पाठकों तक कैसे पहुँचे किताब
एक तरफ इलेक्ट्रॉनिक सूचना माध्यम किताब को परे धकेल रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकारी खरीद और नौकरशाह तंत्र ने प्रकाशकों को वह रास्ता दिखा दिया है जो पुस्तकों को सीधे ‘काल कोठरियों’ तक पहुँचा देता है। प्रकाशक को लागत के साथ मुनाफा भी मिल जाता है और बिचौलिया बने तंत्र को कमीशन भी। परंतु इस छोटे रास्ते में वह चौराहा नहीं पड़ता जहाँ पाठक खड़ा होता है। कुल मिलाकर हिंदी प्रकाशन जगत को दीमक की तरह अंदर ही अंदर खोखला कर देने के लिए खुद प्रकाशकों को ही जिम्मेदार माना जा रहा है।
लेखक के लिए अलग दुविधा है। अच्छे और गंभीर साहित्य की जगह प्रकाशकों की रूचि लोकप्रिय किस्म का साहित्य छापने में ज्यादा होने लगी है। कमीशन लेने वाला जब पुस्तकों की पसंद-नापसंद करने की स्थिति में नहीं रहा तो प्रकाशक को ‘कुछ भी’ छापने की छूट मिल गई। कैसी-कैसी पुस्तकें पुस्तकालयों तक पहुँचाई जा रही हैं, यह खोज का विषय हो सकता है।
पुस्तकों के एक संस्करण की प्रतियाँ कम हो गई और लेखक की रायल्टी सिकुड़ गई। नई टेक्नोलॉजी ने प्रकाशक को यह सुविधा मुहैया करा दी है कि वह जब चाहे, थोड़े से अतिरिक्त खर्चे में, संभाल कर रखे गए निगेटिव आदि से पुस्तक छाप ले। पर इससे लेखक की रायल्टी डकारने का एक और दरवाजा खुल गया है। अब प्रकाशक जब चाहेगा किसी पुस्तक की पाँच सौ या हजार प्रतियाँ चुपके से छाप लेगा। यह बात भले ही सब प्रकाशकों पर लागू नहीं होती हो, पर कागज के दाम और डाक खर्च बढ़ने से संकट में घिरा महसूस कर रहे प्रकाशकों ने लेखक की रायल्टी हड़पने के नए-नए तरीके इजाद किए हैं।
आज हिंदी का लेखक आम तौर पर अपनी पुस्तक की रायल्टी से पांडुलिपि तैयार करने का खर्चा भी बमुश्किल वसूल कर पाता है। राधाकृष्ण प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी भले ही सुरेंद्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ के तीन साल में तीन संस्करण बिक जाने और चौथे की तैयारी से खुश हों, राजकमल प्रकाशन की शीला संधू भी जावेद अख्तर की ‘तरकश’ को बंबई में मिली एक हजार की बिक्री की शुरुआती सफलता से उत्साहित हों, पर यह सत्य है कि हिंदी में पुस्तकों की बिक्री के रिकॉर्ड पहले की तरह अब नहीं टूटते। बच्चन जी की आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूँ’ और उग्र जी की ‘चाकलेट’ और ‘चंद हसीनों के खतूत’ के कुछ ही हफ्तों में कई संस्करण बिक जाने के रिकॉर्ड इस सिलसिले में याद किए जा सकते हैं। आज जहाँ दूसरी भारतीय भाषाओं का पुस्तक परिदृश्य समृद्ध हो रहा है, वहीं हिंदी में वर्ष भर में छपने वाली पुस्तकों की संख्या भी निरंतर कम होती जा रही है। यह तब है जबकि हिंदी में अन्य भारतीय भाषाओं के अनुवाद और सामाजिक-वैज्ञानिक आदि साहित्येतर विषयों की पुस्तकों के प्रकाशन की नई