूप में दंडित किये जाते थे। किंतु मुगलकाल में ऐसी बात नहीं रही। तावर्नियर आठ दिनों तक पटना में ठहरा और उसने देखा कि स्थलमार्ग से दूर-दराज के लोग सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान करने पटना के किनारे आते थे।

यह बात 1666 ई. के जुलाई माह की है। इस अवसर पर एक पाखण्डी ब्राह्मण की धूर्ततापूर्ण कार्य की चर्चा तावर्नियर ने की है। सूर्यग्रहण के दिन वह ब्राह्मण सड़क के किनारे के एक पेड़ पर चढ़कर बैठ गया था और हिन्दुओं को धार्मिक भय से डराकर 20 हजार रूपया और करीब 18 मीटर वस्त्र वसूल लिया।

19वीं सदी का लेखक ख्वाजा अब्दुल करीम खाँ अपनी पुस्तक बयान-ए-वाकी में पटना को अजीमाबाद कहता है और बतलाता है कि तिरहुत से अजीमाबाद आने के लिए नदी पार करना पड़ता था। पूर्णिया होकर स्थलमार्ग से अजीमाबाद पहुँचा जा सकता था। उसने अजीमाबाद को एक स्वच्छ नगर बताया है। अजीमाबाद को देखकर नहीं लगता कि अजीमुश्शान जंगी मिजाज वाला था। अजीमाबाद के जिन गलियों में दुकानें ज्यादा थीं और निजी मकान थे वहाँ स्थानीय लोगों द्वारा सड़कों एवं गलियों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रशासन की ढिलाई से अजीमाबाद की राजकीय भूमि पर गैरकानूनी कब्जे भी हुए। उच्चाधिकारियों एवं नवाबों की नाजायज संतानों ने भी राजकीय भूमि पर अधिकार किये। नये मकान, नये मुहल्ले और नये स्थल मार्ग बने किंतु योजनाबद्ध ढंग से नहीं। गैरकानूनी आबाद मुहल्लों को व्यवस्थित करने का राजकीय प्रयास नहीं किया गया। फलतः अजीमाबाद में गन्दगी बढ़ी। माल-मवेशी, बैलगाड़ी, एक्का-बग्घी सड़क पर ही रहा करते थे।

अठारहवीं शताब्दी के स्रोतों के अध्ययन से पता चलता है कि जाड़ा और गर्मी के दिनों में बैलगाड़ी पर बैठकर पटना से आगरा डेढ़ रुपये में या गाड़ीवान को एक मन अनाज देकर 35 दिनों के स्थलमार्ग से जाया जा सकता था। बरसात के दिनों में पटना की सड़कों की दशा खराब हो जाती थी। इस मौसम में बैलगाड़ी का चलना मुश्किल होता और व्यापारिक वस्तुएं बैलों के माध्यम से भेजी जाती थी। तावर्नियर बताता है कि स्थलमार्ग से तीन माह में पटना से भूटान पहुँचा जा सकता था। आठ दिनों में पटना से गोरखपुर पहुँचा जाता था। आने जाने वाले अधिकांश लोग व्यापारी होते थे। गर्मी में धूल और वर्षा में कीचड़ से सड़कें भरी रहती थी।

फ्रांसिस बुकानन 1811 ई. में पटना आया। उसके समय में पटना का विस्तार पश्चिम में हो चुका था। इस शहर का विस्तार 20 वर्गमील में था। अधिकांश मकान कच्ची ईंटों के बने थे। मुख्य सड़क अनेक गलियों से जुड़ी थीं। बाकरगंज, राजेन्द्र नगर, मुरादपुर, अफजलपुर, महेन्द्रू, लंगरटोली, कदमकुंआ, भिखनापहाड़ी, मुसल्लहपुर, लोहानीपुर आदि मुहल्लों में नवीन सड़कें बनीं।
अफीम-वितरक सर चार्ल्स द वूली के आतिथ्य में विश्व वेवर नामक एक अंग्रेज यात्री 1824 में पटना आया और शहर को सुन्दर बनाने का प्रयास किया। उसी ने रेसकोर्स बनवाया जो गाँधी मैदान है। 1849 में न्यायाधीश लायमैन के सहयोग से विशप हर्टमन को बाँकीपुर में पाँच एकड़ जमीन गंगा के किनारे मिली जहाँ उसने स्टीमर घाट का निर्माण किया। इसी समय से स्टीमर द्वारा पटना से गंगा पार किया जाने लगा। 1833 के भूकम्प में पटना के सैकड़ों मकान ध्वस्त हो गए। इसके बाद पटना का पुनर्निर्माण प्रारंभ हुआ। 1854 ई. में यहाँ इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ और पोस्ट ऑफिस की स्थापना हुई।

