अखबारी कागज की समस्या
देश में अखबारी कागज का उत्पादन इसकी खपत के मुताबिक नहीं होता है। अखबारी कागज की खपत इस समय करीब सात लाख टन सालाना है, जबकि घरेलू उत्पादन केवल चार लाख टन का ही होता है। इसलिए बाकी मात्रा का आयात दूसरे देशों से करना पड़ता है। वर्ष 1992-93 में 350 करोड़ रुपए का, 1993-94 में 40 करोड़ रुपए का और 1994-95 में करीब 550 करोड़ रुपए का अखबारी कागज आयात किया गया।
देश में इस समय 21 मिलें अखबारी कागज के उत्पादन में लगी हुई हैं। इनमें से छह सार्वजनिक क्षेत्र में हैं और 15 निजी क्षेत्र में, लेकिन इनकी कुल उत्पादन क्षमता (अखबारी कागज की) केवल 5.40 लाख टन सालाना है। चूँकि इस क्षमता का भी पूरा उपयोग नहीं हो पाता है, इसलिए वास्तविक उत्पादन केवल 4 लाख टन सालाना के करीब ही हो पाता है।
अखबारी कागज की मांग को देखते हुए कुछ वर्तमान अन्य कागज मिलों ने अपनी उत्पादन क्षमता का एक भाग अखबारी कागज के उत्पादन में लगाने का विचार किया है, क्योंकि लिखाई-छपाई का कागज बनाने वाली भी करीब 350 मिलें देश में हैं। इसके अलावा अखबारी कागज बनाने वाली कुछ नई मिलें भी खुलने की संभावना है। इन सबका हिसाब लगाया जाए तो इस सदी के अंत तक देश में अखबारी कागज की कुल उत्पादन क्षमता 10 लाख टन के करीब हो जाएगी। फिर भी निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि आने वाले वर्षों में अखबारी कागज की बढ़ी हुई मांग घरेलू उत्पादन से पूरी हो सकेगी। फिलहाल स्थिति यह है कि अखबारी कागज की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बहुत बढ़ गई हैं और घरेलू बाजार में भी। दरअसल घरेलू बाजार में कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों के अनुसार ही नहीं बढ़ती हैं, बल्कि घरेलू मांग को भी देखकर बढ़ती हैं।
जहाँ तक अंतरराष्ट्रीय बाजार का संबंध है, पिछले कुछ महीनों में कीमतें बहुत बढ़ी हैं। 1989 में औसत अखबारी कागज का अंतरराष्ट्रीय मूल्य 508 अमेरिकी डालर प्रति टन था जो वर्ष 1992 में एक बार गिर कर 455 डालर हो गया, लेकिन 1993 में वह फिर 464 डालर और 1994 में 483 डालर हो गया। इस वर्ष मार्च-अप्रैल में अखबारी कागज का अंतरराष्ट्रीय मूल्य 1000 डालर प्रति टन हो गया।
जहाँ तक घरेलू बाजार में अखबारी कागज की कीमत का संबंध है, जून 1989 में घरेलू अखबारी कागज की औसत कीमत 13,350 रुपए प्रति टन थी जो जून 1990 में बढ़ कर 14,300 प्रति टन हो गई। इन कीमतों की तुलना में राज्य व्यापार निगम के आयात किए गए कागज की कीमत जून 1989 में 12,715 रुपए प्रति टन और जून 1990 में 11070 रुपए प्रति टन थी। जून 1991 में घरेलू अखबारी कागज की कीमत 15,700 रुपए से लेकर 18,000 रुपए प्रति टन थी जो फरवरी 1995 में बढ़कर 21,000 रुपए से लेकर 22,500 रुपए प्रति टन हो गई। इस समय औसत कीमत 26,000 रुपए प्रति टन है।
इन कीमतों को देखते यदि देश के समाचार पत्र यह महसूस करने लगें कि बजाय घरेलू कागज के आयातित अखबारी कागज का ही इस्तेमाल बेहतर है तो उसे किसी तरह अनुचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि एक तो आयातित कागज की तुलना में घरेलू कागज महंगा है, दूसरे गुणवत्ता में हल्का है। लेकिन अभी तक मुश्किल यह थी कि सरकार ने अखबारी कागज के आयात पर कई तरह की पाबंदियां लगा रखी थीं।
उन पाबंदियों के मुताबिक अखबारों को सरकार से जारी किए गए अधिकार पत्र के आधार पर ही अखबारी कागज घरेलू बाजार से खरीदने और दूसरे देशों से आयात करने का अधिकार मिलता था। जिन अखबारों को 200 टन स्टैंडर्ट अखबारी कागज खरीदने का अधिकार मिलता था उनके लिए यह शर्त थी कि यदि वे घरेलू मिलों से दो टन अखबारी कागज खरीदेंगे तो ही उनको एक टन स्टैंडर्ट अखबारी कागज बाहर से आयात करने की अनुमति मिलेगी। मजे की बात यह थी कि घरेलू मिलों का कागज गुणवत्ता में हल्का था और कीमत में ज्यादा। फिर भी उसे खरीदने की मजबूरी थी। इसलिए समाचार पत्रों की ओर से काफी वर्षों से यह मांग आ रही थी कि अखबारी कागज का आयात खुले आयात लाइसेंस के अंतर्गत करने की छूट दी जाय। इस वर्ष अप्रैल के अंत में सरकार ने यह मांग स्वीकार कर ली। सरकार ने समाचार पत्रों पर से सभी प्रकार की पाबंदियां हटाते हुए उनको अखबारी कागज का आयात खुले आयात लाइसेंस के तहत करने की अनुमति दे दी है। साथ ही आयात को आयात शुल्क से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है। चाहे सरकार ने यह कदम अखबारों की पुरानी मांग को ध्यान में रखकर उठाया हो अथवा अंतरराष्ट्रीय बाजार में बदलते हुए परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए, बहरहाल जो कदम उठाया है, वह स्वागत योग्य है।
इसके बावजूद देश के अखबार हमेशा ही विदेशों से आयात किए जाने वाले कागज पर निर्भर नहीं रह सकते। इसके दो कारण हैं। पहला तो यह कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रसार के बावजूद, प्रिंट मीडिया का प्रसार भी घटा नहीं, बल्कि बढ़ा है। इस कारण अखबारी कागज की मांग सभी देशों में बढ़ रही है। दूसरा कारण यह है कि बढ़ती हुई मांग को देखकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अखबारी कागज का मूल्य बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं। इसलिए बेहतर होगा कि अभी से हम अखबारी कागज का घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश करें। साथ ही उसकी गुणवत्ता में सुधार करने का प्रयत्न भी करें। उत्पादन बढ़ने से कीमतों में भी कमी आएगी, लेकिन वह तभी संभव हो सकता है जब बजाय नई इकाइयां लगाने के पुरानी मिलों की क्षमता में ही वृद्धि की जाए।