संभावनाएँ बनी हैं। तब फिर हिंदी जगत विपन्न क्यों हो रहा है? हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। आबादी के साथ साक्षरता भी बढ़ी है, किंतु उसके पाठक नहीं बढ़े। जिस भाषा को बोलचाल या कामकाज की भाषा बनाने में ही पांच प्रतिशत या उसके भी कम लोगों की चिंताएं आड़े आ रही हों, उससे साहित्य और उस भाषा में लिखी गई पुस्तकों की उपेक्षा सहज ही समझ में आ सकती है।
हिंदी की लोकप्रियता भी आज कहीं ज्यादा है। विदेशों में सौ से ज्यादा विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। कई देशों में हिंदी की अनेक विधाओं में मौलिक साहित्य की रचना हो रही है। हिंदी और आधुनिक भारतीय साहित्य को जर्मन भाषा में परिचित कराने वाले डा. लोठार लुत्से जैसे लोग ही यह कह सकते हैं कि ‘जो साहित्य भारत में अंग्रेजी में लिखा जाता है वह सिर्फ आंशिक रूप से भारतीय है। मुख्यधारा भारतीय साहित्य मूल भारतीय भाषाओं में ही लिखा जा सकता है और लिखा जा रहा है।’ अन्यथा अपने देश के ‘चार अक्षर’ अंग्रेजी पढ़ गए हिंदीभाषी तो हिंदी पढ़ने और समझने में लाचारी का प्रदर्शन करने लगते हैं।
यह विडंबना ही है कि जो सिर्फ हिंदी पढ़ सकता है, वह पुस्तकें पढ़ना नहीं चाहता या उसे पुस्तकों की ओर आकर्षित करने का कोई उपाय नहीं किया जा रहा है और जो तथाकथित पढ़ा-लिखा वर्ग है वह अपने साहित्य, संस्कृति, इतिहास और समाज को अंग्रेजी के चश्मे से समझना और पहचानना चाहता है।
हिंदी प्रकाशन जगत की इस जटिल और विडंबनात्मक स्थिति के संदर्भ में कुछ प्रमुख प्रकाशकों के सामने कुछ सवाल रखे गए।
पहला प्रश्न था: कहा जाता है कि सरकारी यानी थोक खरीद और नौकरशाही ने प्रकाशन की दुनिया को भ्रष्ट कर दिया। पाठकों की चिंता नहीं की जाती। क्या आपको पाठकों तक सीधी पहुँच बनाने पर विचार नहीं करना चाहिए? उसके जवाब में हिंद पाकेट बुक्स के दीनानाथ मल्होत्रा कहते हैं: बात तो ठीक है। सरकारी खरीद के कारण, भ्रष्टाचार के कारण हिंदी का नुकसान हुआ है। कुछेक प्रकाशकों ने पैसे देकर पुस्तकें बेचने का धंधा बना लिया है, जो गलत है।
सरकारी विभाग में पच्चीस प्रतिशत देना है। पच्चीस प्रतिशत और उससे भी ज्यादा अधिकारियों को दे देते हैं। बाहर से कई बड़े उजले चेहरे हैं, अंदर से काले हैं। इससे पुस्तक व्यवसाय का नुकसान हुआ है। पुस्तकें डंप हो जाती हैं।
राजकमल प्रकाशन की शीला संधू कहती हैं: हर गरीब देश में सरकार का फर्ज है कि प्रकाशन व्यवसाय की सहायता करे। खरीद कर नहीं। लाइब्रेरी सिस्टम ठीक हो। जैसे इंग्लैंड में बहुत ही व्यवस्थित लाइब्रेरी सिस्टम है।
‘दूकान नहीं होगी तो किताब नहीं बिकेगी।’ कहकर वे पूर्व सोवियत संघ का हवाला देती हैं और बताती हैं कि वहाँ पोस्ट आफिस के साथ किताबों की दुकानें होती थीं। जहाँ तक नौकरशाही का सवाल है, सौदेबाजी तो चलती है। नौकरशाहों ने ही तबाह नहीं किया (प्रकाशन व्यवसाय को) सब तबाह करने में लगे हैं।