1857 की क्रांति से पटना के व्यापार पर बड़ा ही बुरा असर पड़ा। रेलवे लाइन के आने से पटना दो भागों में बंट गया। पटना-दक्षिण में कुम्हरार और कमालबाग तथा जुल्फीकार बाग अति प्रसिद्ध था। रेलवे लाइन और गंगा नदी के बीच का इलाका उत्तरी पटना था। गाँधी मैदान, छज्जुबाग और गोलघर के पास अंग्रेज और प्रशासनिक अधिकारियों का बसना 1865 से प्रारंभ हुआ। अतः इन क्षेत्रों में नवीन मार्ग एवं गलियाँ बनीं। इन इलाकों की पतली गलियाँ चौड़ी और समतल पक्की गोलाकार सड़कें बन गईं। गाँधी मैदान के पास की गोल सड़क 1865 ई. के बाद बनी। नया टोला, भिखना पहाड़ी, एनी बेसेंट आदि में नये मकान और नई सड़कें बनीं। अशोक राजपथ के उत्तरी हिस्से में 1885 में अंजुमन इस्लामिया हॉल बना।

पटना के शहर की देखरेख के लिए नवम्बर 1864 में पटना म्युनिसिपैल्टी की स्थापना हुई। नाली, रोशनी, सफाई और यातायात को बेहतर बनाने के प्रयास किये गये। पटना शहर के सौन्दर्यीकरण के लिए बंगाल के लेफ्टिनेन्ट गवर्नरमेंट सैयद मेंहदी हसन ने 10 हजार रुपये का अनुदान दिया।
उपर्युक्त विकास कार्यों के बावजूद बिहारबंधु (20 जुलाई 1901) नामक समाचारपत्र के अनुसार 1870 ई. के आसपास पटना देखने में एक गाँव के समान लगता था। सरकारी भवनों एवं कार्यालयों को छोड़ पक्के भवनों की संख्या यहाँ नगण्य थी। शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना के साथ-साथ पटना का विकास होने लगा और सड़कों पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ा। 1900 ई. तक रमना रोड के दक्षिण में लोग नहीं बसे थे। इस समय तक पश्चिम दरवाजा के पश्चिम में नवीन पटना विकसित होने लगा था।

पटना के उल्फत हुसैन फरियाद प्रथम भारतीय थे जिन्होंने बग्गी का प्रयोग प्रारंभ किया। इस बग्गी को पटना के कमिश्नर मिस्टर मेटकॉफ ने इंग्लैंड से मंगाया और वहाँ से पटना मंगाकर उल्फत हुसैन फरियाद को भेंट किया। नवाब लुफ्तअली खाँ ने एक बग्गी कलकत्ता से मंगायी और इसी समय से बग्गी रईसों की सवारी हो गई। बग्गी ने सड़कों की बेहतर दशा कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। पालकी सार्वजनिक सवारी थी। बैलगाड़ी भी यातायात का साधन था। धनी लोग हाथी पर सवारी करते थे। 1901 में पटना की आबादी करीब 1 लाख 35 हजार थी।

