4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

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पटना विश्वविद्यालय : कल और आज

पृष्ठभूमि : चारो तरफ शैक्षणिक-स्तर को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय निर्वाचक मण्डल के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी. एन. शेषन का मानना है कि कल तक मानव निर्माण का कारखाना माना जाने वाला विश्वविद्यालय आज कयामत-केन्द्र बन चुका है। शिक्षा को दूर-दराज तक पहुँचाने के असफल प्रयास को छिपाने के लिए खुला विश्वविद्यालय चलाया गया जो हमेशा बंद ही रहता है। समय रहता तो शेषन महोदय उन सरकारी मान्यता प्राप्त और अंगीभूत कॉलेजों का नाम गिनाते जो शिक्षा के मामले में कितना प्रभावहीन हो चुका है और किस सीमा तक नियम विरोधी कार्यों में लीन हैं। फिर भी उच्च शिक्षा का विस्तार तेज गति से होता जा रहा है जहाँ शिक्षा से संबंधित प्राचीनता, शिक्षा से संबंधित नवीन विचारधारा, विज्ञान-तकनीक का महत्व, विश्वविद्यालय का नियंत्रण और कुलपतियों का विश्वविद्यालय पर नियंत्रण आदि मूल रूप में बदल चुके हैं। समय था जब राधाकृष्णन, मालवीय, आशुतोष मुखर्जी, जाकिर हुसैन, सी. पी. रामास्वामी अय्यर और लक्ष्मणस्वामी मुदालियार जैसे महान लोग कुलपति होते थे, जिनको समाज में उच्च स्थान प्राप्त था।

आज के कुलपति, जैसा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के भूतपूर्व अध्यक्ष जी. रामा रेड्डी का विचार है, परिसर के मुख्य प्रशासनाधिकारी, नमूनादार या आदर्श सेवक, होटल मैनेजर, वित्तीय कलाबाज, जनसम्पर्क विशेषज्ञ और कालोचित राजनीतिज्ञ की भूमिका मात्र निभाते हैं। विश्वविद्यालयों के छात्र ज्यादा से ज्यादा अंक प्राप्त करना, परिसर में भीड़ लगाये रखना, स्नातक डिग्री प्राप्त करना थर्ड डिविजन से ही क्यों न हो- ऐसी ही बातों में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं। व्यंगात्मक रूप में ही सही, इसमें आश्चर्य नहीं कि हमारा महाविद्यालय डबल रोटी बनाने की एक ऐसी भट्टी है जो माता-पिता के द्वारा तैयार किया जाता है। आशा की जाती है कि चार वर्षों में यह डबल रोटी तैयार होकर खाने के लायक हो जायगी। ये विचार श्री शेषन द्वारा विश्वविद्यालयों के बेताज बादशाहों के समक्ष प्रस्तुत किये गये (द टाइम्स ऑफ इण्डिया, पटना, अगस्त 21, 1996)। शेषन के ये विचार कवि क्रिस्टोफर आंस्टे से भिन्न नहीं हैं जिसने आज से ढाई सौ वर्ष पूर्व कैम्ब्रिज के किंग्स कॉलेज में प्रस्तुत किया था।

एम. ए. की उपाधि प्राप्त करने से पूर्व ही उसने कहा था- “कैम्ब्रिज का डॉक्टर बिना किसी डाक्ट्रीन के, मास्टर्स की डिग्री बिना किसी आर्ट के और ग्रेजुएट शराब पीने और बिना किसी डिग्री को कहते हैं।” इस पर विश्वविद्यालय के अधिकारी इतने नाराज हुए कि क्रिस्टोफर आंस्टे को एम. ए. की डिग्री नहीं मिली। तब आंस्टे ने चिल्लाकर कहा- ओ ग्रान्टा, स्वीट ग्रान्टा, वह शिक्षा कहाँ है जिसे पाने के लिए मैंने सात वर्ष लगाये और डिग्री नहीं प्राप्त कर सका। ऑक्सफोर्ड से निकाले जाने के बाद विश्वविद्यालय में प्राप्त शिक्षा से लाभ के संबंध में आंस्टे ने कहा कि शिक्षा पढ़ाये गये विषयों से नहीं बल्कि बदलते हुए परिवेश से होती है; नये दृश्य, नये लोग, नयी स्थिति जिसके साथ चलना है, से होती है। विकास के लिए ये ही सहायक तत्व होते हैं। शिक्षा को अंतिम रूप प्रदान करना और छात्रों का नैतिक विकास तथा भावी जिन्दगी के लिए उचित एवं अनुकूल मार्ग तैयार करना ही विश्वविद्यालय का काम होता है। विश्वविद्यालय छात्रों को शिक्षा और लक्ष्य का एक ऐसा ‘अंतिम रूप’ नहीं प्रदान करता कि शिक्षा का अंत बी. ए. पास करने के साथ ही हो जाय; बल्कि एक ऐसा ‘अंतिम रूप’ प्रदान करता है जिसके सहारे अर्थात बीते हुए कल के सहारे वह आज को बेहतर बना सके।

