4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

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पटना पुस्तक मेला 1994 : “पहले कभी नहीं”

पटना पुस्तक मेला के आयोजन की परिकल्पना सर्वप्रथम 1980 में की गयी थी लेकिन बिहार के पुस्तक व्यवसायियों की संस्था ‘बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ’ उस समय पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा था। अतः इस समारोह को मूर्त रूप देने में यह संस्था उस समय सक्षम नहीं थी। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत ने सितम्बर 1985 में 11वें राष्ट्रीय पुस्तक मेला को पटना में आयोजित करने का निर्णय लिया। सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में अधोहस्ताक्षरी एवं भारती भवन, पटना के श्री तड़ित कुमार बोस को इस आयोजन में स्थान मिला। अपरिहार्य कारणों के फलस्वरूप जिस दिन 11वाँ राष्ट्रीय पुस्तक मेला आरम्भ होनेवाला था उसी दिन राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत ने इसे स्थगित करने की घोषणा की। उस समय इसके वर्तमान निदेशक श्री अरविंद कुमार अखिल भारतीय हिन्दी प्रकाशक संघ के अध्यक्ष हुआ करते थे।

उन्होंने अपनी ओर से पूरा प्रयत्न किया कि यह समारोह बिहार में सम्पन्न नहीं हो तथा बिहार की छवि धूमिल हो। तबतक बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ पुनर्गठित होकर बिहार के पुस्तक व्यवसायियों का एक सशक्त माध्यम बन चुका था। अधोहस्ताक्षरी बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ का उस समय महासचिव था। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत द्वारा घोषित इस समारोह का पटना में न होना बिहार के माथे पर एक कलंक साबित होता। बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ ने श्री अरविंद कुमार को पहले विनम्र शब्दों में अनुनय-विनय, तत्पश्चात खुले शब्दों में चेतावनी देते हुए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत को भरपूर सहयोग देकर इस स्थगित समारोह का सफलतापूर्वक आयोजन किया। श्री अरविंद कुमार अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। वे अलग-थलग होकर वापस दिल्ली लौट गए लेकिन अन्य सभी भागीदारों ने इस मेले में भाग लिया। यह मेला नयी तिथि व अवधि 3 अक्टूबर से 10 अक्टूबर 1985 के बीच सम्पन्न हुआ।

1988 के समारोह में शीर्ष पर नीता प्रकाशन के श्री राधेश्याम गुप्ता का नाम हमेशा याद किया जायेगा। पटना पुस्तक मेला 1988 के अध्यक्ष डॉ. बी. डी. जत्ती थे जबकि वरिष्ठ पत्रकार श्री अक्षय कुमार जैन उपाध्यक्ष थे। मुख्य संरक्षक की भूमिका तत्कालीन केन्द्रीय शिक्षामंत्री श्री ललितेश्वर प्रसाद शाही ने निभायी जबकि डॉ. डी. पी. यादव, पूर्व केन्द्रीय उपशिक्षामंत्री स्वागताध्यक्ष तथा राज्य शिक्षामंत्री श्री नागेन्द्र झा ने इस समारोह में ‘संरक्षक’ के रूप में ‘पटना पुस्तक मेला’ की नींव रखी। यह आयोजन बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ, पटना, भारतीय शैक्षिक प्रकाशक संघ, दिल्ली तथा भारतीय बाल शिक्षा परिषद्, दिल्ली के मिले-जुले प्रयास का प्रतिफल था। 1988 के समारोह के महासचिव श्री ओ. पी. शास्त्री तथा सचिव अधोहस्ताक्षरी था। इस समारोह को सफल मुकाम पर पहुँचानेवालों में श्री वाई. पी. रानाडे, श्री हीरालाल गुप्ता, श्री अशोक शर्मा, श्री मोहिन्दर चौधरी, श्री रूपेन्द्र कश्यप, श्री बी. एम. केले तथा बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ, पटना, भारतीय शैक्षिक प्रकाशक संघ, दिल्ली तथा भारतीय बाल शिक्षा परिषद्, दिल्ली के तमाम सदस्यों का नाम भी सदैव अग्रणी रहेगा। इस आयोजन में डॉ० मंगनानन्द झा एवं डॉ० ब्रह्मानन्द चौधरी जैसे समर्पित कार्यकर्त्ता तो चाहिए ही, साथ ही साथ इसके नेतृत्व हेतु एक दृढ़संकल्प रखने वाला व्यक्तित्व भी चाहिए। 1988 के समारोह का उद्घाटन तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री गोविन्द नारायण सिंह ने किया था। 1988 से ही पटना पुस्तक मेला के इस गरिमामय आयोजन हेतु बिहार चर्चित रहा है। और अब, जबकि 1994 पटना पुस्तक मेला सम्पन्न हो रहा है, हम स्नेहपूर्वक श्री राजीव जी को याद करते हैं जिन्होंने अक्टूबर 1988 के प्रधानमंत्रीत्व-काल में अपने बहुरंगी चित्र के ऊपर स्वहस्ताक्षरित नारा – ‘हर पुस्तक एक मशाल है’ – देकर इस आन्दोलन की शुरूआत की थी। 1988 के आयोजन की रूप-रेखा तैयार करने हेतु सलाहकार समिति की अंतिम बैठक भारत के भूतपूर्व उपराष्ट्रपति माननीय डॉ. वी.डी. जत्ती, जो संयोगवश पटना पुस्तक मेला के ‘मुख्य संरक्षक’ हैं, की अध्यक्षता में 21 अक्टूबर को संसद भवन में हुई थी। 13 से 23 नवम्बर 1988 तक आयोजित प्रथम पटना पुस्तक मेला एक अत्यन्त सफल आयोजन था।

