साहित्य के सम्मान और अपमान की राजनीति
कृष्णा सोबती ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को चिट्ठी में तो यही लिखा है कि सन् 91-92 का शलाका सम्मान वे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करती हैं। लेकिन उनकी चिट्ठी आप पढ़ें तो लगे कि यह विनम्रता नहीं है। काफी सख्त चिट्ठी है।
जैसे कृष्णा जी ने लिखा है ‘अकादमी के पत्र में इस बात की कोई जानकारी नहीं मिलती कि क्यों और कैसे 91-92 का शलाका सम्मान दोबारा जागृत किया जा रहा है। श्रीमान्, कहीं ऐसा तो नहीं कि आप लेखकों को राजनैतिक दलों के भड़वे, मीरासी और दलाल समझ बैठे हों कि देर-सबेर जब आपकी ड्योढ़ी से उन्हें आवाज दी जाएगी, वे जय हो, जय हो करते हुए आपके मंच पर दुशाला और सम्मान लेने पहुँच जाएंगे।’
इसे राजनैतिक लोग भी विनम्रता नहीं कहेंगे। लेकिन कृष्णा सोबती जैसी बड़ी और बुजुर्ग लेखिका जब ऐसी भाषा लिखती हैं तो इतना तो साफ है कि दिल्ली की हिंदी अकादमी के व्यवहार और उसकी चिट्ठी ने उन्हें बुरी तरह अपमानित किया है। अकादमी भले ही एक निर्वाचित सरकार की हो और विधि से उसे हिंदी भाषा, उसके साहित्य और लेखकों-पत्रकारों के मामले देखने का जिम्मा सौंपा गया हो, उसे किसी लेखक का अपमान करने का कोई अधिकार नहीं है और इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली की हिंदी अकादमी ने कृष्णा सोबती का ही नहीं उन सब लेखकों-पत्रकारों का अपमान किया है जिन्हें 91-92 के शलाका और दूसरे सम्मान देने की घोषणा कोई दो साल पहले की गई थी। लेकिन ये सम्मान समय पर दिए नहीं गए और अब जब कि दिए जा रहे हों तो किसी को बताने तक का शिष्टाचार नहीं बरता गया कि तब ये क्यों नहीं दिए गए और अब क्यों दिए जा रहे हैं।
जो संस्था किसी का सम्मान करती है उसमें कम से कम इतनी तमीज तो होनी चाहिए कि जिसका सम्मान कर रही है उसके साथ और नहीं तो सम्मान का व्यवहार तो करे। लेकिन सरकारी अकादमी चाहे हिंदी की सेवा करने वाले लेखकों-पत्रकारों का सम्मान करने को बनी हो चाहे और कोई काम करने के लिए, वह अपने अफसरों और उन्हें चलाने वाले राजनेताओं को ही सबसे महत्वपूर्ण और सम्मानीय मानती है। अफसरों और राजनेताओं में यह मिलीभगत है कि राज्यसत्ता के सामने समाज को चलाने वाली और किसी भी सत्ता की चलने न दी जाए। सर्जक चूंकि स्वभाव से ही स्वतंत्र होता है और शब्द की सत्ता राज्य-सत्ता से कहीं अधिक टिकाऊ और दूर और देर तक असर करने वाली होती है इसलिए लेखकों-कलाकारों के प्रति राज्यसत्ता की उद्दंडता जरा ज्यादा ही दिखाई देती है।
कृष्णा सोबती को अगर लगा कि राजनीतिक लेखकों को भड़वे, मीरासी और दलाल समझने की जुर्रत कर रहे हैं तो उनका कयास कोई बहुत गलत नहीं है। दिल्ली की हिंदी अकादमी ने लेखकों-पत्रकारों के साथ ऐसा बर्ताव किया है जैसे वे उसकी सरकार से पेंशन पाने के लिए लाइन लगा कर खड़े हों और जब उनके केस का निपटारा हो गया हो तो उन्हें बुलाया गया हो कि आओ अपने जिंदा होने का प्रमाण पत्र लाओ और पैसे ले जाओ। नहीं तो इसका क्या मतलब है कि सन् 91-92 के सम्मानों के लिए जुलाई 96 में बुलाया जाए और कहा जाए कि अपना एक श्वेत-श्याम चित्र भेज दीजिए और बताया नहीं जाए कि वे सम्मान तब क्यों रोके गए थे और अब क्यों दिए जा रहे हैं। सम्मानित लेखक पत्रकार का इतना अधिकार तो है ही कि जाने कि ऐसा क्यों हुआ? लेकिन अकादमी में इतनी उत्तरदायिता, इतना जीवन और साहस कहां है कि जो अधिकृत तौर पर बताया नहीं जा सकता बल्कि जिसके होने को ही स्वीकार नहीं किया जा सकता उसे आम जनता को नहीं तो उन लेखकों-पत्रकारों को तो बताए जिनका सम्मान इससे प्रभावित होता है। सार्वजनिक जीवन और सरकारी कामकाज में स्वच्छता, शुचिता और पारदर्शिता की बात तो जैसे दूसरे करते हैं वैसे दिल्ली की सरकार चलाने वाले भाजपाई भी करते हैं लेकिन उनकी भी कथनी और करनी में उतना ही दोमुँहापन है जितना दूसरी पार्टियों के लोगों में।