1872 के बाद ईसाई, सिक्ख, जैन, अजात, दर्जी, दुनियाँ, फकीर, जोलाहा, कलाल, कसैरु, कुंजरा, मल्लिक, नये मुसलमान, पठान, सैयद, शेख, डोम, मुसहर, पासी, वेहेलिया, भीया, खरवार, धांघर, चेरू, कोल, दुसाध, रजवार, ब्राह्मण, राजपूत, वाभन (भूमिहार), वैद्य, भाट, कायस्थ, अग्रहरी, वनिया, वर्जवाल (वर्णवाल?), केशरवानी, खत्री, माहुरी, नन्हीयार, रौनीयार, सिन्दुरिया, गराड़ी, ग्वाल, गुजर, जाट, हलवाई, कांदू, वरई, तमोली, कोइरी, कुर्मी, माली, वेहरा, धानुक, धोबी, हज्जाम, कहार, बढ़ई, कसेरा, ठठेरा, कुम्हार, लोहार, सोनार, सूढ़ी, तेली, बंगाली, पटुआ, तांती, वेलदार, नोनिया, अग्रवाल, मारवाड़ी, आदि जाति के लोग पटना में बसे। इनके नवीन मुहल्लों में सड़कें एवं गलियाँ बनीं। पटना सिटी के व्यापारियों ने पश्चिमी पटना में बसने में कोई रूचि नहीं ली। फलतः बाहर के दुकानदार और व्यापारी पटना में बसने लगे।

शेरशाह पथ का ही नाम बाद में चलकर अशोक राजपथ हो गया। 1920 के आसपास सुल्तानगंज थाना गंगा नदी के तरफ का इलाका वीरान था। मौआर लेन के प्रथम निवासी और जमींदार परिवार के वरिष्ठ वर्तमान अधिवक्ता विजयकुमार मौआर ने बताया कि 1920 के बाद ही सुल्तानगंज थाना के उत्तर-पूर्व का इलाका आबाद होने लगा। फलतः खेत के मेढ़ ने ही गलियों का रूप ले लिया। 1930-40 में गाँधी मैदान और रेलवे स्टेशन के आसपास आबादी बढ़ी और नयी चौड़ी-पतली सड़कें बनीं। 1940 ई. के बाद पाटलिपुत्र के इलाके में निर्मित विशाल भवनों के कारण नई-नई सड़कें बनी। सड़कों और गलियों का जाल बिछ गया जिनके माध्यम से श्रीकृष्णपुरी तथा बुद्धा कोलोनी में भीतर ही भीतर आने-जाने में सुविधा हो गई। यही हाल राजेन्द्र नगर और कंकड़बाग का भी रहा। 1950 के बाद बोरिंग रोड के उत्तर-पश्चिम में राजीवनगर और आशियाना नगर के मुहल्ले बसे। 1950 के आसपास से बसे उपर्युक्त मुहल्लों में अधिकांश मकान बिना सरकारी योजना के बने। फलतः सड़कों और गलियों की स्थिति दयनीय ही रही। बरसात के मौसम में कंकड़बाग, राजेन्द्रनगर, बोरिंग रोड, पाटलिपुत्र आदि इलाकों की दयनीय स्थिति से हम सभी परिचित हैं।

पटना के तत्कालीन कमिश्नर वेली के कार्यकाल में निर्मित बेली रोड के दोनों किनारे जो पेड़ आज भी दिखाई देते हैं उनका स्टुरकुलिया का पेड़ है। ये पेड़ आसाम के जंगलों से लाकर यहाँ लगाये गए।
1950 के बाद पटना की सड़कों और गलियों को मजबूत और बेहतर स्थिति के लिए ठोस कदम उठाने की जानकारी नहीं मिलती है। धीरे-धीरे सड़कों की दशा खराब होती गई। प्रशासन ने भी लापरवाही दिखायी। सड़क-मरम्मत और सड़क-निर्माण के नाम पर लूट-खसोट की खबर समाचार पत्रों में छपती रही। सड़कों पर रोना आने के सिवा कोई रास्ता नजर नहीं आता। सड़कों की जर्जरता ने पटना को भारत का सबसे गन्दा और पिछड़ा शहर बना दिया।