राधाकृष्ण प्रकाशन के निदेशक अशोक माहेश्वरी जो राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक भी हैं, कहते हैं: हम लोग पाठकों तक सीधा पहुँच बनाने का प्रयास कर रहे हैं। अपने स्तर पर पुस्तक प्रदर्शनियाँ लगाने की कोशिश कर रहे हैं। राँची और गया में हमें सफलता भी मिली। राजकमल के पेपरबैक और राधाकृष्ण के किफायती संस्करण सस्ते दामों पर पुस्तकें उपलब्ध कराने की दिशा में ही प्रयासरत है। हमने राधाकृष्ण में किफायती संस्करण की योजना शुरू की थी। वह रुक गई थी। लेकिन इधर नए सिरे से शुरू की है। पुस्तक मेले में हमारी पुस्तकें नई सज्जा के साथ दिखाई देंगी। किफायती संस्करण में कीमतें कम कर दी हैं। पाठकों से सीधे जुड़ाव के लिए ही ऐसा किया गया।
वाणी प्रकाशन के अरूण माहेश्वरी बताते हैं कि वे पाठकों तक सीधी पहुँच के लिए कई योजनाओं को आकर्षक बनाते हुए पेश करने जा रहे हैं। सरकारी खरीद को वे स्वस्थ परंपरा नहीं मानते। कहते हैं-इससे ‘इंडिविजुअल बायर’ (पाठक) पर भी असर पड़ेगा। सरकारी खरीद नहीं हो तो (पुस्तकों की) कीमतें कम होंगी। उन्हें शिकायत है कि योजनाबद्ध काम करने की पद्धति बहुत से प्रकाशकों के पास नहीं है।
किताबघर के सत्यव्रत शर्मा कहते हैं: पाठकों तक पहुँच बनाने पर बिल्कुल सोचना चाहिए। पेपरबैक ही एक तरीका है। वह हम भी अपना रहे हैं। दूर-दराज के लोगों को पता ही नहीं चलता कि कौन-सी पुस्तक आई। पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए। अखबारों में साल में पुस्तकों की सूची आती है। वह तीन महीने में आनी चाहिए। पाठक उतने नहीं हैं कि उन पर निर्भर किया जा सके। इसलिए सरकारी खरीद को नकारा नहीं जा सकता। पाठकों के बारे में सोचना जरूरी है। पर सरकारी खरीद से पैसा इकट्ठा करके ही नई पुस्तकें भी छाप पाते हैं।
प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार बताते हैं: पाठकों को अधिकतम छूट देते हैं तब भी कम लोग किताब खरीदने आते हैं। यों भी हम दूर चावड़ी बाजार में बैठे हैं। पाठक यहाँ तक नहीं आता। हिंदी में पाठक कम हैं।
सारांश प्रकाशन के मोहन गुप्त कहते हैं: इस थोक खरीद ने प्रकाशन व्यवसाय का भारी नुकसान किया है। इससे गुणवत्ता में कमी आई है। प्रकाशक किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं रहा, तो कुछ भी छाप देता है। प्रकाशन व्यवसाय को स्वस्थ रूप में चलाने के लिए थोक खरीद को बंद किया जाना ठीक है। थोक खरीद चल रही है तो हम भी हिस्सा लेते हैं। लेकिन व्यक्तिगत रूप से मेरा मतभेद है। पर विरोध करते हुए भी मैं इसका बहिष्कार नहीं कर रहा।