इस समारोह को स्वतंत्र रूप से नियमित आयोजित करने हेतु ‘बिहार शैक्षिक संघ’ का गठन किया गया जिसमें सभी क्षेत्रों एवं समाज के विभिन्न वर्गों से सदस्य लिए गए। इस संस्था के वर्तमान अध्यक्ष प्रख्यात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ० लाला सूरज नन्दन प्रसाद हैं। पटना पुस्तक मेला 1994 के स्वागत समिति के अध्यक्ष गृह सचिव श्री जियालाल आर्य सलाहकार समिति के वरीय सदस्य हैं तथा आरम्भ से ही इन्होंने इस समारोह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। डॉ० डी. डी. गुरू, विभागाध्यक्ष, अर्थशास्त्र, अनुग्रह नारायण सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान, पटना इस संस्था के संरक्षक हैं। इसके अतिरिक्त प्रो. सच्चिदानंद, पूर्व कुलपति, राँची विश्वविद्यालय, डॉ. चेतकर झा, पूर्व कुलपति, मिथिला विश्वविद्यालय एवं प्रो. प्रधान हरिशंकर प्रसाद, पूर्व निदेशक, अनुग्रह नारायण सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान समेत राज्य के अनेक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, प्रबुद्ध नागरिक एवं बुद्धिजीवियों ने इस संस्था के सलाहकार समिति में अपना नाम देकर हमें गौरवान्वित किया है।
सन् 1988 में आयोजित प्रथम पटना पुस्तक मेला की भव्य सफलता के बाद 1990 में 20 नवम्बर से 3 दिसम्बर के बीच बड़े पैमाने पर द्वितीय पटना पुस्तक मेला का आयोजन किया गया। श्री राजीव गाँधी ने अपने विशेष सहायक के माध्यम से इस मेले का उद्घाटन करने की सहमति प्रदान की थी। देश के तेजी से बदल रहे राजनीतिक हालात की व्यस्तता के कारण वे नहीं आ सके। तृतीय पटना पुस्तक मेला की घोषणा 3 दिसम्बर 1990 को द्वितीय पटना पुस्तक मेला के समापन समारोह में की गयी। 1990 के समारोह का उद्घाटन माननीय न्यायाधीश वर्तमान लोकायुक्त श्री एस. सरवर अली ने किया था जबकि इसके समापन समारोह के मुख्य अतिथि तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री यूनुस सलीम थे। 1990 में इस समारोह के सभापति डॉ. जगन्नाथ मिश्र, पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार रहे। इस आयोजन में राजीव जी की गहरी रूचि के कारण तृतीय समारोह के उद्घाटन हेतु पुनः उनसे अनुरोध किया गया जिस हेतु भी उन्होंने अपनी सहमति प्रदान की थी। परन्तु विधि को शायद यह मंजूर नहीं था। 1991 पटना पुस्तक मेला आरम्भ होने से पूर्व ही हमारे देश की इस महान आत्मा का असामयिक एवं दुखद निधन हो गया। इस प्रकार पटना पुस्तक मेला एक अकेला आयोजन है जिससे कोई राष्ट्रप्रमुख जीवन पर्यन्त इतनी रूचि के साथ जुड़ा रहे।