वर्तमान सरकार के काल में विगत तीन वर्षों से पटना के सौन्दर्यीकरण पर ध्यान दिया गया। इसके लिए सड़कों एवं गलियों की दशा सुधारना सर्वाधिक आवश्यक समझा गया। राज्य सरकार, कतिपय नेतागण, पटना के नागरिक और बिहार के कुछ प्रसिद्ध उद्योगपतियों के सहयोग से पटना की कुछ वैसी गलियों को पक्का किया गया और चौराहों का सौन्दर्यीकरण किया गया जो आधी सदी से बीमार और जर्जर थीं। मुख्य सड़कों की योजनाबद्ध ढंग से मरम्मत करायी गयी। मुख्य मार्गों के बीच में पतले चिह्न अंकित किये गये ताकि दायें-बायें का महत्व बढ़े। फुटपाथ की दशा बेहतर की गई।

पटना के इतिहास में यह महत्वपूर्ण कदम उठाने का श्रेय वर्तमान सरकार को ही है कि पटना की सड़कों के दोनों किनारे को अवैध कब्जा से मुक्त कराने का आश्चर्यजनक और सफलतापूर्वक प्रयास किया गया है।
इतिहास गवाह है कि नगरों के विकास में यातायात की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। विकसित और योजनाबद्ध पटना को विश्वप्रसिद्ध पाटलिपुत्र नगर बनाना सम्भव है कैसे:-

  1. यहाँ की सड़कों और गलियों की देखरेख हमेशा की जाय, सड़क पर कूड़ा-कर्कट
  2. चूहा-बिल्ली-कुत्ता (मरा हुआ) आदि फेंकने वालों को कठोर दंड की व्यवस्था हो।
  3. नाले की सफाई पर चौबीस घंटे चौकन्ना। सफाई से संबंधित कर्मचारियों एवं मजदूरों को समय पर संतोषप्रद राशि वेतन के रूप में दी जाय और इनमें पायी गई अनुशासनहीनता को कभी भी क्षमा नहीं किया।
    जाय।
  4. बिजली-पानी की समुचित व्यवस्था पूरे पटना शहर में हो; गरीब अमीर मुहल्लों में भेद नहीं किया जाय।
  5. बिजली-शुल्क और मकान-कर तथा रोड टैक्स में कार्यरत कर्मचारियों एवं अधिकारियों के भ्रष्ट कारनामों के प्रति सरकार सदा सावधान रहे।
  6. सरकारी आदेश प्राप्त किये बिना भवन-निर्माण करने वाले व्यक्ति के सम्पत्ति की जाँच की जाय और दोषी को दंड मिले।
  7. संकटकालीन साधनों की व्यवस्था रहे जो बाढ़ के दिनों में या महामारी के दिनों में नगर की सफाई और सुरक्षा पर कड़ी नजर रखे।
  8. न्यायालय से अनुरोध किया जाय कि पटना शहर के सौन्दर्यीकरण एवं विकसित योजना के विरुद्ध कार्य करने वाले भ्रष्ट अधिकारी, घूस खाने वाले, गन्दगी फैलाने वाले, सरकारी नियम का उल्लंघन करने वाले आदि को कठोर रूप में दंडित करें। जनता कानून से ज्यादा डर मानती है। दंड पाने के डर से ही वह कानून मानेगी।
  9. सरकार का कोई मंत्री या कोई नेता विकास कार्य में न तो बाधक बने और न किसी बाधक तत्व को प्रोत्साहित करे।
    और अंत में, वर्तमान सरकार के साहसिक और प्रशंसनीय कार्यों को ध्यान में रखते हुए इस बात की सम्भावना ज्यादा है कि आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के सहारे पटना अवश्य ही एक प्रसिद्ध व्यापारिक एवं प्रशासनिक नगर बनेगा। बंद घड़ी भी समय की याद दिलाती है। पटना का विकास सड़कों की मदद से नहीं हुई तो सामन्तवादी काल वाली कहावत “इस नियम का एक ही पैगाम है, घूस खाओ और दूसरे को खिलाओ।” पुनः लोकप्रियता प्राप्त करेगा।