प्रकाशन संस्थान के हरिश्चंद्र शर्मा पांच वर्ष तक अखिल भारतीय हिंदी प्रकाशक संघ में रह चुके हैं। उनका मानना है कि ‘थोक खरीद से प्रकाशकों का कम, लेखकों और पाठकों का नुकसान ज्यादा हो रहा है। नौकरशाह लेखक या दिल्ली में बैठा लेखक तो फिर भी पुस्तक छपवाने का जुगाड़ कर लेता है। दिक्कत दूर-दराज बैठे लेखक की है।’ पाठक तक पहुँच बनाने का क्या रास्ता है? जवाब में शर्मा कहते हैं: पैसे को विकेंद्रीकृत करके सीधे संस्थाओं को दिया जाता तो ठीक रहता। उन्हें अनुदान मिलता। संकट कुंजी या गाइड बेचने वालों का नहीं है। संकट तो अच्छा साहित्य बेचने वालों का है। तो दूसरा तरीका है, समाजसेवी संगठन इस काम में आगे आएं।
सीधे केंद्रीय खरीद करके पुस्तकें जिला पुस्तकालयों को जाती हैं, यह बताते हुए शर्मा कहते हैं: सरकारी पैसे से जिला लाइब्रेरी में पुस्तकें आई तो यह जिले में बैठे लोगों का फर्ज भी है कि देखें वहाँ कौन-सी किताबें आई। सूची बना कर उसे सार्वजनिक करें। इससे कुछ तो दबाव बनेगा।
इस दौरान प्रकाशकों ने पुस्तकों के संस्करण छोटे कर दिए हैं। पहले दो हजार पुस्तकें छपती थीं; फिर वह संख्या ग्यारह सौ पर आ गई और अब छह सौ और पाँच सौ पुस्तकें छपती जा रही हैं। इसका कारण पूछने पर शीला संधू कहती हैं: ‘नई टेक्नोलॉजी आ जाने से हमें एक साथ दो हजार पुस्तकें छापने की जरूरत नहीं है। सब कुछ तैयार होता है। कभी भी छाप लो। छोटा प्रिंट आर्डर होने का मतलब यह नहीं है कि पुस्तकें उतनी ही छपती हैं। पैसा न रुके इसलिए कम प्रिंट आर्डर रखते हैं। हजार से कम तो आम तौर पर हम नहीं छापते। नई टेक्नोलॉजी से लाभ ही हुआ है। जितनी जरूरत है, उसी हिसाब से छाप सकते हैं।’
सत्यव्रत शर्मा का कहना है कि पांच या छह सौ किताबें ही छपने का कारण थोक खरीद ही है। सरकारी खरीद में नई किताब मांगी जाती है। प्रकाशक सोचता है जितनी लागत लगाई, वह निकल जाए। एक या दो हजार का स्टाक रखें तो वह पूँजी रुक जाती है। एक किताब दो से पाँच साल में खत्म होती है। फिर एक साल में 20 पुस्तकें छापीं तो जो दो-तीन अच्छी हैं उन्हें दोबारा छाप लेते हैं। फिर अंग्रेजी वाले तो बहुत कम छापते हैं।
प्रभात कुमार की राय में दो हजार पुस्तकें छापने में कागज पर ज्यादा पूँजी लग जाती है। कागज के दाम बढ़ गए, पुस्तकालयों के बजट नहीं बढ़े।
मोहन गुप्त के मुताबिक, संख्या कम कर दिए जाने का कारण पुस्तकें कम बिकने के अलावा नई मुद्रण प्रौद्योगिकी भी है। कागज की कीमत कुल कीमत का दो तिहाई होती है। अब रीप्रिंट करने का कोई झंझट नहीं रहा, तो जब चाहा और छाप लिया। जो पैसा गोदामों में ब्लाक होता था उससे बच गए।’