हम यह कहते हुए गौरवान्वित हैं कि माननीय मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद प्रदेश के अकेले राज्यप्रमुख हैं जिनके संरक्षण में यह आयोजन बिहार में लगातार चौथी बार सम्पन्न हो रहा है। साक्षरता को पूर्णतः समर्पित इस आयोजन हेतु माननीय मुख्यमंत्री जी ने विगत मेलों के लिए मेला परिसर के आरक्षण शुल्क व अन्य शुल्कों को विमुक्त करने की भी कृपा की है। हम उनसे इस सदाशयता की इस वर्ष भी अपेक्षा रखते हैं।

मेला को आदरणीय मदर टेरेसा का आशीर्वाद भी प्राप्त है जो अपनी अस्वस्थता के कारण 1990 में मुख्य अतिथि बनने में असमर्थ रही। मेले ने विदेशों को भी आकर्षित किया है। विदेशों के कुछ प्रमुख भागीदार हैं – बुल्गारिया का दूतावास, ब्रिटिश उच्चायुक्त, मैक्सवेल-मैकमिलन, सिंगापुर, इस्कॉन, अमेरिका एवं पूर्व सोवियत संघ का वोस्तोक। इस वर्ष हमारे परिवार में शामिल हुए हैं – विश्व स्वास्थ्य संगठन। इस आयोजन से कई महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व, जैसे, ब्रिटिश उच्चायुक्त श्रीमान् इआन मैक्लनी, प्रथम सचिव, श्रीमान् डॉन स्लोन, प्रतिष्ठित पत्रकार श्री विद्यानिवास मिश्र, श्री दिलीप पडगाँवकर, सुविख्यात लेखक डॉ. नामवर सिंह इत्यादि जुड़े रहे हैं। साथ ही नेपाल के प्रधानमंत्री श्री जी.पी. कोइराला, व्यंग्यकार श्री आर. के. लक्ष्मण, फिल्म निर्माता, शक्ति सामंत – श्री राम वोहरा – आत्माराम, फिल्म अभिनेता श्री शत्रुघ्न सिन्हा के अलावा अन्य राज्यों के साहित्यकार, लेखक, मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक एवं प्रमुख नागरिक भी हमारे आयोजनों में शामिल होते रहे हैं। ऐसे महानुभावों को मेले में देखना एक सुखद अनुभूति है। यह शायद एकमात्र घटना है जिसकी संचार माध्यमों द्वारा इतनी विस्तृत चर्चा होती है। वाइस ऑफ अमेरिका ने अपने एशियाई श्रोताओं के लिए 23 नवम्बर 1988 को 9.45 बजे रात्रि में पटना पुस्तक मेला पर 15 मिनट का एक विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किया था।