जैसे सन् 91-92 के सम्मान वर्ष 93-94 में नहीं दिए गए क्योंकि सन् 93 में दिल्ली को राज्य का जो दर्जा मिला था उसके अनुसार विधानसभा चुनाव हुए और लोगों ने भाजपा को चुना और उसकी सरकार बनी। केंद्र शासित क्षेत्र होने के कारण अब तक दिल्ली में सरकार उप राज्यपाल चलाया करते थे। अब मुख्यमंत्री सरकार का कार्यकारी अधिकारी हो गया। कहते हैं अब तक जिन हिंदी, उर्दू, पंजाबी, अकादमियों का अध्यक्ष उप राज्यपाल हुआ करता था उसकी अध्यक्षता करने का निश्चय मुख्यमंत्री ने किया। पर इन अकादमियों के संविधान में लिखा था कि इनका पदेन अध्यक्ष उप राज्यपाल होगा। अब सरकार ने फैसला बाकायदा किया होता तो वह अकादमियों को लिख सकती थी कि महासमितियों की बैठक बुला कर संविधान बदलो। सरकार कह सकती थी कि दिल्ली चूँकि केंद्र शासित क्षेत्र से राज्य हो गई इसलिए अकादमियों का अध्यक्ष अब निर्वाचित मुख्यमंत्री होगा।
दिक्कत शायद यह होगी कि पूरे राज्य के दर्जे वाले कई राज्यों में भी स्वायत्त कही जाने वाली संस्थाओं के अध्यक्ष मुख्यमंत्री नहीं राज्यपाल हैं और ऐसा कोई लोकतांत्रिक नियम नहीं है कि निर्वाचित मुख्यमंत्री ही अकादमियों का अध्यक्ष हो। बल्कि राजनीति की सीधी दखलंदाजी से बचाने और उसका स्वायत्तशासी स्वरूप बनाए रखने के लिए यही वांछित है कि राज्यपाल को अकादमियों का अध्यक्ष बना दिया जाए। भले ही अब यह भी सही हो कि राज्यपाल राज्य के प्रतिनिधि के बजाय केंद्र की राजनीति के एजेंट की तरह ज्यादा काम करते हैं। फिर भी ऐसी संस्थागत व्यवस्था करनी चाहिए कि जिन संस्थाओं का स्वायत्त और राजनीति से ऊपर होना जरूरी हो वे वैसी बनी रह सकें। इसलिए दिल्ली के उपराज्यपाल हिंदी, उर्दू, पंजाबी आदि अकादमियों के अध्यक्ष बने रहते तो कोई लोकतांत्रिक वंचन नहीं हो जाता।
लेकिन कहते हैं मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना बहुत उत्सुक थे कि अकादमियों की सीधी देखरेख उनके पास हो और इन पर निगरानी रखने के लिए उन्होंने भाजपा के सांसद विजय कुमार मलहोत्रा को कहा था। कहते हैं मलहोत्रा ने ही उन्हें कहा था कि अकादमियों का संविधान मुख्यमंत्री को अध्यक्ष नहीं बनाता। अब पक्का कहा नहीं जा सकता कि मुख्यमंत्री बहुत उत्सुक थे कि वही अकादमियों के अध्यक्ष हो जाएं- या नई सरकार की कृपाकांक्षी नौकरशाही या सत्ता में नई-नई आई पार्टी चाहती थी कि अकादमियों पर राजनीति का राज चले।
अपना निजी अनुभव यह है कि नौकरशाही और सत्ता की भलाई का धक्का पाने को उत्सुक पार्टी मुख्यमंत्री से कई बार ज्यादा सत्ताकांक्षी होती है। गए साल अपना साबका उत्तर प्रदेश के हिंदी संस्थान से पड़ा था। वह भी पुरस्कार, सम्मान आदि देने वाली संस्था है। कथाकार निर्मल वर्मा और इस कलमघसीट को लोहिया अति विशिष्ट और विशिष्ट सम्मानों की घोषणा हुई। न निर्मल जी से पूछा गया था न अपने से कि सम्मान लेंगे या नहीं।
सम्मान हिंदी दिवस-14 सितंबर को दिए जाते हैं। लेकिन इसके पहले ही मुलायम सिंह यादव की सपा-बसपा सरकार गिर गई और भाजपा की मदद से अकेली बसपा की मायावती सरकार बन गई। अब नौकरशाही को लगा कि मायावती मुलायम सिंह यादव से दुश्मनी पाले बैठी है और लोहिया जी उनके गुरु थे इसलिए कहीं वे ये सम्मान दिए जाने से नाराज न हो जाएं सो कोई पहल नहीं की। कहा कि सरकार से फ़ाइल क्लियर होकर नहीं आई जब कि सच्चाई यह थी कि फ़ाइल मुख्यमंत्री के दफ्तर में गई ही नहीं। अब अपन थोड़ी बहुत नौकरशाही को और थोड़ी बहुत राजनीति को जानते हैं इसलिए इनके शिकार होने की नौबत नहीं आई। नहीं