मोहन गुप्त विस्तार से बताते हैं: ‘किताब के भविष्य के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकते। छोटा प्रिंट आर्डर रखने से फायदा यह है कि न बिकने वाली किताब को ज्यादा नहीं छापते और बिकने वाली को फिर छाप लिया। 1947 से पहले दो हजार ही छपती थीं। उस समय के परिदृश्य को देखें तो शिक्षा का प्रसार नहीं था, सबसे ज्यादा पिछड़ा क्षेत्र हिंदी भाषी क्षेत्र रहा, पुस्तकालय भी नहीं थे। फिर भी दो हजार प्रतियां बिकती थीं। अब पाँच सौ प्रतियों का संस्करण भी बिना पुस्तकालयों की मदद से नहीं बेच सकते। सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि प्रकाशक पुस्तकालयों पर निर्भर करने लगा। पुस्तक विक्रेता ने ज्यादा से ज्यादा कमीशन की मांग कर दी। ऐसे भी प्रकाशक हैं जो 50-60 प्रतिशत कमीशन दे देते हैं। लेकिन फिर पुस्तक पसंद करने की छूट नहीं रहती। इससे कोई किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं रहा। बजट खर्च करना है, किताबें कैसी आती हैं इससे कोई लेना-देना नहीं।
अरुण माहेश्वरी के मुताबिक ऐसा कोई नियम नहीं है कि छह सौ छपनी हैं। किताब की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। अभी हम, ज्यादातर मामलों में छह सौ पर नहीं आए। कुछेक छापी भी हैं। जैसे, ‘राजेंद्र माथुर संचयन’ पांच सौ छापी। हम उसे पेपर बैक में लाना चाहते थे, पर दुर्भाग्य से विवाद हो गया। हमने तो बाजार को देखना है कि किस किताब की बिक्री कितनी होगी। जैसे, तस्लीमा नसरीन की किताब है और एक शोधात्मक ग्रंथ है, तो शोध ग्रंथ कम बिकेगा।’
क्या कम छापने का कारण नई टेक्नोलॉजी है? इस पर अशोक माहेश्वरी कहते हैं: ‘यह एक बहुत बड़ी वजह तो है ही। लेकिन दूसरी बड़ी वजह उद्योग में पूँजी की कमी है। हमें सैद्धांतिक रूप से छोटे उद्योग की मान्यता तो मिल गई है, लेकिन कोई बैंक या वित्तीय संस्थान प्रकाशन को उद्योग नहीं मानता। हमारे स्टॉक को वे रद्दी मानते हैं। खाली कागज पर लोन मिल जाएगा, लेकिन छपे हुए कागज पर नहीं।’
हरिश्चंद्र शर्मा कहते हैं कि प्रकाशक अब उतना ही जोखिम लेना चाहता है जितना एक-डेढ़ साल में बिक जाए। वैसे भी नई प्रौद्योगिकी से प्रोडक्शन की लागत बढ़ गई है।
नई प्रौद्योगिकी के कारण अब प्रकाशक के लिए चुपके से (बिना लेखक को बताए) पाँच-छह सौ प्रतियाँ फिर छाप लेना और रायल्टी मार जाना आसान नहीं हो गया है? इस प्रश्न के उत्तर में शर्मा कहते हैं: ‘लेखक और प्रकाशक का रिश्ता सिर्फ अनुबंध पर कभी नहीं रहा। यों तो पहले भी दो हजार बता कर पांच हजार छापने वाले रहे हैं। बाकी, लेखक की रायल्टी का कुछ हिस्सा इतनी बड़ी रकम नहीं है कि प्रकाशक ऐसा करे। कुछ ऐसे हो सकते हैं।’
लेखकों को कभी 20 प्रतिशत रायल्टी मिलती थी, फिर 15 प्रतिशत या 12.5 प्रतिशत हुई। अब वह घट कर 10 प्रतिशत हो गई है। लेखक की रायल्टी का प्रतिशत घटने के बारे में पूछे जाने पर ज्यादातर प्रकाशकों ने दूसरे देशों से तुलना करते हुए कहा कि कहीं भी 10 प्रतिशत से ज्यादा रायल्टी नहीं मिलती। यह पूछने पर कि रायल्टी भी कम कर दी और किताबें भी कम छापते हैं, तो लेखक को क्या मिला, शीला संधू कहती हैं: ‘हम कम रायल्टी देते हैं और किताब भी कम छापते हैं तो गलत है। दूसरे देशों में भी कम मिलती है (वे पेंग्विन बुक्स का जिक्र करती हैं), लेकिन वे ज्यादा छापते हैं।