1990 में भी जब देश मंडल एवं मंदिर द्वारा जनित हिंसा का शिकार था, पटना पुस्तक मेला का आयोजन किया गया। व्यापक पैमाने पर हुई गड़बड़ी के कारण राज्य के हालात भी बिगड़ गए थे। जातीय एवं धार्मिक टकराहटों के कारण ऐसा लगा जैसे समाज का बँटवारा हो जाएगा; विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त हुई सफलता छिन जाएगी। सबसे ज्यादा नुकसान शैक्षिक वातावरण को हुआ क्योंकि जातीय एवं धार्मिक तनावों के कारण शैक्षिक संस्थाएं महीनों बंद रहे। ऐसे मुश्किल समय में पटना पुस्तक मेला का आयोजन करके बिहार शैक्षिक संघ ने सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में शांति स्थापित करने में अपनी भूमिका निभायी। इसने राज्य में शैक्षिक वातावरण बहाल किया तथा आम जनता का आत्मविश्वास वापस लौटाया। मेले में 12 दिनों की लघु अवधि में लगभग 3 लाख व्यक्ति आए और मेला परिसर शैक्षिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र बना रहा। मंडल-मंदिर विवाद के दौरान घरों में रहने के अभ्यस्त लोग निर्भय होकर बाहर आए तथा मेले की शोभा बढ़ाई। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। पटना पुस्तक मेला 1990 का आयोजन एवं समापन बड़े पैमाने पर हुआ। इसकी सफलता तब और बढ़ जाती है जब हम जातीय एवं धार्मिक तनावों, डीजल-संकट इत्यादि को ध्यान में रखें। शायद मात्र बिहार शैक्षिक संघ ने ही तमाम अवरोधों के बावजूद पटना पुस्तक मेला को आयोजित करने का साहस किया। इसका कारण था संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1990 को अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता वर्ष घोषित करना जो कि एक विश्वव्यापी घटना थी पर जिसका देश के अन्य भागों पर कुछ खास असर नहीं पड़ा था। अनिश्चितताओं एवं बाधाओं से घिरे रहने पर भी भागीदारों की संख्या ने राष्ट्रीय पुस्तक मेलों में एक कीर्तिमान स्थापित किया। कानून एवं व्यवस्था के हालातों के मद्देनजर इस कीर्तिमान की अहमियत और भी बढ़ जाती है। कहां 1988 में मात्र 116 स्टॉल थे वहीं 1990 के मेले में 295 स्टॉल थे, अर्थात् 1988 से 180 अधिक। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत द्वारा जयपुर में प्रस्तावित 15वें राष्ट्रीय पुस्तक मेला को दो बार स्थगित करना पड़ा था। साथ ही, यह भी ध्यान दें कि त्रिवेन्द्रम में आयोजित 13वें राष्ट्रीय पुस्तक मेले में मात्र 120 स्टॉल थे तथा राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आयोजित 14वें राष्ट्रीय पुस्तक मेले में, जिसका कीर्तिमान पटना पुस्तक मेला ने ध्वस्त किया, 212 स्टॉल थे। मात्र यही नहीं, पटना पुस्तक मेला में फ्रांस एवं जर्मनी दूतावासों ने भी गहरी दिलचस्पी दिखाई। यदि वातावरण प्रतिकूल नहीं होता तो उन्होंने भी हिस्सा लिया होता। देश के सभी राज्यों से भागीदार आए। 1991 में इस समारोह का उद्घाटन तत्कालीन राज्यपाल महामहिम श्री शफी अहमद कुरैशी ने किया था जबकि 1992 के समारोह का उद्घाटन पटना उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री विमल चन्द्र बसाक ने किया। समापन समारोह के मुख्य अतिथि वर्तमान मुख्यमंत्री माननीय श्री लालू प्रसाद थे। 1991 एवं 1992 के दो आयोजनों ने अपने पिछले सारे कीर्तिमान तोड़ डाले। जाहिर है कि पटना पुस्तक मेला देश के अन्य पुस्तक मेलों से कहीं आगे है।

इस परियोजना में पुस्तक प्रदर्शनी के अतिरिक्त संगोष्ठी, वर्तमान समस्याओं पर कार्यशालाएँ, प्रश्न प्रतियोगिता, अन्ताक्षरी, स्थल पर रंग भरो प्रतियोगिता, निबंध एवं वाद-विवाद प्रतियोगिता, वाग्मिता प्रतियोगिता एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी आयोजित किए जाते हैं। इसके तहत होने वाले अन्य कार्यक्रमों के अलावा दो कार्यक्रम – उद्घाटन एवं समापन लगभग सभी क्षेत्र के सुविख्यात प्रतिनिधियों द्वारा शोभित होते हैं। सभी कार्यक्रमों में भारी भीड़ जुटती है। इन कार्यक्रमों की सभी मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हैं। इस वर्ष के मेले को जो अपने क्रम में पाँचवाँ है – पहले से कहीं बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया है तथा इसमें कई नए कार्यक्रम जोड़े गए हैं। पटना पुस्तक मेला एक आन्दोलन है। यह मात्र एक पुस्तक प्रदर्शनी नहीं बल्कि राज्य तथा इसकी जनता के लिए गौरव एवं सम्मान का कारण है। बिहार में ऐसी कोई घटना और खासकर इस प्रकार की, जहाँ 3 लाख व्यक्ति स्वेच्छा से जुट जाएं प्रशंसा का हकदार है। यह किसी एक व्यक्ति द्वारा या उसके हेतु नहीं बल्कि बिहार की जनता द्वारा उनकी ही सेवा में अर्पित एक गरिमामय आयोजन है। यह कुछ और नहीं बल्कि शैक्षिक-सामाजिक-सांस्कृतिक सुखाड़ के माहौल में बिहार प्रदेश में इन्हीं कार्यक्रमों का एक और विस्तार है। यह जनता के भरपूर सहयोग एवं प्यार के बगैर कभी सफल नहीं हो सकता।