तेरहवीं शताब्दी में आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों को अपने आवास का प्रबन्ध स्वयं करना पड़ता था। छोटे कमरे में तीन छात्र एक ही खाट पर सोकर काम चला लेते थे। अपने परिवारों से छात्रों को बहुत मामूली आर्थिक सहायता मिलती थी। ऐसे विद्यार्थी भी थे जो बाजार से सड़ी-गली सब्जी अथवा मांस बटोरकर पेट भर लेते थे। छात्र सारा दिन अध्ययन, व्याख्यान-श्रवण तथा वाद-विवाद में व्यतीत करते। 1209 ई. में ऑक्सफोर्ड में कुल दो हजार छात्र थे। इस विश्वविद्यालय में कुछ छात्र ऐसे थे जिनके लिए मदिरालय में लड़ना, नगरवासियों को आतंकित करना, राहगीरों को लूटना, लड़कियों के लिए आपस में लड़ना तथा जुआ खेलना आम बात थी। ऐसे छात्रों को कभी-कभी नगर से बाहर निकाल दिया जाता था। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के छात्र कभी-कभी तलवारों और तीर-धनुष से लैस शाम को सड़कों पर निकल पड़ते और राहगीरों पर हमले कर देते थे। रोम के कुछ विद्यार्थी हत्या, राहजनी और चोरी तक कर लेते थे। समृद्ध घरों के छात्र शराब और लड़कियों पर पैसा पानी की तरह बहाते थे। एक जर्मन शिक्षक को अपने मित्र शिक्षक की हत्या करने के आरोप में नौकरी से निकाला गया। ऑक्सफोर्ड के एक प्राध्यापक ने एक अशिष्ट पादरी की हत्या करने के लिए अपने शिष्यों को भड़काया था। क्या हमारा पटना विश्वविद्यालय मध्यकालीन यूरोपीय विश्वविद्यालय है?

1229 में तुलो विश्वविद्यालय की स्थापना इटली में इसलिये हुई कि अलविजेंसियन विधर्मिता का विरोध किया जाय। 1349 ई. में फ्लोरेंस नगर में विश्वविद्यालय की स्थापना प्लेग के कारण घटी हुई आबादी को बढ़ाने के लिए की गई। कुलाधिपति और शिक्षकों के बीच प्रायः मतभेद होते रहते थे। 1214 ई. में प्रथम बार विश्वविद्यालय के कुलपति का उल्लेख मिलता है। कुलाधिपति और कार्याध्यक्ष मध्यकालीन विश्वविद्यालयों के उच्चतम पदाधिकारी होते थे। विश्वविद्यालय से संबंधित अधिकांश निर्णय शिक्षकों की आम बैठक में लिये जाते थे। शिक्षक और छात्र राज्य द्वारा दंडित होने या बन्दी बनाये जाने से मुक्त थे। ऐसा भी होता था कि कोई विद्यार्थी शराब की दुकान में तोड़फोड़ करना अथवा किसी महिला के साथ बलात्कार करता तो नगरवासी और राजकीय पदाधिकारी उसे बन्दी बनाने का प्रयास करते थे।

एक अच्छाखासा हंगामा उठ खड़ा होता था। हंगामे के बाद विश्वविद्यालय के पदाधिकारी राजा के पास अपील करते थे। राजा विश्वविद्यालय-पदाधिकारियों के अधिकार में वृद्धि कर देता था ताकि मामला सुलझ जाय। यदि राजा हिचकिचाता तो विश्वविद्यालय पदाधिकारी पोप की शरण लेते थे। पोप और राजा में पारस्परिक मतभेद से विश्वविद्यालय के अधिकारियों को लाभ हो जाता था।

उपर्युक्त तथ्यों पर अगर हम गहरी दृष्टि डालें तो मध्यकालीन यूरोपीय विश्वविद्यालयों और आज के पटना विश्वविद्यालय में शायद ही विशेष अन्तर दिखाई दे। एक विशेष अन्तर को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि यूरोपीय विश्वविद्यालयों में अनुशासनहीन छात्रों की संख्या दो-चार प्रतिशत से अधिक नहीं थी। अधिकांश छात्रों ने अपनी प्रतिभाओं के बल पर यूरोपीय देशों को सर्वाधिक विकसित करने में अति प्रशंसनीय भूमिका निभायी। आज भी यूरोपीय शिक्षा-स्तर का विश्व में एक विशिष्ट पहचान है।

भारत में विश्वविद्यालयों की स्थापना यूरोप के लोगों द्वारा और भारतीयों के सहयोग से यूरोपीय पद्धति के आधार पर हुई। पटना विश्वविद्यालय भी देश का सातवाँ प्राचीनतम विश्वविद्यालय होने के नाते इस पद्धति से पूर्णतः प्रभावित रहा। 1917 से 1960 के आसपास तक इस विश्वविद्यालय की गरिमा पर कहीं कोई दो मत नहीं है। इस समय तक यहाँ से पास हुए छात्रों ने विज्ञान शिक्षा, साहित्य, इतिहास, प्रशासन एवं राजनीति में बहुमूल्य नाम किया। भारत के अधिकांश प्रसिद्ध और ज्ञानी न्यायाधीश एवं अधिवक्ता पटना लॉ कॉलेज के छात्र रहे हैं। बिहार के अधिकांश मुख्यमंत्री और डा. राजेन्द्र प्रसाद तथा जय प्रकाश नारायण जैसे राष्ट्रीय स्तर के राजनेता इसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। महान् इतिहासकार मैक्रिण्डल, के. के. दत्त, सैय्यद हसन अस्करी और राम शरण शर्मा इसी विश्वविद्यालय के रहे हैं। आज पटना विश्वविद्यालय की दशा 1950-60 वाली नहीं रह गई है।