अरुण माहेश्वरी रायल्टी घटाने की बात स्वीकार नहीं करते और हंसते हुए कहते हैं-कोई दस प्रतिशत लेता ही नहीं, हम तो देने को तैयार हैं।
हरिश्चंद्र शर्मा के मुताबिक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देख लें तो रायल्टी कहीं भी 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। जो लेखक दबाव बनाने (प्रकाशक पर) की स्थिति में था तो वह 20 प्रतिशत भी ले लेता था।
मोहन गुप्त कहते हैं: अगर देखा जाए तो रायल्टी दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। प्रकाशक पुस्तक के प्रचार-प्रसार के मद में पैसा खर्च नहीं करना चाहता। कोई समीक्षा के लिए पुस्तकें तक नहीं भेजना चाहता (हालांकि किसी की समीक्षा ही नहीं निकलती)। तो ईमानदारी से रायल्टी देनी है और प्रचार-प्रसार पर भी खर्च करना है तो दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। मैं 12.5 या कुछ मामलों में दस प्रतिशत दे रहा हूँ।’
अशोक माहेश्वरी ने कहा, ‘जैसे-जैसे बाजार व्यवस्था हावी होगी, लेखक का प्रतिशत कम होता जाएगा। विदेशों में तो रायल्टी दो प्रतिशत से शुरू होती है। वहाँ तो नया चलन शुरू हो गया। रायल्टी छपे मूल्य पर न देकर, जो राशि प्रकाशक को कमीशन काटकर प्राप्त होती है, उस पर दी जाती है।’
अशोक माहेश्वरी ने माना कि प्रकाशकों के बारे में रायल्टी देने में बेईमानी की शिकायत एक हद तक सही भी है। यह बुराई दूर होनी चाहिए। इसके लिए हिसाब रखने के तरीकों में सुधार करना होगा। यह सिस्टम सिर्फ चार-पांच प्रकाशकों का ही ठीक है।
पाठकों की शिकायत प्राय: यही रहती है कि पुस्तकों के दाम काफी रखे जाते हैं दूसरी भारतीय भाषाओं में पुस्तकों के दाम कम हैं। लेकिन हिंदी में छह गुना तक दाम रखा जाता है। ऐसा क्यों? इस प्रश्न के उत्तर में दीनानाथ मल्होत्रा धाराप्रवाह बोलने लगते हैं। ‘हिंदी में हालत खराब है। दाम बहुत ज्यादा हैं। बांग्ला में ऐसा नहीं है। हिंदी में कुछेक नए प्रकाशक ऐसे उभरे हैं कि उनका ध्यान पाठकों की तरफ नहीं है। सबसे बड़ा नुकसान कागजों के दाम बढ़ने से हुआ है। नई दिल्ली में कागज न्यूयॉर्क और लंदन से महंगा है। अब, उदारीकरण में तो कहते हैं, कोई मूल्य नियंत्रण नहीं होगा। पेपर मिलों की बैलेंस शीट देखी जाए तो घनघोर मुनाफा है। मिल वाले नेताओं को घूस देते हैं।’
हमारा सांस्कृतिक विकास पुस्तकों पर निर्भर है। लेकिन पहले 1970-75 तक हर साल 22 हजार पुस्तकें छपती थीं। अब 20 वर्ष में इस अधोगति तक पहुँच गए कि वर्ष में 12-13 हजार छपती हैं। विश्व में पुस्तक प्रकाशन में सातवां स्थान था, वह अब बारहवां या तेरहवां रह गया। सरकार का फर्ज है कि पुस्तकों के लिए कागज सस्ता हो। अब उदारीकरण में कागज के आयात की छूट होनी चाहिए।’