सलाहकार समिति के सदस्यों द्वारा सार्थक सहयोग पाकर हम अति उत्साहित हैं। प्रशासनिक अधिकारियों, बुद्धिजीवियों, संचार माध्यमों के प्रतिनिधियों, संरक्षकों एवं पुस्तकों के सच्चे प्रेमियों से जो सक्रिय सहयोग हमें प्राप्त होता है वहीं हमें तमाम बाधाओं से आगे बढ़ने को प्रेरित करता रहता है। हम इन सबके प्रति अपना हार्दिक आभार प्रकट करते हैं। इनके सहयोग के बिना इस मेले का आयोजन असंभव है। आयोजन में आनेवाले खर्च के ब्योरे के लिए एक पृथक अध्याय है। यहाँ इस बात पर जोर दिया जा सकता है कि सम्बद्ध विभागों के सभी मंत्रियों, समाज-कल्याण क्षेत्र इत्यादि के महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों को पत्र लिखने के बावजूद भी किसी वर्ग से हमें खास आर्थिक सहायता की उम्मीद नहीं दिखती। केन्द्रीय सरकार हमारे प्रयासों की भी खबर नहीं लेती। इससे न तो हमें मान्यता प्राप्त होती है, न अनुदान मिलता है, चाहे वह नगद हो अथवा किसी अन्य रूप में। जो सहायता हमें प्राप्त होती है वह गृह, पुलिस, अग्नि शमन, पटना क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन, सूचना व जनसम्पर्क इत्यादि विभागों के पदाधिकारियों की व्यक्तिगत रूचि तथा राज्य का उत्थान चाहनेवालों पर ही आधारित होती है। यहाँ हम यह बताना चाहेंगे कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास विभाग राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत द्वारा आयोजित पुस्तक मेलों के कुल खर्च का वहन करता है।

हम इतनी सदाशयता की आशा तो नहीं रख सकते लेकिन क्या सरकार द्वारा यथोचित आपूर्ति अथवा अनुदान देना उचित नहीं होगा? इस सवाल पर सम्बद्ध अधिकारियों को गहराई से सोचना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि बाधाओं की बाढ़ में हम अलग-थलग पड़कर कर्म कर रहे हैं। फिर भी, हमने हिम्मत नहीं हारी है। हमारे शुभचिन्तकों की सार्थक सहायता, स्नेह एवं प्यार तथा जनता का उत्साह हमें इस द्विवर्षीय समारोह को लगातार जारी रखने हेतु असीम प्रेरणा का स्रोत है।

आप यह समझ सकते हैं कि बिहार शैक्षिक संघ अभी अपने शैशवकाल से गुजर रहा है। इस पृष्ठभूमि में अति विनम्रता के साथ हमने अपनी उपलब्धियों को आपके सामने रखा है। हम महसूस करते हैं कि राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए बहुत कुछ करना शेष है। हमें यह पक्का विश्वास है कि आपकी सहृदयता एवं सक्रिय सहयोग की बदौलत हम अपनी गतिविधियों से सभी कार्य-क्षेत्रों में आपकी महत्त्वाकांक्षा पूरी करेंगे तथा बिहार शैक्षिक संघ विशेषतः बिहारवासियों के लिए प्रेरणा-स्रोत तथा संकेत-दीप बन सकेगा।