पटना विश्वविद्यालय : पटना विश्वविद्यालय की स्थापना 1917 में हुई। यह एक लम्बे संघर्ष और कठिन प्रयास का परिणाम था। उत्तर बिहार के निलहे साहबों के अत्याचार की समस्या के अतिरिक्त उन दिनों तक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न जो बिहार के शिक्षित लोगों को आकृष्ट कर रहा वह था पटना विश्वविद्यालय विधेयक। यह विधेयक सितम्बर 1916 में तत्कालीन शिक्षा सदस्य सर शंकरण नायर ने केन्द्रीय विधायिका परिषद में प्रस्तुत किया। बिहार प्रान्तीय सम्मेलन का एक विशेष अधिवेशन नवम्बर, 1916 में बांकीपुर में किया गया जिसमें इस विधेयक के प्रतिक्रियावादी स्वरूप पर प्रबल विरोध प्रकट किया गया। एक्सप्रेस ने 28, नवम्बर, 1916 को छापा— “आधुनिक बिहार के इतिहास में इसके पूर्व इस प्रांत में किसी सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर इतना जोरदार एवं निर्विरोध मत इतने अधिक उत्साह के साथ नहीं व्यक्त किया गया था जैसाकि बांकीपुर के बिहार प्रान्तीय सम्मेलन की विशेष बैठक में पिछले रविवार को देखा गया।” सम्मेलन के इस अधिवेशन की सफलता पर विचार व्यक्त करते हुए उसी तिथि के अंक बिहारी में छपा— “सरकार को सम्मेलन की इस असामान्य बैठक से इस महत्वपूर्ण विधेयक पर कितनी तीव्र एवं व्यापक उत्तेजना फैली है, इसका संकेत मिल जाना चाहिए।” राजेन्द्र बाबू उन दिनों बिहार प्रान्तीय संघ के संयुक्त सचिव थे। उन्होंने भी अपने सहयोगियों के साथ विधेयक की आपत्तिजनक धाराओं के विरुद्ध दृढ़ संकल्प एवं साहस के साथ कुछ जोरदार आन्दोलन किया। अंततः पारित होने के पूर्व उसमें बहुत कुछ संशोधन किया जा चुका था। 1 अक्टूबर 1917 को पटना विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

पटना विश्वविद्यालय के छात्र : पटना विश्वविद्यालय के गौरव की नींव को सुदृढ़ करने में यहाँ के छात्रों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 1913 में शचीन्द्र नाथ सन्याल ने पटना में अनुशीलन समिति (इस समिति की स्थापना 1908 में बनारस में हुई थी) की एक शाखा स्थापित की। इस शाखा का संगठन करनेवालों में बी. एन. कॉलेज का प्रथम वर्ष का बंकिम चन्द्र मित्र नामक एक छात्र भी था। इसी कॉलेज का अखिलचन्द्र दास गुप्त भी इसका सदस्य था। वह बहुत बड़ा देश-प्रेमी था। 1915 में बंकिम चन्द्र मित्र को बनारस षड्यंत्र केस में पकड़कर जेल में बन्द कर दिया गया। सरकार के सभी उच्च पदाधिकारी बी. एन. कॉलेज को अवांछित तत्वों से मुक्त कराने को चिन्तित थे। 1916 के एक सरकारी रिपोर्ट में कहा गया— “पटना में एक गुप्तदल काम कर रहा था। इसके मुख्य सदस्य बी. एन. कॉलेज के छात्र एवं कुछ छात्र पटना कॉलेज के हैं। बी. एन. कॉलेज का एक छात्र अतुल चन्द्र मजुमदार भी क्रांतिकारी दल का सदस्य था जिसे भारत रक्षा कानून के तहत कैद कर लिया गया। श्री सुधीर कुमार सिन्हा और श्री प्रफुल्ल कुमार विश्वास 1916 में बी. एन. कॉलेज में नामांकित हुए और इसी वर्ष दोनों ने पढ़ाई छोड़ दी। दोनों क्रांतिकारी थे। सुधीर कुमार सिन्हा के भाई शिव कुमार सिन्हा पर भी सरकार कड़ी नजर रखती थी।
1920 तक इंजीनियरिंग कॉलेज के 110 छात्र अपनी पढ़ाई छोड़ आजादी की जंग में कूद पड़े थे। इनमें से सात छात्र तो अपने अभिभावकों के कहने से पुनः कॉलेज लौट गये किंतु 103 छात्र चर्खा बनाने एवं एक कारखाना स्थापित करने में लग गए। 1906 में राजेन्द्र बाबू के नेतृत्व में बिहारी स्टूडेन्ट्स कांफ्रेंस नामक एक संघ की स्थापना हुई। इसकी पहली बैठक पटना कॉलेज के हॉल में श्री सर्फुद्दीन, बार एट लॉ की अध्यक्षता में हुई। देश में अपने ढंग का यह पहला संगठन था। यह संस्था छात्रों के समक्ष ऊंचा आदर्श प्रस्तुत करती थी। स्टूडेन्ट्स कांफ्रेंस का वार्षिक समारोह दुर्गापूजा की छुट्टियों में आयोजित किया जाता था जिसकी अध्यक्षता श्री सर्फुद्दीन, हसन इमाम, परमेश्वर लाल, दीपनारायण सिंह, सच्चिदानन्द सिन्हा, व्रजकिशोर प्रसाद, मधुसूदन दास, राजेन्द्र प्रसाद, प्रोफेसर जदुनाथ सरकार, श्री मजहरूल हक तथा गजाधर प्रसाद जैसे बड़े लोग करते थे।