‘बस दाम खूब रख दिया जाता है। कोई पाठक खरीद ही नहीं सकता। इससे देश के सांस्कृतिक विकास में बाधा पड़ती है। गांवों में लाखों ग्रेजुएट हैं। पढ़ना चाहते हैं। पुस्तकें लेना चाहते हैं। लेकिन डाक खर्च इतने ज्यादा हैं कि पुस्तक मंगा नहीं सकते। सरकार कहती है, ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन गांवों तक पुस्तकें पहुँचाने के लिए पोस्टल रेट तो कम नहीं किए। कोकाकोला और चाकलेट गाँव-गाँव तक पहुँच गया, पुस्तक नहीं पहुँच पा रही।’
हरिश्चंद्र शर्मा कहते हैं: दूसरी भारतीय भाषाओं में दाम कम इसलिए है कि वे लोग पाठकों को ध्यान में रखते हैं। वे लोग अपने सिद्धांतों पर कायम हैं। पाठक के प्रति प्रतिबद्ध हैं। दूसरा, अन्य भाषाओं का प्रोडक्शन उतना अच्छा नहीं होता। यह जो प्रकाशकों की दूसरी पीढ़ी आई है, व्यवसाय के प्रति इसकी सोच अलग है। वे इस व्यवसाय को भी ऐसा समझते हैं जैसे कैसेट का या दूसरा धंधा है।
सत्यव्रत शर्मा पुस्तकों के दाम बढ़ने का कारण कमीशन की होड़ और थोक खरीद को मानते हैं। कहते हैं, सब खर्चे शामिल करते हैं, इसलिए दाम बढ़ जाते हैं। दूसरी भारतीय भाषाओं में प्रोडक्शन उतना अच्छा नहीं होता, हिंदी की तरह। वहाँ विषय-वस्तु को प्राथमिकता दी जाती है। हिंदी में बाहर का आकर्षण देखा जा रहा है। वे पुस्तक विक्रेता को कमीशन भी कम देते हैं। यहाँ 40 प्रतिशत चल रहा है। वहाँ पाठक ज्यादा हैं और ‘टाइटल’ कम। वहाँ लेखक बहुत हैं। वहाँ दो हजार से कम पुस्तकें नहीं छापते।
शीला संधू कहती हैं: दूसरी भाषाओं में डिस्काउंट ज्यादा नहीं मांगते। नगद भी लेते हैं। इसके लिए प्रकाशक ही जिम्मेदार हैं। कागज के दाम ने ज्यादा तबाही की है। पेंग्विन वाले एक किताब के दाम 180 रुपए रखते हैं, तो हम तो दो सौ रख ही नहीं सकते। चाहे उन्होंने भी वही कागज लगाया है। अंग्रेजी की मार्केट में प्राइस रेजिस्टेंस नहीं है।
इतना कहने के बाद वे उल्टा प्रश्न करती हैं: स्वैटर या कमीज महंगी हो गई, हम नहीं लेंगे, यह कोई नहीं कहता। किताबों के लिए रोना होता है-बड़ी महंगी है जी।
हिंदी में पुस्तकों के मूल्य ज्यादा होने के संदर्भ में अशोक माहेश्वरी कहते हैं: मैं नहीं मानता। राजकमल और राधाकृष्ण के पेपर बैक के दाम मलयालम और मराठी से कम हैं। हार्डबाउंड में ज्यादा हैं तो अंग्रेजी से तुलना कर सकते हैं। छपाई में तो हमारी हिंदी की पुस्तकें भी बेहतर हैं। अन्य भारतीय भाषाओं की छपाई बेहतर नहीं है। किताबें पुराने ढर्रे पर छपती हैं। वहाँ कमीशन अधिकतम 25 प्रतिशत है और हमारे यहाँ 40 प्रतिशत। हाँ, सरकारी संस्थानों की कीमतें कम होती हैं। वे सिर्फ किताब की लागत जोड़ते हैं। हमें तो सारे खर्चे ही किताब से लेने हैं।
मोहन गुप्त कहते हैं: 40 प्रतिशत पुस्तक विक्रेता को गया, 10 प्रतिशत आर्डर लेने में, छह प्रतिशत पैकिंग-फारवर्डिंग में। आपको मिला 44 प्रतिशत। उसमें लागत भी है। आज की स्थिति में तीस प्रतिशत लागत में चला जाता है। नतीजतन प्रकाशक किताबों की कीमतें बढ़ा देते हैं।
