4th - 15th December 2026
Gandhi Maidan, Patna

हिंदी

किताबें सस्ती कैसे होंगी

इस वर्ष की शुरूआत से ही कागज के मूल्य में जो अनाप-शनाप वृद्धि का सिलसिला शुरू हुआ है, उससे अब स्थिति यह आ गई है कि पुस्तकों के मूल्य भी उसी अनुपात में बढ़ जाएंगे। हिंदी पाठक तो पहले से ही ‘पुस्तकें महंगी’ हैं का रोना रोते आ रहे हैं, उस पर कागज की मूल्य वृद्धि की मार से सारा प्रकाशन जगत भौंचक है कि आखिर पाठकों को सस्ती पुस्तकें कैसे मुहैया करें? यही हालत अखबारी कागज की भी है, जिससे पूरा समाचार पत्र जगत त्रस्त है।

पाठ्य पुस्तकें छापने वाले प्रकाशकों के सामने सबसे बड़ी समस्या तो यह खड़ी हो गई है कि वे विद्यार्थियों के लिए कम कीमत पर पाठ्य पुस्तकें कैसे प्रकाशित करें। कागजों के मूल्य में वृद्धि से अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के ‘सबके लिए शिक्षा’ के साक्षरता अभियान को ही धक्का लगने वाला है, यह तय है। जवाहरलाल नेहरू ने अपने शासनकाल में पुस्तकों पर लगने वाले कागज का दाम अधिक नहीं बढ़ने दिया। उस समय कागज का मूल्य केवल 1.50 रु. प्रति किलो था।

एक नजर कागज के बढ़ते मूल्यों पर। 1977 में जनता पार्टी के शासन काल में कागज का मूल्य 2.70 रुपए प्रति किलो था, लेकिन अब यह बढ़ते-बढ़ते आज की तारीख में 35 से 40 रुपए प्रति किलो तक हो गया है, अर्थात् लगभग 13 गुना बढ़ोत्तरी। पुस्तकों के मूल्य में बढ़ोत्तरी के मुख्य कारण तो ये हैं ही। इसके अतिरिक्त लगे हाथ उन कारणों की भी विवेचना कर लें, जिसके कारण पुस्तकें सस्ती नहीं हो पातीं। पहला कारण तो यह है कि प्रकाशकों को सामाचार पत्रों की तरह सरकार की ओर से कागज का कोई कोटा मिलना तो दूर, किसी प्रकार की सब्सिडी तक नहीं मिलती, उलटे कागज पर उन्हें विक्रय-कर भी अदा करना पड़ता है। प्रिंटिंग इंक, निगेटिव एवं पुस्तकों की छपाई में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं के मूल्यों में बेतहाशा वृद्धि दूसरा कारण है। तीसरा कारण रेल भाड़ा, डाक दर एवं पुस्तकों को पाठकों तक भेजने में किसी प्रकार की कोई रियायत का न होना। इसी प्रकार चौथा कारण यह गिनाया जा सकता है कि हर प्रकाशक के अपने कर्मचारियों एवं स्टेशनरियों पर आने वाले खर्चे भी शामिल होते हैं। पुस्तक वितरकों या दुकानदारों को चालीस प्रतिशत से अधिक का कमीशन देना होता है। यह कमीशन तो इतना असमान है कि कहीं-कहीं तो 60 प्रतिशत से अधिक का कमीशन देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त अगर सरकारी थोक खरीद हुई तो वहाँ 30 से 40 प्रतिशत अंकित दर पर कमीशन निर्धारित है। साथ ही पुस्तकों का आर्डर देने के एवज में ऊपरी तौर पर संबंधित व्यक्तियों को जो रकम दी जाती है, वह अलग।

अगर इन कारणों से पुस्तकों का मूल्य पाँच-छह गुना अधिक रखा जाता है, तो इसके लिए सिर्फ प्रकाशक ही दोषी नहीं बल्कि ऊपर वर्णित सारे तत्वों की समान भागीदारी होती है। यदि इन कारणों का सही ढंग से हल कर लिया जाए तो कोई वजह नहीं कि जो किताबें 60 रुपए की बिकती हैं, वे आधे से भी कम मूल्य पर मिलनी शुरू हो जाएं।
एक सहज ही सवाल उठाया जा सकता है कि हिंदी पुस्तकें पहले ही कहाँ सस्ती थीं, जो अब महंगी होने का डर है। तो लगे हाथ हम यहाँ चर्चा कर लें कि सवाल सस्ती और महंगी का नहीं है बल्कि अहम् सवाल है कि किताबें बिकती क्यों नहीं या फिर बहुत कम क्यों बिकती हैं? दरअसल इसके मूल में हमें पाठकों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक स्थितियों पर ध्यान देना होगा, जिसके कारण वह पुस्तकों से दूर होता चला गया।