25 जनवरी 1931 को पुलिस ने बी. एन. कॉलेज के एक छात्र के निवास पर छापा मारकर वहाँ से सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की तस्वीर प्राप्त किया। इस छात्र का निवास भिखना पहाड़ी में था। जवाहरलाल नेहरू को जेल की सजा देने के विरोध में 5 दिसम्बर 1940 को पटना के कॉलेजों में हड़ताल रही। छात्रों का एक जुलूस निकला और पटना विश्वविद्यालय पुस्तकालय के सामने वाले मैदान में एक सभा हुई। अगस्त 1942 में राजेन्द्र बाबू की गिरफ्तारी की खबर मिलते ही बी. एन. कॉलेज से पटना के छात्रों का जुलूस पटना के प्रमुख मार्गों से गुजरता हुआ विश्वविद्यालय-परिसर में पहुँचकर एक सभा में परिणत हो गया। सभा के बाद हजारों छात्र बांकीपुर जेल के सामने पहुँचे और वहाँ प्रदर्शन किया। वहाँ से राज्यपाल के आवास की ओर बढ़े एवं उसके समक्ष एक सभा की। इसमें सरकार की दमन-नीति की कड़ी आलोचना की गई। 10 अगस्त 1942 को करीब दो हजार छात्र पटना कॉलेज परिसर से निकल पटना विश्वविद्यालय पुस्तकालय के सामने वाले मैदान में एक सभा की। सभा की अध्यक्षता बाबू जगत नारायण लाल के पुत्र श्री कृष्ण प्रसाद ने की। श्रीकृष्ण प्रसाद पटना कॉलेज का छात्र था। वहाँ से छात्र इंजीनियरिंग कॉलेज पर झण्डा फहराने गए और फहराये भी, किंतु अधिकारियों ने उसे उतार दिया। उस दिन पटना ट्रेनिंग कॉलेज, बी. एन. कॉलेज, पटना कॉलेज, सायंस कॉलेज के छात्रावासों पर कांग्रेस का झण्डा फहराया गया। 11 अगस्त को पटना सचिवालय के पूर्वी फाटक पर दिन में दो बजे छात्रों की भीड़ इकट्ठी हुई। करीब पांच बजे संध्या को पुलिस की गोली से सात लोग वहीं मर गए। इनमें से जगपति कुमार नामक लड़का बी. एन. कॉलेज का छात्र था। 13 अगस्त को एक सरकारी अधिसूचना जारी की गई जिसके अनुसार पटना के सभी कॉलेजों और छात्रावासों को एक माह के लिए बन्द कर दिया गया। पटना कॉलेज के भवन का एक भाग और छः छात्रावास को सैनिक छावनी बना दिया गया। 26 अक्टूबर को बी. एन. कॉलेज में मोखतारी की परीक्षा के अवसर पर फाटक पर धरना देने के अपराध में 23 छात्र गिरफ्तार किए गए।

1 सितम्बर 1942 को सरकार से निम्नलिखित शर्तों पर कॉलेज खोलने की अनुमति मिली:-

(1) कॉलेज में उपस्थित होने से पूर्व छात्र को जमानत के रूप में सौ रुपया (1942 में सोना 40 रुपये में एक तोला और 1996 में छः हजार रुपये प्रति तोला था) अर्थात् आज के हिसाब से 15 हजार रुपया नकद जिलाधिकारी के पास जमा करना होगा।
(2) भविष्य में सविनय अवज्ञा आन्दोलन में किसी भी तरह भाग नहीं लेने का एक लिखित बयान देना पड़ेगा।
(3) राजनैतिक सभा में भाग लेने या जाने की अनुमति उसे नहीं होगी।
(4) कोई भी छात्र किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं होगा।
(5) छात्र कोई नया संघ नहीं बना सकते।
(6) छात्रावासों या स्वीकृत आवासों में रहनेवाले छात्रों को सत्रकाल में बाहर जाने की अनुमति नहीं होगी। निजी आवास में रहने वाले छात्रों को विशेष अनुमति-पत्र दिये जायेंगे ताकि वे कॉलेज जा सकें।
(7) सात बजे संध्या से पांच बजे प्रातः काल तक कोई छात्र निजी आवास या छात्रावास से बाहर नहीं जायगा।
(8) छात्रावास के अंतेवासियों को कठोर अनुशासन में रखने के लिए वही प्राध्यापक अधीक्षक हो सकता था जो कम से दस वर्ष से कार्यरत हो। छात्रावास अधीक्षकों का एलाउन्सेज यदि आवश्यक हो तो बढ़ा दिये जाएंगे ताकि वे ठीक से कार्य का संचालन कर सकें।
(9) कॉलेज के प्राचार्यों का यह दायित्व होगा कि वे अपने कॉलेजों की घटनाओं से जिलाधिकारी को सूचित करते रहें।

उपर्युक्त शर्तों के आधार पर जिलाधिकारी द्वारा लॉ कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज 11 नवम्बर 1942, बी. एन. कॉलेज तथा सायंस कॉलेज 18 नवम्बर को खोलने का सुझाव दिया गया।

सिन्डीकेट की बैठक-1942 : छात्रों में अनुशासन बना रहे इसके लिए आवश्यक कार्यवाइयों पर विचार करने हेतु शिक्षा निदेशक ने 24-25 सितम्बर 1942 को कॉलेज के वरीय प्राचार्यों की एक बैठक बुलायी। सदाचरण के लिए पांच महीने की कॉलेज फीस के बराबर “कासन मनी” की व्यवस्था लगाने पर इसमें सहमति हुई तथा इससे तभी छूट दी जाती जब उसके लिए पर्याप्त आधार हों। इस बैठक में एक अन्य अनुशंसा यह की गई कि “उपकुलपति” (आज कल कुलपति को कुलाधिपति और उपकुलपति को कुलपति कहते हैं) द्वारा जिन संस्थाओं या संघों को मान्यता प्रदान नहीं की गई हो, छात्रों को उनका सदस्य होने अथवा राजनैतिक सभाओं एवं प्रदर्शनों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया जाय। ये अनुशंसाएं सरकार द्वारा पटना विश्वविद्यालय के उपकुलपति को 1 अक्टूबर 1942 को भेज दी गई जिससे यथाशीघ्र वह उनके आधार पर अधिनियम बना ले और कॉलेज खुलने के पहले ही उन्हें लागू किया जा सके। पटना विश्वविद्यालय के सिन्डीकेट की एक बैठक हुई और निम्नलिखित सुझाव विश्वविद्यालय द्वारा सरकार को 12 अक्टूबर को भेजे गए:

पटना में कॉलेजों का खोला जाना 12 नवम्बर 1942 के बाद ऐसे समय तक रोक रखा जाय जब तक कि सरकार की राय में पूर्णतया सामान्य स्थिति पुनर्स्थापित नहीं हो जाती और सरकार चार से अधिक व्यक्तियों को एकत्र होने के संबंध में अधिसूचना या तो हटा नहीं लेती या उसमें बदलाव नहीं कर देती है। कर्फ्यू आर्डर या नगर में सड़कों पर किसी तरह की बाधाएं या रुकावटें आदि नहीं हटा ली जाती। किंतु सरकार यदि कॉलेजों का खुलना 12 नवम्बर से आगे स्थगित नहीं करना चाहती तो सिन्डीकेट का सुझाव होगा कि पटना के सभी कॉलेज एक ही तारीख को नहीं खोले जाँय। लॉ कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज को पहले खोला जाय और उसके बाद चार दिन से एक सप्ताह की अवधि पर एक-एक करके दूसरे कॉलेज खोले जायं। जब भी कॉलेज खुलें तो सरकार द्वारा प्राचार्यों को अपने सभी अधिकारों का तथा समझाने-बुझाने की शक्ति का उपयोग करने का आदेश दिया जाय। शिक्षा-अधिनियम और विश्वविद्यालय-अधिनियमों द्वारा विहित सभी अधिकारों के उपयोग किये जायं और पुलिस को प्राचार्यों द्वारा बुलाए जाने की स्थिति को छोड़कर किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करने को कहा जाय। क्लास करने आने वाले छात्रों को रोकने का प्रयास जब छात्र करें तभी सैनिकों को स्थिति से निबटने को कहा जाय अन्यथा नहीं। मारपीट रोकने के लिए सैनिकों का उपयोग किया जायगा। संकटकालीन स्थिति से निबटने के लिए कॉलेज के प्राचार्यों के लिए टेलीफोन की व्यवस्था की जाय ताकि वे पुलिस तथा विश्वविद्यालय को किसी घटना के संबंध में तुरंत सूचित कर सकें। किसी संकट की स्थिति में कुछ दिनों के लिए कॉलेज बन्द कर देने का अधिकार भी संभव हो तो प्राचार्य को दिए जायं।

19 अक्टूबर 1942 को उपकुलपति की सहमति से पटना विश्वविद्यालय के कुलपति ने इंजीनियरिंग और ट्रेनिंग कॉलेज 3 नवम्बर 1942, मेडिकल और सायंस कॉलेज 11 नवम्बर 1942 तथा पटना और बी. एन. कॉलेज को 18 नवम्बर 1942 को खोलने का निर्णय लिया।
जंगे आजादी में इस तरह पटना विश्वविद्यालय के छात्रों ने ऐतिहासिक भूमिका निभायी। देश के राष्ट्रप्रेमियों के प्रयास से एवं असंख्य नरबलि के फलस्वरूप देश को आजादी मिली। 1889 में सच्चिदानन्द सिन्हा, 1893-94 में गणेश दत्त सिंह, 1900 ई. में विधानचन्द्र राय (बंगाल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री) और 1896 में ख्वाजा मोहम्मद नूर (भूतपूर्व कुलपति, पटना विश्वविद्यालय) पटना कॉलेज के छात्र थे।

देश आजाद हुआ। जश्न मनाए गए। बिहार के सभी राजनीतिक, प्रशासनिक एवं न्यायिक पदों पर पटना विश्वविद्यालय के छात्र आसीन हुए। इसी विश्वविद्यालय के छात्र डा. राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। आजादी के बाद छात्रों ने अपना ध्यान राजनीति से हटाकर पढ़ाई-लिखाई की ओर केन्द्रित किया। इसका महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक परिणाम यह निकला कि भारत के अधिकांश वरिष्ठ न्यायाधीश एवं अधिवक्ता, आई.ए.एस. अधिकारी, आई.पी.एस. अधिकारी, समाजशास्त्री, साहित्यकार, इतिहासकार, वैज्ञानिक और इन्जीनियर तथा कुशल और योग्य शिक्षक पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे थे। 1974-75 में भारतीय राजनीति में क्रांतिकारी बदलाव लाने वालों का नेतृत्व संभालने वाले श्री जय प्रकाश नारायण इसी विश्वविद्यालय के छात्र थे।

1960 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ की स्थापना हुई। भारतीय परिवेश में राजनीति की मुख्यधारा में आने के लिए यहाँ के छात्र गोलबंद होने लगे। इन छात्रों में से अधिकांश छात्र सायंस के नहीं बल्कि आर्ट्स के थे। मेडिकल या इन्जीनियरिंग में नामांकित होने के लिए सायंस के छात्र आई.एस.सी. के स्तर से ही गम्भीर पढ़ाई में जुट जाते किंतु आर्ट्स के छात्रों के साथ वैसी बात नहीं रही। बी.ए. पास करने के बाद ही वे प्रतियोगी-परीक्षाओं की तैयारी में जुट पाते। इसका परिणाम यह हुआ कि आर्ट्स के ही अधिकांश छात्र राजनीतिक गतिविधियों में समय देने लगे। छात्रसंघ का चुनाव लड़ने वाले एवं उनके समर्थकों में जात-पात की भावना का फैलना स्वाभाविक था। फलतः 1970 ई. के आसपास छात्रों की राजनीति में जात पात के विषाणु फैले। धीरे-धीरे, पटना विश्वविद्यालय के छात्रावासों पर अलग-अलग जाति के छात्रों का कानूनी और गैरकानूनी कब्जा होने लगा। राजनीति करने वालों, मारपीट और रक्तपात करने वालों तथा पढ़ाई-लिखाई करने वाले छात्र अब यहाँ पाए जाने लगे। छात्रों को पथभ्रष्ट करने में यहाँ के शिक्षकों की भूमिका कम जहरीली नहीं रही। इसी समय से विश्वविद्यालय राजनीति के चपेट में आने लगा। कई छात्र नेताओं की हत्या हुई।