यह कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसी गतिविधियों को वांछित प्राथमिकता नहीं मिली है तथा हमारी उदासीनता वर्तमान भारतीय समाज के लिए, जिसे शेष दुनिया के बराबर आने में वर्षों लगेंगे, क्षति का कारण हो सकती है। अतः हम अपने शुभ-चिन्तकों से अपनी गतिविधियों में सार्थक हिस्सेदारी का आग्रह करते हैं। अपने देश में बिहार प्रदेश को विशेष ध्यान एवं अंतर्तम स्नेह की आवश्यकता है ताकि राज्य के विशाल मानव व भौतिक संसाधनों के उचित उपयोग से इसे खोई प्रतिष्ठा एवं पूर्व गौरव पुनः प्राप्त हो। हम यह अनुभव करते हैं कि आप स्वयं परिस्थितियों का सही आकलन कर सकते हैं, अतएव विस्तार से कहने की आवश्यकता नहीं। मात्र यह कहना चाहूँगा कि आप सबों के सक्रिय सहयोग से यह आयोजन इस बार ‘कभी न भूलनेवाला’ साबित हुआ है। इस बार के आयोजन को हमने भी ‘पहले कभी नहीं’ नाम दे रखा है। हमने केवल अपना दायित्व निभाया है। आकलन आपका काम है। किसी एक व्यक्ति द्वारा यह दावा करना कि पटना पुस्तक मेला का वह जन्मदाता है पूर्णतः मिथ्या-प्रचार होगा। ऐसा दावा मूर्खों के स्वर्ग में रहने जैसा होगा। किसी प्रकाशक, वितरक, पुस्तक व्यवसायी अथवा व्यक्ति द्वारा अपनी बची-खुची, अनबिकी पुस्तकों का सार्वजनिक प्रदर्शन उस व्यक्ति का निजी कौशल, उद्यम हो सकता है लेकिन इतने बड़े राष्ट्रीय समारोह में लगातार चिन्तन, श्रृंखलाबद्ध योजना, शुभचिन्तकों के सुझाव, समाज के विभिन्न वर्गों से विचार-विमर्श व उनकी भागीदारी समेत एक पूर्णतः समर्पित टीम की नितान्त आवश्यकता होती है। इन तत्वों की अनुपस्थिति में इस समारोह को अंजाम देना इस दुनिया का आठवाँ आश्चर्य होगा। पटना पुस्तक मेला की परिकल्पना बहुत पहले वर्ष 1980 में विकसित की गई थी लेकिन इसे मूर्त रूप देने में लगभग 10 वर्षों का श्रम लगा।

हम आपके बीच स्वयं को पाकर गौरवान्वित हैं क्योंकि यह मेला बिहार की जनता का, उनके लिए तथा उनके ही द्वारा है। आपकी उपस्थिति सम्पूर्ण बिहार के लिए प्रेरणादायक है। अतः यह स्वाभाविक है कि इस अवसर पर हम आपसे सहयोग की मांग करें। हम पहले भी आपकी उदारता के पात्र रहे चुके हैं, इस उदारता के लिए हम आप सभी के प्रति अपना गहनतम आदर प्रकट करते हैं। इस आयोजन को सफल बनाने में आपकी भूमिका सबसे अहम् है। हम समाचारपत्रों, संचार माध्यमों, माईलेज मार्केटिंग मीडियाज, अधिकृत प्रचारक, श्री शुभ्रो भट्टाचार्या, अधिकृत फोटोग्राफर श्री अशोक कुमार बादल, अधिकृत वीडियोग्राफर, दत्ता एण्ड ब्रदर्स, अधिकृत जनसुलभ सुविधा उपलब्ध करानेवाले, श्री सतीश कुमार शर्मा, अधिकृत बिजली ठेकेदार, अतुल कैरियर्स, अधिकृत ट्रांसपोर्टर समेत श्री अविनाश प्रसाद, श्री दिलीप कुमार झा, श्री कंचन घोष दस्तीदार, श्री रोहित जैन तथा श्री संजय कुमार के भी विशेष रूप से आभारी हैं जिन्होंने नयनाभिराम व आकर्षक स्मारिका तैयार करने में दिन-रात एक कर दिया। दी कर्मी बिन्दा, कलकत्ता के श्री जीवन कृष्ण घोषाल ने तमाम अवरोधों के बावजूद मात्र तीन हफ्ते में स्टालों को विकसित करने का एक प्रशंसनीय कार्य किया है। हम सबों की ओर से उन्हें हार्दिक बधाई। भारतीय स्टेट बैंक, पोस्ट ऑफिस, दूरसंचार विभाग, आकाशवाणी, दूरदर्शन, बिहार स्वैच्छिक स्वास्थ्य संघ, तारुमित्रा, एस. आई. एस., जिला प्रशासन सहित कतिपय अनाम संस्थानों व व्यक्तियों के प्रति भी हम हृदय से कृतज्ञ हैं जिन्होंने मेला परिसर में अपनी सेवाएँ अर्पित की हैं।