तो निर्मलजी और अपनी बारह बजवाने में संस्थान और उससे लगी नौकरशाही ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जब यह सब चल रहा था तभी गाँधी पुरस्कार की चयन समिति की बैठकें भी हो रही थीं। अपन भी उसके एक सदस्य थे। चूँकि संस्थान के उपाध्यक्ष लक्ष्मीकांत वर्मा तब हट गए थे इसलिए एक अफसर अध्यक्षता करते थे। तीन बैठकों के बाद लगा कि टालमटोल हो रही है। शायद इसलिए कि मुख्यमंत्री बहन मायावती गाँधीजी के बारे में अपने उच्च विचार प्रकट कर चुकी हैं इसलिए उत्सुकता न दिखाने की सावधानी बरती जा रही है। एक बार यह भी कहा गया कि कोई जरूरी नहीं है कि गाँधी पुरस्कार गाँधी जयंती पर दिया ही जाए।
मायावती की कृपाकांक्षी बने रहने के चक्कर में हिंदी संस्थान को नौकरशाही कहीं गाँधी पुरस्कार का ही कबाड़ा न कर दे इसलिए अपन ने समिति से इस्तीफा दे कर मामले को सार्वजनिक किया। पुरस्कार आखिर गाँधी जयंती पर ही विष्णु प्रभाकर को दिया गया। लेकिन राजभवन के गाँधी जयंती समारोह में। आपको मालूम भी नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा गाँधी के नाम का पुरस्कार विष्णु प्रभाकर को दिया गया है। तब मायावती की सरकार जा रही थी। लेकिन उनके वज्रपात से बचने को उत्सुक नौकरशाही-राष्ट्रपिता की सवा सौवीं जयंती के अवसर पर घोषित पुरस्कार की गरिमा भी नहीं रख सकती थी। नौकरशाही के लिए अपने हित राष्ट्रपिता के सम्मान से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
यह सब इसलिए नहीं लिखा कि जिम्मेदारी अपने मित्र मदनलाल खुराना से हटा कर नौकरशाही या उनकी पार्टी पर डालना चाहता हूँ। लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि खुराना की राजनीति साहित्य की राजनीति से नहीं सत्ता की राजनीति से ही चलती है। बहरहाल वास्तविकता यही है कि अकादमियों की अध्यक्षता के झगड़े में हिंदी अकादमी का काम लगभग ठप्प रहा। कार्यकारिणी के दबाव पर उप राज्यपाल दवे ने 91-92 के सम्मानों की घोषणा कर दी। वे खुद भी अध्यक्षता छोड़ने के अनौपचारिक दबाव में थे और घोषणा करके मुक्त हो जाना चाहते थे।
मुख्यमंत्री के अध्यक्ष होने और सचिव और महासमिति का कार्यकाल समाप्त होने में इतना समय लग गया कि न तो 91-92 के सम्मान देने दिए गए न अगले वर्षों के सम्मान तय हुए। जब उप राज्यपाल और उनकी बनाई समितियों के निशान भी नहीं बचे तब भारतीय संस्कृति की रक्षक भाजपा ने साहित्य और संस्कृति की निष्कंटक जिम्मेदारी संभाली। अकादमी कह तो नहीं सकती कि 91-92 के सम्मान इसलिए नहीं दिए गए कि हिंदी अकादमी ने झटपट मुख्यमंत्री को अध्यक्ष बनाने का निर्णय कर के अपना संविधान नहीं बदला। वह यह भी कैसे कहे कि नई सरकार ने अनौपचारिक निर्णय लिया था कि अकादमियों का अध्यक्ष उप राज्यपाल नहीं मुख्यमंत्री होना चाहिए। क्योंकि इनमें से कोई भी बात औपचारिक कार्यवाही में नहीं आ सकती और इनका अधिकृत तौर पर कोई नोटिस नहीं लिया जा सकता।
लेकिन जब मुख्यमंत्री अध्यक्ष हो गए और नई महासमिति बन गई तब भी 91-92 के सम्मानों के साथ 92-93 के सम्मानों की घोषणा नहीं हुई। कहते हैं इसका भी कारण यह था कि नई सरकार और नई महासमिति कम्युनिस्टों की समिति द्वारा कम्युनिस्टों को दिए गए सम्मान नहीं देना चाहती थी। वह तो 94-95 के सम्मानों के साथ 91-92 के सम्मान देने का निर्णय भी नहीं होता अगर विधि की व्यवस्था नहीं होती कि एक बार घोषित किए गए पुरस्कारों-सम्मानों के दिए जाने के बाद ही अगले साल के सम्मान दिए जा सकते हैं। यानी कृष्णा सोबती और दूसरे लेखकों-पत्रकारों को घोषित सम्मान इसलिए दिए जा रहे हैं कि कानूनी मजबूरी है। इस पर कृष्णा सोबती को गुस्सा आता है और वे एक सख्त पत्र लिखती हैं तो क्या खराबी करती हैं?