अच्छे तत्वों पर बुरे तत्व हावी होने लगे। कदाचार और परीक्षा में गहरी दोस्ती हो गई। फलतः अच्छी नौकरी प्राप्त करने और अच्छे पदों पर नियुक्त होने वाले छात्रों की संख्या तेज रफ्तार से घटती गई। आर्ट्स और कॉमर्स के छात्रों पर इसका सर्वाधिक बुरा असर पड़ा। छात्र संघ के चुनाव पर प्रश्न चिह्न लगने लगे। विश्वविद्यालय के शिक्षक और अधिकारीगण असहाय महसूस करने लगे। कई कारणोंवश परीक्षा एक सैद्धान्तिक सच मात्र बन कर रह गया। छात्र-हित की बात सोचने वाले छात्रनेताओं का अभाव बढ़ा और निजी स्वार्थ से छात्रों की राजनीति संचालित होने लगी। विश्वविद्यालय के छात्र रोगग्रस्त होते जा रहे हैं।

पटना विश्वविद्यालय की गरिमा और छात्रों के बेहतर भविष्य के लिए एक लम्बे अरसे के बाद कदाचार मुक्त परीक्षा आयोजित करने के कठिन प्रयास 1993-94 में किये गये किंतु असामाजिक तत्व भारी पड़े। पटना कॉलेज में जहाँ केवल इतिहास के दो-चार स्नातक प्रतिवर्ष आई.ए.एस. और आई.पी.एस. बनते थे वहाँ इतिहास का कोई स्नातक बी.पी.एस.सी. की नौकरी भी शायद ही पाने लगा। अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों का नामांकन पटना से बाहर के कॉलेजों में कराने लगे। शिक्षा बिहार के लिए एक समस्या बन गई। कदाचार मुक्त परीक्षा और पढ़ाई-लिखाई का स्तर ऊंचा उठाने के लिए सरकार, न्यायालय, शिक्षक, कुलपति और छात्रों द्वारा 1995 में पुनः प्रयास किये गए। सौभाग्यवश सफलता मिली। कदाचार मुक्त परीक्षा की सत्यता को 1996 में तो सभी लोगों ने स्वीकारा। कदाचार मुक्त परीक्षा से गहरा संबंध परीक्षकों एवं परीक्षा विभाग का है। परीक्षकों एवं यहाँ के परीक्षा विभाग में उपस्थित गड़बड़ियों को ठीक करने का प्रयास विश्वविद्यालय द्वारा किया तो जा रहा है किंतु अनुकूल परिस्थिति अभी भी शेष है।

आजादी की जंग और शिक्षक : बी. एन. कॉलेज के प्राध्यापक श्री नृपेन्द्र नाथ बसु को सरकार 1916 में “संदिग्ध व्यक्ति” समझती और उन पर कड़ी नजर रखती थी। बिहार में असहयोग आन्दोलन के सर्वप्रमुख नेता डा. राजेन्द्र प्रसाद ने मार्च 1921 में जो विवरण प्रस्तुत किया उसके अनुसार बाबू बदरीनाथ वर्मा, (एम.ए., प्राध्यापक, बी.एन. कॉलेज), बाबू जालेश्वर प्रसाद (एम.ए., प्राध्यापक, बी.एन. कॉलेज), बाबू जगत नारायण (बी.एस.सी. डिमॉन्स्ट्रेटर, पटना कॉलेज), पाण्डेय जगन्नाथ प्रसाद (एम.ए., प्राध्यापक, पटना कॉलेज) आदि शिक्षक अपने पदों को त्याग कर राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं अथवा अन्य राष्ट्रीय कार्यों में लग गए। बाबू बदरीनाथ वर्मा ने पुनः विश्वविद्यालय में काम करने का वचन दिया। 1921 में वे अपना पद छोड़ चुके थे किन्तु उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया गया था।

राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के लिए 1920 में बाबू बजरंग सहाय ने लॉ कॉलेज छोड़ दिया। 1924 में श्री जगदीश चन्द्र बोस पटना विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के अवसर पर भाषण देने आये। 1929 में बी.एन. कॉलेज के प्राध्यापक श्री मणीन्द्र नारायण राय पटना क्रांतिकारी पार्टी के नेता थे। अगस्त, 1929 में श्री राय ने पटना में मैजिक लालटेन की सहायता से भारत के प्राचीन वैभव की तुलना में वर्तमान गरीबी तथा अंग्रेज ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कर्मचारियों की क्रूरताओं पर भाषण दिया। इसके लिए श्री राय को 17 अगस्त 1929 को गिरफ्तार कर लिया गया किंतु हाईकोर्ट द्वारा जमानत पर उन्हें छोड़ दिया गया। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में पटना विश्वविद्यालय के अधिकांश शिक्षक आजादी की लड़ाई में गतिशील रहे। आजादी के बाद यहाँ के शिक्षकों ने शैक्षणिक वातावरण को इतना बेहतर बना डाला कि यह भारत का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय हो गया। देश-विदेश में ख्याति प्राप्त शिक्षक यहाँ कार्यरत थे।