पुस्तकें अगर महंगी हुई हैं तो यह भी सही है कि आखिर ऐसी कौन-सी वस्तुएं महंगी नहीं हुई हैं, फिर पुस्तकों के महंगा होने का ही रोना क्यों? कुछ ऐसे कारण भी हैं जिनके कारण पाठक ने उन्हें अपनी प्राथमिकताओं से निकाल दिया है। सच तो यह है कि पिछले दो दशकों में सभी वस्तुओं के मूल्य बढ़े हैं तो उसी अनुपात में (कमोबेश) लोगों की आमदनी में भी बढ़ोत्तरी हुई है। आमदनी बढ़ोत्तरी के अनुपात में ही किताबों के मूल्य बढ़े हैं, तो फिर यह बात बिल्कुल ठीक नहीं बैठती कि किताबें महंगी होने के कारण कम बिकती हैं। अगर ऐसा होता तो बिहार में औसत आदमी की आमदनी बहुत कम है लेकिन यहाँ पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें सबसे ज्यादा बिकती हैं। उसी के ठीक उलटे दिल्ली जैसे महानगर जहाँ औसत लोगों की आमदनी अधिक है, किताबें सबसे कम बिकती हैं। अगर किताबों की बिक्री के लिए उनका सस्ता होना एक प्रमुख शर्त है तो सजिल्द की अपेक्षा पेपरबैक्स संस्करण की अच्छी बिक्री होनी चाहिए, लेकिन हकीकत ऐसी नहीं है। राजकमल प्रकाशन ने हिन्दी के उत्कृष्ट साहित्यकारों के पेपरबैक्स संस्करण भी निकाले हैं, जो न केवल सस्ते हैं बल्कि उत्कृष्ट भी हैं लेकिन व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद इन पुस्तकों की बिक्री उत्साहवर्द्धक नहीं है।

इस प्रकार बिहार और राजकमल पेपरबैक्स के उदाहरण से साफ है कि किताबों की कम बिक्री का प्रमुख कारण उनका महंगा होना नहीं है, बल्कि उपभोक्तावादी जीवन शैली में किताबों के लिए कोई जगह न होना है। एक जनसामान्य का काफी समय तो टीवी खा जाता है वही वह घोर उपभोक्तावादी संस्कृति में फंसकर पुस्तकों की दुनिया से दूर होता चला जाता है।
एक समय था जब पुस्तकें सिर्फ व्यक्तिगत पाठक ही खरीदकर पढ़ा करते थे, उस समय न तो सरकार या न संस्था की ओर से थोक खरीद होती थी, फिर भी पुस्तकें बिकती थीं। जबकि उस समय आज की तरह न तो इतनी आबादी थी और न ही उतनी साक्षरता, लेकिन पुस्तकों की व्यक्तिगत खरीद पर्याप्त होती थी।

अगर बांग्ला भाषा में सर्वाधिक पुस्तकें बिकती हैं तो इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि यहाँ पाठकों ने पुस्तकों को प्राथमिक आवश्यकता के रूप में ग्रहण किया है। व्यक्तिगत खरीद का ही नतीजा है कि बांग्ला भाषा की पुस्तकों के मूल्य कम होते हैं। अगर अंग्रेजी भाषा की पुस्तकों का सवाल लें तो उसके मुकाबले हिन्दी की पुस्तकें आज भी सस्ती हैं। अंग्रेजी किताबें अगर यहाँ खरीदी जाती हैं तो उसका एक पहलू यह भी है कि वह न केवल शासक या प्रभुतासंपन्न लोगों की भाषा है बल्कि लोग इसे ‘स्टेटस सिंबल’ के रूप में भी खरीदकर रखते हैं।
यहाँ पुस्तकों के महंगा होने के पक्ष में तर्क-कुतर्क देने की अपेक्षा इस बात पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है कि आज का पाठक विषयों की विविधता भी चाहता है, वह केवल सर्जनात्मक साहित्य की ही लालसा नहीं रखता। प्रकाशकों को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए। रही बात सरकारी नीति की कि यह किताबों के प्रति फिल्मों की तुलना में उदार है तो वह इसी बात से जाहिर हो जाता है कि टीवी जैसे उपकरणों को तो सस्ता किया जा रहा है, लेकिन वह किताबों पर डाक खर्च में रियायत नहीं दे रही। यही कारण है कि भारत के दूर-दराज में बैठे पाठकों के लिए किसी पुस्तक का मूल्य डाक खर्च मिलाकर काफी महंगा पड़ जाता है।

कुल मिलाकर प्रकाशकों की मानसिकता, पुस्तक विक्रेताओं के रवैए और सरकारी नीतियों को साथ लेकर पुस्तकों के महंगा होने के कारणों पर विश्लेषण करने की जरूरत है।

लेख़क – चंद्र भूषण