
हिंदी पाठक वर्ग में गिरावट
यह कहना गलत है कि हिंदी का पाठक वर्ग बढ़ा है। यूनेस्को के मुताबिक हम बत्तीसवें नंबर पर आते हैं। दूसरी ओर थोक खरीद ने माहौल बिगाड़ दिया है। इसमें कमीशन की मार बहुत बड़ी है। इसी से किताबों के दाम भी बढ़े हैं। सरकार द्वारा बढ़ाए कागज का मूल्य भी एक कारण है। इसके अलावा टीवी ने भी हमारी संवेदनाएं छीनी हैं। मुझे एक अमेरिकी स्कॉलर ने लिखा कि टीवी के कारण हमारा देश तो नष्ट हो गया, अब आपका देश भी नष्ट होगा।
इसके अलावा एक कारण है अशिक्षा और दूसरा है हिंदीभाषी जातीयता का विकसित न हो पाना। बंगला और मलयालम में शिक्षा का प्रभाव दिखाई देगा। हमारे यहां लोगों की विकृत रुचि बनाई जा रही है। लाखों की तादाद में गंदी और बाजारू पत्र-पत्रिकाएं तथा किताबें बिक रही हैं, तो फिर अच्छा साहित्य भी बिक सकता है। जरूरत इस बात की है कि राजनीतिज्ञ और शासन पुस्तक की अहमियत महसूस करें। आप प्रकाशक से यह उम्मीद न करें कि वह पाठक वर्ग पैदा करेगा। हिंदी पुस्तकों का प्रकाशक न तो लेखक है न साहित्यानुरागी। वह विशुद्ध व्यवसायी है। उसकी बंगला, मलयालम के प्रकाशक से तुलना नहीं की जा सकती।
मैं सोवियत संघ में लेखक का सम्मान देखकर दंग रह गया। भारत में तो स्थिति यह है कि मुझे पुलिसवालों तक से आए दिन अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ता है। प्रकाशकों को लेकर मेरी जबरदस्त शिकायतें हैं। वे लगातार कहते हैं कि बिकती नहीं। मैं कहता हूँ कि किताबें बेचने का हुनर प्रकाशक लागू ही नहीं करना चाहते। वे रेडियो, टेलिविजन, अखबार का साहित्य की पुस्तकों के प्रचार के लिए उपयोग ही नहीं करते। बेहतर तरीके से विज्ञापन और स्टाल सजाए जाएं, तभी पुस्तकें बिकेंगी। असल में वे पाठकों तक पहुंचाना नहीं चाहते। वे लेखक की पुस्तक में भी कांटछांट करते हैं। यहां तक कि मेरे ‘आवारा मसीहा’ में से प्रकाशक ने बीस फोटो गायब कर दिए, जबकि इसी पुस्तक के बंगला संस्करण में बीस से ज्यादा फोटो छपे हैं।
पुस्तक मेलों से फायदा तो होता है, पर इसके आयोजकों को मेले का शऊर नहीं आता। मेलों की प्रक्रिया में लेखकों को शामिल करना चाहिए, वे सही रूप में पुस्तकों को लोकप्रिय बनाने की सलाह दे सकते हैं। पर लगता नहीं कि सरकार लेखक और पुस्तकों के प्रति गंभीर है। सरकार जिस तरह अपसंस्कृति एवं गंदे साहित्य की बिक्री होने दे रही है, उसी से पता चलता है कि वह अच्छे साहित्य और साहित्यकार के प्रति क्या दृष्टिकोण रखती है।
लेखक- विष्णु प्रभाकर