अपने यहाँ पुस्तक संस्कृति क्यों नहीं विकसित हो पाई? इस प्रश्न पर मोहन गुप्त का कहना है कि यह मूल सवाल है। पुस्तक संस्कृति अपने यहाँ कभी विकसित नहीं हो पाई। अंग्रेजों ने सबसे पहले बंदरगाह शहरों में अड्डे बनाए, वहाँ अपना कार्य स्थल बनाया। आधुनिक शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी वहीं किया। इससे हिंदी भाषी प्रदेश अछूते रह गए। आजादी के दौर में थोड़ा सा पढ़ने-लिखने की संस्कृति बनी। फिर भारत विभाजन के बाद शरणार्थी आए। वे अपने साथ जिस संस्कृति को लाए उसमें पुस्तक की जगह ही नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि आजादी के बाद शिक्षा का प्रसार तो हुआ, लेकिन जो संस्कृति प्रदूषित हो गई थी, वह ठीक नहीं हो पाई। चटखोरेदार मनोरंजन उसी संस्कृति का नतीजा है। तो अच्छा साहित्य कैसे बिकेगा?
शीला संधू कहती हैं: बंगाली लोग शादी या जन्मदिन पर पुस्तकें भेंट करते हैं। हमारे यहाँ ऐसा नहीं है। यह हिंदी का दुर्भाग्य है। पुस्तक-संस्कृति विकसित करने की पहल प्रकाशक नहीं कर सकता। प्रभात कुमार कहते हैं: हम किसी समारोह में किताब भेंट कर दें तो लोग कहते हैं, किताब दे दी। कोई अच्छी चीज देते तो काम आती। मीडिया को इस दिशा में कुछ करना चाहिए। आपकी भी जिम्मेदारी है। हम तो पुस्तकें छाप कर दायित्व पूरा कर रहे हैं।
पुस्तक मेलों के संदर्भ में ज्यादातर प्रकाशकों का मानना था कि पटना के पुस्तक मेले में खूब किताबें बिकती हैं। सत्यव्रत शर्मा कहते हैं कि लोग हवाई चप्पल पहने, कंधे में अंगोछा टांगे फटी कमीज में आते हैं, लेकिन पुस्तकें सैकड़ों रुपए की ले जाते हैं। प्रकाशकों का मानना था कि कलकत्ता में भले ही पहले स्थान पर बांग्ला और दूसरे स्थान पर अंग्रेजी पुस्तकों की बिक्री होती है, पर हिंदी की बिक्री का तीसरा स्थान होते हुए भी काफी पुस्तकें बिकती हैं। लेकिन हिंदी में सबसे ज्यादा पाठक बिहार में ही बताए जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले के संदर्भ में शीला संधू कहती हैं: पुस्तक मेला हमें भारी पाठक देता है। पिछले विश्व पुस्तक मेले में हमारी बिक्री इतनी हुई कि हमें आश्चर्य हुआ। प्रभात कुमार कहते हैं: विश्व पुस्तक मेला गलत समय पर लगता है। चूंकि हम लोग सरकारी खरीद पर निर्भर करते हैं और खरीद का समय यही होता है (मार्च तक)। पुस्तक मेले में भाग लेने का उद्देश्य बिक्री नहीं होता। पुस्तकों का प्रदर्शन ही उद्देश्य होता है। हरिश्चंद्र शर्मा कहते हैं कि पढ़ने की रूचि का विकास करने के लिए पुस्तक मेला अच्छी प्रथा है। दीनानाथ मल्होत्रा कहते हैं: पुस्तक मेला वर्ष में दो बार लगना चाहिए। हर शहर में लगना चाहिए। स्टाल वगैरह का किराया कम करना चाहिए। कोई छोटा प्रकाशक कैसे भाग लेगा?