अब कृष्णा सोबती को कोई भी हिंदी पढ़ने वाला साम्यवादी रुझान की लेखिका नहीं कहेगा। 91-92 के सम्मानों में एक विश्वनाथ त्रिपाठी को छोड़कर किसी को भी कम्युनिस्ट नहीं कहा जा सकता। फिर तब की महासमिति उपराज्यपाल मार्कंडेय सिंह ने बनवाई थी और बाद में पीके दवे उपराज्यपाल हुए। इन दोनों को न तो कम्युनिस्ट कहा जा सकता है न साम्यवादी रुझान या सहानुभूति वाले अफसर। दोनों ही उप राज्यपाल बनने के पहले आई.ए.एस. अफसर थे। चयन समिति में नामवर सिंह, हरभजन सिंह, सुधीश पचौरी, निर्मला जैन और सचिव के नाते विजय मोहन सिंह थे।
यह सही है कि ये लोग भाजपा समर्थक या उस पार्टी से सहानुभूति रखने वाले लेखक नहीं हैं। लेकिन क्या लेखकीयता पार्टी लाइन से तय होगी? प्रगतिशील लेखन के जमाने में कम्युनिस्टों ने भी पार्टी लाइन से लेखकीयता तय की थी और इस कारण कई सर्जक लेखक उससे अलग भी हुए थे। लेकिन जो कम्युनिस्टों ने कभी किया या मौका लगने पर आज भी करेंगे वही भाजपा को भी करना चाहिए? चूंकि कम्युनिस्टों ने किया था या यह उनकी आदत है इसलिए भाजपा का वही करना उचित ठहराया जा सकता है? और क्या राज्य अपनी सरकार की पार्टी की विचारधारा पर तय करेगा कि कौन लेखक सम्मानीय है और कौन नहीं क्योंकि वह कम्युनिस्ट है या भाजपाई?
फिर यह भी कि क्या लेखक कम्युनिस्ट या भाजपाई है इसलिए उसका अपमान किया जा सकता है? क्या सर्जनात्मकता और लेखकीय महानता राजनैतिक विचारधारा से तय की जा सकती है? पार्टी और सरकार जब साहित्य और दूसरी कलाओं के बारे में तय करने लगती है तो वही होता है जो लेनिन-स्टालिन के बाद रूस के साहित्य और कलाओं का हुआ। उसकी सर्जनात्मकता जाती रहती है और प्रचार के लिए लिखा गया साहित्य बंजर होता है। विचारधारा के आग्रह वाली पार्टियां साहित्य की स्वतंत्र सत्ता नहीं मानती वह चाहे कम्युनिस्ट पार्टी हो या भाजपा। इसीलिए भाजपा सत्ता में आते ही उन संस्थाओं की स्वायत्तता को नष्ट करती है जिनमें सृजन का आग्रह हो। अपने यहां कांग्रेस और दूसरी पार्टियां भी यही करती हैं। इसीलिए स्वायत्त संस्थाएं समाप्त हो रही हैं।
हिंदी अकादमी कृष्णा सोबती को क्या जताए कि उन्हें 91-92 का शलाका सम्मान अब क्यों दिया जा रहा है? पार्टियां और सरकारें जो कहती हैं उसे ताल ठोक कर कहने का साहस नहीं है। हमारे लोकतंत्र की कुंजी यही है कि जो करना है आड़ में छुपा कर करो। कृष्णा सोबती की भाषा में इसकी गुंजाइश नहीं है।
लेखक – प्रभाष जोशी