पटना विश्वविद्यालय में इतिहास की पढ़ाई 1862 ई. से होती है। इस विषय में बी.ए. स्तर की पढ़ाई 1965 ई. से होने लगी। 2 जनवरी 1952 से स्नातकोत्तर-विभाग में एम.ए. की पढ़ाई होने लगी। इससे पूर्व आई.ए. से एम.ए. तक की पढ़ाई पटना कॉलेज में होती थी। 1919 ई. में एम.ए. इतिहास की परीक्षा पहली बार हुई जिसमें चार नियमित छात्र और चार प्राइवेट छात्र सम्मिलित हुए। इनमें से दो नियमित छात्र द्वितीय श्रेणी और पांच तृतीय श्रेणी में पास हुए। एक प्राइवेट छात्र फेल हो गया। जुलाई, 1921 ई. से स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई नियमित ढंग से होने लगी। इससे पूर्व नामांकन एम.ए. में होते किंतु पढ़ाई नहीं होती थी। 1957 से एम.ए. इतिहास की पढ़ाई दरभंगा हाउस में होने लगी। इतिहास के स्नातकोत्तर विभागाध्यक्ष ही केन्द्रीय पुस्तकालय के मनुस्क्रिप्ट सेक्शन के देखरेख कर्ता होते हैं। अवकाश प्राप्त इतिहासकार सैयद हसन अस्करी और विमान बिहारी मजुमदार अस्थायी तौर पर 1964 में इस विभाग में नियुक्त किये गये। मध्यकालीन भारतीय इतिहास में प्रोफेसर अस्करी विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार थे। आधुनिक इतिहास के विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर के. के. दत्त 24 अगस्त 1958 तक विभागाध्यक्ष रहे। उसके बाद 25 अगस्त 1958 से पटना कॉलेज के प्राचार्य के रूप में कार्यरत रहे। 14 मार्च 1965 से 13 नवम्बर 1970 तक वे पटना विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। बिहार के इतिहास की जानकारी के लिए प्रोफेसर के. के. दत्त द्वारा लिखित पुस्तक आज भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारत के आधुनिक इतिहास एवं आदिवासियों पर उनके महत्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हैं।

प्रोफेसर के. के. दत्त के बाद 25 अगस्त 1958 को प्रोफेसर राम शरण शर्मा स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के अध्यक्ष बने। प्राचीन भारतीय राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक एवं प्रशासनिक इतिहास के विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर शर्मा की दर्जनों पुस्तकें एवं सैकड़ों शोधलेख प्रकाशित हैं। देशी-विदेशी करीब पन्द्रह भाषाओं में उनकी कई पुस्तकें अनुवादित हैं। 1 अप्रैल 1970 से दो वर्षों के लिए प्रोफेसर शर्मा जवाहरलाल नेहरू फेलोशिप के रूप में रहे। बाद में चलकर वे भारतीय इतिहास शोध परिषद, नई दिल्ली के अध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष रहे। अवकाश प्राप्त प्रोफेसर शर्मा बोरिंग रोड, पटना में रहते हैं और अभी भी अध्ययनरत हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार डा. विमला प्रसाद यहीं इतिहास विभाग में शिक्षक थे। बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आधुनिक इतिहास के प्रोफेसर और उसके बाद नेपाल में भारतीय राजदूत बने। यहाँ यह बताना अनुचित नहीं होगा कि 1952 तक नेपाल में होने वाली परीक्षाओं का संचालन पटना विश्वविद्यालय करता था।

प्राचीन भारत के प्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर योगेन्द्र मिश्र, प्राचीन भारत के प्रसिद्ध प्रोफेसर भक्त प्रसाद मजुमदार, आधुनिक भारत के प्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर विष्णु अनुग्रह नारायण, आधुनिक भारत के प्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर जगदीश चन्द्र झा, आधुनिक भारत के विद्वान प्रोफेसर वीरेन्द्र वर्मा और मध्यकालीन इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर सुरेन्द्र गोपाल इस विभाग के विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। बिहार के प्रसिद्ध पाठ्य पुस्तक लेखक डा. दीनानाथ वर्मा इस विभाग के अतियोग्य शिक्षक थे। प्रोफेसर राम लखन शुक्ल और प्रोफेसर द्विजेंन्द्र नाथ झा अंतर्राष्ट्रीय इतिहास और प्राचीन भारतीय इतिहास के योग्य शिक्षक थे। दोनों आज दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के वरिष्ठ शिक्षक हैं। डा. सुवीरा जायसवाल इसी विभाग में प्राचीन भारतीय इतिहास पढ़ाती थीं। आज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वरिष्ठ शिक्षिका हैं। पटना कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर नगेन्द्र प्रसाद वर्मा, वीमेंस कॉलेज की प्राचार्या सिस्टर लाइसेरिया और अनुग्रह नारायण सिन्हा समाज अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रोफेसर युवराज देव प्रसाद इसी इतिहास विभाग के शिक्षक रहे हैं।

पटना विश्वविद्यालय के शेष विभागों में इसी प्रकार के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रोफेसर रहे हैं और तब जाकर पटना विश्वविद्यालय की मान-मर्यादा इतने गौरवशाली रूप में स्थापित हो सकी। केवल पटना कॉलेज में 30 अंग्रेज विद्वान प्राचार्य 1935 तक रहे हैं। सायंस कॉलेज के प्रथम दो प्राचार्य अंग्रेज विद्वान थे।

विद्वानों की उपर्युक्त टोली से विश्वविद्यालय का परिसर 1960 ई. तक नई-नवेली दुल्हन के समान सजा-संवरा रहा। इस परिसर का कोना-कोना शिक्षा और ज्ञान के सुगन्ध से सुगन्धित रहा। विश्वविद्यालय की पूर्व उपलब्धियों से करीब 1970 तक का शैक्षणिक माहौल अनुकूल रूप में प्रभावित रहा। 1975 के आसपास कुछ वैसे तत्व परिपक्व-अवस्था में पहुँच गये जिन्होंने पटना विश्वविद्यालय के सुगन्धित वातावरण को दुर्गन्धयुक्त बना दिया। 1970-80 के समाचार-पत्र और पत्रिकाएं हमें इस दुर्गन्ध का आँखों देखा हाल बताती हैं। वेतन और प्रोन्नति को लेकर शिक्षकों के बीच व्याप्त वातावरण ने पढ़ाई-लिखाई पर खराब असर डाला। पढ़ाई-लिखाई से रिश्ते तोड़कर बहुत-से शिक्षकों ने राजनीति से दोस्ती कर लिया। छात्रों और शिक्षकों के बीच दूरी बढ़ती गई। पढ़ने-पढ़ाने में रूचि नहीं लेने वाले शिक्षकों की संख्या बढ़ी। इन्होंने छात्रों के रोष को कम करने के लिए कदाचार और पैरवी को प्रोत्साहित किया।

