4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

किताबों से दूर होते लोग

हमारी दैनिक जरूरतों में किताब के लिए कोई जगह नहीं है। गरीबों में तो शायद किताब के प्रेमी मिल जायेंगे, अमीर होते लोगों के लिए किताब एक गैरजरूरी चीज है। वे साज-सिगार के सामान और कपड़ों पर ही खर्च करते हैं। दूसरी तरफ हमारे प्रकाशक भी थोक खरीद के भरोसे चलते हैं, उन्हें आम आदमी तक किताब पहुँचाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। ऐसे में क्या पुस्तक मेले कुछ सार्थक भूमिका निभा सकते हैं, पुस्तक-प्रेमी समाज बनाने में मदद कर सकते हैं?

सरकार नहीं चाहती कि जागरूक पाठक वर्ग पैदा हो। आम लोगों में पढ़ने की अभिरुचि पैदा हो गई तो मौजूदा शासकों की चूलें हिल जाएँगी। यह सरकार को गवारा नहीं है। इसलिए अनाप-शनाप तरीकों से कागज के दाम बढ़ाए जा रहे हैं।

आजाद भारत में आज भी बच्चों के लिए स्वस्थ-सहज बाल साहित्य नहीं। पढ़ने का संस्कार न बन पाने का यह बुनियादी कारण है। आज ऐसे लोग देश चला रहे हैं जिनका शिक्षा-दीक्षा से कोई वास्ता नहीं है। ये लोग लोगों को अनपढ़ बनाए रखने में ही अपना भला समझते हैं। बच्चों पर अनौपचारिक शिक्षा के दौरान पाठ्यपुस्तकों का जबरदस्त बोझ लाद दिया जाता है। इसे छोटे-छोटे बच्चों की अभिरुचियाँ कुचल जाती हैं। उन्हें पाठ्यपुस्तकों के अलावा कुछ भी पढ़ने का मौका नहीं मिलता। बच्चों के लिए हिंदी में पत्रिकाएं भी नाममात्र को मिल पाती हैं। घटिया और विदेशी भाषा की बाल पत्रिकाएं और साहित्य बच्चों को मजबूरन पढ़ना पड़ता है। हकीकत में पाठकीय चेतना का निर्माण बचपन से किया जाता है। बंगला, मलयालम आदि में श्रेष्ठ बाल साहित्य बड़ी तादाद में मिल जाएगा। वहां के पुस्तक मेलों में जबरदस्त उत्साह मिलेगा। खुद मेरी पुस्तकों की जबरदस्त बिक्री पिछली कलकत्ता पुस्तक प्रदर्शनी में हुई। हिंदी में कोई प्रकाशक बच्चों का अच्छा साहित्य छापे तो सही। वह तुरंत बिक जाएगा। हिंदी के प्रकाशकों में बाल साहित्य के प्रकाशन को लेकर कोई उत्साह नहीं है। पर प्रकाशक तो व्यवसाय के लिए ही पुस्तक छापता है। आप उससे यह उम्मीद ही क्यों रखते हैं कि वह पाठक वर्ग तक पुस्तक पहुँचाएगा। मुनाफा वह थोक बिक्री से हासिल कर लेता है, फिर खुदरा बिक्री के बारे में सिरदर्द क्यों मोल ले। वह साहित्य-प्रेमी नहीं है। प्रकाशक का सही दर्जा पहचाना जाना चाहिए।

पढ़ने के संस्कार को साक्षरता की स्थिति से जोड़ना नहीं चाहिए। जो लोग पढ़े-लिखे हैं, खाते-पीते मध्यवर्ग के हैं, वे क्यों नहीं पढ़ते? उनमें भी पढ़ने का संस्कार नहीं है। वे घटिया साहित्य पढ़ना चाहेंगे, अच्छे साहित्य के लिए उनके पास वक्त नहीं है। पुस्तक मेलों की एक हद तक अहमियत है। इससे अनेक पाठकों तक पुस्तकें पहुँचती हैं। पाठक मेले में लेखक से मिलना पसंद करते हैं, इसीलिए बहुत से लोग मेले में आते हैं। इस तरह के मेलों से सभी को लाभ मिलता है, पर एक हद तक। जब मेरा उपन्यास ‘आपका बंटी’ पिछले वर्ष पुस्तक मेले में मात्र दो घंटे में 250 से अधिक बिका तो मुझे बेहद सुकून मिला। मैंने ऑटोग्राफ भी दिए। क्या यह संभव है कि किसी दुकान से इतने कम समय में ‘आपका बंटी’ इतना बिक सके? इस तरह के मेले खूब होने चाहिए।

कागज की कीमत के बढ़ जाने से पुस्तकें बहुत महंगी हो गई हैं। इसके लिए सरकार कुछ प्रभावी कदम उठाए। मौजूदा शासक उत्सवों और सैर-सपाटों में करोड़ों रुपया फूंक देते हैं। पर वे कभी किताबों को सस्ता बनाने की नहीं सोचते। पुस्तकों का महंगा होते जाना असल में हमें जटिल बनाने की प्रक्रिया का ही हिस्सा है, जिसे केंद्र सरकार की नीतियों ने नियंत्रित किया हुआ है। इसके खिलाफ गुस्सा पैदा होना चाहिए तभी कुछ होगा।

लेखक- मन्नू भंडारी
(कथाकार-उपन्यासकार)