मैं अपनी ओर से, बिहार शैक्षिक संघ तथा पटना पुस्तक मेले के आयोजन समिति की ओर से अपने सभी भागीदारों, दर्शकों तथा अतिथियों को वर्ष 1994 की विदाई के अवसर पर बिहार के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन में हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। यह बीसवीं सदी का “पहले कभी नहीं” समारोह है। फिर भी आपसे विनम्र शब्दों में गुजारिश है कि बगैर किसी पूर्वाग्रह के हमारा आकलन करें कि क्या हम आपकी आशा के अनुरूप खरे उतरे? इस वर्ष के आयोजन में बिहार राज्य पुस्तक व्यवसायी संघ, पटना के साथ-साथ अखिल भारतीय हिन्दी प्रकाशक संघ, भारतीय शैक्षिक प्रकाशक संघ, दिल्ली, फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स, दिल्ली एवं फेडरेशन ऑफ पब्लिशर्स एण्ड बुकसेलर्स एसोसिएशन इन इंडिया, दिल्ली का भी सक्रिय सहयोग हमें प्राप्त हुआ है। उनके सहयोग के प्रति हम अभिभूत हैं। उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि माननीय श्री लालू प्रसाद एवं सभापति डॉ. रंजन प्रसाद यादव के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने हेतु शब्दों की कमी हो गई है। स्वागत समिति के अध्यक्ष श्री जियालाल आर्य हमारी प्रेरणा के स्रोत हैं। हर बाधाओं से उन्होंने ही हमारी मुक्ति दिलाई है। उनके प्रति आभार व्यक्त करना एक असंभव-सा कार्य है। मुझे स्वयं नहीं मालूम कि आगे इस समारोह में मैं जुड़ा रह सकूँगा अथवा नहीं। मैं द्वंद्वों के बीच घिरा हुआ हूँ। आने वाला समय मेरा निर्णय सार्वजनिक करेगा। मेरी केवल एक गुजारिश है भविष्य में जब भी पटना पुस्तक मेला हो आप सभी हमारे अतिथि बनने की कृपा करें। हमारी तमाम गलतियों के लिए मुझे क्षमा करें। व्यावहारिक रूप से इस विशाल समारोह में निर्दोष एवं निष्कलंक रह पाना किसी एक व्यक्ति के लिए असंभव-सा प्रतीत होता है।

हम डॉ. कर्ण सिंह, श्री शंकर दयाल सिंह, बाबा नागार्जुन, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री, श्री आरसी प्रसाद सिंह, डॉ. रामशरण शर्मा, ले० जे० एस० के० सिन्हा, श्री जाबिर हुसैन, डॉ. रामवचन राय, श्री ए.के. हंगल, डॉ जगन्नाथ मिश्र, डॉ. रामचन्द्र पूर्वे, श्री कैलाशपति मिश्र, श्री सूरज मंडल, श्री नीतीश कुमार, प्रो. उत्तम कुमार सिंह, प्रो. अमरनाथ सिंह, श्री अब्दुल बारी सिद्दीकी, श्री विजयपाल जैन, श्री रामचन्द्र खां, श्रीमती उषा किरण खां एवं अन्य उन तमाम हस्तियों के प्रति भी कृतज्ञ हैं जिन्होंने मेला परिसर में आकर इस समारोह को अभूतपूर्व गरिमा प्रदान की है। बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी के निदेशक डॉ. अमर कुमार सिंह के बारे में हम क्या कहें? कुछ भी कहना बेमानी होगा। वे भले ही न मानें, लेकिन हकीकत यह है कि 1994 के समारोह का सम्पूर्ण श्रेय कद में बौने पर विनम्रता में विशाल इस व्यक्तित्व को जाता है। इसको स्वीकार नहीं करना भी उनके हृदय की विशालता का एक संक्षिप्त परिचय है।

आप सबको सुखद, प्रगतिशील और 1994 में विदाई के इस सर्द मौसम में एक गर्म 1995 के लिए हमारी हार्दिक शुभकामनाएं।

नरेन्द्र कुमार झा
महासचिव
बिहार शैक्षिक संघ

सचिव
पटना पुस्तक मेला
पटना