नौकरी में आरक्षण के प्रश्न पर शिक्षकों के बीच जात-पात की भावना फैली। असामाजिक तत्वों में वृद्धि होने लगी। छात्र समुदाय भी अपनी जाति के शिक्षक को विशेष रूप में अपना मानने लगा। ये सारे दृश्य पटना विश्वविद्यालय के अधिकांश शिक्षक मूकदर्शक की भाँति देखते रहे। “जौ पिसाया और घुन भी”।

उपरोक्त माहौल से विश्वविद्यालय के अधिकारीगण और कर्मचारी लोग भी प्रभावित हुए। अनगिनत गैर कानूनी कार्य हुए। विश्वविद्यालय में अवैध नियुक्तियाँ ढेर मात्रा में हुई। वित्तीय स्थिति खराब होने लगी। सरकार देखती रही। अधिकांश कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा परीक्षा में कदाचार—इन सभी तत्वों ने मिलकर पटना विश्वविद्यालय की गौरवशाली गाथा को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। छात्रों को शिक्षकों से अब कोई डर-भय नहीं रहता। कई छात्रावासों में दादा किस्म के लड़के अब छात्रों से किराया वसूलते हैं। कई कमरे मदिरालय बना दिए गये। भयंकर से भयंकर असामाजिक तत्वों को छात्रावासों में शरण मिले। दादा किस्म के छात्र अब परीक्षा में सम्मिलित नहीं होते। उनकी उत्तर-पुस्तिकाएँ बाहर चली जातीं और लिखकर परीक्षा हॉल में जमा कर दी जातीं। कई शिक्षक तो इसी बात से खुश हो जाते और संतुष्ट रहते कि “दादा” लोग उत्तर पुस्तिका उनके पास पुनः जमा कर देते।

15-16 अप्रैल, 1993 को तत्कालीन कुलपति ने पटना कॉलेज में हो रही परीक्षा में कदाचार को रोकना चाहा तो पुलिस और शिक्षकों की उपस्थिति में उन पर जानलेवा हमले हुए। शिक्षक असहाय थे। तत्कालीन कुलपति के इस क्रांतिकारी कदम का व्यवस्था पर कोई खास असर नहीं पड़ा किंतु एक बात अतिमहत्वपूर्ण रूप में यह देखने को आयी कि छात्रों द्वारा कदाचार मुक्त परीक्षा के पक्ष में आवाज उठायी जाने लगी। 1994 में जब परीक्षाएँ हुईं तो कमिश्नर कुलपतियों से छात्र डरे रहे और कदाचार के प्रति छात्रों का डर बना रहा।

1995 में उच्च न्यायालय ने कदाचार को गैरकानूनी और दंडनीय अपराध बनाया। अनुभवी कुलपति को प्रेम, करूणा और सहृदयता के सहारे छात्रों और शिक्षकों को सम्मोहित करने में ऐसी सफलता मिली जिसकी कल्पना नहीं थी। छात्रों और शिक्षकों के बीच मधुर संबंध पर जोर दिया जाता है। नियमित क्लास और क्लास में नियमित उपस्थिति को गम्भीरतापूर्वक लिया गया है। विश्वविद्यालय कार्यालय में सुचारू ढंग से कार्य करने के प्रयास जारी हैं। भ्रष्ट अधिकारियों, विभाग एवं प्राचार्यों पर साहसिक जाँच-पड़ताल एवं दंडित करने की बात देखी जाने लगी है। शिक्षकों को नियमित वेतन मिले, परीक्षा विभाग में रूपये-पैसे का दुरूपयोग घटे, जात-पात के आधार पर परीक्षक नियुक्त नहीं किये जांय, परीक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा अपना-पराया नहीं करने आदि पर कुलपति द्वारा कड़ी नजर रखी जाने लगी है। योग्य और विद्वान शिक्षकों को विशेष आदर और सम्मान मिल सकें—कुलपति इसमें भी गहरी रूचि रखते हैं। छात्रों की सारी समस्याएँ अभी तक नहीं सुलझायी जा सकी है। शिक्षकों के प्रोन्नति, वेतन और तृतीय तथा चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों की आर्थिक दशा ठीक करना अभी शेष है। इसके बावजूद इस निष्कर्ष पर निसंकोच पहुँचा जा सकता है कि काफी वर्षों पश्चात् पटना विश्वविद्यालय को एक ऐसा कुलपति मिला है जिसकी प्रशंसा फुस्ताव की प्रांतीय सम्मेलन (अगस्त 11, 1996) में अधिकांश वरिष्ठ शिक्षकों ने की। इतना प्रयत्न करने के बावजूद वर्तमान कुलपति विकास की एक छोटी दूरी तक ही पहुँच पाए हैं। उन्हें अभी बहुत कुछ करना शेष है तभी विश्वविद्यालय की पुरानी गरिमा वे पुर्नस्थापित कर पाएंगे। इसके लिए छात्रों, शिक्षकों और विश्वविद्यालय के अधिकारियों से सच्चा सहयोग मिलना आवश्यक है। कुलाधिपति की सहानुभूति और सरकार से उचित आर्थिक सहायता भी मिलनी चाहिए।

लेखक- डा. ओम् प्रकाश प्रसाद
रीडर, इतिहास विभाग
पटना विश्वविद्यालय, पटना